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सर्वकोश
बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja

महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा

DevanagariHindipublished368 पृष्ठ

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पृष्ठ 154

कुटिटणीशक्तियन्त्र ] [ १३१
जाता है। पीठ, केन्द्र, आवर्तकील, द्रषपात्र, पट, ऊर्मिका, चक्रदन्ति, क्षीरपटनालावरण कील, विद्युत्तारों
से युक्त भ्रामणी चक्र, विस्तृतस्योपसंहार कील ये दश कुट्टिणी शक्तियन्त्र के अङ्ग हैं ऐसा निर्णय
किया गया है। पांच अंग इस प्रकार कह कर प्रयोग कहते हैं। तीन बालिश्त चौड़ा लम्बा आधा बालिश्त
ऊँचा लोटा पात्र के आकार की भांति गोल पीठ दृढ बनावें, उस पर पूर्व आदि क्रम से ७ केन्द्र रचें,
पश्चात् ७ केन्द्रों में घूमने वाले पेंच लगावें, मध्य केन्द्र में द्रषपात्र सुदृढ स्थापित करें ॥ २२-२७ ॥
तदुक्तं क्रियासारे—वह कहा है क्रियासार ग्रन्थ में—
कुलकाकर्षणे गुञ्जागृध्निकाद्रावक वरम् ।
तथैव श्येनकर्माण चापि श्रेष्ठतम विदुः ॥ २८ ॥
नागक्रौञ्चिकसौरम्भलोहाद् ये कृतदर्पणात् ।
निर्मिते चषकाकारपात्रे पश्चाद् यथाविधि ॥ २९ ॥
सम्पूरयेत् सप्रमाण गुञ्जागृध्निकाद्रावकम् ।
शोधित श्येनकर्माण सूत चापि निवेशयेत् ॥ ३० ॥
पश्चात् संस्थापयेद् यन्त्रमध्यकेन्द्रे यथाविधि ।
आहत्यादित्यकिरणान् पश्चात्तस्मिन्नियोजयेत् ॥ ३१ ॥
तद्रशुवेगात्तत्पात्रद्रावकस्थमणौ क्रमात् ।
क्रौञ्चिनीनामका काचिच्छक्त्यत्यन्तशीतला ॥ ३२ ॥
उद्भूय व्याप्य सर्वत्र कुलिकाभिमुखा भवेत् ।
पश्चात् तत्कुलिका शक्तिस्तदाकर्षणात्स्वयम् ॥ ३३ ॥
पतत्यत्यन्तवेगेन पात्रस्थद्रावके क्रमात् ।
अथ तत्कुलिकाशक्तिं मणि पिबति तत्क्षणात् ॥ ३४ ॥ इत्यादि ॥
तथैव स्थापयेद् वामकेन्द्रे पश्चात् पटोर्मिकान् ।
कुल्लका के आकर्षण में गुञ्जा—रत्ति घूंघची, गृध्निका ? गृध्र पत्र—तम्बाकू या गृञ्जनिका—
रक्त सोञ्जना का शुद्ध द्रावक, इसी प्रकार श्येनकर्मा—पारे को भी श्रेष्ठ समझा नाग क्रौञ्चिक सौरम्भ
लोहे से जिन से किये दर्पण से बने चषकाकार पात्र में यथाविधि सप्रमाण गुञ्जागृध्निका द्रावक भर दे,
शोधित श्येनकर्मा मारा हुआ पारा भी डाले पश्चात् यन्त्र के मध्य केन्द्र में यथाविधि संस्थापित करे,
सूर्य की किरणों को पीछे उसमें नियुक्त करे, उन किरणों के वेग से उस पात्र के द्रावकस्थ मणि में क्रम
से क्रौञ्चिनी नाम वाली कोई शक्ति अत्यन्त शीतल प्रकट होकर सर्वत्र व्याप्त कर कुलिका के सामने हो
जावे पश्चात् कुलिका शक्ति उसके आकर्षण से स्वयं अत्यन्त वेग से पात्रस्थ द्रावक में गिरती है। अनन्तर
कुलिका शक्ति को मणि तुरन्त पी लेती है, वैसे ही पश्चात् वामकेन्द्र में पटोर्मिकों को स्थापित
करे ॥ २८-३४ ॥
तदुक्तं पटकल्पे—वह कहा है पटकल्प में—