सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja

महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा

DevanagariHindipublished368 पृष्ठ

पृष्ठ 288, कुल 368 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 288

सुन्दरविमान ] [ २६५
ततोपामागंबीजाना तैलमेकादशांशकम् ।
सर्पास्यबीजतैलं च द्वात्रिंशाश तथैव हि ॥ १२३ ॥
चत्वारिशदयस्कान्ततैलाश च यथाक्रमम् ।
त्र्युत्तराशीतिभागाशगजमूत्रे नियोजयेत् ॥ १२४ ॥
तैलत्रयतृतीयाशादधिक गजमूत्रकम् ।
मेलयित्वा सप्रमाणमुदीची केन्द्रसस्थिते ॥ १२५ ॥
पश्चात् ११७ संख्या तडित्मणि ? को मध्यभाग वाले में रखे, इस प्रकार पश्चिम केन्द्रपात्र में
भर कर पुन' उत्तर पात्र में कहे जाने वाले पदार्थों को भरे फिर अपामार्ग-चिडचिडे के बीजों का तैल
११ भाग ३२ अंश सर्पास्य बीज- सर्पास्य ? नागकेसर बीज का तैल ४० भाग अयस्कान्त का तैल ८३
गजमूत्र-हाथी के मूत्र में डाल दे फिर तीनों तैलों के तृतीय अंश से अधिक हाथी का मूत्र मिलाकर
उत्तर दिशा के केन्द्र में स्थित हुए-॥ १२१-१२५ ॥
पात्रे सम्पूरयित्वाथ पश्चात् तस्मिन् यथाविधि ।
पारद सेहिकक्षार तथा पार्वणिसत्त्वकम् ॥१२६॥
त्रिंशद्विंशत्पञ्चविंशत्पलभागान् पृथक् पृथक् ।
प्रत्येक तोलयित्वाथ सम्यक् सम्पूरयेत् क्रमात् ॥१२७॥
मणिप्रकारेणोक्ताष्टशतसंख्यात्मक शिवम् ।
स्थापयेद् भास्करमणि तन्मध्ये तैलशोधितम् ॥ १२८ ॥
एवमुत्तरकेन्द्रस्थपात्रे वस्तुप्रपूरणम् ।
कृत्वा दक्षिणकेन्द्रस्थपात्रेण्येव यथाविधि ॥ १२६ ॥
द्वादशद्वैर्काविंशतषोडशभागशका क्रमात् ।
ग्रन्थिद्रावक (च) पञ्चमुखीद्रावकमेव च ॥ १३० ॥
श्वेतापुङ्खाद्रावक च मेलयित्वा यथाविधि ।
गोमूत्रे द्रवभागाशात्पञ्चभागाधिके क्रमात् ॥ १३१ ॥
पात्र में भर कर पश्चात् उसमें यथाविधि पारा, सैहिक क्षार, वही कटेली का क्षार, पार्वणि-
सत्त्व-वंशसत्त्व-वंशलोचन ? या जिसके पर्व पर्व में वैसा ही अङ्ग हो ईख की भांति, लाल रंग, लम्बे
पत्ते, लाल फूल, सूक्ष्म कांटे वाला, सर्पविष विनाशक, कडुवे सार वाला कृष्णपक्ष में खिलने वाला (देखो
कापी १४ श्लोक ७८-८०) पार्वणि वृक्ष होता है ये तीनों ३०, २०, २५ पल अर्थात् १२०, ८०, १००
तोला क्रम से भागों को पृथक् पृथक् प्रत्येक तोल कर भली प्रकार भर दे, मणि प्रकार से उक्त आठ सौ
संख्यात्मक तैल से शोधित कल्याण कर भास्करमणि-सूर्यकान्त मणि को उसके मध्य में स्थापित करे ।
इस प्रकार उत्तर केन्द्र में स्थित पात्र में वस्तु प्रपूरण करके दक्षिण केन्द्रस्थ पात्र में भी यथाविधि १२,
२१, १६ भाग रूप क्रम से ग्रन्थिद्रावक-पिप्पला मूजरस, वासारस, श्वेत शरपुंखा रस या श्वेतगुञ्जा
रस यथाविधि मिला कर उक्त द्रव भागांशों से ५ भाग अधिक अर्थात ५४ भाग गोमूत्र में क्रम
से-॥ १२६-१३१ ॥