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सर्वकोश
त्रिशतिका: पाटीगणितसार (श्रीधराचार्य - पं. सुद्युम्नाचार्य सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

त्रिशतिका: पाटीगणितसार (श्रीधराचार्य - पं. सुद्युम्नाचार्य सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Trishatika / Patiganitasara of Sridharacharya with Hindi Commentary

श्रीधराचार्य (टीकाकार: पं. सुद्युम्नाचार्य) द्वारा

DevanagariHindipublished208 पृष्ठ

पृष्ठ 17, कुल 208 में से

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पृष्ठ 17

( xvii )
भास्कराचार्य ने इस सम्पूर्ण स्थिति के गहन अध्ययन के पश्चात् a/0 = ∞
बताया है तथा इसे ‘खहर’ यह विशिष्ट नाम दिया है¹। निश्चय ही उन्हें इस
परिणाम तक पहुँचने के लिये ब्रह्मगुप्त के तच्छेद तथा त्रिशतिका की इस
अपरिभाष्यता से प्रेरणा प्राप्त हुई होगी।
परवर्ती गणित के लिये श्रीधर की देन के सन्दर्भ में यह उल्लेख सुखद है
कि उनकी सम्पूर्ण त्रिशतिका में वृत्त-खण्ड के क्षेत्रफल तथा π के मान को
छोड़कर सभी सूत्रों को आधुनिक गणित के सूत्रों के समकक्ष सिद्ध किया जा
सकता है। उनका वृत्त-खण्ड के क्षेत्रफल का सूत्र भी पूर्ववर्ती जैन-गणित तथा
पश्चाद्वर्ती महावीर आदि से अधिक सही है। पर वह त्रिज्या-खण्ड के क्षेत्रफल
के समावेश के बिना सर्वथा सही सिद्ध नहीं हो पाया है। श्रीधर ने पाई के मान
√10 को भी सूक्ष्मतम स्तर तक प्राप्त किया है। पर वह आधुनिक गणित के
सर्वथा समतुल्य नहीं है।
त्रिशतिका के रोचक सूत्र- (I) त्रिशतिकाकार ने गणितीय संक्रियाओं के
मध्य अनेक रोचक परिणाम प्राप्त किये हैं। उन्होंने 1+2+3---+ अन्तिम पद तक
के योग के लिये एक रोचक सूत्र प्रस्तुत किया है। इस विषय में आधुनिक युग
के महान् गणितज्ञ गॉस (Karl Freidrich gauss) के बचपन की एक कहानी
बहुत प्रसिद्ध है। छह वर्ष के गॉस से उसके अध्यापक ने पूछा कि 1+2+3-- इस
क्रम से 10 तक संख्याओं का जोड़ सबसे पहले कौन बता सकता है। अन्य छात्र
इन्हें संख्या के क्रम से जोड़ में व्यस्त हो गए, तभी गॉस ने हाथ उठाकर कहा,
‘मैंने कर लिया'। अध्यापक ने पूछा, 'तूने इतनी जल्दी कैसे कर लिया, शैतान'।
गॉस ने क्या उत्तर दिया, यह तो पता नहीं। पर 'वास्तव में उसे गणित का एक
महत्त्वपूर्ण प्रमेय सूझ गया था²।
यह बिल्कुल संयोग (chance) की बात है कि त्रिशतिका में ठीक यही
प्रश्न तथा इसे हल करने का सूत्र ग्रन्थ के सबसे प्रारम्भ में प्रस्तुत किया गया है।
कौन जानता है कि त्रिशतिकाकार को यह प्रमेय किस प्रकार सूझा होगा। संक्षेप
के आवेग में उन्होंने सूत्र की उपपत्ति भी नहीं लिखी। पर सूत्र से प्रकट है कि
वे उपपत्ति जानते रहे होंगे। प्रस्तुत ग्रन्थ की व्याख्या में इसे निरूपित कर दिया गया
है।
(II) त्रिशतिकाकार ने एक रोचक नियम स्थिर किया कि 1 से लेकर कहीं
तक की भी क्रमिक विषम संख्याओं का जोड़ अवश्य ही वर्ग संख्या होती है तथा
१. खभाजितो राशिः खहरः स्यात्।। लीलावती अभिन्नपरिकर्माष्टक सूत्र 1, पृ. 71
२. Productive thinking - Verdaemir - 1945