सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja

महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा

DevanagariHindipublished368 पृष्ठ

पृष्ठ 296, कुल 368 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 296

सुन्दरविमान ] [ २७३
तारोंद्वारा इस शक्ति को लेकर पूरकपात्र में सावधान चित्त से सप्रमाण भरदे, वहां की मणि
उस शक्ति को पात्र में संग्रह कर देती है ॥ १६७-२०२ ॥
शक्तिपूरकपात्रस्य पुरोभागे तत परम् ।
वितस्तिपञ्चकायामं वितस्तित्रयमुन्नतम् ॥२०३॥
कुम्भवद् वर्तुलाकार पात्रमेक न्यसेद् दृढम् ।
तत्पात्र वेष्टयेत्सम्यग् वारिवृक्षस्य चर्मणा ॥२०४॥
सार्वकालं यतो वारि तस्मिन् प्रवहति स्वयम् ।
ततो वारिप्रतिनिधि वारिचर्मनिरूपितम् ॥२०५॥
एतेन पात्रस्य जलावरण प्रभवेद् यथा ।
तथैव वारिवृक्षस्य चर्मणा भवति ध्रुवम् ॥२०६॥
सन्धार्य पश्चात् तत्पात्रे सप्रमाण यथाविधि ।
शिखावलीद्रावकस्य द्वादशांश तथैव हि ॥२०७॥
अष्टादशांशायस्कान्तद्रावक तदनन्तरम् ।
वज्रचुम्बकद्रावस्य द्वाविंशांश यथाक्रमम् ॥२०८॥
सम्पूर्य काचपात्रेषु स्थापयेत् सुदृढ यथा ।
शक्तिपूरक यन्त्र के सामनेवाले भाग में ५ बालिश्त लम्बा ३ बालिश्त ऊंचा घड़े के समान
गोल पात्र रखदे उस पात्र को भली प्रकार बारिवृक्ष—हीबेरवृक्ष की छाल से लपेट दे, जिससे कि
सर्वकाल उसमें स्वयं वारि—जल बहता है तब ही वारि—जल का प्रतिनिधि बारिचर्म कहा गया है ।
इससे पात्र का जलावरण होजावे वैसे वारिवृक्ष के चर्म से यह ध्रुव होजाता है फिर उस पात्र में यथा-
विधि सप्रमाण रखकर शिखावली द्रावक—(शिखी) चित्रकवृक्ष ? या अपामार्ग ? के द्रावक में या
(शिखिकण्ठ) नीलाथोथा के द्रावक का १२ अंश १८ अंश अयस्कान्तद्रावक पुन २२ अंश वज्रचुम्बक-
द्रावक काचपात्रों में सुदृढ भरकर रखदेना ॥२०३-२०८॥
पूर्वोक्तकाचावरणलोहनालस्य तन्त्रिभि ॥२०९॥
शक्तिपूरकपात्रादाहृत्य शक्तिं यथाविधि ।
पात्रस्थद्रवपात्रेषु सम्यक् पूरयितुं क्रमात् ॥२१०॥
एकै कनाले चत्वारि यन्त्रघस्रशोभितास्तत ।
काचचक्रमूलात्सम्यक् सन्धार्याथ यथाविधि ॥२११॥
पूर्वोक्तपात्रान्तरस्थकाचपात्रेषु द्रावके ।
सम्पूर्य पश्चात् तत्पात्रमूलात् तन्त्रीद्वय क्रमात् ॥२१२॥
शक्तिमार्किविषु बाह्ये कीलैस्संयोजयेद् दृढम् ।
पुनस्तत्कीलकाभ्या तत्तन्त्रीद्वयमृजुर्यथा ॥२१३॥