त्रिशतिका: पाटीगणितसार (श्रीधराचार्य - पं. सुद्युम्नाचार्य सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Trishatika / Patiganitasara of Sridharacharya with Hindi Commentary
श्रीधराचार्य (टीकाकार: पं. सुद्युम्नाचार्य) द्वारा
( xii )
पू. में विरचित जैन गणित ग्रन्थ 'सूर्य-प्रज्ञप्ति' से¹ चली आ रही परम्परा के
अनुसार इसका मान √10 निर्धारित किया है। उन्होंने शंकु के आयतन के लिये
इसका मान 3 मानते हुए तथा गोले के आयतन के लिये 3.16 मान स्वीकृत करते
हुए सूत्र विकसित किये हैं। उदा. श्लोक 94 की संस्कृत व्याख्या में बेलन आकार
प्रस्तर-पिण्ड के घनफल को 3.162 मान स्वीकार करते हुए हल किया गया है।
फिर भी हम यह नहीं मान सकते कि त्रिशतिकाकार को आर्यभटीय-प्रोक्त मान
परिज्ञात नहीं था। जब कि D.E. Smith जैसे इतिहासकार अनायास ही इसे मानने
को तैयार हो जाते हैं²। वास्तविकता यह है कि त्रिशतिकाकार आर्यभटीय को
जानकर भी सूत्रों की सुविधा के लिये इससे पूर्व के पारम्परिक मान को स्वीकार
करते हैं।
इस सन्दर्भ में यह भी एक तथ्य है कि त्रिशतिकाकार जिस पूर्ववर्ती सूत्र
को अपनाते हैं, उसे स्वच्छता एवं स्पष्टता प्रदान करते हैं। उदाहरणतः-
(I) 'गच्छ' के प्रसंग में द्विघात समीकरण (quadratic equation) की
विधि की आर्यभटीय से तुलनीयता को अभी ऊपर निरूपित किया गया है। इस
प्रकार इस विधि को मूलतः आर्यभट ने तथा अनन्तर ब्रह्मगुप्त ने प्रस्तुत किया है।
इन सबका अनुशीलन करते हुए त्रिशतिकाकार ने इसे सर्वथा स्पष्ट रूप प्रदान
किया है। अतएव परवर्ती भास्कराचार्य ने लीलावती में इनके ही आधार पर अपना
सूत्र प्रस्तुत किया है³। साथ ही उन्होंने भास्करीय बीजगणित में श्रीधराचार्य के एक
अन्य महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ 'बीज-गणित' (वर्तमान में अनुपलब्ध) से द्विघात-समीकरण
के सम्पूर्ण सूत्र को अविकल उद्धृत करते हुए⁴ उनके ऋण को स्पष्ट रीति से
स्वीकार किया है। अतएव गणित के आधुनिक इतिहासकारों द्वारा वर्ग-समीकरण
के साथ श्रीधराचार्य का नाम जोड़ दिया गया है। स्पष्ट सूत्र प्रदान करने के लिये
श्रीधराचार्य का अवदान अनमोल है। फिर भी वर्ग-समीकरण सूत्र के मौलिक
अन्वेष्टा के रूप में आर्यभटीय, गणितपाद श्लोक 20 में आर्यभट के मूल्यवान्
योगदान को भुलाया नहीं जाना चाहिये।
१. सूर्य प्रज्ञप्ति सूत्र 20
२. As to the ratio of the circumference to the diameter, both ब्रह्मगुप्त and महावीराचार्य
used the old sementic value 3, both giving also √10 as a closer approxima-
tion, and neither one was aware of the works of Archemedes or of Heron.
३. ब्रह्मगुप्त तथा भास्कर के सूत्र के लिये देखें परिशिष्ट 2 में 'गच्छ' शब्द
४. चतुराहतवर्गसमै रूपैः पक्षद्वयं गुणयेत्।
अव्यक्तवर्गरूपैर्युक्तौ पक्षौ ततो मूलम् - भास्करीय बीजगणित पृ. 229 में उद्धृत श्रीधराचार्य
का सूत्र। .
( xiii )
(II) त्रिशतिकाकार ने मूलतः आर्यभटीय से स्पष्ट प्रेरणा प्राप्त करके<sup>१</sup>
त्रिभुज के क्षेत्रफल के लिये सर्वथा स्पष्ट तथा सही सूत्र प्रदान किया है<sup>२</sup>। इसे
आधुनिक गणित में ठीक उसी रूप में स्वीकार किया जाता है। इन्होंने वर्ग तथा
आयत के क्षेत्रफल के लिये भी आर्यभटीय से प्रेरणा प्राप्त करते हुए<sup>३</sup> स्वच्छ तथा
सर्वमान्य नियम विकसित किये<sup>४</sup>।
इन्होंने मूलतः ब्रह्मगुप्त से प्रभावित होकर<sup>५</sup> त्रिभुज तथा चतुर्भुज के क्षेत्रफल
के लिये एक सामान्य सूत्र प्रस्तुत किया है<sup>६</sup>। ब्रह्मगुप्त ने इसे दोनों प्रकार की
आकृतियों के सूक्ष्म क्षेत्रफल के लिये लागू होने वाला सामान्य सूत्र बताया था।
श्रीधर ने इसे स्वीकार करते हुए अपनी पाटी-गणित में विस्तार से यह बताया कि
यह सूत्र समलम्ब तथा सभी विषमलम्ब चतुर्भुज (quadrilaterals with unequal
altitudes) के लिये भी समान रूप से समन्वित होता है<sup>७</sup>।
आगे चलकर इस सूत्र के प्रतिबन्धों का अनुभव कर लिया गया था।
सर्वप्रथम आर्यभट द्वितीय ने इस सूत्र की सभी प्रकार के चतुर्भुजों के प्रति
व्यापकता का स्पष्ट प्रतिषेध किया तथा ऐसा मानने वालों के प्रति बड़े कठोर शब्दों
का प्रयोग किया।<sup>८</sup>
बाद में भास्कराचार्य ने भी इस सूत्र से चतुर्भुज के अस्फुट या अवास्तव
क्षेत्रफल की बात कही<sup>९</sup>। उन्होंने बताया कि भुजाओं की नाप एक समान होने पर
भी उनमें अलग-२ नाप के विकर्ण खींचने से अनेक अनियत आकार के चतुर्भुज
तथा उनके अलग-२ क्षेत्रफल प्राप्त होते हैं<sup>१०</sup>। ऐसी दशा में पूर्वोक्त सूत्र से चक्रीय
तथा अचक्रीय सभी प्रकार के आकारों वाले चतुर्भुज के लिये प्राप्त एक निश्चित
१. त्रिभुजस्य फलं शरीरं समदलकोटी भुजार्धसंवर्गः - आर्यभटीय, गणितपाद 1.6
२. कुदलं च लम्बहतम् - त्रिशतिका सूत्र 43, पृ. 86
३. वर्गः समचतुरश्रः फलं च सदृशद्वयस्य संवर्गः - आर्यभटीय, गणितपाद 1.3
४. समचतुरस्रायतयोर्भुजकोटिहतिः प्रजायते गणितम् - त्रिशतिका सूत्र 42
५. भुजयोगार्धचतुष्टयभुजोनघातात् पदं सूक्ष्मम्। - ब्राह्मस्फुट सिद्धान्त 12.21
