सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

विवाह वृन्दावनम् (पं. सीताराम झा ज्योतिष टीका - विवाह संस्कार, अष्टकूट गुण-मिलान एवं मुहूर्त विज्ञान सटीक)

Vivaha Vrindavanam: Vivaha Sanskara, Ashtakuta Guna Milana evam Muhurta Vigyan

केशवार्कमहोदय (टीकाकार: पं. सीताराम झा) द्वारा

DevanagariHindipublished138 पृष्ठ

प्रकरणम् ८ ] वसन्तलक्ष्मीसहितम् । ५४
प्रथम और द्वितीय भाव के योग का आधा करने से सन्धि होती है, वह प्रथम
की विराम और द्वितीय की आरम्भ सन्धि होती है । इसी प्रकार जिन दो भावों
के योग कर आधा किया जाता वह उन दोनो भावों की सन्धि होती है ॥ २ ॥
ग्रहाणां भावसम्बन्धिफलं कथयति—
सन्धौ खेटो निःफलो भावभागैस्तुल्यः सम्यग्भावपक्तिं व्यनक्ति ।
सन्धेरूनाधिक्यमाप्तो गतैष्यभावाधीनं संदधाति स्वपाकम् ॥ ३ ॥
सं०— सन्धौ ‘स्थितः’ खेटो ग्रहो निष्फलो भवति, भावभागैस्तुल्यो-
ग्रहो भावपक्ति भावफलं सम्यग् व्यनक्ति ददातीत्यर्थः । सन्धेरूनाधिक्यं
आप्तः गतः खेटः क्रमेण गतैष्यभावाधीनं स्वपाकं सन्दधाति – सन्धेरूनो
ग्रहः पूर्वभावफलं, सन्धेरधिको ग्रहोऽग्रिमभावफलं ददातीत्यर्थः ॥ ३ ॥
भा०—सन्धि में ( अर्थात् सन्धितुल्य ) ग्रह निष्फल होता है ( अर्थात्
शुभ वा अशुभ कुछ भी फल नहीं देता है ) । तथा भाव के अंश के तुल्य ग्रह
पूर्णफल देता है । और सन्धि से अल्प हो तो उस सन्धि से पूर्वभाव का फल,
और सन्धि से अधिक हो तो उस सन्धि से अग्रिमभाव का फल देता है ॥ ३ ॥
अथ राशिभावयोर्भेदे सति निर्णयमाह—
नाङ्गीकारो भावजानां गुणानां तद्दोषाणां तत्त्वतस्त्याग एव ।
भावव्यक्तावष्टमत्वं गतोऽपि त्याज्यो लग्नात्सप्तमः सप्तसप्तिः ॥ ४ ॥
सं०—भावजानां ( भवसम्बन्धिनां ) गुणानां अङ्गीकारो न कार्यः,
तद्दोषाणां भावदोषाणां तत्त्वतः त्याग एव कार्यः । यथा—लग्नात् सप्तमः
सप्तसप्तिः ( सूर्यः ) भावव्यक्तौ सत्यां अष्टमत्वं गतोऽपि ( अष्टमे शुभत्वं
प्राप्तोऽपि ) त्याज्य एव ॥ ४ ॥
भा०—भावस्पष्ट बनाने से भावकल्पनावश जो गुणप्राप्त हो उसका स्वीकार
नहीं करना चाहिये । और भाव कल्पनावश जो दोष हो वह सर्वथा त्याज्य है ।
जैसे—लग्नकुण्डली में सप्तम रवि ‘जो अशुभ कहा गया है’ वह यदि भावकुण्डली
के अनुसार अष्टम ( अष्टम होने से शुभ ) भी हो तथापि वह त्याज्य ही है ॥४॥
प्रत्याख्येयः पाक्षिकोपीह दोषः सम्यग्व्यापी यो गुणः सोनुगम्यः ।
यस्मादंशैर्गेहभावाधिकः सन्न स्याद् भूत्यै भार्गवः पञ्चमोऽपि ॥५॥
सं०—हि यतः दोषः पाक्षिकोऽपि (न्यूनपक्षसम्भवोऽपि) प्रत्याख्येयः

