बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja
महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकुण्डिणीशक्तियन्त्र ] [ १३५
अष्टन्यङ्कूप्रमाणेन जायतेत्यन्तवेगत ।
विद्युत्सयोजनात् पश्चात् तयोस्सम्मेलनं भवेत् ॥ ६३ ॥
तत्सम्मेलनत काचिच्छक्तिरत्यन्तशीतला ।
जायते कौञ्चिनीनाम कुलिकाकर्षणक्षमा ॥ ६४ ॥
अथ तच्छक्तिमाहृत्य कुलिकाभिमुखं यथा ।
भवेत् तथा नालमुखात् प्रेरयेत् सप्रमाणतः ॥ ६५ ॥
सूर्यकिरण विद्युत् के सम्पर्क से द्रावक में और मणि में क्रम से शीतघन-अत्यन्त शीत हो
जावे उस में द्रवसंंसर्ग से सौलिकानामक स्त्रीशक्ति पांच न्यङ्कू ? प्रमाण से उत्पन्न हो जाती है, उसी प्रकार
मणिसंसर्ग से चुलिकानामक पुरुषशक्ति आठ न्यङ्कू ? प्रमाण से अत्यन्त उत्पन्न हो जाती है । विद्युत्स-
योजन से पश्चात् दोनों का मेल हो जावे-हो जाता है उस मेल से कौञ्चिनीनामक अत्यन्त शीतल कुलिका
के आकर्षण में समर्थ कोई शक्ति उत्पन्न हो जाती है, उस शक्ति को लेकर कुलिका के सामने जैसे हो
जावे ऐसे नाल के मुख से सप्रमाण प्रेरित करे-छोड़े ॥ ६१-६५ ॥
जतुपिण्डे यथा गुञ्जा कुलिकाया तथैव हि ।
कौञ्चिनीशक्तिसंयोगं कारयेद् विधिवत् क्रमात् ॥ ६६ ॥
अथ सा कौञ्चिनीशक्तिस्समाकर्षति वेगतः ।
तथाकर्षणात् पश्चात् कुलिकाद्रावकं क्रमात् ॥ ६७ ॥
पतत्यत्यन्तवेगेन तां मणिः पिबति स्वयम् ।
तत पटोलिकाकीलभ्रमणं कारयेत् क्रमात् ॥ ६८ ॥
पटोर्मिको विस्तृतास्यः प्रभवेत् तेन सत्वरम् ।
न भवेद् वातसंयोगस्सुतरां तन्मणौ यथा ॥ ६९ ॥
आच्छादयेत् तथा सम्यक् तन्मणिं सम्प्रदायत ।
ततः परं चक्रदन्तिकीलकं भ्रामयेच्छनै ॥ ७० ॥
लाख के पिण्ड में जैसे घूंघची-रत्ति वैसे ही कुलिका में कौञ्चिनीशक्ति का संयोग क्रम से
विधिवत् करावे, अनन्तर उस कुलिका को कौञ्चिशक्ति वेग से खींचती है पुनः उस प्रकार के आकर्षण से
कुलिका क्रम से द्रावक में अत्यन्त वेग से गिर जाती है उस कुलिका को स्वयं मणि पी लेती है-अपने
अन्दर लीन कर लेती है फिर पटोलिका नामक या पटोलक-घोंघा सीपी के आकारवाले पेंच के भ्रमण को
करावे तिस से शीघ्र पटोर्मिकनामक या वस्त्र की तह विस्तृत मुख हो जावे उस मणि में वातसंयोग ठीक
न हो सकेगा किन्तु उस मणि का अपनी कलाप्रमाण से चक्रदन्ति कील को धीरे से घुमावे-॥ ६६-७० ॥
तस्माद् विकासमायाति चक्रदन्तिमूलं क्रमात् ।
मणिद्रावकमध्यस्थामत्युष्णा कुलिका तत ॥७१॥
चक्रदन्तिमूलात् पीत्वा स्वगर्भे सन्निधास्यति ।
सम्पूरिता भवेत् पश्चाच्चक्रदन्तिगुहाशये ॥७२॥