बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja
महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा
कुण्डिणीशक्तियन्त्र ] [ १३५
अष्टन्यङ्कूप्रमाणेन जायतेत्यन्तवेगत ।
विद्युत्सयोजनात् पश्चात् तयोस्सम्मेलनं भवेत् ॥ ६३ ॥
तत्सम्मेलनत काचिच्छक्तिरत्यन्तशीतला ।
जायते कौञ्चिनीनाम कुलिकाकर्षणक्षमा ॥ ६४ ॥
अथ तच्छक्तिमाहृत्य कुलिकाभिमुखं यथा ।
भवेत् तथा नालमुखात् प्रेरयेत् सप्रमाणतः ॥ ६५ ॥
सूर्यकिरण विद्युत् के सम्पर्क से द्रावक में और मणि में क्रम से शीतघन-अत्यन्त शीत हो
जावे उस में द्रवसंंसर्ग से सौलिकानामक स्त्रीशक्ति पांच न्यङ्कू ? प्रमाण से उत्पन्न हो जाती है, उसी प्रकार
मणिसंसर्ग से चुलिकानामक पुरुषशक्ति आठ न्यङ्कू ? प्रमाण से अत्यन्त उत्पन्न हो जाती है । विद्युत्स-
योजन से पश्चात् दोनों का मेल हो जावे-हो जाता है उस मेल से कौञ्चिनीनामक अत्यन्त शीतल कुलिका
के आकर्षण में समर्थ कोई शक्ति उत्पन्न हो जाती है, उस शक्ति को लेकर कुलिका के सामने जैसे हो
जावे ऐसे नाल के मुख से सप्रमाण प्रेरित करे-छोड़े ॥ ६१-६५ ॥
जतुपिण्डे यथा गुञ्जा कुलिकाया तथैव हि ।
कौञ्चिनीशक्तिसंयोगं कारयेद् विधिवत् क्रमात् ॥ ६६ ॥
अथ सा कौञ्चिनीशक्तिस्समाकर्षति वेगतः ।
तथाकर्षणात् पश्चात् कुलिकाद्रावकं क्रमात् ॥ ६७ ॥
पतत्यत्यन्तवेगेन तां मणिः पिबति स्वयम् ।
तत पटोलिकाकीलभ्रमणं कारयेत् क्रमात् ॥ ६८ ॥
पटोर्मिको विस्तृतास्यः प्रभवेत् तेन सत्वरम् ।
न भवेद् वातसंयोगस्सुतरां तन्मणौ यथा ॥ ६९ ॥
आच्छादयेत् तथा सम्यक् तन्मणिं सम्प्रदायत ।
ततः परं चक्रदन्तिकीलकं भ्रामयेच्छनै ॥ ७० ॥
लाख के पिण्ड में जैसे घूंघची-रत्ति वैसे ही कुलिका में कौञ्चिनीशक्ति का संयोग क्रम से
विधिवत् करावे, अनन्तर उस कुलिका को कौञ्चिशक्ति वेग से खींचती है पुनः उस प्रकार के आकर्षण से
कुलिका क्रम से द्रावक में अत्यन्त वेग से गिर जाती है उस कुलिका को स्वयं मणि पी लेती है-अपने
अन्दर लीन कर लेती है फिर पटोलिका नामक या पटोलक-घोंघा सीपी के आकारवाले पेंच के भ्रमण को
करावे तिस से शीघ्र पटोर्मिकनामक या वस्त्र की तह विस्तृत मुख हो जावे उस मणि में वातसंयोग ठीक
न हो सकेगा किन्तु उस मणि का अपनी कलाप्रमाण से चक्रदन्ति कील को धीरे से घुमावे-॥ ६६-७० ॥
तस्माद् विकासमायाति चक्रदन्तिमूलं क्रमात् ।
मणिद्रावकमध्यस्थामत्युष्णा कुलिका तत ॥७१॥
चक्रदन्तिमूलात् पीत्वा स्वगर्भे सन्निधास्यति ।
सम्पूरिता भवेत् पश्चाच्चक्रदन्तिगुहाशये ॥७२॥
१३६ ] [ बृहद् विमानशास्त्र
ततस्सूक्ष्मदर्शनालकीलकं भ्रामयेत् क्रमात् ।
चक्रदन्त्यन्तर्गता सा कुलिका तेन वेगत ॥७३॥
नालत्रयाकर्षणेन बहिर्याति शनैश्शनै. ।
यदा नालत्रयाकर्षणोन्मुखा सा भवेत् तदा ॥७४॥
सम्यक् सम्भ्रामयेद् विवृतास्यकील यथाविधि ।
तेनाङ्गान्य (ण्य?) थ यानस्य विवृतानि हि ॥७५॥
—उससे चक्रदन्ति का मुख क्रम से विकास को प्राप्त होजाता है-खुल जाता है, फिर द्रावक
मणि के मध्य में वर्तमान अत्युष्ण कुलिका को चक्रदन्ति स्वमुख से पीकर अपने अन्दर रख लेगी
पश्चात् चक्रदन्ति के गुहाशय गुप्तस्थान में भर जावेगी फिर सूक्ष्मदर्शनालवाले पेंच को क्रम से घुमावे
उससे चक्रदन्ति के अन्तर्गत वह कुलिका बेग से तीन नालों के आकर्षण से धीरे धीरे बाहिर चली जाती
है । जबकि वह तीनों नालों के आकर्षण के उन्मुख होती होवे तो सम्यक् विस्तृतमुखवाले पेंच को
यथाविधि घुमावे उससे विमान के अङ्ग विस्तृत हो जाते हैं-खुल जाते हैं ॥७१-७५॥
तस्मात् तत्रत्यकुलिका बहिर्यात्यपकर्षणात् ।
पश्चात् तत्कुलिकाशक्तिर्निश्शेष नाशमेधते ॥७६॥
ततोपसहारयन्त्रकीलक † चालयेत् सुधी. ।
तेन सर्वाङ्गोपसंहारस्स्यादेकैकतः क्रमात् ॥७७॥
पश्चाद् यन्त्रस्वरूपं लभते पूर्ववत्स्वयम् ।
एवमुक्तवा समासेन कुण्टिणीशक्तियन्त्रकम् ॥७८॥
अथेदानों पुष्पिण्यकयन्त्रमत्र निरूप्यते ।
उससे वहां की कुलिका खींचे जाने से बाहिर चली जाती है, पश्चात् वह कुलिकाशक्ति निःशेष
नाश को प्राप्त हो जाती है फिर उपसंहारयन्त्र की कील को बुद्धिमान् चलावे उससे सब अङ्गों का उपसंहार
एक एक करके हो जावेगा पश्चात् पूर्ववत् यन्त्र अपने रूप को प्राप्त करता है इस प्रकार कुण्टिणी यन्त्र को
संक्षेप से कहकर अब पुष्पिणीक यन्त्र यहां कहा जाता है ॥७६-७८॥
अथ पुष्पिणीयन्त्रनिर्णयः—अब पुष्पिणीयन्त्र का निर्णय देते हैं—
वसन्तग्रीष्मतुं कालप्रयाणे यानयन्तॄणाम् ।
सुखशैत्योपचारार्थं पुष्पिणीयन्त्रमुच्यते ॥७६॥