६० विवाहवृन्दावनम्- [•षड्वर्ग-
त्याज्यः । तथा यो गुणः सम्यग् व्यापी (सर्वसम्मतः) सोऽनुगम्यः ( अनु-
सरणीयः-ग्राह्य इत्यर्थः ) तस्मात् कारणात् पञ्चमोऽपि ( लग्नकुण्डल्यां
पञ्चमस्थः शुभोपि ) अंशैः गेहभावाधिकः ( भावव्यक्तौ पञ्चमभावाधिकः
= षष्ठभावं गतः ) सन् भार्गवः शुक्रः भूत्यै ( शुभाय ) न स्यात् ॥ ५ ॥
भा० - क्योंकि-दोष पाक्षिक ( अल्प अंश से ) भी हो तो त्याज्य है ।
और जो गुण सर्वसम्मत हो उसका ग्रहण करना चाहिये । जैसे लग्नकुण्डली में
पञ्चम स्थानस्थ 'शुभ' शुक्र भी यदि भाव के अंश से अधिक होकर षष्ठ भाव में
प्राप्त हों तो वह शुभकारक नहीं होता है ॥ ५ ॥
वि०-इससे सिद्ध हुआ कि लग्नकुण्डली और भावकुण्डली दोनों प्रकार से
जो ग्रह शुभ हो वह शुभ है । तथा एक प्रकार से शुभ और एक प्रकार से अशुभ
हो तो वह अशुभ ही है ॥ ५ ॥
संक्रान्तिकालज्ञानादिष्टकाले स्पष्टसूर्यसाधनामाह -
संक्रान्त्यन्तर्वासरैर्यद्द्युवृन्दालब्धं भानुर्भादि मेषादिमिश्रम् ।
भक्ता रामैर्लग्नमुक्ता नवांशा दिग्भिर्निघ्नास्ते तदंशा भवेयुः ॥६॥
सं०-संक्रान्त्यन्तर्वासरैः ( गतैष्यसंक्रान्त्यन्तर्गतदिनैः ) द्युवृन्दात्
( गतसंक्रान्तिकालैष्टकालान्तर्गतदिनगणात् ) लब्धं भादि ( राश्यादिकं
फलं ) यत् 'तत्' मेषादिमिश्रं भानुः ( तात्कालिकः सूर्यः ) स्यात् !
अथेष्टलग्नांशसाधनमाह-लग्नभुक्ता नवांशा दिग्भिः ( दशभिः ) निघ्ना
रामैर्भक्ताः ते तदंशाः ( तस्य लग्नस्याभीष्टांशाः ) भवेयुः ॥ ६ ॥
भा०-विवाहकालिक इष्ट समय में--गत संक्रान्तिकाल से इष्टकाल पर्यन्त
जितने दिनादि हो उसमें गत और अग्रिम संक्रान्ति के अन्तर्गत दिनादि से भाग
देने से राश्यादिक लब्धि में मेषादि गत संक्रान्ति तक की राशि संख्या मिलाने
से स्पष्ट सूर्य होता है । तथा इष्ट लग्न में इष्ट नवांश से पूर्व की संख्या को १० से
गुना करके ३ का भाग देने से लब्धि इष्ट लग्न के अंशादि होते हैं । इस प्रकार
राश्यादि अभीष्ट लग्न का ज्ञान करना ॥ ६ ॥
अथ लग्न-सूर्याभ्यामिष्टकालज्ञानमाह-
रात्रौ भानुर्भार्धयुक्तसायनांशस्तन्वंर्काशाः स्वोदयघ्नाः पृथक्ते ।
त्रिंशद्भक्ता भुक्तभोग्याः पलादिस्तात्कालो मध्यगस्वोदयाढ्यः ॥
सं०-रात्रौ ( रात्रिगतेष्टघटी-साधने ) भानुः सूर्यः भार्धयुक्