६. त्रिशतिका सूत्र 43।
७. सदृशासमलम्बानामसदृशलम्बे विषमबाहौ - पाटी गणित श्लोक 116
८. कर्णज्ञानेन विना चतुरश्रे लम्बकं फलं यद् वा।
वक्तुं वाञ्छति गणको योऽसौ मूर्खः पिशाचो वा। -महासिद्धान्त 14.70
९. मूलमस्फुटफलं चतुर्भुजे - लीलावती, क्षेत्रव्यवहार श्लोक 19
१०. चतुर्भुजस्यानियतौ हि कर्णौ कथं ततोऽस्मिन्नियतं फलं स्यात्। - लीलावती, क्षेत्रव्यवहार
श्लोक 20
( xiv )
क्षेत्रफल अवास्तव ही होगा। इसलिये आधुनिक गणित में भी इस सूत्र को केवल
चक्रीय चतुर्भुज (cyclie quadrilaterals) के लिये ही समुचित माना जाता है।
यहाँ यह उल्लेखनीय है कि श्रीधर ने अपने सूत्र में किसी प्रतिबन्ध का
उल्लेख तो नहीं किया है। पर उन्होंने सावधानीपूर्वक ऐसे उदाहरण तथा उसके ऐसे
फल का निरूपण किया है, जो चक्रीय चतुर्भुज के लिये सर्वथा सुसंगत है। विषम
लम्ब-चतुर्भुज ब्रह्मगुप्त-प्रमेय द्वारा प्राप्त विकर्णों का प्रयोग करने पर चक्रीय होता
है। श्रीधर ने अपने उदाहरण में अपने सूत्र से जो क्षेत्रफल बताया है, वह उस प्रमेय
से प्राप्त विकर्ण का प्रयोग करने से प्राप्त क्षेत्रफल के ठीक समतुल्य बैठता है।
इससे यह संकेत मिलता है कि श्रीधर अपने सूत्र में प्रतिबन्धों का उल्लेख न करते
हुए भी एक निश्चित नियम द्वारा विकर्ण बनाकर तथा इस प्रकार चक्रीय चतुर्भुज
बनाकर अपने सूत्र को समन्वित करने के प्रति सतर्क थे।
श्रीधराचार्य के मौलिक सूत्र— गणित के क्षेत्र में श्रीधर के ग्रन्थ अत्यन्त
मूल्यवान् हैं। गणित-शास्त्र का विशाल सौध जिन इष्टकाओं से निर्मित है उनमें
इनके ग्रन्थों की चमत्कारी इष्टकाएँ भी यत्र तत्र फैली हुई हैं। उन्होंने ऐसे अनेक
सूत्र प्रदान किये, जो इनसे पहले अपरिज्ञात थे।
उदाहरणतः, गोले के आयतन के लिये उन्होंने सर्वप्रथम सूत्र विकसित
किया। इससे पूर्व आर्यभट ने आर्यभटीय गणितपाद में इसके लिये जो सूत्र प्रस्तुत
किया१, वह आधुनिक गणित के अनुसार सही नहीं है। उन्होंने गोलपाद 3.22 में
ऐसे गोल-काष्ठ का भी वर्णन किया है, जो पारा आदि भरकर निर्मित होने पर
स्वतः सदा गतिशील रहता था। मध्ययुग में विश्व के अनेक देशों में ऐसे शाश्वत
चलित्र के निर्माण में अपार परिश्रम किया गया२। आधुनिक विज्ञान में 'ऊर्जा
संरक्षण नियम' की स्थापना द्वारा यह सिद्ध कर दिया गया है कि कोई भी चक्र
वायु आदि के अवरोध तथा घर्षण-बल आदि की उपस्थिति में स्वतः सदा
गतिशील नहीं रह सकता। अतः ऐसा गोल-काष्ठ काल्पनिक है। पर श्रीधराचार्य
का गोले के आयतन का सूत्र सर्वथा वास्तविक एवं प्रामाणिक है।
श्रीधर ने पूर्ववर्ती विद्वानों का अनुसरण करते हुए अर्धवृत्त के क्षेत्रफल के
सूत्र के सामान्यीकरण द्वारा प्रत्येक वृत्त-खण्ड के लिये सूत्र विकसित किया है।
साथ ही वे इस तथ्य से सर्वथा अवगत थे कि अर्धवृत्त में जीवा तथा शर का जो
अनुपात है, वह अन्य वृत्त-खण्डों का नहीं है। उन्होंने उदा. श्लोक 86 में ब्रह्मगुप्त
के सूत्र के अनुसार 13 जीवा पर 3 शर का बिल्कुल सही प्रमाण बताया है।
१. तन्निजमूलेन हतं घनगोलफलं निरवशेषम्।। —आर्यभटीय, गणितपाद, श्लोक 7
२. द्रष्टव्य-मनोरंजक भौतिकी या.इ.पेरेलमान पृ. 72 तथा आगे
( xvi )
के अन्य प्रसंग में स्तम्भ को आधार बनाकर और भी कठिन प्रश्न विकसित किये
गए हैं।
इनके पश्चात् आर्यभट द्वितीय के 'महा-सिद्धान्त', श्रीपति के 'गणित-तिलक'
तथा नारायण के गणित-कौमुदी आदि में श्रीधर के अनेक सूत्र तथा उदाहरण
शब्दशः प्रस्तुत किये गए हैं। भास्कराचार्य ने तो उनका नाम लेकर अनेक सूत्र और
उदाहरणों में उनका ऋण स्वीकार किया है। उदाहरणतः लीलावती इष्टकर्म के
उदा. 1 के अन्तर्गत 'षड्भागः पाटलासु....' के लिये उन्होंने स्पष्ट कहा है कि यह
श्लोक त्रिशतिका का है। भास्करीय बीजगणित में श्रीधर के वर्ग-समीकरण के
सूत्र को इस भूमिका के पृ.7 में दिखाया जा चुका है।
भास्कराचार्य ने श्रीधर के गणित के इन सूत्रों के आलोक में गणित का
पर्याप्त विकास किया। अभी श्रीधर के जिस वर्ग-समीकरण की चर्चा की गई है,
उसे द्विपद के गुणनफल तथा उसके गुणनखण्डन के बिना भली प्रकार नहीं समझा
जा सकता। अतः उन्होंने इनके लिए स्पष्ट सूत्र प्रस्तुत किये, जो आधुनिक गणित
में खूब प्रचलित हैं।२
त्रिशतिकाकार ने शून्य-परिकर्म के प्रसंग में कहा है कि शून्य को किसी
राशि से गुणा आदि करने पर उसका फल शून्य होता है। आगे तुरत ही यह भी
कहा है कि शून्य से किसी राशि को गुणित करने पर उसका फल भी शून्य होता
है३। इस प्रकार उन्होंने 0 × a तथा a × 0 इन दोनों स्थितियों की परिकल्पना की
है। गुणन के क्रम-विनिमेय गुण के कारण इन दोनों का परिणाम एक ही बताया
है।
उन्होंने पूर्वोक्त प्रथम नियम के साथ 'आदि' का प्रयोग करते हुए यह भी
ध्वनित किया है कि शून्य को किसी राशि से भाग करने पर उसका फल भी शून्य
होता है। अतः 0/a भी सही है। पर उन्होंने गुणन की दोनों स्थितियों के समान भाग
की दोनों स्थितियों की कल्पना नहीं की है। उन्होंने शून्य से किसी राशि को भाग
देने पर उसके परिणाम के विषय में सावधानीपूर्वक कुछ नहीं कहा है। सम्भव है
उन्हें a/0 के अपरिभाष्य होने का आभास रहा है!!
