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बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja

महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा

DevanagariHindipublished368 पृष्ठ

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पृष्ठ 157

[ १३४ ] [ बृहद् विमानशास्त्र
प्रादक्षिण्येन पूर्वास्ये कीलचक्रद्वयं तथा ।
विलोमेनोत्तरास्ये च स्थापयेच्चक्रकीलकम् ॥ ५३ ॥
छत्रीशलाकावत् सर्वकीलव्याप्तशलाककम् ।
एतल्लक्षणसंयुक्तं विवृतास्याख्यकीलकम् ॥ ५४ ॥ इत्यादि ॥
दो कोणों से युक्त दो मुखों से सम्पन्न प्रदक्षिणा से घूमनेवाले कीलचक्र से युक्त शराएं पूर्व
मुख में दो कीलचक्र तथा बांए से उत्तरमुख में चक्रकील स्थापित करे, छत्री शालाकाओं की भांति सब
कीलों पेंचों में व्याप्त—पूरित शलाकाओंवाला हो इस लक्षण से युक्त विस्तृत मुखवाला नाम का कील
पेंच है ॥ ५२-५४ ॥
पूर्वास्यकीलभ्रमणात् सर्वाङ्गा विवृता क्रमात् ।
तथा मुकुलिताङ्गाः स्युरुत्तरे कीलकभ्रमात् ॥ ५५ ॥
एव क्रमेणोपसंहारकीलकं यथाक्रमम् ।
सन्धारयेद् यथाशास्त्रं यथा यन्त्रोपसंहृतिः ॥ ५६ ॥ इत्यादि ॥