त्रिशतिका: पाटीगणितसार (श्रीधराचार्य - पं. सुद्युम्नाचार्य सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Trishatika / Patiganitasara of Sridharacharya with Hindi Commentary
श्रीधराचार्य (टीकाकार: पं. सुद्युम्नाचार्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंत्रिशतिका ३
परिवर्तित हो गया है। प्रस्तुत श्लोक में पुराण नाम से वर्णित सिक्के को अष्टाध्यायी
में कार्षापण तथा कौटिल्य अर्थशास्त्र में इसे ही पण तथा मनुस्मृति में रजत पुराण
कहा गया है। यही भारत का चाँदी का एक प्रसिद्ध सिक्का था। उस समय 16
माष = 1 पण या 1 पुराण माना जाता था। प्रस्तुत विवरण में पण पूर्वप्रचलित माष
के अनुरूप है तथा इससे 16 गुना बड़े सिक्के को पण के स्थान पर पुराण नाम
दिया गया है। वार्तिककार कात्यायन ने पहली बार दक्षिण भारत से प्राप्त
'काकिणी' नामक सिक्के का उल्लेख किया है। यह 4 काकिणी = 1 माष के
अनुरूप था। यहाँ पूर्वप्रचलित माष के पण के समकक्ष होने के कारण 4 काकिणी
= 1 पण बताया है। यह तथ्य निम्न चित्र से स्पष्ट है-
| कार्षापण का भाग | प्राचीन ग्रन्थों में वर्णित सिक्के | तोल |
|---|---|---|
| 1/1 | कार्षापण-अष्टाध्यायी<br>पण - कौटिल्य अर्थशास्त्र<br>रजतपुराण - मनुस्मृति | 32 रत्ती<br>चाँदी |
| 1/16 | माष | 2 रत्ती |
| 1/64 | काकिणी-वार्तिककार कात्यायन | ½ रत्ती |
| पुराण का भाग | त्रिशतिका में वर्णित सिक्के | तोल |
| :--- | :--- | :--- |
| 1/1 | पुराण | 32 रत्ती चाँदी |
| 1/16 | पण | 2 रत्ती |
| पण का 1/4<br>पुराण का 1/64 | काकिणी<br>वाराटक | ½ रत्ती |
| गुरुत्व के मात्रक | ||
| माषो दशार्धगुञ्जः षोडशमाषो निगद्यते कर्षः। | ||
| स सुवर्णस्य सुवर्णस्तैरेव पलं चतुर्भिश्च॥ ५॥ | ||
| सुक्षेमा-अनुवाद दशार्ध याने 5 गुञ्जा का 1 माष, 16 माष का 1 कर्ष, | ||
| सोने का बना हुआ इसी 1 कर्ष भार का 'सुवर्ण' नामक सिक्का होता है। उसी | ||
| 4 कर्ष का 1 पल होता है। |