बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja
महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा
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एव क्रमेणैव कृत्वा पञ्चपात्राण्यथाविधि ।
पीठस्थपञ्चकेन्द्रेषु स्थापयेत्कीलकशङ्कुभि ॥ ११२ ॥
पश्चान्मूत्र ग(r?)र्दभाना षोडशद्रोणसम्मितम् ।
लिक्कूषोडशकेङ्गारान् सुदृढ खनिजोद्भूवान् ॥ ११३ ॥
तथैव लवणालिकुत्रय चैव तत परम् ।
लिक्द्वय शुद्धसापं शुद्ध लिक्द्वय रविम् ॥ ११४ ॥
पूरयेत् पूर्वदिक्पात्रे तत्तद्भागानुसारत ।
एव सम्पूर्य प्राचीदिक्पात्रे पश्चात् तथैव हि ॥ ११५ ॥
फिर पात्रमुख में हुए छिद्र को दृढ सब ओर से ढक कर चर्म को शंकुओं से बान्ध दे पश्चात्
पीठस्थ पांच केन्द्रों में पांच यन्त्र कीलशंकुओं से स्थापित कर दे। फिर गधों का मूत्र १६ द्रोण (मण)
परिमाण १६ लिक्षु (डिग्री) उष्णता परिमाण खनिज से उत्पन्न अङ्गार तथा ३ लिक्षु परिमाण लवण २
लिक्षु शुद्ध सापे सर्पविष, २ लिक्षु रवि-ताम्बा या आख वृक्ष, पूर्व दिशा के यन्त्र में भर दे उस उसके
भागानुसार से इस प्रकार पूर्व पात्र में भर कर-॥ १११-११५ ॥
पश्चात् पश्चिमदिक्पात्रे वक्ष्यमाणान् प्रपूरयेत् ।
सप्तविद्युद्गममणि प्राणक्षारत्रयोदश ॥ ११६ ॥
द्वाविंशच्छशविष्ठा(१?) च सम्मेल्य विधिवत्तत ।
यन्त्रे सम्पूर्य विधिवदाहरेद् द्रावक क्रमात् ॥ ११७ ॥
भागद्वय चोष्ट्र्मूत्र द्रावकस्यैकभागकम् ।
पूरयित्वा प्रतीचीदिग्भाण्डे सम्यक् प्रमाणत ॥ ११८ ॥
पश्चात्खड्गमृगास्थीनि पञ्चाशल्लिकुमेव हि ।
लिक्कूत्रिशद् गन्धक च चिञ्चाक्षारस्तथैव हि ॥ ११९ ॥
लिक्कूषोडशक तद्वदयस्कान्तमत परम् ।
अष्टाविशल्लिकूमात्रं तन्मूत्रे सन्नियोजयेत् ॥ १२० ॥
पश्चात् पश्चिम दिशा वाले पात्र में आगे कहे जाने वाले पदार्थों को भर दे, ७ भाग विद्युद्-
गममणि-चुम्बक ? १३ भाग प्राणक्षार-नवसादर, २२ भाग शश की विष्ठा एक पात्र में विधिवत्
मिला कर यन्त्र में भर कर द्रावक-अर्क निकाल फिर २ भाग ऊण्ट का मूत्र द्रावक का एक भाग पश्चिम
दिशावाले पात्र में भर का पश्चात् ५० लिक्षु गेण्ड मृग की हड्डियां ३० लिक्षु गन्धक, १६ लिक्षु चिंचा-
क्षार-अमली का क्षार, २ लिक्षु अयस्कान्त, २८ लिक्षु प्रमाण मूत्र में डालदे-मिलादे ॥ ११६-१२० ॥
पश्चात् सप्तदशोत्तरशतसख्यात्मकं पुन ।
तद्विन्निममणिं तस्मिन् स्थापयेन्मध्यभागके ॥ १२१ ॥
एव सम्पूर्य विधिवत् पश्चिमे केन्द्रपात्रके ।
वक्ष्यमाणपदार्थांश्चोत्तरपात्रे प्रपूरयेत् ॥ १२२ ॥