प्रकरणम् ४ ] वसन्तलक्ष्मीसहितम्। ६१
( षड्राशियुक्तः ) कार्यः, दिने तु यथास्थित एव सूर्यः, स सायनांशः
अयनांशसहितः कार्यः, लग्नं च सायनाशं कार्यम्, अथ भुक्ता भोग्याः
तन्वकांशाः ( तनोः भुक्ताः, अर्कस्य भोग्या अंशाः ) ते पृथक् स्वोदयघ्नाः
त्रिंशद्भक्ता पलादिस्तात्कालः ( अर्थात् तनोर्भुक्तकालः, सूर्यस्य भोग्यकालः
सः ) मध्यगस्वोदयाढ्यः ( अर्क-तनुमध्यगतराशिखोदययुक्तः ) अभीष्ट-
कालो भवतीति शेषः ॥ ७ ॥
भा०—रात्रिगत इष्टकाल बनाना हो तो सूर्यमें ६ राशि जोड़ देना, और
दिनमें केवल सूर्यही में अयनांश जोड़कर उसके भोग्यांशको, इष्ट लग्नमें
अयनांश जोड़ कर उसके भुक्तांश को अपने देशीय उदय मान से गुनाकर ३०
का भाग देनेसे क्रम से लग्न का भुक्तपल और सूर्य के भोग्यपल होते हैं । उनके
योगमें सूर्य और लग्नकेमध्यगत राशियोंके स्वोदयमान जोड़ने से इष्टकाल होता है ।
अथ लग्नात्कालहोराज्ञानं कथयति—
तत्कालार्कन्यूनलग्नांशपिण्डो भक्तः पञ्चक्षोणिभिर्भुक्तहोराः ।
भास्वच्छुक्रेजेन्दुसौरार्यभौमाः संख्यायेरन्वारतस्ते तदीशाः ॥ ८ ॥
सं०—तत्कालार्कन्यूनलग्नांशपिण्डः ( तत्कालसूर्येोन-लग्नांशसमूहः )
पञ्चक्षोणिभिः ( पञ्चदशभिः ) भक्तः, भुक्तहोराः स्युः । तदीशाः
भास्वच्छुक्रेजेन्दुसौरार्यभौमाः इति क्रमेण वारतः ( इष्टवारात् ) संख्या-
येरन् गणयेरन् ॥ ८ ॥
भा०--तात्कालिक सूर्य को लग्न में घटाकर शेष के अंशादि बनाकर उसमें
१५ के भाग देने से गतकाल होरा होती है । सूर्यादिवारों में उनके स्वामी क्रम से
सूर्य, शुक्र, बुध, सोम, शनि, बृहस्पति और मङ्गल होते हैं। जिस दिन होराज्ञान
करना हो उसी दिन से आरम्भ कर उक्त क्रम से गिनकर समझना चाहिये ॥८॥
उदा०—जैसे गुरुवार में स्पष्ट सूर्य १ । १५ । १४ । २० और लग्न ५ ।
१६ । २० । २५ । लग्न में सूर्य को घटाकर ४ । १ । ६ । ५ इसके अंशपिण्ड
१२१ । ६ । ५ में १५ के भाग देने से लब्धि ८ गत होरा वर्तमान ९ वीं होरा
हुई, अभीष्टवार बृहस्पति है, अतः बृहस्पति से बृहस्पति, मङ्गल, सूर्य इत्यादिक
क्रम से ९ वाँ मंगल होरेश हुआ ॥ ८ ॥
पापहोराया निष्फलत्वं कथयति—
होराः क्रूराः सौम्यवर्गाधिके स्युर्लग्ने मोघाः सौम्यवारे च रात्र्याम् ।

