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सर्वकोश
त्रिशतिका: पाटीगणितसार (श्रीधराचार्य - पं. सुद्युम्नाचार्य सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

त्रिशतिका: पाटीगणितसार (श्रीधराचार्य - पं. सुद्युम्नाचार्य सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Trishatika / Patiganitasara of Sridharacharya with Hindi Commentary

श्रीधराचार्य (टीकाकार: पं. सुद्युम्नाचार्य) द्वारा

DevanagariHindipublished208 पृष्ठ

पृष्ठ 15, कुल 208 में से

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पृष्ठ 15

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के अन्य प्रसंग में स्तम्भ को आधार बनाकर और भी कठिन प्रश्न विकसित किये
गए हैं।
इनके पश्चात् आर्यभट द्वितीय के 'महा-सिद्धान्त', श्रीपति के 'गणित-तिलक'
तथा नारायण के गणित-कौमुदी आदि में श्रीधर के अनेक सूत्र तथा उदाहरण
शब्दशः प्रस्तुत किये गए हैं। भास्कराचार्य ने तो उनका नाम लेकर अनेक सूत्र और
उदाहरणों में उनका ऋण स्वीकार किया है। उदाहरणतः लीलावती इष्टकर्म के
उदा. 1 के अन्तर्गत 'षड्भागः पाटलासु....' के लिये उन्होंने स्पष्ट कहा है कि यह
श्लोक त्रिशतिका का है। भास्करीय बीजगणित में श्रीधर के वर्ग-समीकरण के
सूत्र को इस भूमिका के पृ.7 में दिखाया जा चुका है।
भास्कराचार्य ने श्रीधर के गणित के इन सूत्रों के आलोक में गणित का
पर्याप्त विकास किया। अभी श्रीधर के जिस वर्ग-समीकरण की चर्चा की गई है,
उसे द्विपद के गुणनफल तथा उसके गुणनखण्डन के बिना भली प्रकार नहीं समझा
जा सकता। अतः उन्होंने इनके लिए स्पष्ट सूत्र प्रस्तुत किये, जो आधुनिक गणित
में खूब प्रचलित हैं।२
त्रिशतिकाकार ने शून्य-परिकर्म के प्रसंग में कहा है कि शून्य को किसी
राशि से गुणा आदि करने पर उसका फल शून्य होता है। आगे तुरत ही यह भी
कहा है कि शून्य से किसी राशि को गुणित करने पर उसका फल भी शून्य होता
है३। इस प्रकार उन्होंने 0 × a तथा a × 0 इन दोनों स्थितियों की परिकल्पना की
है। गुणन के क्रम-विनिमेय गुण के कारण इन दोनों का परिणाम एक ही बताया
है।
उन्होंने पूर्वोक्त प्रथम नियम के साथ 'आदि' का प्रयोग करते हुए यह भी
ध्वनित किया है कि शून्य को किसी राशि से भाग करने पर उसका फल भी शून्य
होता है। अतः 0/a भी सही है। पर उन्होंने गुणन की दोनों स्थितियों के समान भाग
की दोनों स्थितियों की कल्पना नहीं की है। उन्होंने शून्य से किसी राशि को भाग
देने पर उसके परिणाम के विषय में सावधानीपूर्वक कुछ नहीं कहा है। सम्भव है
उन्हें a/0 के अपरिभाष्य होने का आभास रहा है!!
१. वही, प्रकीर्णक व्यवहार, भागसंवर्गजाति में श्लोक 60 तथा भिन्न दृश्य जाति में श्लोक 70
२. खण्डद्वयस्याभिहतिर्द्विनिघ्नी तत्खण्डवर्गैक्ययुता कृतिर्वा - लीलावती, अभिन्नपरिकर्माष्टक
श्लोक 9
३. खस्य गुणनादिके खं संगुणने खेन च खमेव - त्रिशतिका सूत्र 8, पृ. 11