१. वही, प्रकीर्णक व्यवहार, भागसंवर्गजाति में श्लोक 60 तथा भिन्न दृश्य जाति में श्लोक 70
२. खण्डद्वयस्याभिहतिर्द्विनिघ्नी तत्खण्डवर्गैक्ययुता कृतिर्वा - लीलावती, अभिन्नपरिकर्माष्टक
श्लोक 9
३. खस्य गुणनादिके खं संगुणने खेन च खमेव - त्रिशतिका सूत्र 8, पृ. 11
( xv )
उन्होंने इस तथ्य के आलोक में पूर्ववर्ती सूत्र को परिष्कृत करते हुए अधिक सही
सूत्र प्रदान किया है।
इसी प्रकार समलम्ब चतुर्भुज (traperium) के क्षेत्रफल के लिये इन्होंने
सर्वथा मौलिक सूत्र प्रदान किया है। यहाँ 'लम्ब' का प्रयोग भी इनका अपना है।
इसके लिये त्रिशतिका तथा 'पाटी गणित' में कुछ शाब्दिक भिन्नता के साथ सूत्र
प्रदान किये गए हैं१। पर दोनों का भाव एक ही है। आगे चलकर भास्कराचार्य
आदि ने इनसे प्रेरणा प्राप्त करके अपने-२ शब्दों में सूत्र प्रदान किये हैं२। आधुनिक
गणित में इनका यह सूत्र पूरी तरह मान्य है।
केवल त्रिशतिका में प्राप्त कुछ सूत्रों का संक्षिप्त निरूपण इस भूमिका के
IV में किया गया है। सूचीखात का घनफल या शंकु के आयतन के लिये उनका
सूत्र ब्रह्मगुप्त आदि से विलक्षण है३। यद्यपि उनका सूत्र अन्ततः ब्रह्मगुप्त के सूत्र
में ही पर्यवसित होता है। उन्होंने यह सूत्र π=3 मानकर प्रस्तुत किया है। यह
उल्लेख रोचक है कि इस सूत्र को सुविधा जनक मानते हुए भास्कराचार्य ने भी
यहाँ पाई के इस मान को स्वीकार कर लिया है४। यद्यपि वे अन्य सभी जगह इस
का मान 22/7 स्वीकार करते हैं। भास्कराचार्य ने ब्रह्मगुप्त का अनुसरण करते हुए
अन्य सूत्र भी प्रस्तुत किया है५, जो आधुनिक गणित में सर्वथा मान्यता प्राप्त है।
श्रीधर से परवर्ती गणित के लिये प्रेरणाएँ- श्रीधराचार्य के ग्रन्थ ऐसे
आलोक-स्तम्भ की भाँति रहे, जिनके प्रकाश में परवर्ती विद्वानों ने अपनी रचनाएँ
प्रस्तुत कीं। महावीर ने उनसे भाव प्राप्त करके अनेक उदाहरण अपने शब्दों में
प्रस्तुत किये। त्रिशतिका श्लोक 26 की गणितसार-संग्रह 5, 17-22 से तुलना की
जा सकती है। त्रिशतिका उदा. श्लोक 23, 24 तथा 25 में स्तम्भ के आधार पर
गणित के उदाहरण दिये गए हैं। ये भी महावीर के ग्रन्थ से तुलनीय हैं६। इस ग्रन्थ
१. चतुरस्त्रेष्वन्येषु च लम्बगुणं कुमुखयोगार्धम् - त्रिशतिका सूत्र 42, पृ. 83
तथा ⇒ भूवदनसमासार्धं मध्यमलम्बेन संगुणितम् - पाटी गणित सूत्र 115, पृ. 161
२. चतुर्भुजेऽन्यत्र समानलम्बे लम्बेन निघ्नं कुमुखैक्यखण्डम्। - लीलावती, क्षेत्रव्यवहार, श्लोक
23, पृ. 225
३. समभुवि विकीर्णराशेः परिधिषडंशस्य यो भवेद् वर्गः।
सोऽभ्युदयहतो गणितं घनहस्तेऽवस्थितिः खार्याः।। - त्रिशतिका सूत्र 61, पृ. 115
तथा ⇒ क्षेत्रफलं वेधगुणं समखातफलं त्रिभिः सूच्याः - ब्रा.स्फु.सि. 12.44
४. भवति परिधिषष्ठे वर्गिते वेधनिघ्ने घनगणितकराः स्युर्मागधास्ताश्च खार्यः। - लीलावती,
राशिव्यवहार, श्लोक 15, पृ. 31
५. समखातफलत्र्यंशः सूचीखाते फलं भवति - लीलावती, खातव्यवहार श्लोक 3, पृ. 31
६. दृष्टोऽष्टमं पृथिव्यां स्तम्भस्य त्र्यंशको मया तोये।
पादांशः शैवाले कः स्तम्भः सप्त हस्ता खे।। -गणितसारसंग्रह, प्रकीर्णक व्यवहार श्लोक 5
( xvii )
भास्कराचार्य ने इस सम्पूर्ण स्थिति के गहन अध्ययन के पश्चात् a/0 = ∞
बताया है तथा इसे ‘खहर’ यह विशिष्ट नाम दिया है¹। निश्चय ही उन्हें इस
परिणाम तक पहुँचने के लिये ब्रह्मगुप्त के तच्छेद तथा त्रिशतिका की इस
अपरिभाष्यता से प्रेरणा प्राप्त हुई होगी।
परवर्ती गणित के लिये श्रीधर की देन के सन्दर्भ में यह उल्लेख सुखद है
कि उनकी सम्पूर्ण त्रिशतिका में वृत्त-खण्ड के क्षेत्रफल तथा π के मान को
छोड़कर सभी सूत्रों को आधुनिक गणित के सूत्रों के समकक्ष सिद्ध किया जा
सकता है। उनका वृत्त-खण्ड के क्षेत्रफल का सूत्र भी पूर्ववर्ती जैन-गणित तथा
पश्चाद्वर्ती महावीर आदि से अधिक सही है। पर वह त्रिज्या-खण्ड के क्षेत्रफल
के समावेश के बिना सर्वथा सही सिद्ध नहीं हो पाया है। श्रीधर ने पाई के मान
√10 को भी सूक्ष्मतम स्तर तक प्राप्त किया है। पर वह आधुनिक गणित के
सर्वथा समतुल्य नहीं है।
त्रिशतिका के रोचक सूत्र- (I) त्रिशतिकाकार ने गणितीय संक्रियाओं के
मध्य अनेक रोचक परिणाम प्राप्त किये हैं। उन्होंने 1+2+3---+ अन्तिम पद तक
के योग के लिये एक रोचक सूत्र प्रस्तुत किया है। इस विषय में आधुनिक युग
के महान् गणितज्ञ गॉस (Karl Freidrich gauss) के बचपन की एक कहानी
बहुत प्रसिद्ध है। छह वर्ष के गॉस से उसके अध्यापक ने पूछा कि 1+2+3-- इस
क्रम से 10 तक संख्याओं का जोड़ सबसे पहले कौन बता सकता है। अन्य छात्र
इन्हें संख्या के क्रम से जोड़ में व्यस्त हो गए, तभी गॉस ने हाथ उठाकर कहा,
‘मैंने कर लिया'। अध्यापक ने पूछा, 'तूने इतनी जल्दी कैसे कर लिया, शैतान'।
गॉस ने क्या उत्तर दिया, यह तो पता नहीं। पर 'वास्तव में उसे गणित का एक
महत्त्वपूर्ण प्रमेय सूझ गया था²।
यह बिल्कुल संयोग (chance) की बात है कि त्रिशतिका में ठीक यही
प्रश्न तथा इसे हल करने का सूत्र ग्रन्थ के सबसे प्रारम्भ में प्रस्तुत किया गया है।
कौन जानता है कि त्रिशतिकाकार को यह प्रमेय किस प्रकार सूझा होगा। संक्षेप
के आवेग में उन्होंने सूत्र की उपपत्ति भी नहीं लिखी। पर सूत्र से प्रकट है कि
वे उपपत्ति जानते रहे होंगे। प्रस्तुत ग्रन्थ की व्याख्या में इसे निरूपित कर दिया गया
है।
(II) त्रिशतिकाकार ने एक रोचक नियम स्थिर किया कि 1 से लेकर कहीं
