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बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja

महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा

DevanagariHindipublished368 पृष्ठ

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१४० ] [ बृहद् विमानशास्त्र ]
ताराग्निबाणोडुदशद्विमृद्वसुसागराः ।
द्वाविंशत्यङ्गविभागास्तेषां शास्त्रनिरूपिताः ॥ १०९ ॥
एतानाहृत्य संशुद्धान् तत्तद्भागानुसारतः ।
पूरयित्वापद्ममुखमूषायां पद्मकुण्डके ॥ ११० ॥
तन्मूषां विन्यसेत् पश्चाद् दृढमिङ्गालपूरिते ।
त्रयोविंशदुत्तरत्रिशतकक्ष्योष्णमानतः ॥ १११ ॥
गालयित्वा पञ्चमुखभस्त्रेणात्यन्तवेगतः ।
तद्रसं योजयेद् यन्त्रस्योर्ध्वनालमुखे शनैः ॥ ११२ ॥
भवेदेवंककृते शीतरञ्जिकादर्शमुत्तमम् ॥ इत्यादि ॥
शश का पिथ्य ?-पित्त और उडु ? का पिथ्य?,-पित्त, पांशुक्षार-नवसादर, कुड्मल-नीलोत्पल-
नीलोफर, ज्योत्नासार-रेणुका गन्ध द्रव्य का तैल इतर, शीतरस कन्द-रसोंत के कन्द की पिट्ठी,
कुडुपक्षार ?, अभ्रक का क्षार, शौण्डीरका जङ्घा शल्य-गजपिप्पली के मूल का चूर्ण, वातोयर-खुले मैदान
का शोरा, श्वेत निर्यास-आक का दूध ?, मृत्सार-मृत्सा-सौराष्ट्र मृत्तिका, उरघ ? । ये बारह पदार्थ ५,
३, ५, १, १०, १०, ११, ८, ७, २२, ६, भागों को उनके शास्त्र से उन उन भागों के अनुसार शुद्ध लेकर
पद्ममुखमूषा में भर कर अङ्गार से भरे पद्मकुण्ड में उस मूषा-बोतल को रख दे, पश्चात् ३३२ दर्जे की
उष्णता प्रमाण से पांच मुख वाली भस्त्रा से गला कर, उस पिघले रस को धीरे से यन्त्र के ऊपरवाले
नालमुख में युक्त करे ऐसा करने पर शीतरञ्जिकादर्श हो ॥ १०६-११२ ॥
शीतप्रसूतिकमणिमुक्तं मणिप्रकरणे-शीतप्रसूति मणि कही है मणिप्रकरण में-
वराटिकामञ्जुलचूर्णपञ्चक मोदुम्बरक्षारचतुष्टय तथा ।
रुक्मत्रय वचुलकाष्टकं च शीतरञ्जिकादर्शसप्तकं तथा ॥ ११३ ॥
बदुत्रय शाल्मलिकाष्टविंशति क्षारत्रय पारदभागसप्तकम् ।
श्वेताभ्रसत्त्वाष्टककर्कटाङ्घ्रिक्षाराष्टक चौलिकसत्त्वपञ्चकम् ॥११४॥
निर्यासमुष्ट्युदशांशकं तथा सम्पातिजङ्घास्थि च पञ्चविंशति ।
चतुर्दशैतान् परिगृह्य शोधितान् सम्पूर्य मृत्कुण्डलमूषिकामुखे ॥११५॥
सस्थाप्य पश्चात् कुलकुण्डिकान्तरे वेगाद् धमेत् त्र्यम्बकभस्त्रिकामुखात् ।
सगाल्य पश्चात् त्रिशतोष्णकक्ष्यतो मणिप्रसूतस्य मुखे प्रपूरयेत् ॥११६॥
एवंकृते शीतप्रसूतिकामणिर्भवेत् सुदृढस्सुदृढस्सुशीतल ॥११७॥ इत्यादि ॥
कौडी, मजीठ का चूर्ण ५ भाग, गूलरक्षार ४ भाग, रुक्म ? ३ भाग, वचुलक ?-वञ्जुल-तिनिश
वृत्त ? ८ भाग,-शीतरञ्जिकादर्श ७ भाग, बदु-शोनापाठा वृक्ष ३ भाग, सिम्बल २८ भाग, कर्कटाङ्घ्रि-
काकडासिङ्गी के मूल का क्षार या केकड़ा जन्तु की टांगों का क्षार ? ८ भाग, चौलिक सत्त्व-मोरपुष्पी ?
या दारुचीनी का सत्त्व ५ भाग, निर्यासमुष्ट-कत्था ? १५ भाग, सम्पाति-गिद्ध पक्षी की जांघ की हड्डी
२५ भाग इन १४ वस्तुओं को लेकर शोध कर मिट्टी के कुण्डलाकार मूषिका-बोतल के मुख में भर कर