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सर्वकोश
बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja

महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा

DevanagariHindipublished368 पृष्ठ

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पुष्पलोचन ] [ १४१
कुल्लकुण्डिका के अन्दर रख कर वेग से त्र्यम्बक भक्षिका मुख से ३०० दर्जे की उष्णता से गला कर
मणिप्रसूतास्य के मुख में भर दे, ऐसा करने पर शुद्ध सुदृढ सुशीतल शीतप्रसूतिका मणि हो जावे—हो
जाती है ॥ ११३-११७ ॥
विद्युत्तन्त्र्या समायुक्तं द्रावकत्रयशोधितम् ।
शतारविद्युत्पङ्क तत्पुरस्तात् स्थापयेद् दृढम् ॥ ११८ ॥
विद्युत् के तारयुक्त तीन द्रावक से शोधा हुआ या बहुत अराओं से युक्त पङ्क--पंखडीचक्र
को तो उसके सामने दृढरूप में स्थापित करे ॥ ११८ ॥
तदुक्तं क्रियासारे—वह कहा है क्रियासार ग्रन्थ में —
द्वादशार्कं चाञ्जनैकत्रय द्विवृद्धाष्टक तथा ।
सम्मेल्य गालयेत सम्यक् शतकक्ष्योष्णमानत ॥ ११९ ॥
तद्भवेत्सर्जवच्छुद्धमारारं पीतवर्णकम् ।
अत्यन्तलघुसूक्ष्म च मृदुलं सुदृढ शुचि ॥ १२० ॥
पञ्चलोहमिति प्राहु रेत तच्छास्त्रवित्तमा. ।
तस्मात् प्रकल्पयेत् पत्रशतं कमलपत्रवत् ॥ १२१ ॥
तथा नाभित्रय कीलत्रय तन्त्रीत्रय क्रमात् ।
घण्टारकीलञ्चैव कारयेच्छास्त्रमानत ॥ १२२ ॥
सकीलकशलाकाभिस्संयुत सुमनोहरम् ।
नाभिचक्रत्रयं तस्मिन्नादौ सञ्चारयेद् दृढम् ॥ १२३ ॥
शण(न ?) पत्रभ्रमो वेगादनुलोमाद् यथा भवेत् ।
षट्षुपाश्र्वेषु चक्रस्य विधिवद् योजयेत् क्रमात् ॥ १२४ ॥
तथैव तत्पुरोभागचक्रपाश्र्वेष्वपि क्रमात् ।
सञ्चारयेत् पत्रशतं विलोमभ्रमण यथा ॥ १२५ ॥
ताम्बा १२ भाग, सुरमा ३ भाग, द्विवृद्ध--लोह विशेष या जस्ता ८ भाग, इन्हें मिला कर १०० दर्जे
की उष्णता से गलावे, वह शुद्ध सर्जीक्षार जैसा आरे आरों वाला पीतरंग का अत्यन्त हल्का सूक्ष्म मृदुल
सुदृढ पवित्र हो जावे उसे उत्तम शास्त्रवेत्ता पञ्चलोह कहते हैं । अतः उससे १०० पत्र-कमलपत्र की भांति
बनावे तथा ३ नाभियां ३ कीलें ३ तार क्रम से घण्टा देने वाली कील भी शास्त्र रीति से करावे कीलसहित
शलाकाओं से युक्त भी हो । उसमें प्रथम ३ नाभिचक्र लगावे, इसी प्रकार पुरोभाग—सामनेवाले चक्रपाश्र्वों
में भी क्रम से १०० पत्र लगावे जिससे विलोम—उल्टा भ्रमण हो सके ॥ ११८-१२५ ॥
तत्पश्चाद्भागचक्रस्य नाभीमूले यथाविधि ।
विद्युत्तन्त्री समाहृत्य पाश्र्वयोरुभयोरपि ॥ १२६ ॥
शतारविद्युत्पङ्कस्य भ्रमणार्थं नियोजयेत् ।
पश्चात् सम्पूरयेत् पात्रे शीतप्रसुवकद्रावम् ॥ १२७ ॥