सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
त्रिशतिका: पाटीगणितसार (श्रीधराचार्य - पं. सुद्युम्नाचार्य सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

त्रिशतिका: पाटीगणितसार (श्रीधराचार्य - पं. सुद्युम्नाचार्य सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Trishatika / Patiganitasara of Sridharacharya with Hindi Commentary

श्रीधराचार्य (टीकाकार: पं. सुद्युम्नाचार्य) द्वारा

DevanagariHindipublished208 पृष्ठ

पृष्ठ 18, कुल 208 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 18

( xviii )
वह उस संख्या का वर्ग होती है, जितने पद (number) उस जोड़ में प्रयुक्त हुए
हैं। इस प्रकार 1+3+5---99 तक का जोड़ 50²= 2500 होगा। क्योंकि यहाँ कुल
50 विषम संख्याओं को जोड़ा गया है। यह परिणाम क्रमिक संख्याओं के जोड़
‘सर्वधन’ के सूत्र से प्राप्त होता है। इसे व्याख्या में समीकरण की पद्धति से प्रकट
कर दिया गया है¹।
(III) त्रिशतिकाकार ने सूत्र 15 में किसी संख्या का घनफल प्राप्त करने के
लिये एक नियम बताया है। इसके आधार पर उन्होंने यह रोचक परिणाम प्राप्त
किया कि किसी भी संख्या (a) का घन उससे 1 कम संख्या (b) के घन से
3×a×b+1 अधिक होता है। जैसे-
8³= (7³) + (3×8×7+1) = 343+169 = 512
इसके सूक्ष्म निरीक्षण से महावीराचार्य ने यह परिणाम प्राप्त किया कि इस
a संख्या से 1 कम संख्या से नीचे वाली संख्याओं में भी ठीक यही नियम लागू
है²। अतः उन्होंने इससे यह मनोरंजक श्रेढ़ी विकसित की-
8³ = (6³) + (3×7×6)+1 + 169 = 512
अथवा 8³ = (5³) + (3×6×5) +1+169+127= 512
अथवा 8³ = (4³) + (3×5×4) +1+169+127+91 = 512 इत्यादि
अन्य रीति से-
4³ = 3 (4×3+3×2+2×1) + 4
त्रिशतिका के कुछ भाषा-वैज्ञानिक तथ्य- त्रिशतिका-शब्दों के
भाषा-वैज्ञानिक अध्ययन से उनके उद्भव तथा विकास पर प्रकाश पड़ता है। भारत
में दूरियों को नापने के लिये मूलतः उँगलियों तथा हाथ का उपयोग किया गया
था। यह दूरियों के मात्रक के रूप में ‘अंगुल’ तथा ‘हस्त’ शब्दों से प्रमाणित है।
नापने के लिये ‘अंगुल’ का प्रयोग वेद में भी प्राप्त है³। हाथ से नापने की पद्धति
विदेशों में भी प्रचलित रही। यह इसी ‘हस्त’ अर्थ में लैटिन से निःसृत cubit शब्द
से प्रमाणित है। वहाँ मूलतः पैर अर्थ वाले foot शब्द के दूरी के मात्रक के रूप
१. त्रिशतिका सूत्र 11, पृ. 14 तथा उसकी व्याख्या।
२. इष्टाद्विगुणेषुप्रचयेष्टपदान्वयोऽथवेष्टकृतिः।
व्येकेष्टहृतैकादिद्विचयेष्ट-पदैक्ययुक्ता वा। - गणित सार संग्रह, परिकर्मव्यवहार, श्लोक 43
तथा आगे
३. एतावानस्य महिमाऽतो ज्यायाँश्च पुरुषः।
स भूमिं सर्वतः स्पृत्वाऽत्यतिष्ठद् दशांगुलम्॥ - यजुर्वेद 31.2