त्रिशतिका: पाटीगणितसार (श्रीधराचार्य - पं. सुद्युम्नाचार्य सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Trishatika / Patiganitasara of Sridharacharya with Hindi Commentary
श्रीधराचार्य (टीकाकार: पं. सुद्युम्नाचार्य) द्वारा
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गई हैं। उदा. श्लोक 98 आदि में मजदूरी आदि के प्रसंग में 'रूप' नामक सामान्य
सिक्के का उल्लेख किया गया है। पाणिनि ने अ.सू. 5.2.120 में आहत या ठप्पा
लगे सिक्कों के लिये 'रूप्य' नाम दिया है। कार्षापण आदि ऐसे सभी सिक्के चाँदी
पर बनाए जाते थे। अतः रूप्य का अर्थ चाँदी भी है। ऐसे सभी प्रकार के सिक्कों
के लिये 'रूप' का प्रयोग भी होता रहा है।
समाज में इन सिक्कों की उपलब्धता पर्याप्त मात्रा में नहीं थी। अत एव
वस्तु-विनिमय भी प्रचलित था। वस्तुओं की अलग-२ मात्रा के मुद्रा में मूल्य तय
होने के पश्चात् भी उनका आपस में अनुपात से मूल्य तय किये जाने की भी
आवश्यकता होती थी। अतः त्रिशतिका सूत्र 38 आदि में इसके नियम बताए गए
हैं।
ग्रन्थ का सम्पादन- भूमिका के प्रारम्भ में कहा गया है कि म. म. पं.
सुधाकर द्विवेदी ने वर्ष 1899 ई. में इस ग्रन्थ को पहली बार प्रकाशित किया था।
तबसे पूरी 1 शताब्दी के बीच यह ग्रन्थरत्न दूसरी बार प्रकाशित नहीं हो सका।
इस दशा में इसकी दुर्लभता का सहज अनुमान किया जा सकता है। अतः 'सुक्षेमा'
नामक व्याख्या के साथ इसका सम्पादन करते हुए इस ग्रन्थ को सुलभ तथा सुग्राह्य
बनाने का एक विनम्र प्रयास किया गया है। इस व्याख्या की कुछ प्रमुख विशेषताएँ
इस प्रकार हैं-
- इसका सबसे प्रमुख उद्देश्य प्राचीन गणित को आधुनिक परिवेश में
प्रस्तुत करना है। अतः ग्रन्थ में उल्लिखित नियमों को आधुनिक चिह्नों से युक्त सूत्र
का रूप प्रदान किया है। साथ ही उल्लिखित प्रत्येक उदाहरण में सम्बद्ध सूत्र का
अनुप्रयोग करते हुए उनकी सिद्धि भी की गई है। इसमें भिन्न संख्याओं के जोड़
आदि की प्राचीन विधि के वर्णन के पश्चात् नवीन लेखन क्रम को अपनाया है। - प्राचीन गणित की विधियों में उनकी उपपत्तियों का निरूपण बहुत कम
प्राप्त होता है। आधुनिक गणित में किसी भी नियम या सूत्र को उनकी उपपत्ति
के बिना स्वीकार नहीं किया जा सकता। अतः प्रस्तुत व्याख्या में प्रत्येक सूत्र की
उपपत्ति को प्रस्तुत किया गया है। - श्रीधराचार्य ने इस त्रिशतिका में अपने बृहत् ग्रन्थ पाटी-गणित के सूत्र,
उदाहरण प्रायः प्रस्तुत किये हैं। कहीं-२ उनके शब्दों में अन्तर है। ऐसे भिन्न
वाक्यों को तुलना के लिये इस व्याख्या की टिप्पणी में उद्धृत कर दिया गया है। - गणित के सिद्धान्तों का क्रमिक विकास तथा परवर्ती प्रभाव का निरूपण
भी इस व्याख्या का उद्देश्य है। अतः आवश्यकतानुसार परवर्ती युग में परिष्कृत