बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja
महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकुण्टिणीशक्तियन्त्र ] [ १२६
पश्चात् कच्छपप्रम्लोचशक्त्याकर्षणतः क्रमात् ।
कुलकारूपा जायते काचिच्छक्ति ज्वलनवत्स्वतः ॥८॥
तत्संयोगो यदि भवेद् व्योम्नि यानपथि क्रमात् ।
भस्मीकृत भवेद् व्योमयानमत्यन्तशीघ्रत ॥९॥
तदपायविनाशार्थं कुण्टिणीशक्तियन्त्रकम् ।
संस्थापयेद् यानकण्ठप्रदेशे सम्प्रदायतः ॥१०॥ इत्यादि ॥
तीन पांच दश ऊष्म किरणों का मेल ग्रीष्म में जब होता है तो ग्रीष्म की उष्णता कूर्म तक
स्वयं व्याप्तो है पश्चात् कच्छप प्रम्लोचन शक्ति के आकर्षण से क्रम से कुलका नामक कोई शक्ति
ज्वलन की भांति स्वतः उत्पन्न हो जाती है यदि उसका संयोग आकाश में बिमान के मार्ग में क्रम से
हो जाये तो विमान अत्यन्त शीघ्र भस्म हो जावे उस अनिष्ट के विनाशार्थ कुण्टिणीशक्ति यन्त्र विमान के
कण्ठप्रदेश में परम्पराविचार से संस्थापित करे ॥७-१०॥
नारायणोपि—नारायण भी इसमें कहता है—
ग्रीष्मोष्मकिरणवर्गविभागेषु यथाक्रमम् ।
द्वितीयवर्गकिरणाः पञ्चाशीतिसहस्रशः ॥११॥
तेष्वष्टत्रिदशसंख्याकाश्चोत्यन्तसूक्ष्मकाः ।
कूर्मस्थप्रम्लोचशक्त्याकर्षणेन स्वभावतः ॥१२॥
एकीभूय यदा ग्रीष्मे मिलितास्स्यु परस्परम् ।
तदा सञ्जायते काचित् कुलिकाख्या महत्तरा ॥१३॥
शक्तिरत्यन्तोष्णरूपा अग्निज्वालावलीरिव ।
तत्संयोगो यदि भवेद् व्योमयानस्य तत्क्षणात् ॥१४॥
भस्मीकृत भवेद् व्योमयानमत्यन्तशीघ्रतः ।
तदपायविनाशार्थं कुण्टिणीशक्तियन्त्रकम् ॥१५॥
संस्थापयेद् यानकण्ठप्रदेशे सम्प्रदायतः ॥ इति ॥
ग्रीष्म के ऊष्म किरणवर्ग के विभागों में यथाक्रम द्वितीय वर्ग की किरणें ८५ सहस्र हैं उनमें
आठ त्रिदश-८+१३ = २१ संख्या किरणें अत्यन्त सूक्ष्म हैं । कूर्मस्थ प्रम्लोचन शक्ति के आकर्षण से
स्वभावत एक होकर जब ग्रीष्म में परस्पर जब मिल जावें तो कुलिका नामक अत्यन्त उष्णरूपा अग्नि
ज्वालामाला के समान महत्तरा शक्ति उत्पन्न हो जाती है, यदि विमान का उससे संयोग हो जावे तो
विमान अत्यन्त शीघ्र भस्म हो जावे उस अनिष्ट के विनाशार्थ कुण्टिनीशक्तियन्त्र विमान के कण्ठ-
प्रदेश में परम्परा से संस्थापित करे ॥११-१५॥
लल्लोपि—लल्ल आचार्य ने भी कहा—
ग्रीष्मोष्मकिरणवर्गविभागेषु यथाक्रमम् ।
द्वितीयवर्गे द्वात्रिंशद् विभागस्थांशुषु क्रमात् । १६ ॥