बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja
महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसिञ्चन-जलसिञ्चन करके पश्चात् 'प्राणियों के' हृदय में कोशाष्टक-अष्टमकोश ?-
मस्तिष्क ? में भी प्रभा-तेज आभा तथा अगों-वृक्षों लता फैलने वाले पौधों आदि में भी पल्लव-
नवकोंपल फूल फल आदि उत्पन्न करती है, उसी प्रकार प्राणियों के देह की सात धातुओं में क्रम से
बल दृढ़ता चमक कान्ति आदि अधिक प्रदान करती है। और पञ्चशिखा शक्ति विषरूपा गुल्फिका-
गर्भारूपा क्रूरणा खाजाने वाली शोषण करने वाली शक्ति स्थावर जङ्गम को व्याप कर
उनकी सात धातुओं को सुखा देती है इसी प्रकार यह दूसरी मारिका-मारनेवाली शक्ति स्वभावतः स्थावर
में काण्ड-शाखा, वल्क-छाल को और जङ्गम में हृदय पांच कोशों-अन्नमय प्राणमय मनोमय आदि
को संकुचित करती है निश्चय उससे पुष्टि का नाश होता है अतः पञ्चशिखा शक्ति के वेग बलसहित
नष्ट करके विमान में स्थित ऊष्मभागी-गर्मी को सहते हुए गर्मी से आक्रान्त चालक यात्रियों के सुख
शीतता शान्ति हर्ष देने के लिये यथाविधि विमान के अङ्गयन्त्रों में पुष्पणीयन्त्र कहा जाता है ॥८६-६१॥