त्रिशतिका: पाटीगणितसार (श्रीधराचार्य - पं. सुद्युम्नाचार्य सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Trishatika / Patiganitasara of Sridharacharya with Hindi Commentary
श्रीधराचार्य (टीकाकार: पं. सुद्युम्नाचार्य) द्वारा
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जमानतदार के लिये, ½% मुनीम के लिये तथा ¼% ऋणपत्रलेखक के लिये अर्थात्
कुल ²⁷⁄₄ % मासिक के हिसाब से ब्याज चुकाना पड़ता था। इस प्रकार 100/= रूप
पर वार्षिक कुल ब्याज 81/= रूप प्रदान करना पड़ता था। यह अष्टाध्यायी के
'दशैकादश ऋण'¹ से तो कम था। फिर भी सामान्य आदमी को पीढ़ियों तक
बन्धुआ मजदूर बना देने के लिये काफी था। त्रिशतिका सूत्र 35 आदि के नियमों
के अनुसार ऋण तथा ब्याज का विधिवत् हिसाब रखा जाता था तथा विस्तृत ऋण
पत्र तैयार किये जाते थे।
धनी लोगों में सोना का प्रयोग पर्याप्त मात्रा में होता था। इसकी विशुद्धता
तथा तदनुसार मूल्य निर्धारित करने की विस्तृत विधियाँ त्रिशतिका में बताई गई हैं।
सोना को तपाने पर इसके उज्ज्वल वर्ण के आधार पर मूल्य तय होता था। सबसे
बढ़िया चमकदार सुवर्ण 16 वर्ण (24 कैरेट) का होता था। इसे कल्याण सुवर्ण
कहा जाता था। यह बहुत प्राचीन काल से प्रचलित था। निरुक्तकार यास्क ने
निरुक्त 2.3 में चमकते चेहरे वाले मनुष्य की उपमा इस कल्याण-वर्ण से की है।
इसमें अन्य धातुओं को मिलाने पर क्रमशः हीन वर्ण का हो जाता था।
उस समय वन-सम्पदा का बाहुल्य था। गृह-निर्माण आदि के लिये विशाल
पेड़ों की चिराई करके उनसे पटरे तैयार किये जाते थे। उदा. श्लोक 100 में 100
हाथ लम्बे अतिविशाल पटरे का तथा उदा. श्लोक 101 में 1 हाथ व्यास वाली
अतिस्थूल खैर की लकड़ी से बनने वाले पटरे का वर्णन किया गया है उनके
क्षेत्रफल, चिराई की मजदूरी आदि के लिये गणित की आवश्यकता होती थी।
त्रिशतिकाकार ने श्लोक 59, 60 के में काष्ठ व्यवहार के अन्तर्गत उन सूत्रों का
वर्णन किया है।
कृषि के लिये खेतों को नापने की अनेक विधियाँ विकसित की गई थीं।
रेखा-गणित के अनेक नियम क्षेत्र-मापन के लिये आविष्कृत हुए थे। फसल पकने
के बाद धान के बड़े-२ ढेरों को मापने के लिये सूची खात का घनफल या शंकु
के आयतन की विधि विकसित हुई थी। श्लोक 61 में बताया है कि मगध देश
या बिहार में समपृष्ठ वाली धरती पर शंकु आकार में पड़ा हुआ 1 घन हस्त धान
1 खारी के समतुल्य माना जाता था। इसमें कमरे के अन्दर या बाराण्डे के बाहर
रखे गए ढेर से अपूर्ण शंकु बनने पर उनके घनफल जानने की भी अलग-२ विधि
बताई गई है।
त्रिशतिकाकार के समय मुद्राओं का प्रयोग प्रचलित था। श्लोक 4 में
विनिमय के मात्रकों के रूप में प्राचीन काल से चली आ रही अनेक मुद्राएँ बताई
१. कुसीददशैकादशात्ष्ठन् ष्ठचौ (पा.सू. 4-4-31)