बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja
महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा
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विद्युत्तन्त्या समावेष्ट्य शीतप्रसुवकं मणिम् ।
द्रवपात्रान्तरे पश्चात् स्थापयेन्मध्यकेन्द्रके ॥ १२८ ॥
क्षीरीपटान्तर्गतौदुम्बरतन्त्रीन् यथाविधि ।
द्रवपात्रस्थतन्त्र्यग्रे पश्चात् सन्धारयेत् समम् ॥ १२६ ॥
तत्प्रदेशात् समानीय तन्त्रीद्वयमतः परम् ।
यन्त्रमध्यस्य शीतरञ्जिकादर्शकीलके ॥ १३० ॥
उसके पिछले भागवाले चक्र के नाभिमूल में यथाविधि दो विद्युत्तारों को लेकर दोनों पाश्र्वों
में भी सौ अरोंवाले विद्युच्चक्र के भ्रमणार्थ लगावे, पश्चात् पात्र में शीतप्रसुवक को भर दे, शीतप्रसुवक
मणि को विद्युत् के तार से लपेट कर द्रवपात्र के अन्दर मध्य केन्द्र में स्थापित करे । क्षीरी—दूधवाले
वृक्ष के दूध से बने वस्त्र के अन्तर्गत औदुम्बर-ताम्बे की तारों को यथाविधि द्रवपात्रस्थ तारों के अग्रभाग
में समान रूप से लगादे । उस प्रदेश से दो तारों को लाकर यन्त्रमध्यस्थ शीतरञ्जिकादर्शकील
में—॥ १२६-१३० ॥
अनुलोमप्रकारेण सकीलं योजयेत् ततः ।
मणिद्रावकसम्बद्ध (न्ध?) विद्युत्तन्त्रीमुखाच्छनैः ॥ १३१॥
शक्तिं सञ्चोदयेत् सम्यङ् मणिद्रावकयोः क्रमात् ।
पश्चाच्छक्तिद्वये वेगाद् विद्युत्संयोगत पुनः ॥ १३२ ॥
तन्निष्ठसुखशैत्यस्वभावशक्तिं यथाक्रमम् ।
तच्छीतरञ्जिकादर्शकीलमाक्रम्य वर्तते ॥ १३३ ॥
तत्कीलभ्रमणाद् व्योमयानमावृत्य वेगतः ।
तच्छक्ती यन्तॄणां ग्रीष्मविषशक्तिं निमेषतः ॥ १३४ ॥
विहत्य सुखसन्तोषमधोवृद्ध्यादिकान् क्रमात् ।
प्रयच्छतो विशेपेण मकरन्दामृतं यथा ॥ १३५ ॥
—अनुलोम प्रकार से कीलसहित युक्त करदे, द्रावक मणि से सम्बन्ध रखने वाले विद्युत्तारों के
मुख से धीरे से शक्ति को दोनों मणिद्रावकों में भली भांति प्रेरित करें पश्चात् दोनों शक्तियों में वेग से
विद्यु त् के संयोग से उन में रखी उन में अवलम्बित सुख शैत्य स्वभाववाली शक्ति को यथाक्रम वह शीत-
रञ्जिक आदर्शीकील को अवलम्बित करके रहती है, उस कील के घूमनेसे वे दोनों शक्तियां वेग से व्योम-
यान को प्राप्त होकर चालक और यात्रियों की गरमीरूप विषशक्ति को निमेष भर में नष्ट करके सुख सन्तोष
बुद्धिवृद्धि आदिकों को क्रम से विशेषरूप से मधु के समान देती है ॥ १३१—१३५ ॥
ततश्शतारपङ्कभ्रमणं तन्त्रया प्रकाशयेत् ।
तेन वायुविशेषेण प्रादुभूयं यथासुखम् ॥ १३६ ॥
व्योमयानस्थयन्तॄणां सर्वेषामुपरि स्वतः ।
मन्द मन्दं प्रसरति मन्दमारुतवत् क्रमात् ॥ १३७ ॥