त्रिशतिका: पाटीगणितसार (श्रीधराचार्य - पं. सुद्युम्नाचार्य सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Trishatika / Patiganitasara of Sridharacharya with Hindi Commentary
श्रीधराचार्य (टीकाकार: पं. सुद्युम्नाचार्य) द्वारा
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प्रभावित संस्कृत शब्द है। इससे ज्ञात होता है कि मुख्यतः पात्रों के विनिमय द्वारा
वस्तु-विनिमय की परम्परा जारी थी। इसी प्रकार पदों की संख्या के लिये
पारिभाषिक ‘गच्छ’ का प्रयोग है। यह स्पष्टतः प्राकृत है। संस्कृत व्याकरण की
दृष्टि से संज्ञावाचक ‘गच्छ’ अशुद्ध शब्द है। क्रमिक संख्याओं के लिये ‘श्रेढ़ी’ का
प्रयोग है। यह वेद में प्राप्त ‘श्रेणी’ शब्द से निःसृत है। पर व्यापक प्रचलन के
कारण यहाँ ‘श्रेढ़ी’ का ही प्रयोग है।
इससे प्रकट है कि त्रिशतिका में अनेक परम्पराओं से प्राप्त शब्दों तथा
विधियों का उपयोग किया गया है।
त्रिशतिका में प्रतिबिम्बित सामाजिक आर्थिक जीवन- यों तो त्रिशतिका
मूलतः अंकगणित का ग्रन्थ है। पर इसके सूत्रों, उदाहरणों में प्रसंगवश तत्कालीन
जीवन की झाँकी प्राप्त हो जाती है। त्रिशतिकाकार के समय पशु-पक्षि-संकुल,
मधुर-मयूर-विरुत रमणीय अरण्यों का बाहुल्य था। अतः ऐसे अनेक उदाहरण
प्राप्त होते हैं।
समाज में मुख्यतः निम्न वर्ग तथा स्त्रियों की स्थिति अच्छी नहीं थी। दास,
दासियों की खरीद बिक्री इतनी प्रचलित थी कि इसमें अलग से जीव-विक्रय के
उदाहरण प्रस्तुत किये गए हैं¹। यह परम्परा लम्बे काल तक प्रचलित थी। क्योंकि
त्रिशतिका से लेकर लीलावती तथा 1039 ई. के गणित-तिलक तथा 1356 ई. के
गणित-कौमुदी तक में भी ऐसे ही उदाहरण वर्तमान हैं। पाटी-गणित की अज्ञातकर्तृक
व्याख्या में सहज ही कहा है कि जैसे कपड़ों आदि का उपयोग करने पर उनका
मूल्य घटता है, उसी प्रकार उम्र बढ़ने के व्युत्क्रमानुपात में इनका मूल्य कम होता
जाता है। (देखें इस ग्रन्थ में त्रिशतिका प्रस्तुत सूत्र पर उद्धृत टिप्पणी)। वास्तव
में यह उस समय की सामाजिक हीन दशा को स्पष्ट प्रकट करता है।
इस समय सामान्य लोगों की आर्थिक दशा भी कोई बहुत अच्छी नहीं थी।
आम आदमी ‘सूदखोरी’ की प्रथा से बहुत पीड़ित था। यों तो इस प्रथा का वर्णन
वेद, निरुक्त, अष्टाध्यायी, धर्मशास्त्र आदि ग्रन्थों में वर्तमान है। अथर्ववेद के एक
मन्त्र में प्रार्थना है कि मैं जिससे ऋण लूँ तथा जिसका स्त्री के पास जाऊँ, वह
मुझसे उलटी, पुलटी बातें कहते हुए डाँटे, फटकारे नहीं²!!
त्रिशतिकाकार के समय इस समस्या में जरा भी कमी नहीं आई थी।
त्रिशतिका के एक उदाहरण के अनुसार ऋणी को 5% ऋणदाता के लिये, 1%
१. त्रिशतिका उदा. 56 पृ. 60
२. यस्मा ऋणं यस्य जायामुपैमि यं याचमानो अभ्यैमि देवाः।
ते वाचं वादिषुर्मोत्तरां महैवपत्नी अप्सरसावधीताम्।। - अथर्ववेद 6.118.3