तक की भी क्रमिक विषम संख्याओं का जोड़ अवश्य ही वर्ग संख्या होती है तथा
१. खभाजितो राशिः खहरः स्यात्।। लीलावती अभिन्नपरिकर्माष्टक सूत्र 1, पृ. 71
२. Productive thinking - Verdaemir - 1945
( xviii )
वह उस संख्या का वर्ग होती है, जितने पद (number) उस जोड़ में प्रयुक्त हुए
हैं। इस प्रकार 1+3+5---99 तक का जोड़ 50²= 2500 होगा। क्योंकि यहाँ कुल
50 विषम संख्याओं को जोड़ा गया है। यह परिणाम क्रमिक संख्याओं के जोड़
‘सर्वधन’ के सूत्र से प्राप्त होता है। इसे व्याख्या में समीकरण की पद्धति से प्रकट
कर दिया गया है¹।
(III) त्रिशतिकाकार ने सूत्र 15 में किसी संख्या का घनफल प्राप्त करने के
लिये एक नियम बताया है। इसके आधार पर उन्होंने यह रोचक परिणाम प्राप्त
किया कि किसी भी संख्या (a) का घन उससे 1 कम संख्या (b) के घन से
3×a×b+1 अधिक होता है। जैसे-
8³= (7³) + (3×8×7+1) = 343+169 = 512
इसके सूक्ष्म निरीक्षण से महावीराचार्य ने यह परिणाम प्राप्त किया कि इस
a संख्या से 1 कम संख्या से नीचे वाली संख्याओं में भी ठीक यही नियम लागू
है²। अतः उन्होंने इससे यह मनोरंजक श्रेढ़ी विकसित की-
8³ = (6³) + (3×7×6)+1 + 169 = 512
अथवा 8³ = (5³) + (3×6×5) +1+169+127= 512
अथवा 8³ = (4³) + (3×5×4) +1+169+127+91 = 512 इत्यादि
अन्य रीति से-
4³ = 3 (4×3+3×2+2×1) + 4
त्रिशतिका के कुछ भाषा-वैज्ञानिक तथ्य- त्रिशतिका-शब्दों के
भाषा-वैज्ञानिक अध्ययन से उनके उद्भव तथा विकास पर प्रकाश पड़ता है। भारत
में दूरियों को नापने के लिये मूलतः उँगलियों तथा हाथ का उपयोग किया गया
था। यह दूरियों के मात्रक के रूप में ‘अंगुल’ तथा ‘हस्त’ शब्दों से प्रमाणित है।
नापने के लिये ‘अंगुल’ का प्रयोग वेद में भी प्राप्त है³। हाथ से नापने की पद्धति
विदेशों में भी प्रचलित रही। यह इसी ‘हस्त’ अर्थ में लैटिन से निःसृत cubit शब्द
से प्रमाणित है। वहाँ मूलतः पैर अर्थ वाले foot शब्द के दूरी के मात्रक के रूप
१. त्रिशतिका सूत्र 11, पृ. 14 तथा उसकी व्याख्या।
२. इष्टाद्विगुणेषुप्रचयेष्टपदान्वयोऽथवेष्टकृतिः।
व्येकेष्टहृतैकादिद्विचयेष्ट-पदैक्ययुक्ता वा। - गणित सार संग्रह, परिकर्मव्यवहार, श्लोक 43
तथा आगे
३. एतावानस्य महिमाऽतो ज्यायाँश्च पुरुषः।
स भूमिं सर्वतः स्पृत्वाऽत्यतिष्ठद् दशांगुलम्॥ - यजुर्वेद 31.2
( xix )
में प्रयुक्त होने के कारण पैरों से नापने की पद्धति भी विकसित सिद्ध होती है।
काल के मात्रकों में 'घटी' का प्रयोग किया गया है। काल के मापने वाले
के लिये 'घटी-यन्त्र' तथा केवल 'घटी' शब्द भी प्रचलित रहा है। इस शब्द से
प्रकट होता है कि उस समय यह यन्त्र छोटे घड़े के आकार का बनता था। आज
कलाई में पहने जाने वाले यन्त्र के लिए 'घड़ी' का प्रयोग करने वाले कितने लोग
जानते हैं कि यह मूलतः घड़े के आकार का था।
त्रिशतिका के गणितीय शब्द देश के विभिन्न भागों से प्राप्त किये गए हैं।
इससे प्रकट होता है कि इतिहास के विशाल काल-खण्ड में विविध स्थानों में
निरन्तर गणितीय चिन्तन जारी था। त्रिशतिका में जहाँ वैदिक शब्दों के आधार पर
सहस्र, अयुत आदि का प्रयोग किया गया है, वहीं बौद्ध ग्रन्थों के आधार पर पहली
बार नियुत के स्थान पर 'लक्ष' शब्द का प्रयोग प्राप्त होता है।
विनिमय के मात्रकों में मुख्यतः उत्तर भारत में प्रचलित पण आदि का
उल्लेख है। साथ ही दक्षिण भारत के 'काकिणी' का भी वर्णन है, जिसका
सर्वप्रथम उल्लेख दक्षिण भारत के वार्तिककार कात्यायन ने किया है।¹
प्राचीन भारतीय गणित में वृत्त तथा गोल दोनों प्रकार के आकारों के लिये
'वृत्त' का प्रयोग होता रहा है। ब्राह्मण ग्रन्थों में वृत्त के लिये 'परिमण्डल' का
प्रयोग किया गया है² तथा बौद्धग्रन्थ धम्मसंगनी आदि में अण्डाकार के लिये इस
शब्द को प्रचलित किया गया। फिर भी गणित में काफी समय तक वृत्त तथा गोल
के अर्थों में घालमेल की सम्भावना बनी रही। अतः आर्यभट ने दक्षिण भारत से
प्राप्त 'गोल' शब्द को प्रचलित किया। यह अपने इस विशिष्ट अर्थ में मूलतः
तेलगू, कन्नड आदि का शब्द है³। आर्यभटीय गोलपाद श्लोक ६ में इस 'भूगोल'
को आकाश में लटके गोल पिंजरे के समान बताया गया है। सूर्य सिद्धान्त १२.५३
में कहा है कि इस विशाल 'महीगोल' में तात्त्विक दृष्टि से कौन स्थान 'ऊपर'
या 'नीचे' कहा जा सकता है। त्रिशतिकाकार ने भी इस शब्द को यथावत् अपनाते
हुए इसके आयतन का सर्वप्रथम वर्णन किया। आज हम 'भूगोल शास्त्र' का प्रयोग
करते हुए मूलतः दक्षिण भारतीय शब्द का प्रयोग करते हैं।
त्रिशतिका में जैन, बौद्ध ग्रन्थों से प्राप्त अनेक प्राकृत शब्द भी हैं। यहाँ
वस्तु-विनिमय के लिये 'भाण्ड-प्रतिभाण्ड' का प्रयोग किया गया है। यह प्राकृत
१. काकिण्याश्चोपसंख्यानम्-अ.सू. ५.१.३३ के महाभाष्य पर वार्तिक।
२. परिमण्डल उ वा अयं पृथिवीलोकः -शतपथ ब्राह्मण ७.१.१.३७
३. तेलगू - गुडुसु (वृत्त, गोला), गुड्डु (आँख की पुतली), गोइड (गोल पत्थर) कन्नड -
गुडसु (कोई गोल चीज़) - Sanskrit language - T.Burrow Page 462
( xx )
प्रभावित संस्कृत शब्द है। इससे ज्ञात होता है कि मुख्यतः पात्रों के विनिमय द्वारा
वस्तु-विनिमय की परम्परा जारी थी। इसी प्रकार पदों की संख्या के लिये
पारिभाषिक ‘गच्छ’ का प्रयोग है। यह स्पष्टतः प्राकृत है। संस्कृत व्याकरण की
दृष्टि से संज्ञावाचक ‘गच्छ’ अशुद्ध शब्द है। क्रमिक संख्याओं के लिये ‘श्रेढ़ी’ का