वसन्त ग्रीष्म ऋतुकाल के प्रवर्तमान होने पर या आक्रमण पर विमानचालक सवारियों के
सुख शीतता के उपचारार्थ पुष्पिणीयन्त्र कहा जाता है ॥७६॥
उक्तं हि खेटविलासे—कहा ही है खेटविलास ग्रन्थ में—
ग्रीष्मे पञ्चशिखा शक्तिर्वसन्ते सौरिकाभिधा ।
वायव्याग्नेयकेन्द्राभ्यामीषादण्डस्य वेगतः ॥८०॥
तत उपसंहार=ततोपसहार इत्यत्र सन्धिरार्षः ।
पुष्पणीयन्त्र ] [ १३७
जायते सूर्यकिरणसंसर्गादूर्ध्वरूपतः ।
तयोः पञ्चशिखा शक्तिर्विषद्वयविराजिता ॥८१॥
अग्नियोमात्मिका सौरिसमशीतोष्णरूपिणी ।
अन्तश्शीतलतामेत्य बाह्येत्यन्तोष्णरूपताम् ॥८२॥
निदाघं कुरुते सर्वसृष्टिवर्गेषु वेगतः ।
स्वेदोद्रेकं मनुष्येषु निर्यास वृक्षवर्गके ॥८३॥
करोति तेन सर्वेषा सर्वामयविनाशनम् ।
एव स्वशीतलीशक्त्या सर्वत्र व्याप्य पूर्ववत् ॥८४॥
आकृष्य सूर्यकिरणस्थितवासन्तिकान्ततः ।
बसन्तेनर्तु नेत्यादिश्रुतिवाक्यानुसारतः । ॥८५॥
ग्रीष्म में पञ्चशिखा शक्ति वसन्त में सौरिका नामवाली शक्ति वायव्य आग्नेयकेन्द्रों से ईषा-
दण्ड (पृथिवी सूर्य रेखा) की शक्ति वेग से सूर्यकिरणसंसर्ग से उत्पन्न हो जाती है, उन दोनों में पञ्च-
शिखा शक्ति दो विषों से युक्त होती है और सौरिका शक्ति अग्निसोमात्मिका-अग्नि सोम धर्मवाली
समानशीतोष्णरूपा होती है 'जोकि' अन्दर' शीतलता को और बाहिर अत्यन्त उष्णता को प्राप्त होती है,
सब सृष्टि वर्गों-जड जङ्गमों में वेग से निदाघ-घाम-दाह करती है, मनुष्यों में स्वेद-पसीने को बाहिर और
वृक्षवर्ग में चेप गोन्द को करती है इससे सब के रोगों का नाश हो जाता है इस प्रकार अपनी शीतली
शक्ति से पूर्ववत् सर्वत्र व्यापकर सूर्यकिरणस्थित वसन्त लाने वाली शक्ति को आकर्षित करके
“बसन्तेनर्तु ना” (यजु० २१। २३) वसन्त ऋतु से इत्यादि श्रुतिवाक्य के अनुसार ॥८०-८५॥
कृत्वाभिषेकं पश्चात् तद्वृदि† (हृधि?) कोषाष्टकेपि च ।
प्रभापल्लवपुष्पादीन् करोत्यगलतादिषु ॥८६॥
तथैव प्राणिना देहसप्तधात्वादिषु क्रमात् ।
बलदाढ्यं प्रकाशादीन् संप्रयच्छति पुष्कलम् ॥८७॥
तथा पञ्चशिखा शक्ति (क्ते?) विषरूपा हि गृध्निका ।
स्थावर जङ्गमं व्याप्य तद्धातून् सप्त शोष (घ') येत् ॥८८॥
तथैव मारिका नाम शक्तिरन्या स्वभावतः ।
स्थावरे काण्डवल्काश्च हृत्कोशान् पञ्च जङ्गमे ॥८६॥
सङ्कोचं कुरुते सम्यक् तेन पुष्टिविनाशनम् ।
अतः पञ्चशिखावेग सशुष्णा (सौयुष्णा?) च विशेषत ॥६०॥
नाशयित्वा विमानस्थयन्तॄणामूष्मभाजिनाम् ।
सुखशैत्याह्लादहर्षप्रदानार्थं यथाविधि ॥६१॥
विमानस्याङ्गयन्त्रेषु पुष्पणीयन्त्रमुच्यते ।
† हृत्कोशान् ॥८६॥ (देखो)
सिञ्चन-जलसिञ्चन करके पश्चात् 'प्राणियों के' हृदय में कोशाष्टक-अष्टमकोश ?-
मस्तिष्क ? में भी प्रभा-तेज आभा तथा अगों-वृक्षों लता फैलने वाले पौधों आदि में भी पल्लव-
नवकोंपल फूल फल आदि उत्पन्न करती है, उसी प्रकार प्राणियों के देह की सात धातुओं में क्रम से
बल दृढ़ता चमक कान्ति आदि अधिक प्रदान करती है। और पञ्चशिखा शक्ति विषरूपा गुल्फिका-
गर्भारूपा क्रूरणा खाजाने वाली शोषण करने वाली शक्ति स्थावर जङ्गम को व्याप कर
उनकी सात धातुओं को सुखा देती है इसी प्रकार यह दूसरी मारिका-मारनेवाली शक्ति स्वभावतः स्थावर
में काण्ड-शाखा, वल्क-छाल को और जङ्गम में हृदय पांच कोशों-अन्नमय प्राणमय मनोमय आदि
को संकुचित करती है निश्चय उससे पुष्टि का नाश होता है अतः पञ्चशिखा शक्ति के वेग बलसहित
नष्ट करके विमान में स्थित ऊष्मभागी-गर्मी को सहते हुए गर्मी से आक्रान्त चालक यात्रियों के सुख
शीतता शान्ति हर्ष देने के लिये यथाविधि विमान के अङ्गयन्त्रों में पुष्पणीयन्त्र कहा जाता है ॥८६-६१॥
:
Line 6 has: इत्युक्त्वा सुन्दमृत्काचमथाङ्गरचनाविधि ।॥ ९९ ॥ (or विधि ॥ ९९ ॥).
Let's look REALLY closely at line 6:
इत्युक्त्वा सुन्दमृत्काचमथाङ्गरचनाविधि ॥ ९९ ॥
Wait, is that a single danda before double danda?
There's धि, then space, then ॥ ९९ ॥. There is a faint vertical mark or space. Let's transcribe faithfully: विधि ॥ ९९ ॥ or विधि ।॥ ९९ ॥. It looks like विधि ॥ ६६ ॥? Wait, earlier I thought 66, but we proved it's ९९.
Wait, is there an extra danda? It looks like विधि ।॥ ९९ ॥ or just विधि ॥ ९९ ॥ with a thick first danda. Let's look at line 8: दृढम् ॥ १०० ॥. The double danda has two bars. In line 6, there are two bars ॥ and maybe a stray speck. It's ॥ ९९ ॥.
