त्रिशतिका: पाटीगणितसार (श्रीधराचार्य - पं. सुद्युम्नाचार्य सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

त्रिशतिका: पाटीगणितसार (श्रीधराचार्य - पं. सुद्युम्नाचार्य सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Trishatika / Patiganitasara of Sridharacharya with Hindi Commentary
श्रीधराचार्य (टीकाकार: पं. सुद्युम्नाचार्य) द्वारा
DevanagariHindipublished208 पृष्ठ
पृष्ठ 30, कुल 208 में से
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2 त्रिशतिका
यजुर्वेद 17.2 में इन सभी का उल्लेख मिलता है। इनमें एक, दश, शत, सहस्र
शब्दों के प्रतिरूप भारत से लेकर यूरोप तक की प्राचीनतम भाषाओं में प्राप्त होते
हैं। आधुनिक भाषावैज्ञानिकों ने 'शत' की इस विशेषता को देखते हुए भारोपीय
भाषा परिवार का सबसे पहला उपविभाजन शतम् तथा केन्तुम् (Centum-Latin)
इसके आधार पर ही किया है। निरुक्तकार के अनुसार सहस्र शब्द का मौलिक
अर्थ 'शक्तिशाली' यह है। इसके प्रतिरूप भारोपीय शब्दों में इसी अर्थ में इसका
प्रयोग प्राप्त होता है।
यजुर्वेद के उक्त मन्त्र में मध्य, अन्त, परार्ध संख्याएँ क्रमशः 10¹⁰, 10¹¹,
10¹² को प्रकट करती हैं। पर यहाँ संख्या नाम अधिक होने से अन्त्य, मध्य,
परार्ध, क्रमशः 10¹⁵, 10¹⁶, 10¹⁷ को व्यक्त करने के लिये प्रयुक्त हुए हैं।
सहस्र के पश्चात् वैदिक संख्याओं के समान आर्यभटीय में अयुत, नियुत,
प्रयुत का उल्लेख किया गया है२। पर इन-संख्या-नाम के लगभग एक समान होने
के कारण भ्रम की सम्भावना बनी रहती थी। अतः इस ग्रन्थ में पहली बार बौद्ध
संख्याओं के आधार पर नियुत के स्थान पर 'लक्ष' का प्रयोग किया गया। परवर्ती
गणित ग्रन्थों में यह शब्द पर्याप्त प्रचलित हुआ। साथ ही रामायण के आधार पर
कोटि का प्रयोग किया गया। वेद में अर्बुद शब्द 1 करोड़ अर्थ के लिए प्रयुक्त
हुआ है। पर इस ग्रन्थ में इसके लिये कोटि शब्द के प्रयोग के कारण इसके आगे
की अर्बुद संख्या 1 अरब की वाचक बन गई। आज भी ऐसी ही प्रसिद्धि है। आगे
की अब्ज, खर्व, निखर्व, महासरोज संख्याएँ कमल के नामों के आधार पर
विकसित हैं, जो कि जैन साहित्य से प्रेरित प्रतीत होती हैं।
विनिमय के मात्रक
षोडशपणः पुराणः पणो भवेत् काकिणीचतुष्केण।
पञ्चाहतैश्चतुर्भिर्वराटकैः काकिणी ह्येका१॥ ४॥
सुक्षेमा अनुवाद-16 पण का 1 पुराण, 4 काकिणी का 1 पण तथा
5×4=20 वराटक (कौड़ी) की काकिणी होती है।
अनुशीलन-इसके अनुसार 1/16 पुराण = 1 पण, 1/4 पण = 1 काकिणी तथा
1/20 काकिणी = 1 वराटक सिद्ध होता है।
परवर्ती युग में ये नाम बदलते रहे हैं। लीलावती में 16 पण का 1 द्रम्म
बताया है। प्रस्तुत मात्रकों के नाम प्राचीन परम्परा के अनुरूप हैं। पर इनका मूल्य
१. तुल. पाटी गणित सू. 9, गणिततिलक पृ. 2, लीलावती परिभाषा श्लोक 3