त्रिशतिका: पाटीगणितसार (श्रीधराचार्य - पं. सुद्युम्नाचार्य सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Trishatika / Patiganitasara of Sridharacharya with Hindi Commentary
श्रीधराचार्य (टीकाकार: पं. सुद्युम्नाचार्य) द्वारा
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पू. में विरचित जैन गणित ग्रन्थ 'सूर्य-प्रज्ञप्ति' से¹ चली आ रही परम्परा के
अनुसार इसका मान √10 निर्धारित किया है। उन्होंने शंकु के आयतन के लिये
इसका मान 3 मानते हुए तथा गोले के आयतन के लिये 3.16 मान स्वीकृत करते
हुए सूत्र विकसित किये हैं। उदा. श्लोक 94 की संस्कृत व्याख्या में बेलन आकार
प्रस्तर-पिण्ड के घनफल को 3.162 मान स्वीकार करते हुए हल किया गया है।
फिर भी हम यह नहीं मान सकते कि त्रिशतिकाकार को आर्यभटीय-प्रोक्त मान
परिज्ञात नहीं था। जब कि D.E. Smith जैसे इतिहासकार अनायास ही इसे मानने
को तैयार हो जाते हैं²। वास्तविकता यह है कि त्रिशतिकाकार आर्यभटीय को
जानकर भी सूत्रों की सुविधा के लिये इससे पूर्व के पारम्परिक मान को स्वीकार
करते हैं।
इस सन्दर्भ में यह भी एक तथ्य है कि त्रिशतिकाकार जिस पूर्ववर्ती सूत्र
को अपनाते हैं, उसे स्वच्छता एवं स्पष्टता प्रदान करते हैं। उदाहरणतः-
(I) 'गच्छ' के प्रसंग में द्विघात समीकरण (quadratic equation) की
विधि की आर्यभटीय से तुलनीयता को अभी ऊपर निरूपित किया गया है। इस
प्रकार इस विधि को मूलतः आर्यभट ने तथा अनन्तर ब्रह्मगुप्त ने प्रस्तुत किया है।
इन सबका अनुशीलन करते हुए त्रिशतिकाकार ने इसे सर्वथा स्पष्ट रूप प्रदान
किया है। अतएव परवर्ती भास्कराचार्य ने लीलावती में इनके ही आधार पर अपना
सूत्र प्रस्तुत किया है³। साथ ही उन्होंने भास्करीय बीजगणित में श्रीधराचार्य के एक
अन्य महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ 'बीज-गणित' (वर्तमान में अनुपलब्ध) से द्विघात-समीकरण
के सम्पूर्ण सूत्र को अविकल उद्धृत करते हुए⁴ उनके ऋण को स्पष्ट रीति से
स्वीकार किया है। अतएव गणित के आधुनिक इतिहासकारों द्वारा वर्ग-समीकरण
के साथ श्रीधराचार्य का नाम जोड़ दिया गया है। स्पष्ट सूत्र प्रदान करने के लिये
श्रीधराचार्य का अवदान अनमोल है। फिर भी वर्ग-समीकरण सूत्र के मौलिक
अन्वेष्टा के रूप में आर्यभटीय, गणितपाद श्लोक 20 में आर्यभट के मूल्यवान्
योगदान को भुलाया नहीं जाना चाहिये।
१. सूर्य प्रज्ञप्ति सूत्र 20
२. As to the ratio of the circumference to the diameter, both ब्रह्मगुप्त and महावीराचार्य
used the old sementic value 3, both giving also √10 as a closer approxima-
tion, and neither one was aware of the works of Archemedes or of Heron.
३. ब्रह्मगुप्त तथा भास्कर के सूत्र के लिये देखें परिशिष्ट 2 में 'गच्छ' शब्द
४. चतुराहतवर्गसमै रूपैः पक्षद्वयं गुणयेत्।
अव्यक्तवर्गरूपैर्युक्तौ पक्षौ ततो मूलम् - भास्करीय बीजगणित पृ. 229 में उद्धृत श्रीधराचार्य
का सूत्र। .