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सर्वकोश
बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja

महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा

DevanagariHindipublished368 पृष्ठ

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पृष्ठ 148

अङ्गोपसंहारयन्त्र ] [ १२५
में यथाविधि एक एक पद्मनाल के नीचे यथाक्रम क्षीरीवृक्ष की छाल से बनी वायु को खींचनेवाली लम्बी
भस्त्राओं को सुदृढ़ स्थापित करे पश्चात् दो चक्रों को घुमानेवाली कीलों-पेंचों से यन्त्रसङ्कोचकील उसके
वायव्यकेन्द्र में लगावे ॥ १३०-१३४ ॥
तदुक्तं क्रियासारे-वह क्रियासार ग्रन्थ में कहा है -
अनुलोमान्मूलकील विलोमादूर्ध्वकीलकम् ।
यदा सम्भ्राम्यते वेगाद् यन्त्रसङ्कुचितो भवेत् ॥ १३५ ॥
षट्चक्रं विस्तृतैर्युक्तं पञ्चनालविराजितम् ।
तथा द्वादशतन्त्रीभिर्द्वादशास्यैश्च संयुतम् ॥ १३६ ॥
द्वादशाङ्गोपकरणकीलकं सुमनोहरैः ।
भ्राजमानं विस्तृतास्यमूर्ध्वाधो भागतस्तथा ॥ १३७ ॥
द्वाभ्या भ्रमण कीलाभ्या योजित कमठाकृतिम् ।
एतल्लक्षणसंयुक्तं यन्त्रसङ्कोचकीलकम् ॥ १३८ ॥
तत्कील स्थापयेद् यन्त्रवायव्ये सुदृढ यथा ॥ इत्यादि ॥
मूल कील अनुलोम - सीधेरूप ऊपर वाली कील विलोम-उलटे रूप से जब वेग से घूमती हैं
तो यन्त्र सङ्कुचित हो जावे-हो जाता है । विस्तृत ६ चक्रों से युक्त पांच नालों से सम्पन्न १२ तारों से
और १२ मुखों से युक्त १२ अङ्गों का सङ्कोच करनेवाली सुमनोहर कीलों से भ्राजमान-प्रकाशमान-प्रवर्त्त-
मान ऊपर नीचे भागों से बड़े मुखवाला दोनों कीलों के द्वारा भ्रमणसाधन कछवे के आकारवाला ऐसे
लक्षणों से युक्त यन्त्र को सङ्कुचित करनेवाला कील-पेंच हो उस ऐसे पेंच को यन्त्र के वायव्यकोण में
सुदृढ़ स्थापित करे ॥ १३५-१३८ ॥
एव संस्थाप्य सुदृढ यन्त्रसङ्कोचकीलकम् ॥ १३९ ॥
यन्त्रविस्तृतकीलस्य स्थापन चाभिवर्ण्यते ।
इस प्रकार यन्त्रसङ्कोच करनेवाले पेंच को स्थापित करके यन्त्र को विस्तृत करनेवाले पेंच का
स्थापन वर्णित किया जाता है ॥ १३९ ॥
तदुक्तं क्रियासारे-वह क्रियासार में कहा है-
क्रमाद् द्वादशचक्रस्य वर्तुलं पूर्णकुम्भवत् ॥ १४० ॥
नालद्वादशकं रन्तस्सशलाकं विराजितम् ।
उत्क्षेपणक्रियावर्तंकीलद्वादशकं युतम् ॥ १४१ ॥
वातप्रपूरणावर्तमध्यकीलकसंयुतम् ।
एतल्लक्षणसंयुक्तं यन्त्रविस्तृतकीलकम् ॥ १४२ ॥
विस्तृताङ्गं भवेद् यन्त्रमेतत्कीलचालनात् ।
तस्माद् यन्त्रविकासकीलकं नैऋत्यकेन्द्रके ४३।