-
Line 7:
निरूप्यते विधिवत्सङ्ग्रहेण यथाक्रमम् । -
Line 8:
द्वात्रिंशत्पाकशुद्धसुन्दमृत्काचतो दृढम् ॥ १०० ॥
१४० ] [ बृहद् विमानशास्त्र ]
ताराग्निबाणोडुदशद्विमृद्वसुसागराः ।
द्वाविंशत्यङ्गविभागास्तेषां शास्त्रनिरूपिताः ॥ १०९ ॥
एतानाहृत्य संशुद्धान् तत्तद्भागानुसारतः ।
पूरयित्वापद्ममुखमूषायां पद्मकुण्डके ॥ ११० ॥
तन्मूषां विन्यसेत् पश्चाद् दृढमिङ्गालपूरिते ।
त्रयोविंशदुत्तरत्रिशतकक्ष्योष्णमानतः ॥ १११ ॥
गालयित्वा पञ्चमुखभस्त्रेणात्यन्तवेगतः ।
तद्रसं योजयेद् यन्त्रस्योर्ध्वनालमुखे शनैः ॥ ११२ ॥
भवेदेवंककृते शीतरञ्जिकादर्शमुत्तमम् ॥ इत्यादि ॥
शश का पिथ्य ?-पित्त और उडु ? का पिथ्य?,-पित्त, पांशुक्षार-नवसादर, कुड्मल-नीलोत्पल-
नीलोफर, ज्योत्नासार-रेणुका गन्ध द्रव्य का तैल इतर, शीतरस कन्द-रसोंत के कन्द की पिट्ठी,
कुडुपक्षार ?, अभ्रक का क्षार, शौण्डीरका जङ्घा शल्य-गजपिप्पली के मूल का चूर्ण, वातोयर-खुले मैदान
का शोरा, श्वेत निर्यास-आक का दूध ?, मृत्सार-मृत्सा-सौराष्ट्र मृत्तिका, उरघ ? । ये बारह पदार्थ ५,
३, ५, १, १०, १०, ११, ८, ७, २२, ६, भागों को उनके शास्त्र से उन उन भागों के अनुसार शुद्ध लेकर
पद्ममुखमूषा में भर कर अङ्गार से भरे पद्मकुण्ड में उस मूषा-बोतल को रख दे, पश्चात् ३३२ दर्जे की
उष्णता प्रमाण से पांच मुख वाली भस्त्रा से गला कर, उस पिघले रस को धीरे से यन्त्र के ऊपरवाले
नालमुख में युक्त करे ऐसा करने पर शीतरञ्जिकादर्श हो ॥ १०६-११२ ॥
शीतप्रसूतिकमणिमुक्तं मणिप्रकरणे-शीतप्रसूति मणि कही है मणिप्रकरण में-
वराटिकामञ्जुलचूर्णपञ्चक मोदुम्बरक्षारचतुष्टय तथा ।
रुक्मत्रय वचुलकाष्टकं च शीतरञ्जिकादर्शसप्तकं तथा ॥ ११३ ॥
बदुत्रय शाल्मलिकाष्टविंशति क्षारत्रय पारदभागसप्तकम् ।
श्वेताभ्रसत्त्वाष्टककर्कटाङ्घ्रिक्षाराष्टक चौलिकसत्त्वपञ्चकम् ॥११४॥
निर्यासमुष्ट्युदशांशकं तथा सम्पातिजङ्घास्थि च पञ्चविंशति ।
चतुर्दशैतान् परिगृह्य शोधितान् सम्पूर्य मृत्कुण्डलमूषिकामुखे ॥११५॥
सस्थाप्य पश्चात् कुलकुण्डिकान्तरे वेगाद् धमेत् त्र्यम्बकभस्त्रिकामुखात् ।
सगाल्य पश्चात् त्रिशतोष्णकक्ष्यतो मणिप्रसूतस्य मुखे प्रपूरयेत् ॥११६॥
एवंकृते शीतप्रसूतिकामणिर्भवेत् सुदृढस्सुदृढस्सुशीतल ॥११७॥ इत्यादि ॥
कौडी, मजीठ का चूर्ण ५ भाग, गूलरक्षार ४ भाग, रुक्म ? ३ भाग, वचुलक ?-वञ्जुल-तिनिश
वृत्त ? ८ भाग,-शीतरञ्जिकादर्श ७ भाग, बदु-शोनापाठा वृक्ष ३ भाग, सिम्बल २८ भाग, कर्कटाङ्घ्रि-
काकडासिङ्गी के मूल का क्षार या केकड़ा जन्तु की टांगों का क्षार ? ८ भाग, चौलिक सत्त्व-मोरपुष्पी ?
या दारुचीनी का सत्त्व ५ भाग, निर्यासमुष्ट-कत्था ? १५ भाग, सम्पाति-गिद्ध पक्षी की जांघ की हड्डी
२५ भाग इन १४ वस्तुओं को लेकर शोध कर मिट्टी के कुण्डलाकार मूषिका-बोतल के मुख में भर कर
पुष्पलोचन ] [ १४१
कुल्लकुण्डिका के अन्दर रख कर वेग से त्र्यम्बक भक्षिका मुख से ३०० दर्जे की उष्णता से गला कर
मणिप्रसूतास्य के मुख में भर दे, ऐसा करने पर शुद्ध सुदृढ सुशीतल शीतप्रसूतिका मणि हो जावे—हो
जाती है ॥ ११३-११७ ॥
विद्युत्तन्त्र्या समायुक्तं द्रावकत्रयशोधितम् ।
शतारविद्युत्पङ्क तत्पुरस्तात् स्थापयेद् दृढम् ॥ ११८ ॥
विद्युत् के तारयुक्त तीन द्रावक से शोधा हुआ या बहुत अराओं से युक्त पङ्क--पंखडीचक्र
को तो उसके सामने दृढरूप में स्थापित करे ॥ ११८ ॥
तदुक्तं क्रियासारे—वह कहा है क्रियासार ग्रन्थ में —
द्वादशार्कं चाञ्जनैकत्रय द्विवृद्धाष्टक तथा ।
सम्मेल्य गालयेत सम्यक् शतकक्ष्योष्णमानत ॥ ११९ ॥
तद्भवेत्सर्जवच्छुद्धमारारं पीतवर्णकम् ।
अत्यन्तलघुसूक्ष्म च मृदुलं सुदृढ शुचि ॥ १२० ॥
पञ्चलोहमिति प्राहु रेत तच्छास्त्रवित्तमा. ।
तस्मात् प्रकल्पयेत् पत्रशतं कमलपत्रवत् ॥ १२१ ॥
तथा नाभित्रय कीलत्रय तन्त्रीत्रय क्रमात् ।
घण्टारकीलञ्चैव कारयेच्छास्त्रमानत ॥ १२२ ॥
सकीलकशलाकाभिस्संयुत सुमनोहरम् ।
नाभिचक्रत्रयं तस्मिन्नादौ सञ्चारयेद् दृढम् ॥ १२३ ॥
शण(न ?) पत्रभ्रमो वेगादनुलोमाद् यथा भवेत् ।
षट्षुपाश्र्वेषु चक्रस्य विधिवद् योजयेत् क्रमात् ॥ १२४ ॥
तथैव तत्पुरोभागचक्रपाश्र्वेष्वपि क्रमात् ।
सञ्चारयेत् पत्रशतं विलोमभ्रमण यथा ॥ १२५ ॥
ताम्बा १२ भाग, सुरमा ३ भाग, द्विवृद्ध--लोह विशेष या जस्ता ८ भाग, इन्हें मिला कर १०० दर्जे
की उष्णता से गलावे, वह शुद्ध सर्जीक्षार जैसा आरे आरों वाला पीतरंग का अत्यन्त हल्का सूक्ष्म मृदुल
