त्रिशतिका: पाटीगणितसार (श्रीधराचार्य - पं. सुद्युम्नाचार्य सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Trishatika / Patiganitasara of Sridharacharya with Hindi Commentary
श्रीधराचार्य (टीकाकार: पं. सुद्युम्नाचार्य) द्वारा
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में प्रयुक्त होने के कारण पैरों से नापने की पद्धति भी विकसित सिद्ध होती है।
काल के मात्रकों में 'घटी' का प्रयोग किया गया है। काल के मापने वाले
के लिये 'घटी-यन्त्र' तथा केवल 'घटी' शब्द भी प्रचलित रहा है। इस शब्द से
प्रकट होता है कि उस समय यह यन्त्र छोटे घड़े के आकार का बनता था। आज
कलाई में पहने जाने वाले यन्त्र के लिए 'घड़ी' का प्रयोग करने वाले कितने लोग
जानते हैं कि यह मूलतः घड़े के आकार का था।
त्रिशतिका के गणितीय शब्द देश के विभिन्न भागों से प्राप्त किये गए हैं।
इससे प्रकट होता है कि इतिहास के विशाल काल-खण्ड में विविध स्थानों में
निरन्तर गणितीय चिन्तन जारी था। त्रिशतिका में जहाँ वैदिक शब्दों के आधार पर
सहस्र, अयुत आदि का प्रयोग किया गया है, वहीं बौद्ध ग्रन्थों के आधार पर पहली
बार नियुत के स्थान पर 'लक्ष' शब्द का प्रयोग प्राप्त होता है।
विनिमय के मात्रकों में मुख्यतः उत्तर भारत में प्रचलित पण आदि का
उल्लेख है। साथ ही दक्षिण भारत के 'काकिणी' का भी वर्णन है, जिसका
सर्वप्रथम उल्लेख दक्षिण भारत के वार्तिककार कात्यायन ने किया है।¹
प्राचीन भारतीय गणित में वृत्त तथा गोल दोनों प्रकार के आकारों के लिये
'वृत्त' का प्रयोग होता रहा है। ब्राह्मण ग्रन्थों में वृत्त के लिये 'परिमण्डल' का
प्रयोग किया गया है² तथा बौद्धग्रन्थ धम्मसंगनी आदि में अण्डाकार के लिये इस
शब्द को प्रचलित किया गया। फिर भी गणित में काफी समय तक वृत्त तथा गोल
के अर्थों में घालमेल की सम्भावना बनी रही। अतः आर्यभट ने दक्षिण भारत से
प्राप्त 'गोल' शब्द को प्रचलित किया। यह अपने इस विशिष्ट अर्थ में मूलतः
तेलगू, कन्नड आदि का शब्द है³। आर्यभटीय गोलपाद श्लोक ६ में इस 'भूगोल'
को आकाश में लटके गोल पिंजरे के समान बताया गया है। सूर्य सिद्धान्त १२.५३
में कहा है कि इस विशाल 'महीगोल' में तात्त्विक दृष्टि से कौन स्थान 'ऊपर'
या 'नीचे' कहा जा सकता है। त्रिशतिकाकार ने भी इस शब्द को यथावत् अपनाते
हुए इसके आयतन का सर्वप्रथम वर्णन किया। आज हम 'भूगोल शास्त्र' का प्रयोग
करते हुए मूलतः दक्षिण भारतीय शब्द का प्रयोग करते हैं।
त्रिशतिका में जैन, बौद्ध ग्रन्थों से प्राप्त अनेक प्राकृत शब्द भी हैं। यहाँ
वस्तु-विनिमय के लिये 'भाण्ड-प्रतिभाण्ड' का प्रयोग किया गया है। यह प्राकृत
१. काकिण्याश्चोपसंख्यानम्-अ.सू. ५.१.३३ के महाभाष्य पर वार्तिक।
२. परिमण्डल उ वा अयं पृथिवीलोकः -शतपथ ब्राह्मण ७.१.१.३७
३. तेलगू - गुडुसु (वृत्त, गोला), गुड्डु (आँख की पुतली), गोइड (गोल पत्थर) कन्नड -
गुडसु (कोई गोल चीज़) - Sanskrit language - T.Burrow Page 462