प्रयोग है। यह वेद में प्राप्त ‘श्रेणी’ शब्द से निःसृत है। पर व्यापक प्रचलन के
कारण यहाँ ‘श्रेढ़ी’ का ही प्रयोग है।
इससे प्रकट है कि त्रिशतिका में अनेक परम्पराओं से प्राप्त शब्दों तथा
विधियों का उपयोग किया गया है।
त्रिशतिका में प्रतिबिम्बित सामाजिक आर्थिक जीवन- यों तो त्रिशतिका
मूलतः अंकगणित का ग्रन्थ है। पर इसके सूत्रों, उदाहरणों में प्रसंगवश तत्कालीन
जीवन की झाँकी प्राप्त हो जाती है। त्रिशतिकाकार के समय पशु-पक्षि-संकुल,
मधुर-मयूर-विरुत रमणीय अरण्यों का बाहुल्य था। अतः ऐसे अनेक उदाहरण
प्राप्त होते हैं।
समाज में मुख्यतः निम्न वर्ग तथा स्त्रियों की स्थिति अच्छी नहीं थी। दास,
दासियों की खरीद बिक्री इतनी प्रचलित थी कि इसमें अलग से जीव-विक्रय के
उदाहरण प्रस्तुत किये गए हैं¹। यह परम्परा लम्बे काल तक प्रचलित थी। क्योंकि
त्रिशतिका से लेकर लीलावती तथा 1039 ई. के गणित-तिलक तथा 1356 ई. के
गणित-कौमुदी तक में भी ऐसे ही उदाहरण वर्तमान हैं। पाटी-गणित की अज्ञातकर्तृक
व्याख्या में सहज ही कहा है कि जैसे कपड़ों आदि का उपयोग करने पर उनका
मूल्य घटता है, उसी प्रकार उम्र बढ़ने के व्युत्क्रमानुपात में इनका मूल्य कम होता
जाता है। (देखें इस ग्रन्थ में त्रिशतिका प्रस्तुत सूत्र पर उद्धृत टिप्पणी)। वास्तव
में यह उस समय की सामाजिक हीन दशा को स्पष्ट प्रकट करता है।
इस समय सामान्य लोगों की आर्थिक दशा भी कोई बहुत अच्छी नहीं थी।
आम आदमी ‘सूदखोरी’ की प्रथा से बहुत पीड़ित था। यों तो इस प्रथा का वर्णन
वेद, निरुक्त, अष्टाध्यायी, धर्मशास्त्र आदि ग्रन्थों में वर्तमान है। अथर्ववेद के एक
मन्त्र में प्रार्थना है कि मैं जिससे ऋण लूँ तथा जिसका स्त्री के पास जाऊँ, वह
मुझसे उलटी, पुलटी बातें कहते हुए डाँटे, फटकारे नहीं²!!
त्रिशतिकाकार के समय इस समस्या में जरा भी कमी नहीं आई थी।
त्रिशतिका के एक उदाहरण के अनुसार ऋणी को 5% ऋणदाता के लिये, 1%
१. त्रिशतिका उदा. 56 पृ. 60
२. यस्मा ऋणं यस्य जायामुपैमि यं याचमानो अभ्यैमि देवाः।
ते वाचं वादिषुर्मोत्तरां महैवपत्नी अप्सरसावधीताम्।। - अथर्ववेद 6.118.3
( xxi )
जमानतदार के लिये, ½% मुनीम के लिये तथा ¼% ऋणपत्रलेखक के लिये अर्थात्
कुल ²⁷⁄₄ % मासिक के हिसाब से ब्याज चुकाना पड़ता था। इस प्रकार 100/= रूप
पर वार्षिक कुल ब्याज 81/= रूप प्रदान करना पड़ता था। यह अष्टाध्यायी के
'दशैकादश ऋण'¹ से तो कम था। फिर भी सामान्य आदमी को पीढ़ियों तक
बन्धुआ मजदूर बना देने के लिये काफी था। त्रिशतिका सूत्र 35 आदि के नियमों
के अनुसार ऋण तथा ब्याज का विधिवत् हिसाब रखा जाता था तथा विस्तृत ऋण
पत्र तैयार किये जाते थे।
धनी लोगों में सोना का प्रयोग पर्याप्त मात्रा में होता था। इसकी विशुद्धता
तथा तदनुसार मूल्य निर्धारित करने की विस्तृत विधियाँ त्रिशतिका में बताई गई हैं।
सोना को तपाने पर इसके उज्ज्वल वर्ण के आधार पर मूल्य तय होता था। सबसे
बढ़िया चमकदार सुवर्ण 16 वर्ण (24 कैरेट) का होता था। इसे कल्याण सुवर्ण
कहा जाता था। यह बहुत प्राचीन काल से प्रचलित था। निरुक्तकार यास्क ने
निरुक्त 2.3 में चमकते चेहरे वाले मनुष्य की उपमा इस कल्याण-वर्ण से की है।
इसमें अन्य धातुओं को मिलाने पर क्रमशः हीन वर्ण का हो जाता था।
उस समय वन-सम्पदा का बाहुल्य था। गृह-निर्माण आदि के लिये विशाल
पेड़ों की चिराई करके उनसे पटरे तैयार किये जाते थे। उदा. श्लोक 100 में 100
हाथ लम्बे अतिविशाल पटरे का तथा उदा. श्लोक 101 में 1 हाथ व्यास वाली
अतिस्थूल खैर की लकड़ी से बनने वाले पटरे का वर्णन किया गया है उनके
क्षेत्रफल, चिराई की मजदूरी आदि के लिये गणित की आवश्यकता होती थी।
त्रिशतिकाकार ने श्लोक 59, 60 के में काष्ठ व्यवहार के अन्तर्गत उन सूत्रों का
वर्णन किया है।
कृषि के लिये खेतों को नापने की अनेक विधियाँ विकसित की गई थीं।
रेखा-गणित के अनेक नियम क्षेत्र-मापन के लिये आविष्कृत हुए थे। फसल पकने
के बाद धान के बड़े-२ ढेरों को मापने के लिये सूची खात का घनफल या शंकु
के आयतन की विधि विकसित हुई थी। श्लोक 61 में बताया है कि मगध देश
या बिहार में समपृष्ठ वाली धरती पर शंकु आकार में पड़ा हुआ 1 घन हस्त धान
1 खारी के समतुल्य माना जाता था। इसमें कमरे के अन्दर या बाराण्डे के बाहर
रखे गए ढेर से अपूर्ण शंकु बनने पर उनके घनफल जानने की भी अलग-२ विधि
बताई गई है।
त्रिशतिकाकार के समय मुद्राओं का प्रयोग प्रचलित था। श्लोक 4 में
विनिमय के मात्रकों के रूप में प्राचीन काल से चली आ रही अनेक मुद्राएँ बताई
१. कुसीददशैकादशात्ष्ठन् ष्ठचौ (पा.सू. 4-4-31)
( xxii )
गई हैं। उदा. श्लोक 98 आदि में मजदूरी आदि के प्रसंग में 'रूप' नामक सामान्य
सिक्के का उल्लेख किया गया है। पाणिनि ने अ.सू. 5.2.120 में आहत या ठप्पा
लगे सिक्कों के लिये 'रूप्य' नाम दिया है। कार्षापण आदि ऐसे सभी सिक्के चाँदी
पर बनाए जाते थे। अतः रूप्य का अर्थ चाँदी भी है। ऐसे सभी प्रकार के सिक्कों
के लिये 'रूप' का प्रयोग भी होता रहा है।
समाज में इन सिक्कों की उपलब्धता पर्याप्त मात्रा में नहीं थी। अत एव
वस्तु-विनिमय भी प्रचलित था। वस्तुओं की अलग-२ मात्रा के मुद्रा में मूल्य तय
होने के पश्चात् भी उनका आपस में अनुपात से मूल्य तय किये जाने की भी
आवश्यकता होती थी। अतः त्रिशतिका सूत्र 38 आदि में इसके नियम बताए गए
हैं।
ग्रन्थ का सम्पादन- भूमिका के प्रारम्भ में कहा गया है कि म. म. पं.
