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बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja

महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा

DevanagariHindipublished368 पृष्ठ

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सुन्दरविमान ] [ २६७
में रख कर तीन मुख वाली भस्त्रा से धमन करे ४२३ दर्जे की उष्णता के वेग से तपाकर-गला कर उस
गले रस को यन्त्रमुख में धीरे से भर दे यह चपलग्राहक लोहा हो जावे ॥ १३७-१४२ ॥
शक्तिपूरकपात्रनिर्णय. — शक्तिपूरक पात्र का निर्णय —
वितस्तिपञ्चकायाम विस्त्राष्टकमुन्नतम् ।
अर्धचन्द्राकृति पीठ गात्रमेकवितस्तिकम् ॥ १४३ ॥
चपलग्राहकलोहेनैव कुर्याद् यथाविधि ।
शक्तिपूरकपात्र तन्मध्ये संस्थापयेत् क्रमात् ॥ १४४ ॥
पात्रमूल बृहत्कुम्भाकारवद् वर्त्तुलं तथा ।
द्रोणवन्मुखभाग च कल्पयित्वा यथाविधि ॥ १४५ ॥
एतदाकारत. काचकवच तस्य कारयेत् ।
वितस्तित्रयमायाम षड्वितस्त्युन्नत तथा ॥ १४६ ॥
नालद्वय प्रकर्तव्य द्रोणवत्सुदृढ यथा ।
स्थापयेत् तत्पात्रमध्ये दक्षिणोत्तरत क्रमात् ॥ १४७ ॥
५ बालिश्त लम्बा ८ बालिश्त ऊंचा अर्धचन्द्राकार वाला नीचे का भाग १ बालिश्त मोटा
चपलग्राहक लोहे का शक्तिपूरक पात्र यथाविधि करे, उसके बीच में पात्रमूल बड़े घड़े के आकारजैसा
गोल कलश की भांति मुखभाग बनाकर ऐसे आकार में कांच का कवच उसका बनावे, ३ बालिश्त लम्बा
६ बालिश्त उठा हुआ तथा दो नाल कलश की भांति दृढ करने चाहिएं, उन्हें पात्र के मध्य में दक्षिण
और उत्तर के क्रम से स्थापित करे ॥ १४३-१४७ ॥
चक्रद्वय चोभयनालमध्ये स्थापयेत् क्रमात् ।
तयोरावरणा कुर्यात् काचेनैवाथ पूर्ववत् ॥ १४८ ॥
चक्रयोरुभयोर्मध्ये नालयोर्वाह्यत क्रमात् ।
सन्धिकील कल्पयित्वा स्थापयेत् सरल यथा ॥ १४६ ॥
भ्रमणात् सन्धिकीलस्य नालयोरुभयोरपि ।
चक्राणि भ्रामयेद् वेगात् तेन शक्त्यूर्ध्वगा भवेत् ॥१५०॥
चतुर्दिक्षु स्थितविद्युत्पात्रमूलाद् यथाविधि ।
मध्यपात्रस्थनालद्वय मूलावधि क्रमात् ॥ १५१ ॥
नालद्वयमयस्कान्तलोहेन रचित तत ।
षडङ्गुलायामयुक्त सन्धान कारयेदथ ॥ १५२ ॥
दो नालों के मध्य में दो चक्र स्थापित करे उन चक्रों का कांच से आवरण पूर्व जैसा करे,
दोनों चक्रों के बीच में नालों की बाहिरी ओर क्रमश: सन्धि कील लगा कर सरल रखे, सन्धिकील के
भ्रमण से दोनों नालों के चक्र को वेग से घुमावे इससे चारों दिशाओं में स्थित विद्युत्पात्र मूल से मध्य-
पात्रस्थ दो नालों के मूल के अवधिक्रम से शक्ति ऊर्ध्वगामी हो जावेगी, दो नालें अयस्कान्त से रचे पुन
६ अङ्गुल लम्बा जोड लगावे ॥ १४८-१५२ ॥