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सर्वकोश
त्रिशतिका: पाटीगणितसार (श्रीधराचार्य - पं. सुद्युम्नाचार्य सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

त्रिशतिका: पाटीगणितसार (श्रीधराचार्य - पं. सुद्युम्नाचार्य सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Trishatika / Patiganitasara of Sridharacharya with Hindi Commentary

श्रीधराचार्य (टीकाकार: पं. सुद्युम्नाचार्य) द्वारा

DevanagariHindipublished208 पृष्ठ

पृष्ठ 29, कुल 208 में से

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पृष्ठ 29

श्रीधराचार्य-विरचित
त्रिशतिका
अथवा
पाटी गणित सार
नत्वा शिवं स्वविरचितपाट्या गणितस्य सारमुद्धृत्य।
लोकव्यवहाराय प्रवक्ष्यति श्रीधराचार्यः।। १।।
सुक्षेमा अनुवाद-शिव को नमस्कार करके स्वविरचित पाटी-गणित से
गणित के सार को उद्धृत करते हुए श्रीधराचार्य लोकव्यवहार के लिये उसे
निरूपित करेंगे।
अनुशीलन-प्रकटतः श्रीधराचार्य शैव थे तथा उन्होंने इससे पूर्व 'पाटी-गणित'
नामक विस्तृत ग्रन्थ का निर्माण किया था।
दशगुणोत्तर संख्याएँ
एकं दश शतमस्मात् सहस्रमयुतं ततः परं लक्षम्।
प्रयुतं कोटिमथार्बुदमब्जं खर्वं निखर्वं च।। २।।
तस्मान्महासरोजं शंकुं सरितां पतिं ततस्त्वन्त्यम्।
मध्यं परार्धमाहुर्यथोत्तरं दशगुणाः संज्ञाः१।। ३।।
सुक्षेमा अनुवाद-एक, दश, शत पश्चात् सहस्र, अयुत, इसके पश्चात्
लक्ष, प्रयुत, कोटि, अर्बुद, अब्ज, खर्व, निखर्व, इसके पश्चात् महासरोज शंकु,
सरितां पति=समुद्र, पश्चात् अन्त्य मध्य, परार्ध-ये क्रमशः दशगुणोत्तर संख्याओं के
नाम हैं।
अनुशीलन इस श्लोक में वर्णित एक, दश, शत, सहस्र, अयुत, अर्बुद,
समुद्र, अन्त, मध्य, परार्ध, शब्द संख्याओं के इतिहास में प्राचीनतम शब्दों में से हैं।
१. तुल. पाटी-गणित सू. 7-8, ग.ति.पृ. 1, लीलावती अभिन्नपरिकर्माष्टक श्लोक 2-3 ग.कौ.
पृ. 1