बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja
महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा
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स्थापयेत् सुदृढं पश्चाद् यन्त्रपूर्वमुखे क्रमात् ।
त्रिचक्रभ्रामणीकीलप्रतिष्ठा च कारयेत् ॥ १४४ ॥
क्रम से बारह चक्रों के मुखवाला पूर्ण घड़े के समान गोल भीतरी शलाकाओं सहित बाहर नालों
से विराजमान, उत्क्षेपणक्रिया के लिए घूमनेवाली बारह कीलों से युक्त वायु से भरे घूमनेवाले मध्य पेंच
से युक्त हो इन लक्षणों से युक्त यन्त्र को विस्तृत करनेवाला पेंच विस्तृतशङ्गवाला होवे, यह यन्त्र कील
चलाने से यन्त्र का विकास करनेवाली कील को नैर्ऋत्यकोण वाले केन्द्र में सुदृढ स्थापित करके पश्चात्
क्रम से यन्त्रमुख के तीन चक्रोंवाली भ्रामणी कील की प्रतिष्ठा को कर देता है ॥ १४०-१४४ ॥
तदुक्तं क्रियासारे-वह कहा है क्रियासार ग्रन्थ में—
दन्तचक्रसमायुक्त दण्डत्रयविनिर्मितम् ।
शिरोभागे शिशुमाराकारवत् कृतं दारुणा ॥ १४५ ॥
संयोजित तथा चोर्ध्वकीलचक्रं विराजितम् ।
भ्रामणीकीलक प्रोक्तमेतल्लक्षणलक्षितम् ॥ १४६ ॥
एतत्सञ्चालनादेव यन्त्रसर्वाङ्गचालनम् ।
भवेद् यन्त्रविकासश्च तत्तत्कीलकचालनात् ॥ १४७ ॥
तस्मात् त्रिचक्रभ्रामणीकीलक पूर्वकेन्द्रके ।
स्थापयेद् विधिना पञ्चशङ्कुताडनतो दृढम् ॥ १४८ ॥ इत्यादि ॥
दन्तचक्रों से युक्त तीन दण्डों से बना शिरोभाग में शिशुमार=ऊदबिलाओ जलजन्तु के आकार
वाला लकड़ी से बनाया हुआ और उपरीकीलचक्रों से जोड़ा हुआ इस लक्षणवाला भ्रामणीकील कहा है
इसके चलाने से ही यन्त्र के सब अङ्गों का चलना होता है । अतः तीन चक्रोंवाला भ्रामणी पेंच पूर्वकेन्द्र
में विधि से पांच शङ्कुओं के ताडन से दृढ स्थापित करे ॥ १४५-१४८ ॥
वातप्रवाहमार्गाणि पद्माधो भागसन्धिषु ।
पद्मसङ्ख्यानुसारेण कर्त्तव्यानि यथाक्रमम् ॥ १४६ ॥
वायुप्रवाह के मार्ग पद्मसंख्यानुसार पद्मों के नीचले भाग की सन्धियों में यथाक्रम करने
चाहिए ॥ १४६ ॥
तदुक्तं क्रियासारे-वह कहा है क्रियासारग्रन्थ में—
द्वादशाङ्गुलमानस्य द्वारेण सुविकल्पितम् ।
द्वादशाङ्गुलप्रमाणेनोन्नतेन समन्वितम् ॥ १५० ॥
त्वगावरणसंयुक्तं कृत पिप्पलदारुणा ।
वातप्रवहनार्थाय नालसप्तकमीरितम् ॥ १५१ ॥
वातप्रवहनालं स्यादेतल्लक्षणलक्षितम् ।
एकैकपद्ममूलस्थकीलकेषु यथाक्रमम् ॥ १५२ ॥
सन्धारयेत् सप्तनालान् तेन वातः प्रधावति । इत्यादि ॥