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सर्वकोश
बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja

महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा

DevanagariHindipublished368 पृष्ठ

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पिञ्जुलादर्श ] [ १४३
तेन सौर्योष्णसन्तापो निःशेष नाशमेधते ।
मणिद्रावकपङ्केभ्यो व्योमयानस्थयन्तॄणाम् ।। १३८ ।।
सुखशैत्याह्लादहर्षा एवं सम्भवन्ति (ति?) स्वतः ।
देहस्थसप्तधातूना भवेत् तस्माच्छुचिर्बलम् ।। १३६ ।।
तस्मात् सर्वप्रयत्नेन यानदक्षिणकेन्द्रके ।
स्थापयेत् पुष्पिणीयन्त्र शास्त्रोक्तविधिना दृढम् ।। १४०।।
तदधस्स्थापयेत् पश्चात् तत्र घण्टारकीलकम् ।
सौरिपञ्चशिखोत्पन्नशक्तयो विषरूपका ।। १४१ ।।
घण्टारकीलकमुखाद् भवेयुर्बाह्यखे लयम् ।। १४२ ।। इत्यादि ।।
फिर सौ अरे वाले चक्र के भ्रमण को तार से प्रकाशित करे, उससे वायु विशेषरूप से सुग-
मता से प्रकट होकर विमान में स्थित सब चालक यात्रियों के ऊपर मन्द वायु के समान क्रम से स्वत
मन्द मन्द पड़तो है । उस से सूर्य का उष्णताप सर्वथा नाश को प्राप्त हो जाता है । मणिद्रावक