बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja
महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा
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ततस्सूक्ष्मदर्शनालकीलकं भ्रामयेत् क्रमात् ।
चक्रदन्त्यन्तर्गता सा कुलिका तेन वेगत ॥७३॥
नालत्रयाकर्षणेन बहिर्याति शनैश्शनै. ।
यदा नालत्रयाकर्षणोन्मुखा सा भवेत् तदा ॥७४॥
सम्यक् सम्भ्रामयेद् विवृतास्यकील यथाविधि ।
तेनाङ्गान्य (ण्य?) थ यानस्य विवृतानि हि ॥७५॥
—उससे चक्रदन्ति का मुख क्रम से विकास को प्राप्त होजाता है-खुल जाता है, फिर द्रावक
मणि के मध्य में वर्तमान अत्युष्ण कुलिका को चक्रदन्ति स्वमुख से पीकर अपने अन्दर रख लेगी
पश्चात् चक्रदन्ति के गुहाशय गुप्तस्थान में भर जावेगी फिर सूक्ष्मदर्शनालवाले पेंच को क्रम से घुमावे
उससे चक्रदन्ति के अन्तर्गत वह कुलिका बेग से तीन नालों के आकर्षण से धीरे धीरे बाहिर चली जाती
है । जबकि वह तीनों नालों के आकर्षण के उन्मुख होती होवे तो सम्यक् विस्तृतमुखवाले पेंच को
यथाविधि घुमावे उससे विमान के अङ्ग विस्तृत हो जाते हैं-खुल जाते हैं ॥७१-७५॥
तस्मात् तत्रत्यकुलिका बहिर्यात्यपकर्षणात् ।
पश्चात् तत्कुलिकाशक्तिर्निश्शेष नाशमेधते ॥७६॥
ततोपसहारयन्त्रकीलक † चालयेत् सुधी. ।
तेन सर्वाङ्गोपसंहारस्स्यादेकैकतः क्रमात् ॥७७॥
पश्चाद् यन्त्रस्वरूपं लभते पूर्ववत्स्वयम् ।
एवमुक्तवा समासेन कुण्टिणीशक्तियन्त्रकम् ॥७८॥
अथेदानों पुष्पिण्यकयन्त्रमत्र निरूप्यते ।
उससे वहां की कुलिका खींचे जाने से बाहिर चली जाती है, पश्चात् वह कुलिकाशक्ति निःशेष
नाश को प्राप्त हो जाती है फिर उपसंहारयन्त्र की कील को बुद्धिमान् चलावे उससे सब अङ्गों का उपसंहार
एक एक करके हो जावेगा पश्चात् पूर्ववत् यन्त्र अपने रूप को प्राप्त करता है इस प्रकार कुण्टिणी यन्त्र को
संक्षेप से कहकर अब पुष्पिणीक यन्त्र यहां कहा जाता है ॥७६-७८॥
अथ पुष्पिणीयन्त्रनिर्णयः—अब पुष्पिणीयन्त्र का निर्णय देते हैं—
वसन्तग्रीष्मतुं कालप्रयाणे यानयन्तॄणाम् ।
सुखशैत्योपचारार्थं पुष्पिणीयन्त्रमुच्यते ॥७६॥
वसन्त ग्रीष्म ऋतुकाल के प्रवर्तमान होने पर या आक्रमण पर विमानचालक सवारियों के
सुख शीतता के उपचारार्थ पुष्पिणीयन्त्र कहा जाता है ॥७६॥
उक्तं हि खेटविलासे—कहा ही है खेटविलास ग्रन्थ में—
ग्रीष्मे पञ्चशिखा शक्तिर्वसन्ते सौरिकाभिधा ।
वायव्याग्नेयकेन्द्राभ्यामीषादण्डस्य वेगतः ॥८०॥
तत उपसंहार=ततोपसहार इत्यत्र सन्धिरार्षः ।