सुदृढ पवित्र हो जावे उसे उत्तम शास्त्रवेत्ता पञ्चलोह कहते हैं । अतः उससे १०० पत्र-कमलपत्र की भांति
बनावे तथा ३ नाभियां ३ कीलें ३ तार क्रम से घण्टा देने वाली कील भी शास्त्र रीति से करावे कीलसहित
शलाकाओं से युक्त भी हो । उसमें प्रथम ३ नाभिचक्र लगावे, इसी प्रकार पुरोभाग—सामनेवाले चक्रपाश्र्वों
में भी क्रम से १०० पत्र लगावे जिससे विलोम—उल्टा भ्रमण हो सके ॥ ११८-१२५ ॥
तत्पश्चाद्भागचक्रस्य नाभीमूले यथाविधि ।
विद्युत्तन्त्री समाहृत्य पाश्र्वयोरुभयोरपि ॥ १२६ ॥
शतारविद्युत्पङ्कस्य भ्रमणार्थं नियोजयेत् ।
पश्चात् सम्पूरयेत् पात्रे शीतप्रसुवकद्रावम् ॥ १२७ ॥
१४२ ] [ बृहद् विमानशास्त्र'
विद्युत्तन्त्या समावेष्ट्य शीतप्रसुवकं मणिम् ।
द्रवपात्रान्तरे पश्चात् स्थापयेन्मध्यकेन्द्रके ॥ १२८ ॥
क्षीरीपटान्तर्गतौदुम्बरतन्त्रीन् यथाविधि ।
द्रवपात्रस्थतन्त्र्यग्रे पश्चात् सन्धारयेत् समम् ॥ १२६ ॥
तत्प्रदेशात् समानीय तन्त्रीद्वयमतः परम् ।
यन्त्रमध्यस्य शीतरञ्जिकादर्शकीलके ॥ १३० ॥
उसके पिछले भागवाले चक्र के नाभिमूल में यथाविधि दो विद्युत्तारों को लेकर दोनों पाश्र्वों
में भी सौ अरोंवाले विद्युच्चक्र के भ्रमणार्थ लगावे, पश्चात् पात्र में शीतप्रसुवक को भर दे, शीतप्रसुवक
मणि को विद्युत् के तार से लपेट कर द्रवपात्र के अन्दर मध्य केन्द्र में स्थापित करे । क्षीरी—दूधवाले
वृक्ष के दूध से बने वस्त्र के अन्तर्गत औदुम्बर-ताम्बे की तारों को यथाविधि द्रवपात्रस्थ तारों के अग्रभाग
में समान रूप से लगादे । उस प्रदेश से दो तारों को लाकर यन्त्रमध्यस्थ शीतरञ्जिकादर्शकील
में—॥ १२६-१३० ॥
अनुलोमप्रकारेण सकीलं योजयेत् ततः ।
मणिद्रावकसम्बद्ध (न्ध?) विद्युत्तन्त्रीमुखाच्छनैः ॥ १३१॥
शक्तिं सञ्चोदयेत् सम्यङ् मणिद्रावकयोः क्रमात् ।
पश्चाच्छक्तिद्वये वेगाद् विद्युत्संयोगत पुनः ॥ १३२ ॥
तन्निष्ठसुखशैत्यस्वभावशक्तिं यथाक्रमम् ।
तच्छीतरञ्जिकादर्शकीलमाक्रम्य वर्तते ॥ १३३ ॥
तत्कीलभ्रमणाद् व्योमयानमावृत्य वेगतः ।
तच्छक्ती यन्तॄणां ग्रीष्मविषशक्तिं निमेषतः ॥ १३४ ॥
विहत्य सुखसन्तोषमधोवृद्ध्यादिकान् क्रमात् ।
प्रयच्छतो विशेपेण मकरन्दामृतं यथा ॥ १३५ ॥
—अनुलोम प्रकार से कीलसहित युक्त करदे, द्रावक मणि से सम्बन्ध रखने वाले विद्युत्तारों के
मुख से धीरे से शक्ति को दोनों मणिद्रावकों में भली भांति प्रेरित करें पश्चात् दोनों शक्तियों में वेग से
विद्यु त् के संयोग से उन में रखी उन में अवलम्बित सुख शैत्य स्वभाववाली शक्ति को यथाक्रम वह शीत-
रञ्जिक आदर्शीकील को अवलम्बित करके रहती है, उस कील के घूमनेसे वे दोनों शक्तियां वेग से व्योम-
यान को प्राप्त होकर चालक और यात्रियों की गरमीरूप विषशक्ति को निमेष भर में नष्ट करके सुख सन्तोष
बुद्धिवृद्धि आदिकों को क्रम से विशेषरूप से मधु के समान देती है ॥ १३१—१३५ ॥
ततश्शतारपङ्कभ्रमणं तन्त्रया प्रकाशयेत् ।
तेन वायुविशेषेण प्रादुभूयं यथासुखम् ॥ १३६ ॥
व्योमयानस्थयन्तॄणां सर्वेषामुपरि स्वतः ।
मन्द मन्दं प्रसरति मन्दमारुतवत् क्रमात् ॥ १३७ ॥
पिञ्जुलादर्श ] [ १४३
तेन सौर्योष्णसन्तापो निःशेष नाशमेधते ।
मणिद्रावकपङ्केभ्यो व्योमयानस्थयन्तॄणाम् ।। १३८ ।।
सुखशैत्याह्लादहर्षा एवं सम्भवन्ति (ति?) स्वतः ।
देहस्थसप्तधातूना भवेत् तस्माच्छुचिर्बलम् ।। १३६ ।।
तस्मात् सर्वप्रयत्नेन यानदक्षिणकेन्द्रके ।
स्थापयेत् पुष्पिणीयन्त्र शास्त्रोक्तविधिना दृढम् ।। १४०।।
तदधस्स्थापयेत् पश्चात् तत्र घण्टारकीलकम् ।
सौरिपञ्चशिखोत्पन्नशक्तयो विषरूपका ।। १४१ ।।
घण्टारकीलकमुखाद् भवेयुर्बाह्यखे लयम् ।। १४२ ।। इत्यादि ।।
फिर सौ अरे वाले चक्र के भ्रमण को तार से प्रकाशित करे, उससे वायु विशेषरूप से सुग-
मता से प्रकट होकर विमान में स्थित सब चालक यात्रियों के ऊपर मन्द वायु के समान क्रम से स्वत
मन्द मन्द पड़तो है । उस से सूर्य का उष्णताप सर्वथा नाश को प्राप्त हो जाता है । मणिद्रावक
१४४ ] [ बृहद् विमानशास्त्र
शङ्कुकीले बनावें उसे शीतरञ्जिकादर्शीतारों से लपेटकर मौञ्जिकापटकोश-मूञ्ज के टाट के थैले से पृष्ठ
भाग को ढक दे ॥ १४३-१४७ ॥
बाहुमात्रोर्ध्वतत्सूर्यकिरणाभिमुखं यथा ।
विद्युत्तन्त्रीसमायुक्तशङ्कुकीलद्वयादथ ॥ १४८ ॥
विमानदक्षिणकेन्द्रशलाकोर्ध्वमुखे दृढम् ।
स्थापयेत् पिञ्जुलादर्शं किरणाकर्षणोन्मुखम् ॥१४९॥