सुधाकर द्विवेदी ने वर्ष 1899 ई. में इस ग्रन्थ को पहली बार प्रकाशित किया था।
तबसे पूरी 1 शताब्दी के बीच यह ग्रन्थरत्न दूसरी बार प्रकाशित नहीं हो सका।
इस दशा में इसकी दुर्लभता का सहज अनुमान किया जा सकता है। अतः 'सुक्षेमा'
नामक व्याख्या के साथ इसका सम्पादन करते हुए इस ग्रन्थ को सुलभ तथा सुग्राह्य
बनाने का एक विनम्र प्रयास किया गया है। इस व्याख्या की कुछ प्रमुख विशेषताएँ
इस प्रकार हैं-
- इसका सबसे प्रमुख उद्देश्य प्राचीन गणित को आधुनिक परिवेश में
प्रस्तुत करना है। अतः ग्रन्थ में उल्लिखित नियमों को आधुनिक चिह्नों से युक्त सूत्र
का रूप प्रदान किया है। साथ ही उल्लिखित प्रत्येक उदाहरण में सम्बद्ध सूत्र का
अनुप्रयोग करते हुए उनकी सिद्धि भी की गई है। इसमें भिन्न संख्याओं के जोड़
आदि की प्राचीन विधि के वर्णन के पश्चात् नवीन लेखन क्रम को अपनाया है। - प्राचीन गणित की विधियों में उनकी उपपत्तियों का निरूपण बहुत कम
प्राप्त होता है। आधुनिक गणित में किसी भी नियम या सूत्र को उनकी उपपत्ति
के बिना स्वीकार नहीं किया जा सकता। अतः प्रस्तुत व्याख्या में प्रत्येक सूत्र की
उपपत्ति को प्रस्तुत किया गया है। - श्रीधराचार्य ने इस त्रिशतिका में अपने बृहत् ग्रन्थ पाटी-गणित के सूत्र,
उदाहरण प्रायः प्रस्तुत किये हैं। कहीं-२ उनके शब्दों में अन्तर है। ऐसे भिन्न
वाक्यों को तुलना के लिये इस व्याख्या की टिप्पणी में उद्धृत कर दिया गया है। - गणित के सिद्धान्तों का क्रमिक विकास तथा परवर्ती प्रभाव का निरूपण
भी इस व्याख्या का उद्देश्य है। अतः आवश्यकतानुसार परवर्ती युग में परिष्कृत
( xxiii )
सूत्रों का तथा इस विकास के परिणामस्वरूप आधुनिक युग में प्रचलित सूत्रों का
भी उल्लेख किया गया है।
5. इस व्याख्या के मूल ग्रन्थ द्वारा प्रसंगतः संकेतित तत्कालीन सामाजिक,
आर्थिक परिस्थिति का भी स्पष्ट निरूपण किया गया है। आवश्यकतानुसार
विभिन्न शब्दों में प्राकृत प्रभाव, जैन, बौद्ध प्रभाव आदि का भी उल्लेख है। वैदिक
परम्परा से प्राप्त तथा पाणिनि, वार्तिककार कात्यायन आदि द्वारा उल्लिखित शब्दों
तथा उनके क्रमशः परिवर्तित अर्थों का भी यथावसर विवेचन किया गया है।
6. परिशिष्ट में विविध पारिभाषिक शब्द तथा विविध आचार्यों द्वारा प्रस्तुत
सम्बन्धित गणितीय संक्रियाओं के सूत्र अकारादि क्रम से उल्लिखित किये गये हैं।
अन्तिम परिशिष्ट में उन सभी सूत्रों को आधुनिक सूत्रों के साथ आधुनिक पद्धति
से प्रस्तुत किया गया है।
धन्यवाद-प्रकाशन- मैं सर्वप्रथम उस अच्युत, अनन्त परमेश्वर के प्रति
नतमस्तक हूँ, जिसके गणितीय नियमों से सम्पूर्ण विश्व संचालित हो रहा है,
जिसकी अनन्तता की वेदों के शब्दों में महिमा यह है कि हम इन नियमों की
जितनी 'भूमि' को जानते हैं, उससे वह 10 अंगुल आगे बढ़ कर है१!! गणित के
उन महान् विद्वानों के प्रति मैं पुनः नतमस्तक हूँ, जिनके निरन्तर परिश्रम से आज
गणित का विशाल सौध निर्मित हो सका है।
वर्ष 1899 ई. में म.म. पं. सुधाकर द्विवेदी के महान् परिश्रम से हमें यह
ग्रन्थ सुलभ हो सका है। इनके पश्चात् वर्ष 1959 ई. में डा. कृपाशंकर शुक्ल द्वारा
स्वरचित वैदुष्यपूर्ण इंग्लिश अनुवाद के साथ बृहत् ग्रन्थ 'पाटी-गणित' का
प्रकाशन किया गया। हमने अपनी व्याख्या में पं. द्विवेदी की टिप्पणियों से तथा
तुलना के लिये डा. शुक्ल के अनुवाद से सहयोग प्राप्त किया है। अतः मैं इनके
प्रति हार्दिक धन्यवाद तथा आभार प्रकट करता हूँ।
श्री मु. म. टाउन इंटर कालेज, बलिया में व्याख्याता माननीय श्री भोला
प्रसाद 'आग्नेय' ने इस व्याख्या का पुनरीक्षण करके अनेक सुझाव प्रदान किये हैं।
अतः मैं इनके प्रति हार्दिक धन्यवाद प्रकट करता हूँ।
मुझे 'त्रिशतिका' की छाया प्रति 'पाणिनि महाविद्यालय सोनीपत में पूज्य
आचार्य विजयपाल जी विद्यावारिधि से तथा पाटी-गणित माननीय श्री नारायण
किंजवेडकर जी, गुरुबाग, वाराणसी के सौजन्य से प्राप्त हुई है। अतः मैं आप दोनों
के प्रति विनम्र श्रद्धाभाव प्रकट करता हूँ।
१. एतावानस्य महिमाऽतो ज्यायाँश्च पुरुषः।
स भूमिं सर्वतः स्पृत्वाऽत्यतिष्ठद् दशांगुलम्।। - यजुर्वेद 31.2
( xxiv )
राष्ट्रिय संस्कृत संस्थान, नई दिल्ली के कुलपति माननीय प्रो. वी. कुटुम्ब
शास्त्री जी एवम् उपनिदेशक माननीय डा. प्रकाश पाण्डेय जी ने ग्रन्थ की
उपादेयता, महत्ता तथा दुर्लभता का अनुभव करते हुए ग्रन्थ के प्रकाशन की
स्वीकृति प्रदान की है। अतः मैं आपके प्रति हार्दिक धन्यवाद एवम् आभार प्रकट
करता हूँ।
परिश्रम पूर्वक व्याख्या लिखे जाने पर भी कहीं मानवसुलभ त्रुटियाँ हो
सकती हैं, अतः भास्कराचार्य के शब्दों का उपयोग करते हुए-
ये वृद्धा लघवोऽपि येऽत्र गणका बद्ध्वाञ्जलिं वच्मि तान्।
क्षन्तव्यो मम तैर्मुदा यदि क्वचित् व्याख्याप्रमादो भवेत्।।
विदुषां विधेयः
'सुक्षेमा'-व्याख्याकारः
--०--
त्रिशतिका
विषय-सूची
