त्रिशतिका: पाटीगणितसार (श्रीधराचार्य - पं. सुद्युम्नाचार्य सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Trishatika / Patiganitasara of Sridharacharya with Hindi Commentary
श्रीधराचार्य (टीकाकार: पं. सुद्युम्नाचार्य) द्वारा
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(II) त्रिशतिकाकार ने मूलतः आर्यभटीय से स्पष्ट प्रेरणा प्राप्त करके<sup>१</sup>
त्रिभुज के क्षेत्रफल के लिये सर्वथा स्पष्ट तथा सही सूत्र प्रदान किया है<sup>२</sup>। इसे
आधुनिक गणित में ठीक उसी रूप में स्वीकार किया जाता है। इन्होंने वर्ग तथा
आयत के क्षेत्रफल के लिये भी आर्यभटीय से प्रेरणा प्राप्त करते हुए<sup>३</sup> स्वच्छ तथा
सर्वमान्य नियम विकसित किये<sup>४</sup>।
इन्होंने मूलतः ब्रह्मगुप्त से प्रभावित होकर<sup>५</sup> त्रिभुज तथा चतुर्भुज के क्षेत्रफल
के लिये एक सामान्य सूत्र प्रस्तुत किया है<sup>६</sup>। ब्रह्मगुप्त ने इसे दोनों प्रकार की
आकृतियों के सूक्ष्म क्षेत्रफल के लिये लागू होने वाला सामान्य सूत्र बताया था।
श्रीधर ने इसे स्वीकार करते हुए अपनी पाटी-गणित में विस्तार से यह बताया कि
यह सूत्र समलम्ब तथा सभी विषमलम्ब चतुर्भुज (quadrilaterals with unequal
altitudes) के लिये भी समान रूप से समन्वित होता है<sup>७</sup>।
आगे चलकर इस सूत्र के प्रतिबन्धों का अनुभव कर लिया गया था।
सर्वप्रथम आर्यभट द्वितीय ने इस सूत्र की सभी प्रकार के चतुर्भुजों के प्रति
व्यापकता का स्पष्ट प्रतिषेध किया तथा ऐसा मानने वालों के प्रति बड़े कठोर शब्दों
का प्रयोग किया।<sup>८</sup>
बाद में भास्कराचार्य ने भी इस सूत्र से चतुर्भुज के अस्फुट या अवास्तव
क्षेत्रफल की बात कही<sup>९</sup>। उन्होंने बताया कि भुजाओं की नाप एक समान होने पर
भी उनमें अलग-२ नाप के विकर्ण खींचने से अनेक अनियत आकार के चतुर्भुज
तथा उनके अलग-२ क्षेत्रफल प्राप्त होते हैं<sup>१०</sup>। ऐसी दशा में पूर्वोक्त सूत्र से चक्रीय
तथा अचक्रीय सभी प्रकार के आकारों वाले चतुर्भुज के लिये प्राप्त एक निश्चित
१. त्रिभुजस्य फलं शरीरं समदलकोटी भुजार्धसंवर्गः - आर्यभटीय, गणितपाद 1.6
२. कुदलं च लम्बहतम् - त्रिशतिका सूत्र 43, पृ. 86
३. वर्गः समचतुरश्रः फलं च सदृशद्वयस्य संवर्गः - आर्यभटीय, गणितपाद 1.3
४. समचतुरस्रायतयोर्भुजकोटिहतिः प्रजायते गणितम् - त्रिशतिका सूत्र 42
५. भुजयोगार्धचतुष्टयभुजोनघातात् पदं सूक्ष्मम्। - ब्राह्मस्फुट सिद्धान्त 12.21
६. त्रिशतिका सूत्र 43।
७. सदृशासमलम्बानामसदृशलम्बे विषमबाहौ - पाटी गणित श्लोक 116
८. कर्णज्ञानेन विना चतुरश्रे लम्बकं फलं यद् वा।
वक्तुं वाञ्छति गणको योऽसौ मूर्खः पिशाचो वा। -महासिद्धान्त 14.70
९. मूलमस्फुटफलं चतुर्भुजे - लीलावती, क्षेत्रव्यवहार श्लोक 19
१०. चतुर्भुजस्यानियतौ हि कर्णौ कथं ततोऽस्मिन्नियतं फलं स्यात्। - लीलावती, क्षेत्रव्यवहार
श्लोक 20