बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja
महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकुण्टिणीशक्तिस्तन्त्र ] [ ११३
अथ तत्पूर्वोक्तनालानतिसूक्ष्मान् यथाविधि ।
सन्धारयेद् दन्तिमूले अविनाभावतः क्रमात् ॥ ४५ ॥
एवमुक्त्वा चक्रदन्तिनालसन्धाननिर्णयम् ।
अथेदान्नी क्षीरपटनालस्थापनमुच्यते ॥ ४६ ॥
कुलिका शक्ति के पी लेन के लिये चक्रदन्ति बनावे। सर्प की केंचुली, सूणि ? –खिरनी ? का
गोन्द, ऊन का धागा, बारीक तिनकों से पाकभेद से वस्त्र की भांति बनाए दर्पण को विधिवत्-शुण्डी-
हाथीशुण्डा वृक्ष के द्रावक से शोधकर जैसे सर्प अपने शरीर को चक्राकार-गोल करके सोता है वैसे
बनाकर संस्थापित करे अनन्तर उन पूर्वोक्त अतिसूक्ष्म नालों को दन्तिमूल में मिलाकर लगावे, इस प्रकार
चक्रदन्तिनाल लगाने के निर्णय को कहकर अथ क्षीरपटनाल का स्थापन कहा जाता है ॥ ४२-४६ ॥
तदुक्तं क्रियासारे—वह क्रियासार ग्रन्थ में कहा है-
क्षीरीपटेन रचितं विवृतास्य दृढ मृदु ।
नालमेक चक्रदन्तिमुखादावर्तनक्रमात् ॥ ४७ ॥
परिवेष्ट्य तदास्य तु पीठच्छिद्रे नियोजयेत् ।
तद्द्वारा कुलिकाशक्तिर्बहिर्निर्गच्छति क्रमात् ॥ ४८ ॥
तस्मात् त स्थापयेत् क्षीरीपटनालमितीरितम् । इत्यादि ॥
क्षीरीपट—दूधवाले वृक्ष के दूध गोन्द पट से बनाया विस्तृतमुखवाला दृढ कोमल एक नाल
चक्रदन्तिमुख से घूमने के क्रम से उस मुख को लपेटकर पीठ के छिद्र में लगादे, उसके द्वारा कुलिका
शक्ति बाहिर क्रम से चली जाती है अतः उस क्षीरीपटनाल को स्थापित करे यह कहा है ॥ ४७-४८ ॥
स्थापयित्वा क्षीरनालपटमेव सकीलकम् ।
विद्युत्तन्त्रीसमायोगाद् भ्रामणीचक्रकीलकम् ॥ ४६ ॥
सर्वाङ्गभ्रमण यन्त्रे तत्तत्कीलकमार्गत ।
यथा भवेत् तथाकीले स्थापयेत् पश्चिमान्तरे ॥ ५० ॥
एव संस्थाप्य विधिवद् भ्रामणीचक्रकीलकम् ।
तस्यैशान्य विवृतास्यकीलक स्थापयेद् दृढम् ॥ ५१ ॥
इस प्रकार क्षीरनालपट कीलसहित स्थापित करके बिजुली के तार के सम्बन्ध से भ्रामणीचक्र
को सर्वाङ्ग भ्रमणयन्त्र में उस कीलवाले मार्ग से कीलों के साथ पश्चिम भाग के अन्दर स्थापित करे,
इस प्रकार विधिवत् भ्रामणीचक्रकील उसके ईशानी दिशा में बड़े मुखवाले पेंच को दृढ स्थापित
करे ॥ ४६-५१ ॥
तदुक्तं क्रियासारे—वह कियासार में कहा है—
कोशद्वयसमायुक्त मुखद्वयविराजितम् ।
प्रदक्षिणाप्रदक्षिणाकीलचक्रसमन्वितम् ॥ ५२ ॥