श्लोक पृष्ठ
- शिव-नमस्कार 1 1
- दश-गुणोत्तर संख्याएँ 2-3 1
- पदार्थों के मात्रक 4-8 2
- संकलित विधि (एकोत्तर संख्याओं की योगविधि आदि) 1 6
- व्यवकलित विधि 3 10
- प्रत्युत्पन्न (गुणन) विधि 5 13
- भागहार विधि 9 16
- वर्ग विधि 10-11 17
- वर्गमूल-विधि 12-13 20
- घन-विधि 14-15 21
- घनमूल-विधि 16-18 24
- भिन्नसंकलन-विधि 19 26
- भिन्न व्यवकलन-विधि 19 27
- भिन्न प्रत्युत्पन्न (गुणन) विधि 20 28
- भिन्न भागहार-विधि 20 29
- भिन्न वर्ग-विधि 21 29
- भिन्न वर्गमूल-विधि 21 30
- भिन्न घन-विधि 22 30
- भिन्न घनमूल-विधि 22 31
( xxvi )
20. कला सवर्णन या समच्छेद विधि 22 31
21. प्रभाग जाति 23 32
22. भागानुबन्ध-जाति 24 33
23. भाग-भाग विधि 25 36
24. भाग मातृजाति विधि 25 37
25. वल्ली-सवर्णन 26-27 38
26. स्तम्भोद्देश-विधि 27 41
27. त्रैराशिक-विधि या समानुपात 29 49
28. व्यस्त-त्रैराशिक या व्युत्क्रमानुपात 30 57
29. पञ्च-सप्त-नव-राशिक-विधि 31 61
30. भाण्ड-प्रतिभाण्ड-विधि या वस्तु-विनिमय गणित 32 75
31. जीव-विक्रय में प्रस्तुत विधि 32 77
32. मिश्रक व्यवहार या मूलधन में सामान्य ब्याज की विधि 33 78
33. भाव्यक विधि 34 82
34. एक-पत्रीकरण विधि या ब्याज का विवरण-पत्र 35 84
35. सुवर्ण-वर्ण ज्ञान विधि 36 88
36. सुवर्ण-गणित में कुछ विशेष 37 90
37. प्रक्षेपक-विधि या हानि-लाभ ज्ञान करने की विधि 38 92
38. समक्रय-विषमक्रय-विधि या समानपात अथवा
विषमानुपात के आधार पर क्रय-गणित 38 94
39. श्रेढ़ी व्यवहार में अन्त्यधन-मध्यधन-सर्वधन-विधि 39 99
40. आदि धन-विधि 40 103
41. प्रचय-ज्ञान-विधि 40 105
42. गच्छ-ज्ञान-विधि 41 107
43. वर्ग तथा आयत का क्षेत्रफल 42 110
44. समलम्ब चतुर्भुज का क्षेत्रफल 42 111
45. त्रिभुज का क्षेत्रफल 43 115
( xxvii )
46. विविध आकार के क्षेत्रों के क्षेत्रफल 44 121
47. वृत्त की परिधि तथा उसके आधार पर क्षेत्रफल 45 123
48. वृत्त का आसन्न क्षेत्रफल 46 125
49. वृत्त के कार्मुक का क्षेत्रफल 47 126
50. मुरज आदि विविध आकृतियाँ 48 129
51. समलम्ब चतुर्भुज तथा त्रिभुज 49 131
52. मध्यलम्ब या कोटि तथा अवधा 50 131
53. कोटि या लम्ब, भुज या आधार तथा कर्ण के सूत्र 51 131
54. समखात तथा विषमखात का घनफल या
घन तथा घनाभ का आयतन 52-53 137
55. कूप का फल या अपूर्ण शंकु का आयतन 54 140
56. पाषाण फल हस्त की विधि 55 144
57. गोल पाषाण का घनफल या आयतन 56 145
58. वृत्त, त्रिभुज तथा चतुर्भुज का क्षेत्रफल 57 147
59. चिति का घनफल तथा उसके ईंटों की संख्या 58 148
60. क्रकच या चीरी गई लकड़ी का अंगुल तथा
हस्त में वर्गफल 59-60 150
61. धान्य राशि का घन हस्त तथा खारी का मान 61-62 153
62. खारीधान्य घनफल 63 155
63. दीवाल के किनारे रखे धान्य का घनगणित या घन हस्त 64 155
64. काष्ठ की छाया से दिन के गत तथा शेष काल का मान 65 157
--o--
ग्रन्थ-संक्षेप-सूची
संक्षेप ग्रन्थ-नाम प्रणेता
अथ. वे. अथर्ववेद
ऐ. ब्रा. ऐतरेय ब्राह्मण
बौ. शु. सू. बौधायन शुल्ब सूत्र बौधायन
पा. सू. पाणिनीय अष्टाध्यायी सूत्र पाणिनि
म. भा. महाभाष्य पतञ्जलि
आ. आर्यभटीय आर्यभट प्रथम
ब्रा. स्फु. सि. ब्राह्म स्फुट सिद्धान्त ब्रह्मगुप्त
पा. ग. पाटी-गणित श्रीधराचार्य
ग. सा. सं. गणित-सार-संग्रह महावीराचार्य
प्र. पा. भा. प्रशस्तापाद-भाष्य प्रशस्त-पाद
म. सि. महासिद्धान्त आर्यभट द्वितीय
ली. लीलावती भास्कराचार्य
भा. बी. भास्करीय बीजगणित भास्कराचार्य
सि. शे. सिद्धान्त-शेखर श्रीपति
ग. ति. गणित-तिलक श्रीपति
ग. कौ गणित-कौमुदी नारायण
--०--
श्रीधराचार्य-विरचित
त्रिशतिका
अथवा
पाटी गणित सार
नत्वा शिवं स्वविरचितपाट्या गणितस्य सारमुद्धृत्य।
लोकव्यवहाराय प्रवक्ष्यति श्रीधराचार्यः।। १।।
सुक्षेमा अनुवाद-शिव को नमस्कार करके स्वविरचित पाटी-गणित से
गणित के सार को उद्धृत करते हुए श्रीधराचार्य लोकव्यवहार के लिये उसे
निरूपित करेंगे।
अनुशीलन-प्रकटतः श्रीधराचार्य शैव थे तथा उन्होंने इससे पूर्व 'पाटी-गणित'
नामक विस्तृत ग्रन्थ का निर्माण किया था।
दशगुणोत्तर संख्याएँ
एकं दश शतमस्मात् सहस्रमयुतं ततः परं लक्षम्।
प्रयुतं कोटिमथार्बुदमब्जं खर्वं निखर्वं च।। २।।
तस्मान्महासरोजं शंकुं सरितां पतिं ततस्त्वन्त्यम्।
मध्यं परार्धमाहुर्यथोत्तरं दशगुणाः संज्ञाः१।। ३।।
सुक्षेमा अनुवाद-एक, दश, शत पश्चात् सहस्र, अयुत, इसके पश्चात्
लक्ष, प्रयुत, कोटि, अर्बुद, अब्ज, खर्व, निखर्व, इसके पश्चात् महासरोज शंकु,
सरितां पति=समुद्र, पश्चात् अन्त्य मध्य, परार्ध-ये क्रमशः दशगुणोत्तर संख्याओं के
नाम हैं।
अनुशीलन इस श्लोक में वर्णित एक, दश, शत, सहस्र, अयुत, अर्बुद,
समुद्र, अन्त, मध्य, परार्ध, शब्द संख्याओं के इतिहास में प्राचीनतम शब्दों में से हैं।
१. तुल. पाटी-गणित सू. 7-8, ग.ति.पृ. 1, लीलावती अभिन्नपरिकर्माष्टक श्लोक 2-3 ग.कौ.
