त्रिशतिका: पाटीगणितसार (श्रीधराचार्य - पं. सुद्युम्नाचार्य सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Trishatika / Patiganitasara of Sridharacharya with Hindi Commentary
श्रीधराचार्य (टीकाकार: पं. सुद्युम्नाचार्य) द्वारा
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क्षेत्रफल अवास्तव ही होगा। इसलिये आधुनिक गणित में भी इस सूत्र को केवल
चक्रीय चतुर्भुज (cyclie quadrilaterals) के लिये ही समुचित माना जाता है।
यहाँ यह उल्लेखनीय है कि श्रीधर ने अपने सूत्र में किसी प्रतिबन्ध का
उल्लेख तो नहीं किया है। पर उन्होंने सावधानीपूर्वक ऐसे उदाहरण तथा उसके ऐसे
फल का निरूपण किया है, जो चक्रीय चतुर्भुज के लिये सर्वथा सुसंगत है। विषम
लम्ब-चतुर्भुज ब्रह्मगुप्त-प्रमेय द्वारा प्राप्त विकर्णों का प्रयोग करने पर चक्रीय होता
है। श्रीधर ने अपने उदाहरण में अपने सूत्र से जो क्षेत्रफल बताया है, वह उस प्रमेय
से प्राप्त विकर्ण का प्रयोग करने से प्राप्त क्षेत्रफल के ठीक समतुल्य बैठता है।
इससे यह संकेत मिलता है कि श्रीधर अपने सूत्र में प्रतिबन्धों का उल्लेख न करते
हुए भी एक निश्चित नियम द्वारा विकर्ण बनाकर तथा इस प्रकार चक्रीय चतुर्भुज
बनाकर अपने सूत्र को समन्वित करने के प्रति सतर्क थे।
श्रीधराचार्य के मौलिक सूत्र— गणित के क्षेत्र में श्रीधर के ग्रन्थ अत्यन्त
मूल्यवान् हैं। गणित-शास्त्र का विशाल सौध जिन इष्टकाओं से निर्मित है उनमें
इनके ग्रन्थों की चमत्कारी इष्टकाएँ भी यत्र तत्र फैली हुई हैं। उन्होंने ऐसे अनेक
सूत्र प्रदान किये, जो इनसे पहले अपरिज्ञात थे।
उदाहरणतः, गोले के आयतन के लिये उन्होंने सर्वप्रथम सूत्र विकसित
किया। इससे पूर्व आर्यभट ने आर्यभटीय गणितपाद में इसके लिये जो सूत्र प्रस्तुत
किया१, वह आधुनिक गणित के अनुसार सही नहीं है। उन्होंने गोलपाद 3.22 में
ऐसे गोल-काष्ठ का भी वर्णन किया है, जो पारा आदि भरकर निर्मित होने पर
स्वतः सदा गतिशील रहता था। मध्ययुग में विश्व के अनेक देशों में ऐसे शाश्वत
चलित्र के निर्माण में अपार परिश्रम किया गया२। आधुनिक विज्ञान में 'ऊर्जा
संरक्षण नियम' की स्थापना द्वारा यह सिद्ध कर दिया गया है कि कोई भी चक्र
वायु आदि के अवरोध तथा घर्षण-बल आदि की उपस्थिति में स्वतः सदा
गतिशील नहीं रह सकता। अतः ऐसा गोल-काष्ठ काल्पनिक है। पर श्रीधराचार्य
का गोले के आयतन का सूत्र सर्वथा वास्तविक एवं प्रामाणिक है।
श्रीधर ने पूर्ववर्ती विद्वानों का अनुसरण करते हुए अर्धवृत्त के क्षेत्रफल के
सूत्र के सामान्यीकरण द्वारा प्रत्येक वृत्त-खण्ड के लिये सूत्र विकसित किया है।
साथ ही वे इस तथ्य से सर्वथा अवगत थे कि अर्धवृत्त में जीवा तथा शर का जो
अनुपात है, वह अन्य वृत्त-खण्डों का नहीं है। उन्होंने उदा. श्लोक 86 में ब्रह्मगुप्त
के सूत्र के अनुसार 13 जीवा पर 3 शर का बिल्कुल सही प्रमाण बताया है।
१. तन्निजमूलेन हतं घनगोलफलं निरवशेषम्।। —आर्यभटीय, गणितपाद, श्लोक 7
२. द्रष्टव्य-मनोरंजक भौतिकी या.इ.पेरेलमान पृ. 72 तथा आगे