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सर्वकोश
त्रिशतिका: पाटीगणितसार (श्रीधराचार्य - पं. सुद्युम्नाचार्य सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

त्रिशतिका: पाटीगणितसार (श्रीधराचार्य - पं. सुद्युम्नाचार्य सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Trishatika / Patiganitasara of Sridharacharya with Hindi Commentary

श्रीधराचार्य (टीकाकार: पं. सुद्युम्नाचार्य) द्वारा

DevanagariHindipublished208 पृष्ठ

पृष्ठ 16, कुल 208 में से

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पृष्ठ 16

( xv )

उन्होंने इस तथ्य के आलोक में पूर्ववर्ती सूत्र को परिष्कृत करते हुए अधिक सही
सूत्र प्रदान किया है।
इसी प्रकार समलम्ब चतुर्भुज (traperium) के क्षेत्रफल के लिये इन्होंने
सर्वथा मौलिक सूत्र प्रदान किया है। यहाँ 'लम्ब' का प्रयोग भी इनका अपना है।
इसके लिये त्रिशतिका तथा 'पाटी गणित' में कुछ शाब्दिक भिन्नता के साथ सूत्र
प्रदान किये गए हैं१। पर दोनों का भाव एक ही है। आगे चलकर भास्कराचार्य
आदि ने इनसे प्रेरणा प्राप्त करके अपने-२ शब्दों में सूत्र प्रदान किये हैं२। आधुनिक
गणित में इनका यह सूत्र पूरी तरह मान्य है।
केवल त्रिशतिका में प्राप्त कुछ सूत्रों का संक्षिप्त निरूपण इस भूमिका के
IV में किया गया है। सूचीखात का घनफल या शंकु के आयतन के लिये उनका
सूत्र ब्रह्मगुप्त आदि से विलक्षण है३। यद्यपि उनका सूत्र अन्ततः ब्रह्मगुप्त के सूत्र
में ही पर्यवसित होता है। उन्होंने यह सूत्र π=3 मानकर प्रस्तुत किया है। यह
उल्लेख रोचक है कि इस सूत्र को सुविधा जनक मानते हुए भास्कराचार्य ने भी
यहाँ पाई के इस मान को स्वीकार कर लिया है४। यद्यपि वे अन्य सभी जगह इस
का मान 22/7 स्वीकार करते हैं। भास्कराचार्य ने ब्रह्मगुप्त का अनुसरण करते हुए
अन्य सूत्र भी प्रस्तुत किया है५, जो आधुनिक गणित में सर्वथा मान्यता प्राप्त है।
श्रीधर से परवर्ती गणित के लिये प्रेरणाएँ- श्रीधराचार्य के ग्रन्थ ऐसे
आलोक-स्तम्भ की भाँति रहे, जिनके प्रकाश में परवर्ती विद्वानों ने अपनी रचनाएँ
प्रस्तुत कीं। महावीर ने उनसे भाव प्राप्त करके अनेक उदाहरण अपने शब्दों में
प्रस्तुत किये। त्रिशतिका श्लोक 26 की गणितसार-संग्रह 5, 17-22 से तुलना की
जा सकती है। त्रिशतिका उदा. श्लोक 23, 24 तथा 25 में स्तम्भ के आधार पर
गणित के उदाहरण दिये गए हैं। ये भी महावीर के ग्रन्थ से तुलनीय हैं६। इस ग्रन्थ
१. चतुरस्त्रेष्वन्येषु च लम्बगुणं कुमुखयोगार्धम् - त्रिशतिका सूत्र 42, पृ. 83
तथा ⇒ भूवदनसमासार्धं मध्यमलम्बेन संगुणितम् - पाटी गणित सूत्र 115, पृ. 161
२. चतुर्भुजेऽन्यत्र समानलम्बे लम्बेन निघ्नं कुमुखैक्यखण्डम्। - लीलावती, क्षेत्रव्यवहार, श्लोक
23, पृ. 225
३. समभुवि विकीर्णराशेः परिधिषडंशस्य यो भवेद् वर्गः।
सोऽभ्युदयहतो गणितं घनहस्तेऽवस्थितिः खार्याः।। - त्रिशतिका सूत्र 61, पृ. 115
तथा ⇒ क्षेत्रफलं वेधगुणं समखातफलं त्रिभिः सूच्याः - ब्रा.स्फु.सि. 12.44
४. भवति परिधिषष्ठे वर्गिते वेधनिघ्ने घनगणितकराः स्युर्मागधास्ताश्च खार्यः। - लीलावती,
राशिव्यवहार, श्लोक 15, पृ. 31
५. समखातफलत्र्यंशः सूचीखाते फलं भवति - लीलावती, खातव्यवहार श्लोक 3, पृ. 31
६. दृष्टोऽष्टमं पृथिव्यां स्तम्भस्य त्र्यंशको मया तोये।
पादांशः शैवाले कः स्तम्भः सप्त हस्ता खे।। -गणितसारसंग्रह, प्रकीर्णक व्यवहार श्लोक 5