पृ. 1
2 त्रिशतिका
यजुर्वेद 17.2 में इन सभी का उल्लेख मिलता है। इनमें एक, दश, शत, सहस्र
शब्दों के प्रतिरूप भारत से लेकर यूरोप तक की प्राचीनतम भाषाओं में प्राप्त होते
हैं। आधुनिक भाषावैज्ञानिकों ने 'शत' की इस विशेषता को देखते हुए भारोपीय
भाषा परिवार का सबसे पहला उपविभाजन शतम् तथा केन्तुम् (Centum-Latin)
इसके आधार पर ही किया है। निरुक्तकार के अनुसार सहस्र शब्द का मौलिक
अर्थ 'शक्तिशाली' यह है। इसके प्रतिरूप भारोपीय शब्दों में इसी अर्थ में इसका
प्रयोग प्राप्त होता है।
यजुर्वेद के उक्त मन्त्र में मध्य, अन्त, परार्ध संख्याएँ क्रमशः 10¹⁰, 10¹¹,
10¹² को प्रकट करती हैं। पर यहाँ संख्या नाम अधिक होने से अन्त्य, मध्य,
परार्ध, क्रमशः 10¹⁵, 10¹⁶, 10¹⁷ को व्यक्त करने के लिये प्रयुक्त हुए हैं।
सहस्र के पश्चात् वैदिक संख्याओं के समान आर्यभटीय में अयुत, नियुत,
प्रयुत का उल्लेख किया गया है२। पर इन-संख्या-नाम के लगभग एक समान होने
के कारण भ्रम की सम्भावना बनी रहती थी। अतः इस ग्रन्थ में पहली बार बौद्ध
संख्याओं के आधार पर नियुत के स्थान पर 'लक्ष' का प्रयोग किया गया। परवर्ती
गणित ग्रन्थों में यह शब्द पर्याप्त प्रचलित हुआ। साथ ही रामायण के आधार पर
कोटि का प्रयोग किया गया। वेद में अर्बुद शब्द 1 करोड़ अर्थ के लिए प्रयुक्त
हुआ है। पर इस ग्रन्थ में इसके लिये कोटि शब्द के प्रयोग के कारण इसके आगे
की अर्बुद संख्या 1 अरब की वाचक बन गई। आज भी ऐसी ही प्रसिद्धि है। आगे
की अब्ज, खर्व, निखर्व, महासरोज संख्याएँ कमल के नामों के आधार पर
विकसित हैं, जो कि जैन साहित्य से प्रेरित प्रतीत होती हैं।
विनिमय के मात्रक
षोडशपणः पुराणः पणो भवेत् काकिणीचतुष्केण।
पञ्चाहतैश्चतुर्भिर्वराटकैः काकिणी ह्येका१॥ ४॥
सुक्षेमा अनुवाद-16 पण का 1 पुराण, 4 काकिणी का 1 पण तथा
5×4=20 वराटक (कौड़ी) की काकिणी होती है।
अनुशीलन-इसके अनुसार 1/16 पुराण = 1 पण, 1/4 पण = 1 काकिणी तथा
1/20 काकिणी = 1 वराटक सिद्ध होता है।
परवर्ती युग में ये नाम बदलते रहे हैं। लीलावती में 16 पण का 1 द्रम्म
बताया है। प्रस्तुत मात्रकों के नाम प्राचीन परम्परा के अनुरूप हैं। पर इनका मूल्य
१. तुल. पाटी गणित सू. 9, गणिततिलक पृ. 2, लीलावती परिभाषा श्लोक 3
त्रिशतिका ३
परिवर्तित हो गया है। प्रस्तुत श्लोक में पुराण नाम से वर्णित सिक्के को अष्टाध्यायी
में कार्षापण तथा कौटिल्य अर्थशास्त्र में इसे ही पण तथा मनुस्मृति में रजत पुराण
कहा गया है। यही भारत का चाँदी का एक प्रसिद्ध सिक्का था। उस समय 16
माष = 1 पण या 1 पुराण माना जाता था। प्रस्तुत विवरण में पण पूर्वप्रचलित माष
के अनुरूप है तथा इससे 16 गुना बड़े सिक्के को पण के स्थान पर पुराण नाम
दिया गया है। वार्तिककार कात्यायन ने पहली बार दक्षिण भारत से प्राप्त
'काकिणी' नामक सिक्के का उल्लेख किया है। यह 4 काकिणी = 1 माष के
अनुरूप था। यहाँ पूर्वप्रचलित माष के पण के समकक्ष होने के कारण 4 काकिणी
= 1 पण बताया है। यह तथ्य निम्न चित्र से स्पष्ट है-
| कार्षापण का भाग | प्राचीन ग्रन्थों में वर्णित सिक्के | तोल |
|---|---|---|
| 1/1 | कार्षापण-अष्टाध्यायी<br>पण - कौटिल्य अर्थशास्त्र<br>रजतपुराण - मनुस्मृति | 32 रत्ती<br>चाँदी |
| 1/16 | माष | 2 रत्ती |
| 1/64 | काकिणी-वार्तिककार कात्यायन | ½ रत्ती |
| पुराण का भाग | त्रिशतिका में वर्णित सिक्के | तोल |
| :--- | :--- | :--- |
| 1/1 | पुराण | 32 रत्ती चाँदी |
| 1/16 | पण | 2 रत्ती |
| पण का 1/4<br>पुराण का 1/64 | काकिणी<br>वाराटक | ½ रत्ती |
| गुरुत्व के मात्रक | ||
| माषो दशार्धगुञ्जः षोडशमाषो निगद्यते कर्षः। | ||
| स सुवर्णस्य सुवर्णस्तैरेव पलं चतुर्भिश्च॥ ५॥ | ||
| सुक्षेमा-अनुवाद दशार्ध याने 5 गुञ्जा का 1 माष, 16 माष का 1 कर्ष, | ||
| सोने का बना हुआ इसी 1 कर्ष भार का 'सुवर्ण' नामक सिक्का होता है। उसी | ||
| 4 कर्ष का 1 पल होता है। |