तेन मेघोभिवृद्धिश्च प्राणात्राणमेव च ।
आतपाशनिवेगापकर्षणाद्यानयन्तृणाम् ॥१५०॥
भवेत् स्वभावत पश्चात् तापशीतलता व्रजेत् ।
तस्मात् सर्वप्रयत्नेन व्योमयाने यथाविधि ॥१५१॥
स्थापयेत् पिञ्जुलादर्शं यन्तॄणां प्राणदायकम् ॥१५२॥ इत्यादि ॥
सूर्यकिरण के सामने विद्युत के दो तारों से युक्त बाहुमात्र ऊँचे दो शङ्कुकी
नालपञ्चकयन्त्र ] [ १४५
भरकर वेग से सौ दर्जे की उष्णता से गलावे ऐसा करने पर तैल के लेप से शुद्ध हुआ वातायनी लोह
अतिमृदुल सूक्ष्म लघु सुवर्णरंगवाला सुदृढ बन जाता है ॥ १५४-१५७॥
द्वादशाङ्गुलविस्तीर्णं द्वादशाङ्गुलमुन्नतम् ।
कुर्याद् वातायनीलोहात् पञ्चनालान् यथाविधि ॥१५८॥
एकैकधूमप्रमाण नालमूलेषु पञ्चसु ।
सन्धार्य व्योमयानस्य वामपार्श्वमुखे क्रमात् ॥१५६॥
संस्थापयेत् पञ्चनालान् पञ्चसन्धिषु शास्त्रतः ।
मुखानि पञ्चनालाना दिक्षु पूर्वादिषु क्रमात् ॥१६०॥
स्थापयेद् विधिवत् पश्चादूर्ध्वं तूर्ध्वमुख यथा ।
नालमूलस्थमणयः पश्चाद् धूम शनैश्शनैः ॥१६१॥
आकृष्य नालमूलस्थमुखच्छिद्रेषु योजयेत् ।
ततो वातायनीनालमुखेभ्यो वेगतः क्रमात् ॥१६२॥
निक्षेपं याति तद्धूमो बाह्ये विलयमेधते ।
तेन यानस्थयन्तॄणां धूमनाशात् सुखं भवेत् ॥१६३॥
तस्माद् विमाने तन्नालपञ्चक विधिवन्न्यसेत् । इत्यादि ॥
१२ अङ्गुल चौडे १२ अङ्गुल ऊंचे वातायनीलोह से पांच नालें बनावें । एक एक धूम के
प्रमाण में पांचों नालमूलों में लगाकर विमान के वामपार्श्व भाग में क्रम से पाच सन्धियों में शास्त्र से
पांच नालों को संस्थापित करे । पांचों नालों के मुख पूर्व आदि दिशाओं में क्रम से विधिवत् स्थापित
करे पश्चात् ऊपर में जैसे नालमूलस्थ मणियां ऊर्ध्वमुख—ऊपर की ओर धीरे धीरे धूंए को खींचकर नाल
मुख में स्थित मुख छिद्रों में जोड दे फिर वातायनी नालमुखों से धूंवा वाहिर वेग से सर्वथा लय
को प्राप्त हो जाता है । इस से धूमनाश से विमान में स्थित यात्रियों को सुख होता है अतः विमान में
वह ५ नाल विधिवत् लगावे ॥ १५८-१६३ ॥
•-•-•-•-•-•- ❖ -•-•-•-•-•-•
हस्तलेख कापी संख्या १०—
गुहागर्भादर्शयन्त्रनिर्णयः—गुहागर्भादर्शयन्त्र का निर्णय करते हैं—
नालपञ्चकमुक्त्वैव सङ्ग्रहेण यथाविधि ।
गुहागर्भादर्शयन्त्रमिदानी सम्प्रचक्षते ॥१॥
इस प्रकार संक्षेप से नालपञ्चक कहकर अब गुहागर्भादर्शयन्त्र कहते हैं ॥१॥
तदुक्तं यन्त्रसर्वस्वे—यह कहा है यन्त्रसर्वस्व ग्रन्थ में—
विमानखण्डनार्थाय शत्रुभिर्भुमुखान्तरे ।
महागोलाग्निगर्भादियन्त्रपञ्चकमद्भुतम् ॥२॥
यत्र यत्र रहस्येन स्थापित सर्वतोमुखम् ।
तत्स्वरूपपरिज्ञानसिद्धयर्थं शास्त्रत क्रमात् ॥३॥
गुहागर्भादर्शयन्त्रं स्थापयेद् व्योमयानके ।
विमान के तोड़ने के अर्थ शत्रुओंद्वारा भूमि के मुख के अन्दर महागोल अग्निगर्भ आदि
अद्भुत पञ्चकयन्त्र जहां जहां गुप्तरूप से सब ओर मुख वाला स्थापित किया है, उसके स्वरूप परि-
ज्ञान की सिद्धि के अर्थ शास्त्र से क्रम से विमान में गुहागर्भादर्श स्थापित करे ॥२—३॥
तदुक्तं क्रियासारे—यह क्रियासार ग्रन्थ में कहा है—
द्वासप्ततिमसंख्याकादर्शमाहृत्य शास्त्रतः ॥४॥
त्रिकोणवर्तुलचतुष्कोणाकारंयथाविधि ।
त्रिधा कृत्वा ततोञ्जिष्ठवृक्षकाष्ठविनिर्मिते ॥५॥
नीडे सन्धार्य पूर्वोक्तदर्पणान् सुदृढ यथा ।
पञ्चधारालोहकृतशङ्कुभिस्सुदृढै क्रमात् ॥६॥
बन्धयित्वाथ पूर्वोक्तकाष्ठयन्त्रे नियोजयेत् ।
अधोमुखं वर्तुलादर्शमधस्तात् प्रकल्पयेत् ॥७॥
चतुष्कोणादर्शमूर्ध्वास्यं यथा सन्नियोजयेत् ।
त्रिकोणदर्पणं (तु) तद्द्वयो पश्चिमान्तरे ॥८॥
संस्थापयेत् पञ्चमुलकीलीयोगाद् यथाक्रमम् ।
गुहागर्भादर्शयन्त्र ] [ १४७
चतुष्कोणादर्शमूलकेन्द्रशङ्कुमुलान्तरात् ॥६॥
यन्त्रपीठाग्नेयकेन्द्रशङ्कुमुलान्तरावधि ।
रविखर्परपञ्चास्यलोहमिश्रिततन्त्रिभि. ॥१०॥
सन्धारयेद् दृढ पश्चात् पारग्रन्थिकद्रावके ।
स्थापयेच्चुम्बकमणिं तन्त्रीमूलांश्च तन्मुखे ॥११॥
७२ वी संख्या वाले आदर्श को लेकर शास्त्रीति से त्रिकोण गोल चतुष्कोण आकार से यथा-
विधि तीन प्रकार करके [असिष्ठावृत्त ?—सूर्य—सूर्यावर्त वृत्त के काष्ठ से बने लम्ब कोश मै पूर्वोक्त
दर्पणों को सुदृढ़ लगाकर पञ्चधारा कृत्रिम लोहे से बने शंकुओं से बान्धकर पूर्वोक्त काष्ठयन्त्र मै नीचे
लगावे, गोल भाग नीचे करके लगावे, चतुष्कोण आदर्श-दर्पण ऊपर मुखवाला लगावे । त्रिकोण दर्पण
उसी प्रकार दोनों के पश्चिम की ओर पञ्चमुख कील के योग से यथाक्रम संस्थापित करे, चतुष्कोण
