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सर्वकोश
बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja

महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा

DevanagariHindipublished368 पृष्ठ

पृष्ठ 150, कुल 368 में से

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पृष्ठ 150

पद्मचक्रमुखयन्त्र ] [ १२७
१२ अङ्गुल मापवाले मुखद्वार से बना हुआ १२ अङ्गुलमाप ऊंचाई से युक्त छाल के आवरण से युक्त
पिप्पल की लकड़ी से किया गया हो, वायु के बहने के लिये ७ नालें कही है, इन लक्षणों से लक्षित वायु
को बहानेवाला नाल हो, एक एक पद्ममूल में स्थित पेंचों में यथाक्रम ७ नालों को जोड़े—लगावे इस से
वायु दौड़ता है ॥ १५०—१५२ ॥
अथोपसंहारकीलक तद्दक्षिणकेन्द्रके ॥ १५३ ॥
स्थापयेत् सुदृढ शुद्ध द्वादशास्य मनोहरम् ।
अदितेगर्भकोशीयसन्धिस्यानेषु वेगत ॥ १५४ ॥
वसन्तादिक्रमात् तत्तदृत्कालानुसारत ।
जायन्ते चण्डकूर्माद्याश्शक्तयो विषदारुणा ॥ १५५ ॥
वारुणीप्रेरणात् पश्चाद् वातस्तम्भ विशन्ति हि ।
महावातस्तम्भकेन्द्रवातस्रोतस्स्वत परम् ॥ १५६ ॥
पुन दशमुखवाला उपसंहारकील—पेंच उसके दक्षिण केन्द्र में सुदृढ़ स्थापित करे, अग्नि के
गर्भकोश के सन्धिस्थानों में वेग से वसन्त आदि क्रम से उस उस ऋतुकाल के अनुसार प्रचण्ड कूर्म
आदि शक्तियां दारुणविषवाली प्रकट हो जाती है, पश्चात् वारुणी—विद्युत् की प्रेरणा से वातस्तम्भ में
प्रविष्ट होतो है, इस से आगे महावातस्तम्भकेन्द्र के वातस्रोतों में—॥ १५३—१५६ ॥
भवेद्यन्मकल्लोलप्रवाहश्शब्दपूर्वकम् ।
एतदाकाशपरिधिकद्यावरणवायुषु ॥ १५७ ॥
प्रविश्यात्यन्तवेगेन करोति मन्थन तत ।
तत्प्रकोपाच्चण्डवातप्रवाहो वेगतो भवेत् ॥ १५८ ॥
यदा विमानोपरि तद्वायुर्घाति विशेषत ।
क (क ?) श्चिन्निर्यासबत्तस्मिन् पङ्कस्सञ्जायते स्वत ॥१५६॥
तत्सम्पर्काद् विमानस्थयन्तॄणा स्यात् मसूरिका ।
शिथिलत्व समायाति विमानञ्चापि तत्क्षणात् ॥ १६० ॥
अतस्तद्वायुमाकृष्य विमानाद् बाह्यत क्रमात् ।
सञ्चोदनार्थं विधिवत् पद्मपत्रमुखाभिधम् ॥ १६१ ॥
यन्त्र सस्थापयेत् तस्मात् तत्स्वरूपो निरूपित. ।
विशालतरङ्गप्रवाह शब्दपूर्वक हो जावे, इस के आकाश परिधिकक्षा के आवरणवायुओं में
अत्यन्तवेग से प्रविष्ट होकर मन्थनकरता है फिर उसके प्रकोप से प्रचण्डवायुप्रवाह वेग से हो जावे—हो
जाता है, जब विमान के ऊपर वह वायु विशेषत. गति करता है तब कोई गोन्द के समान पङ्क-कीचड़ सा
स्वतः प्रकट हो जाता है उसके सम्पर्क से विमानस्थ चालक और यात्रियों के मसूरिका (छोटी चेचक) हो
जाती है और विमान भो तत्क्षण शिथिलता को प्राप्त हो जाता है अत' उस वायु को खींचकर विमान से
बाहिर क्रम से प्रेरित करने के लिये विधिवत्—पद्मपत्रमुखनामक यन्त्र को संस्थापित करे, अतः उसे
स्वरूपप्रसङ्ग में निरूपित किया है ॥ १५७—१६१ ॥