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सर्वकोश
त्रिशतिका: पाटीगणितसार (श्रीधराचार्य - पं. सुद्युम्नाचार्य सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

त्रिशतिका: पाटीगणितसार (श्रीधराचार्य - पं. सुद्युम्नाचार्य सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Trishatika / Patiganitasara of Sridharacharya with Hindi Commentary

श्रीधराचार्य (टीकाकार: पं. सुद्युम्नाचार्य) द्वारा

DevanagariHindipublished208 पृष्ठ

पृष्ठ 23, कुल 208 में से

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( xxiii )
सूत्रों का तथा इस विकास के परिणामस्वरूप आधुनिक युग में प्रचलित सूत्रों का
भी उल्लेख किया गया है।
5. इस व्याख्या के मूल ग्रन्थ द्वारा प्रसंगतः संकेतित तत्कालीन सामाजिक,
आर्थिक परिस्थिति का भी स्पष्ट निरूपण किया गया है। आवश्यकतानुसार
विभिन्न शब्दों में प्राकृत प्रभाव, जैन, बौद्ध प्रभाव आदि का भी उल्लेख है। वैदिक
परम्परा से प्राप्त तथा पाणिनि, वार्तिककार कात्यायन आदि द्वारा उल्लिखित शब्दों
तथा उनके क्रमशः परिवर्तित अर्थों का भी यथावसर विवेचन किया गया है।
6. परिशिष्ट में विविध पारिभाषिक शब्द तथा विविध आचार्यों द्वारा प्रस्तुत
सम्बन्धित गणितीय संक्रियाओं के सूत्र अकारादि क्रम से उल्लिखित किये गये हैं।
अन्तिम परिशिष्ट में उन सभी सूत्रों को आधुनिक सूत्रों के साथ आधुनिक पद्धति
से प्रस्तुत किया गया है।
धन्यवाद-प्रकाशन- मैं सर्वप्रथम उस अच्युत, अनन्त परमेश्वर के प्रति
नतमस्तक हूँ, जिसके गणितीय नियमों से सम्पूर्ण विश्व संचालित हो रहा है,
जिसकी अनन्तता की वेदों के शब्दों में महिमा यह है कि हम इन नियमों की
जितनी 'भूमि' को जानते हैं, उससे वह 10 अंगुल आगे बढ़ कर है१!! गणित के
उन महान् विद्वानों के प्रति मैं पुनः नतमस्तक हूँ, जिनके निरन्तर परिश्रम से आज
गणित का विशाल सौध निर्मित हो सका है।
वर्ष 1899 ई. में म.म. पं. सुधाकर द्विवेदी के महान् परिश्रम से हमें यह
ग्रन्थ सुलभ हो सका है। इनके पश्चात् वर्ष 1959 ई. में डा. कृपाशंकर शुक्ल द्वारा
स्वरचित वैदुष्यपूर्ण इंग्लिश अनुवाद के साथ बृहत् ग्रन्थ 'पाटी-गणित' का
प्रकाशन किया गया। हमने अपनी व्याख्या में पं. द्विवेदी की टिप्पणियों से तथा
तुलना के लिये डा. शुक्ल के अनुवाद से सहयोग प्राप्त किया है। अतः मैं इनके
प्रति हार्दिक धन्यवाद तथा आभार प्रकट करता हूँ।
श्री मु. म. टाउन इंटर कालेज, बलिया में व्याख्याता माननीय श्री भोला
प्रसाद 'आग्नेय' ने इस व्याख्या का पुनरीक्षण करके अनेक सुझाव प्रदान किये हैं।
अतः मैं इनके प्रति हार्दिक धन्यवाद प्रकट करता हूँ।
मुझे 'त्रिशतिका' की छाया प्रति 'पाणिनि महाविद्यालय सोनीपत में पूज्य
आचार्य विजयपाल जी विद्यावारिधि से तथा पाटी-गणित माननीय श्री नारायण
किंजवेडकर जी, गुरुबाग, वाराणसी के सौजन्य से प्राप्त हुई है। अतः मैं आप दोनों
के प्रति विनम्र श्रद्धाभाव प्रकट करता हूँ।
१. एतावानस्य महिमाऽतो ज्यायाँश्च पुरुषः।
स भूमिं सर्वतः स्पृत्वाऽत्यतिष्ठद् दशांगुलम्।। - यजुर्वेद 31.2