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बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja

महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा

DevanagariHindipublished368 पृष्ठ

पृष्ठ 291, कुल 368 में से

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पृष्ठ 291

२६८ ] [ बृहद् विमानशास्त्र
वेष्टयेद् रुरुमृगचर्म नालद्वयोपरि ।
तस्योपरि पुनः पट्टतन्तुर्वा पटमेव वा ॥ १५३ ॥
वेष्टयेत्सुदृढं सम्यक् पश्चात् तन्नालयो क्रमात् ।
कृत्वा वज्रमुखो ताम्रतन्त्रीन् द्रावकशोधितान् ॥ १५४ ॥
एकैकनालान्तराले द्वौ द्वौ तन्त्रीन् नियोजयेत् ।
तत्तन्त्रीन् शक्तिपूरकपात्रनालद्वयान्तरे ॥ १५५ ॥
संधारयेत्समाहृत्य काचकुप्पिकपूर्वकम् ।
शक्तिपूरकपात्रेथ पारमष्टपलं न्यसेत् ॥ १५६ ॥
एकनवत्युत्तरत्रिशतसंख्याकात्मकं तत ।
विद्युन्मुखमणिं ताम्रतन्त्रीभि परिवेष्टितम् ॥ १५७ ॥
सयोगकीलकयुतं तस्मिन् सन्धारयेत् क्रमात् ।
पश्चात् पूर्वोक्तनालस्यतन्त्रीनाहृत्य यत्नत ॥ १५८ ॥
उन दोनों नालों के ऊपर रुरुचर्म—काले हरिण के चर्म को लपेट दे फिर उसके भी ऊपर
पटतन्तु—सूत या पटवस्त्र ही उन नालों पर सुदृढ लपेट दे फिर द्रावक में शुद्ध की हुई वज्रमुखी ताम्र-
तन्त्रियों को अर्थात् वज्रमुखी ताम्बे की तारों को एक एक नाल के अन्दर दो दो करके तारों को नियुक्त
करे—फिट करे जो कि शक्तिपूरक पात्रस्थ दो नालें हैं उनके अन्दर कांच की कुप्पि—आवरण (बल्भ जैसे )
के साथ लगावे । शक्तिपूरक पात्र में पारा आठ पल—३२ तोला रख दे, तीन सौ इक्यानवे ३६१ संख्या
वाली विद्युन्मुखमणि को ताम्बे की तारों से लपेट संयोग कीलक युक्त उसमें लगा दे फिर पूर्वोक्त नालों
की तारों को लेकर यन्त्र से—॥ १५३-१५८ ॥
विद्युन्मुखमणेस्संयोजनकीलकतन्त्रिषु ।
सन्धारयेद् दृढं काचकं कुरन्ध्रमुखेन हि ॥ १५६ ॥
एव कृत्वा मध्यपात्र विहायाथ पुन क्रमात् ।
अवशिष्टेषु पात्रेषु पृथक् पृथग्यथाविधि ॥ १६० ॥
मन्थानवत् स्थितौ द्वौ द्वौ मथनोन्मथनाभिधौ ।
स्थापयेत्कीलकस्तम्भौ सरलभ्रमण यथा ॥ १६१ ॥
पात्राणा मध्यकेन्द्रेषु शास्त्रोक्तेनैव वर्त्मना ।
अयस्कान्तेन वा नोचेच्छुक्तिकस्कन्धेन वा कृतान् ॥ १६२ ॥
स्तम्भान् संस्थापयेत् तेषु एकैक च पृथक् पृथक् ।
वितस्तित्रयमोन्नत्य गात्रमेकवितस्तिकम् ॥ १६३ ॥
विद्युन्मुखमणि—डायनेमो ? की संयोजक कील वाली तारों में कांच को कुरन्ध्र मुख—नीचे
भूमि वाले छिद्रमुख से दृढ जोड दे या कांच के दो कोश वाले छिद्रमुख से ऊपर कहे तारों को जोड
दे । ऐसा करके मध्य पात्र को छोड कर अन्य अवशिष्ट पात्रों में यथाविधि पृथक् पृथक् मन्थनसाधन के
समान स्थित दो दो मथन उन्मथ नामक कील स्तम्भ लगावे जिससे मध्यकेन्द्रों में वर्तमान पात्रों का