आदर्श मूलकेन्द्र के शंकु के मुख में से यन्त्रपीठ के आग्नेय केन्द्र के शंकुमूल तक । ताम्बा खपरिया
पञ्चास्य लोहों से मिले—बने तारों से लगावे पश्चात् पारग्रन्थिक द्रावक-पारागन्धक द्रावक मै चुम्बक-
मणि को और तारों के मूलों—सिरों को भी स्थापित करे ॥४-११॥
प्रसार्य विधिवत् तस्मात् तन्त्रीमन्यान् चतु ❀ क्रमात् ।
त्रिकोणादर्शमावृत्य ऊर्ध्वास्थ्यादर्शमध्यत ॥१२॥
अधोमुखादर्शमध्यकेन्द्रस्थाने दृढ यथा ।
सन्धार्य विधिवत् पश्चात् सूर्यांशून् पार्श्वत क्रमात् ॥१३॥
शक्तिपश्चिमदिग्भागान्नोदयेत् प्रमाणत ।
बिम्बाकर्षणनिर्यासलेपित पटदर्पणम् ॥१४॥
त्रिकोणाभिमुख (भवेद् ?) यथा तत्र नियोजयेत् ।
पूर्वोक्तसूर्यकिरणान् शक्त्या सह तत परम् ॥१५॥
अत अन्य चार तारों को विधिवत् फैलाकर त्रिकोण आदर्श को घेर कर ऊपर वाले आदर्श के
मध्य से नीचे वाले आदर्श के मध्य केन्द्रस्थान में विधिवत् दृढ लगाकर पश्चात् सूर्यकिरणों की पार्श्व—
शक्ति के पश्चिम दिशा की ओर से प्रमाण से प्रेरित करे, विम्ब—सूर्यविम्ब को आकर्षित करने वाले
निर्यास-गोन्द से लेपे हुए पटदर्पण-वस्त्ररूप दर्पण को त्रिकोण आदर्श के सम्मुख नियुक्त करे, फिर
पूर्वोक्त सूर्यकिरणों को शक्ति के साथ—॥१२-१५॥
द्रावकस्य मणौ सम्यग्योजयेत् सर्वतोमुखम् ।
अधोमुखे ततश्शुद्धे वर्तुलाकारदर्पणे ॥१६॥
मणिस्यानात् समाहृत्य तदशून् शक्तिमिश्रितान् ।
प्रसार्य सप्रमाणेण पश्चात् तन्मुखकेन्द्रत ॥१७॥
यानसञ्चारमार्गाधस्थितभूम्यां प्रयोजयेत् ।
पश्चात् तत्किरणास्तम्यक्श्वतधा सह स्ववेगतः ॥१८॥
❀ भविभक्तिकनिर्देश आर्षः ।
१४८ ]
[ शुद्ध विद्याप्रकाश
प्रविश्य भूमुखं तत्र सर्वत्र स्थापितं क्रमात् ।
महागोलाग्निगर्भादियन्त्रान् व्याप्याथ शक्तितः ॥१९॥
सम्यगावृत्य साङ्गानि तत्स्वरूपाण्यस्फुटम् ।
पूर्वोक्तद्रवमध्यस्थमणावूर्ध्वमुखं यथा ॥२०॥
द्रावक में स्थित मणि में सब ओर सम्यक् लगावे फिर नीचे की ओर शुद्ध गोलाकार दर्पण में
मणिस्थान से शक्तिमिश्रित उन किरणों को लेकर सप्रमाण फैलाकर पश्चात् उनके मुखकेन्द्र से विमान
के गतिमार्ग के नीचे स्थित भूमि में प्रेरित करे पश्चात् वे किरणें भली प्रकार शक्ति के साथ अपूर्व वेग
से भूमि के मुख में प्रविष्ट होकर वहां सर्वत्र स्थापित महागोल अग्निगर्भ आदि यन्त्रों को व्याप कर शक्ति
से भली प्रकार घेरकर अंगोंसहित उनके स्वरूपों को स्फुटरूप में पूर्वोक्त द्रवमध्यस्थ मणि में ऊर्ध्वमुख
जिस प्रकार हो ऐसे-॥१९-२०॥
आदर्श मुखवतेषा प्रतिबिम्बं प्रकुर्वति ।
त्रिकोणादर्शामिमुखमध्यतन्त्रग्रसस्थिते ॥२१॥
बि
गुहगर्भादर्शयन्त्र ] [ १४६
एडं मयूखं सुरुचि पटोल पारं करञ्ज रविशर्करात्रयम् ।
सुटङ्कणं गन्धकचारु शाल्मली बिण्डीरनिर्यासकुरङ्गरोहिणी ॥२८॥
मण्डूरपञ्चाननसैंहिकान् शिव विश्वाभ्रकं पार्वणिज विदूरकम् ।
रुद्रोद्रुवाणार्कगजाब्धिविश्वमुन्यब्धिभूतानलतारकाभ्रका ॥२९॥
द्वात्रिंशत्तिस्त्रिशतिर्वस्वकंमूर्तिग्रहराशितः क्रमात् ।
सन्तोल्य वस्तून् तुल्या यथाविधि सङ्गृह्य भागाशप्रमाणतः क्रमात् ॥३०॥
सम्पूर्य चञ्चुपुटमूषवक्त्रे वराहकुण्डेय निधाय च दृढम् ।
धमनेत् क्रमात् कश्यशतोष्णवेगात् कूर्माख्यभस्त्रेण निमीलनावधि ॥३१॥
संगाल्य सङ्गृह्य च तद्रस पुनः सम्पूरयेद यन्त्रमुखे शनैश्शनैः ।
एवकृते शुभ्रमतीव सूक्ष्म शताधिकव्यापकशक्तिसयुतम् ॥३२॥
१५० ] [ बृहद् विमानशास्त्र
प्रतिबिम्बाकर्षणादिशक्तयः पञ्च सर्वदा ।
यतोञ्जिष्ठावृक्षगर्भे प्रकाश्यन्ते स्वभावतः ॥ ३६ ॥
ततस्सर्वेषु वृक्षेषु एतदञ्जिष्ठमेव हि ।
अत्यन्तश्रेष्ठमित्याहुरेतद्यन्त्रक्रियाविधौ ॥ ३७ ॥
इत्यादि-अगस्तत्वलहर्याम् ॥
प्रतिबिम्बाकर्षण आदि शक्तियां ५ सर्वदा जिस से अञ्जिष्ठ वर्ग में प्रसिद्ध हैं स्वभावतः । सब
वृक्षों में यह अञ्जिष्ठ ही को यन्त्रक्रियाविधि में अत्यन्त श्रेष्ठ कहते हैं । इत्यादि-अगस्तत्व लहरी मैं
कहा है ॥ ३६-३७ ॥
अथ पञ्चधारालोहनिर्णयः- अब पञ्चधारालोह का निर्णय करते हैं-
शङ्कवो बहवस्सन्ति नानायन्त्रक्रियाविधौ ।
पञ्च धारालोहकृतशङ्कवस्तेषु शास्त्रतः ॥ ३८ ॥
गुहागर्भदर्शयन्त्रदर्पणादिनिबन्धने ।
सुप्रशस्ता इति प्रोक्ता यन्त्रशास्त्रविशारदै ॥ ३९ ॥
शङ्कु बहुत हैं नानायन्त्रक्रियाविधि में, पञ्चधारालोहे के बने शङ्कु उन में शास्त्र से प्रशस्त
कहे हैं ॥ ३८-३९ ॥
तदुक्तं लोहतन्त्रप्रकरणे-वह कहा है लोहतत्त्वप्रकरण में-
