बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja
महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा
पृष्ठ 147, कुल 368 में से
संदर्भ में पढ़ें१२४ ] [ बृहद् विमानशास्त्र
नानापकर्षणार्थाय तत्कीलकं चालयेत् तत ।
सीत्कारपूर्वकं वायु तन्नाल. पिबति स्वयम् ॥ १२७ ॥
पीतवायु पुनर्नालस्त्वग्रे(ग्ले ?) वेगात् प्रमुञ्चति ।
आघातपत्रवर्गस्तद्वायु नीत्वा स्ववेगतः ॥ १२८ ॥
विमानाद्दू (दू ?) रतो बाह्यवायौ सम्मेलयेत् क्रमात् । इत्यादि ॥
पत्राहरण कील के चलाने से वेग से क्रमण प्रसारकील-फैलानेवाली कील के जोड़ के अनु-
सार यथाक्रम एक एक पद्म तार के मुख से आता है फिर जोड़नेवाली कील के चलाने से पत्रों का
सञ्चय स्वयं होकर पश्चात् पद्माकार - कमल के आकार वाला मनोहर हो जावे और एक एक पत्र-पत्ता
नाल की भांति हो जावे । एक एक पत्रनाल का आघात - मिले दो पत्र हो जावें, वायु को खींचने वाली
कील तो उसके मुख के अन्दर स्थापित करे, भांति भांति से खींचने के लिये उस कील को चलावे तब वह
नाल सीत्कार-सी करके वायु को स्वयं पीता है फिर पिए हुए वायु को नाल आगे वेग से छोड़ देती है
मेल को प्राप्त पत्रवर्ग उस वायु को नाल आगे वेग से लेकर विमान से दूर बाहिरी वायु में क्रम से
मिलादे ॥ १२३-१२८ ॥
एव निर्मितपद्माना यन्त्रे स्थानविनिर्णय ॥ १२६ ॥
उक्त हि धुण्डिनायेन तदेवान्न निरूप्यते ।
इस प्रकार बने पद्मों-कमलों का यन्त्र में स्थान निश्चय धुण्डिनाथ आचार्य ने कहा है वह
यहां निरूपित किया जाता है ॥ १२६ ॥
उक्त हि सन्धानपटले - सन्धानपटल ग्रन्थ में कहा है-
विमानप्रतिबन्धकचण्डवात निवारणम् ॥ १३० ॥
लल्लोक्तपद्मसन्धानादेव स्यान्नान्यथा भवेत् ।
तस्मात् पद्मानुसन्धानस्थानानि प्रोच्यन्ते (ते?) धुना ॥ १३१॥
पूर्वस्या दिशि ईशान्योदाग्नेयान्तं यथाक्रमम् ।
पद्मानि स्थापयेत् सप्तकेन्द्रेष्वविरल यथा ॥ १३२ ॥
सप्तकेन्द्रस्थपद्माना पुरोभागे यथाविधि ।
एकैकपद्मनालस्याधस्तात् सप्त यथाक्रमम् ॥ १३३ ॥
क्षीरीत्वनिर्मितान् दीर्घवाताकर्षणभस्त्रिकान् ।
स्थापयेत् सुदृढ पश्चाद् द्विचक्रावतंकीलकं ॥ १३४॥
यन्त्रसङ्कोचकीलस्तु तस्य वायव्यकेन्दके ।
विमान को रोकने वाले प्रचण्डवायु का निवारण लल्ल आचार्य के कहे पद्म-कमल के लगाने
से ही हो-होता है अन्यथा नहीं होता है । अतः पद्माकमलों को युक्त करने के स्थान अब कहे जाते हैं ।
पूर्व दिशा में ईशानी कोण से लेकर आग्नेय कोण तक यथाक्रम पद्मों-कमलों - वायु को निका-
लने वाले दलचक्रों को ७ केन्द्रों में पास पास स्थापित करे । ७ केन्द्रों में स्थित पद्मों के सामनेवाले भाग