द्विवङ्गामाक्षिकिशुल्वकेन्द्ररुकान् शोधितान् । शास्त्रतस्सङ्गृह्याथ मृगेन्द्र-
मूषमुखतस्सम्पूर्थ्य मण्डोदरे । चञ्चूभस्त्रामुखाद् धमेत् त्रिशतकक्ष्योष्णप्रवेगात् ।
क्रमात् सञ्चाल्यापि च तद्रस समदल कृत्वा न्यसेद् यन्त्रके ॥ ४० ॥
धारापञ्चकसंयुक्त सुरुचिर भास्वत्स्वरूप दृढ लोहम् ।
भारयुत वदन्ति मुनयस्त पञ्चधाराभिधम् ॥ ४१ ॥
द्विवङ्क-लोहाविशेष, या जस्ता ? सोनामाखि, शुल्व-ताम्बा, इन्द्र-स्थावर विष-वज्र, रुरुक-लोहविशेष
या हरिण का सींग ?, शास्त्र से शोधे हुओं को लेकर मृगेन्द्रमूषामुख से मण्डोदर में भरकर चञ्चू—चूच-
भस्त्रामुख से ३०० दर्जे की उष्णता के वेग से धोंके क्रम से गलाकर उस पिंघले रस को बराबर करके
यन्त्र में रख दे । धारापञ्चकलोह से युक्त सुरुचिर चमकस्वरूपवाला दृढ भारवान् पञ्चकधारा नाम का
लोहा मुनि कहते हैं ॥ ४०-४१ ॥
अथ पारमन्थिकद्रावकनिर्णयः- अब पारमन्थिक द्रावक का निर्णय देते हैं-
मणिसंस्थापनार्थाय तन्त्रीमूलसमाकुलम् ।
कथ्यते सग्रहादत्र पारग्रन्थिकद्रावकम् ॥ ४२ ॥
मणि के संस्थापनार्थ तन्त्रीमूल से युक्त संक्षेप से पारमन्थिक द्रावक कहा जाता है ॥ ४२ ॥
गुहागर्भदर्शयन्त्र ] [ १५१
पार वैणविकं चैव लम्बोदरमृत्कुण्डके ।
जटाग्रन्धि पार्वणिकं स्वर्णबीजं घटोद्गजम् ॥ ४३ ॥
सम्मेल्य विधिवच्छुद्धानेतान् तुल्यप्रमाणतः ।
द्रावकाकर्षणयन्त्रे द्रावकं तु समाहरेत् ॥ ४४ ॥
तद्द्रावकं हेमवर्णं सुशुद्धं सुप्रभं भवेत् ।
एतद् बिम्बाकर्षणादिप्रयोगेषु यथाविधि ॥ ४५ ॥
उपयुक्तं भवेत् तस्मात् पारगन्धिकद्रावकम् ।
सम्पादयेद् विशेषेण प्रतिबिम्बाकर्षणे ॥ ४६ ॥ इत्यादि ।
पारा, वंशलोचन या बांस का क्षार, लम्बेपेटवाले मिट्टी के कुण्ड में जटाग्रन्धि ?—जटामांसी
की ग्रन्थि, पार्वणिक वृक्ष, स्वर्णबीज—धतूरे के बीज, घटोद्गज ?—घटोत्कच—राक्षस—रोहेडा वृक्ष ?
विधिवत् शुद्ध इन को समान प्रमाण से द्रावक आकर्षणयन्त्र-द्रावक खींचनेवाले यन्त्र में मिलाकर द्रावक
को लेले वह द्रावक सुनहरा शुद्ध सुन्दर—प्रभावाला हो जावे, वह बिम्बाकर्षण आदि प्रयोगों में यथाविधि
उपयुक्त हो सके, अतः पारगन्धिक द्रावक विशेषरूप से प्रतिबिम्बाकर्षण के निमित्त सम्पादन करे—
बनावे ॥ ४३-४६ ॥
अथ चुम्बकमणिनिर्णय —अथ चुम्बकमणि का निर्णय देते हैं—
उक्तेषु मणिवर्गेषु प्रतिबिम्बाकर्षणे ।
शास्त्रज्ञैश्चुम्बकमणिःश्रेष्ठमित्युच्यते क्रमात् ॥४७॥
उक्त मणि वर्गों में प्रतिबिम्बाकर्षण के निमित्त शास्त्रज्ञविद्वानों द्वारा चुम्बक मणि श्रेष्ठ
कही है ॥४७॥
तदुक्तं मणिदीपिकायाम्—वह कहा है मणिदीपिका में—
चुम्बकश्शर्करादन्त्य शौण्डिकपारदपार्वणशुल्वम् ।
रञ्जकमाक्षिकगृधिकसौरि महिषखुर तद्विश्वकपालम् ॥४८॥
विधिवच्छुद्धीकृतसमभागान् कर्पटमूषामुखमध्यविले ।
सम्पूर्याक्षतव्यासटिकाया सस्थाप्योलूकिकभस्त्रमुखात् ॥४९॥
धमयेत् कथ्यशतोष्णिकवेगात् सङ्गाल्य रस वरयन्त्रमुखे ।
संसिच्चेद् यदि भवति सुरूप चुम्बकमणिरत्यन्तविशुद्धम् ॥५०॥ इत्यादि ॥
चुम्बक-कान्तलोह, शर्कर-रेत, टङ्कण-सुहागा, दन्त्य-हाथीदान्त का चूर्ण, शौण्डिक-पिप्पली ?
या लोहविशेष ?, पारा, पार्वण—पर्वणि—पर्ववाले वृक्ष का क्षार, शुल्व—ताम्बा, रञ्जक—हिङ्गुल—
शिंगरफ, सोनामाखी, गृधिक ?, सौरि—आदित्यभक्ता—हुलहुल, या भल्लातक ?, भैंस का खुर,
विश्वकपाल ? विधिवत् शुद्ध किए समभागों कर्पटमूषामुखमध्य बिल में भरकर अक्षत व्यासटिका में रख
कर उलूकिक भस्त्रमुख से धमन करे १०० डिग्री के वेग से गलाकर रस—पिंघले रस को वरयन्त्रमुख में
यदि सींच दे सुरूप चुम्बक मणि अत्यन्त विशुद्ध हो जाता है ॥ ४८-५०॥
१५२ ] [ बृहद् विमानशास्त्र
बिम्बाकर्षणनिर्यासनिर्णयः—बिम्बाकर्षणनिर्यास का निर्णय देते हैं—
षष्ट्युत्तरत्रिशतनिर्यासवर्गेषु शास्त्रतः ।
रूपाकर्षणनिर्हासं प्रतिबिम्बापकर्षणे ॥५१॥
अत्यन्तश्रेष्ठमित्याहुश्शास्त्रेषु ज्ञानवित्तमाः ।
रूपाकर्षणनिर्यासमतस्सम्पादयेत् सुधीः ॥५२॥
३६० निर्यास वर्गों में शास्त्र से रूपाकर्षण निर्यास प्रतिबिम्बापकर्षण में उच्च ज्ञानियों ने
शास्त्रों में अत्यन्त श्रेष्ठ कहा है, बुद्धिमान् रूपाकर्षणनिर्यास का सम्पादन करे ॥५१-५२॥
उक्तं हि निर्यासकल्पे—कहा ही निर्यासकल्प में—
ऐन्द्व क्रौञ्च वैणव क्षीरपञ्चकमेव च ।
चुम्बकं चोडुसारं च माधिमात्वग्विभावरिम् ॥५३॥
रयशोण्डं द्रोणसारं पारमम्बरमेव च ।
मुक्ताफल च वल्मीकसार सारस्वत नखम् ॥५४॥
षोडशैतान् पदार्थानत्यन्तशुद्धान् यथाविधि ।
समभागान् गृहीत्वाथ मयूराण्डरसे क्रमात् ॥५५॥
मासमेक मर्दयित्वा बिल्वतैले निवेशयेत् ।
निर्यासपाक(क्व?) यन्त्रेथ तद्घोल (गो?) स्थाप्य शास्त्रतः॥ ५६॥
पाचयेदग्निना सम्यक् पाकावधि यथाक्रमम् ।
यावन्निर्यासता याति तावद् यामचतुष्टयम् ॥५७॥
सम्पाच्य विधिवत् पश्चान्निर्यास संग्रहेच्छनै ।
रूपाकर्षणनिर्यासमिति चाहुर्मनीषिण ॥५८॥
बिम्बाकर्षणनिर्यासमित्याहु पण्डितोत्तमा ॥५९॥ इत्यादि ॥
ऐन्द्रव—चन्द्रकान्त, क्रौञ्च—लोहविशेष, वैणव—वंशलोचन या वेणुक्षार, क्षीरपञ्चक—बड़-
पीपल गूलर बेंत पिलखन का दूध, चुम्बक—अयस्कान्त, उडुसार ?, पारा, अभ्रक, मुक्ताफल—मोती या
कपूर, वल्मीक मिट्टी का सार, सारस्वत मालकंगनी का तैल, नख-नखद्रव्य । इन१६ पदार्थोंको अत्यन्त शुद्ध
यथाविधि समान भाग लेकर क्रम से मोर के अण्डे के रस में एक मास मर्दन करके बिल्वतैल में डालदे
गोन्द पकानेवाले यन्त्र में उस घोल को स्थापित करके शास्त्र से अग्नि से पकावे पाक अवधि तक जबतक
निर्यासता को प्राप्त होता है तब तक चारयाम विधिवत् पकाकर पश्चात् निर्यास धीरे से लेले इसे मनीषी
जन रूपाकर्षण निर्यास कहते हैं और ऊंचे पण्डित बिम्बाकर्षण निर्यास भी कहते हैं ॥५३-५८॥
पटदर्पणनिर्णयः—पटदर्पणनिर्णय देते हैं—
रूपाकर्षणनिर्हासाद् यतश्शास्त्रविधानतः ।
प्रतिबिम्बाकर्षणार्थं कुर्वन्ति पटदर्पणम् ॥६०॥
तस्माद् विचार्य शास्त्राणि पूर्वाचार्योक्तवर्त्मना ।
संग्रहेण प्रवक्ष्यामि निर्यासपटदर्पणम् ॥६१॥
गुहागर्भदर्शयन्त्र ] [ १५३
रूपाकर्षणनिर्यास-गोन्द जिससे शास्त्रविधानद्वारा प्रतिबिम्बाकर्षण के लिये पटदर्पण बनाते
हैं अतः शास्त्रों को पूर्वोक्त आचार्य के कहे मार्ग से विचार करके संग्रह से निर्यासपटदर्पण
कहूंगा ॥८०-६१॥
तदुक्तं दर्पण प्रकरण-वह कहा है दर्पणप्रकरण में-
निर्यासाकपासप्रतोलिकान् कुरङ्गमातङ्गवराटिकानपि ।
क्षोगीरक घोलिकचापशर्करान् परोटिकावाध्युं विकाप्रियङ्गवान् ॥६२॥
झञ्झोटिकभीरुकरुक्मकेसरनिर्यासमृत्क्षारसुवर्चलोरुधान् ।
विडारतैल मुचुकुन्दपिष्टक सिह्नाणुरक्षालिकदारुकार्मुकान् ॥ ६३ ॥
शताष्टपञ्चाशतिरष्टविंशतिर्वेदार्कबाणानलशैलत्रिंशति ।
दिक्तारवस्वर्कमुनित्रयोदशद्वाविंशतिस्सप्तदशाष्टविंशति ॥ ६४ ॥
गुणावताराब्धिमुनित्रयोदशक्रमेण भागाशविधानतस्सुधी ।
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१५४ ] [ बृहद् विमानशास्त्र
गुहागर्भादर्शयन्त्रमेवमुक्त्वा यथाविधि ।
अथेदानीं प्रवक्ष्यामि तमोयन्त्रस्य निर्णयम् ॥ ६६ ॥
गुहागर्भादर्श यन्त्र इस प्रकार यथाविधि कह कर अब तमोयन्त्र का निर्णय कहूँगा ॥ ६६ ॥
उक्तं हि यन्त्रसर्वस्वे—यन्त्रसर्वस्व में कहा है—
रौहिणीविषसम्बद्ध (न्ध ?) चूर्णांधूमादिभिस्तथा ।
क्रकचारिमणेर्दीप्तप्रभाविषसमूलत ॥ ७० ॥
विमाननाशनार्थाय प्रयोगः क्रियते यदा ।
तदा तद्विनाशाय स्वयन्त्रत्राणाय च ॥ ७१ ॥
शत्रुयन्त्रं सुविज्ञाय शास्त्रोक्तेनैव वर्त्मना ।
तमोयन्त्रं स्थापयेद् विमानवायव्यकेन्द्रके ॥ ७२ ॥ इत्यादि ॥
रौहिणी विषसम्बन्धी चूर्ण के धूप आदि से तथा क्रकचारि मणि ? (क्रकच – आरा के शत्रु-
रूपमणि) की प्रभा विषसमूल से विमाननाश के लिये जब प्रयोग किया जाता है तब उसके विनाश
के लिये अपने विमान के रक्षण के लिए शत्रु का रहस्य जान कर शास्त्रोक्त मार्ग से तमोयन्त्र—अन्धकार
फैलाने वाला यन्त्र विमान के वायव्य केन्द्र में स्थापित करे ॥ ७०-७२ ॥
तदुक्तं क्रियासारे—वह कहा है क्रियासार ग्रन्थ में—
विषधूमप्रकाशादिप्रयोगाच्छत्रुणा यदा ।
विनाशो व्योमयानस्य सम्भवेद् यदि तत्क्षणात् ॥ ७३ ॥
संस्थापयेत् तमोयन्त्रमतिवेगाद् विचक्षणः ।
यदि प्रमादं कुर्वीत स्वयानं नाशमेधते ॥ ७४ ॥
शत्रुओं का विषधूम प्रकाश आदि प्रयोग से जब विमान के विनाश की सम्भावना हो तो
तत्क्षण बुद्धिमान् वेग से तमोयन्त्र लगा वे, यदि प्रमाद किया तो अपना विमान नाश को प्राप्त हो
जाता है ॥ ७३-७४ ॥
द्वात्रिंशदुत्तरशततमोयन्त्रेषु शास्त्रतः ।
द्वियष्टितमसंख्याकयन्त्र एव गरीयसी* ॥ ७५ ॥
विषधूमप्रकाशादिसंहारे सुप्रशस्तकः ।
इति प्रोच्यते (ति ?) सम्यग्यन्त्रशास्त्रविशारदैः (दे ?) ॥७६॥
१३२ तमोयन्त्रों में शास्त्र से ६२ वीं संख्या वाला यन्त्र श्रेष्ठ है क्योंकि विषधूम प्रकाश आदि
के संहार करने में ठीक यन्त्र शास्त्र के विद्वानों द्वारा अच्छा प्रशस्त कहा जाता है ॥ ७५-७६ ॥
―――❖―――
- लिङ्गव्यत्ययः ।