६२ विवाहवृन्दावनम्- •[ षड्वर्ग-
पापारिष्टं निष्फलं शक्तिभाजां स्यात्षड्वर्गे लग्नगे सद्ग्रहाणाम् ॥
सं०—सौम्यवर्गाधिके लग्ने क्रूरा होराः ( पापग्रहसम्बन्धिहोराः )
मोघाः ( निष्फलाः ) स्युः । एवं सौम्यवारे ( शुभग्रहाणां दिने ) रात्र्यां
च क्रूरा होरा निष्फला भवन्ति । तथा—शक्तिभाजां सद्ग्रहाणां षड्वर्गे
लग्नगे सति पापारिष्टं निष्फलं स्यात् ॥ ९ ॥
भा०—लग्न में अधिक शुभग्रह के वर्ग हो तो पापग्रह की होरा निष्फल
होती है । एवं शुभग्रह के दिन में भी पाप होरा विफल, तथा रात्रि में भी पाप
होरा निष्फल होती है । और बलवान् शुभग्रहों का षड्वर्ग लग्न में हो तो पापग्रह
जन्य अरिष्ट भी निष्फल होता है ॥ ९ ॥
अथ ग्रन्थकारः स्वदेशाभिप्रायिकवारप्रवृत्तिमाह—
चरार्धदेशान्तरयुग्वियोगौ क्रमेण याम्योत्तरगोलगेऽर्के ।
योगे पुरा रव्युदयाद्वियोगे पश्चात्प्रवृत्तिर्दिनवारकर्तुः ॥१०॥
सं०—याम्योत्तरगोलगेऽर्के सति क्रमेण चरार्धदेशान्तरयुग्-
वियोगौ कार्यों ( याम्यगोलगेऽर्के चरार्ध-देशान्तरपलानां योगः, उत्तर-
गोले वियोग इत्यर्थः ) योगे रव्युदयात् पुरा ( पूर्वमेव ), वियोगे रव्युद-
यात् पश्चात् तयोरन्तरपलैः दिनवारकर्तुः प्रवृत्तिः । अर्थात् दक्षिण-
गोले पूर्वं, उत्तरगोले पश्चाद् वारप्रवृत्तिर्भवति ॥१०॥
भा०—दक्षिण गोल में सूर्य हो तो चरपल और देशान्तर पल के योग, और
उत्तर गोल में अन्तर करके जो हो, दक्षिण गोल में सूर्योदय से योगपल तुल्य
पूर्व और उत्तर गोल में सूर्योदय से अन्तरपल तुल्य पश्चात् वारप्रवृत्ति होती है ॥
वि०—लङ्का में सूर्योदयकाल से ही सर्वत्र वारप्रवृत्ति मानी जाती है ।
कारण कि--लङ्का में सूर्योदय काल ही में सृष्टि का आरम्भ हुआ । कहा भी है--
“लङ्कानगर्यामुदयाच्च भानोस्तस्यैव वारे प्रथमं बभूव ।
मधोः सितादेर्दिन-मास-वर्ष-युगादिकानां युगपत् प्रवृत्तिः ॥”
लङ्का का याम्योत्तर वृत्त रेखा नाम से प्रसिद्ध है । रेखा और अपना स्थान
का पूर्वापर अन्तर देशान्तर; तथा उन्मण्डल और अपना क्षितिजका अन्तर
( अर्थात् लङ्का से दक्षिणोत्तर अन्तर ) चरार्ध कहलाता है । अतः लंका
क्षितिज और अपना क्षितिज का अन्तर चरार्ध और देशान्तर के संस्कार से हो
सकता । परञ्च सब स्थान में सर्वथा दक्षिण गोल में योग, और सर्वथा उत्तर

?
दोषाःसन्ति or दोषाः सन्ति? No space, or tiny space: दोषाःसन्ति.

L29:
हूण-बङ्गान् ) विना न त्याज्याः । तिथिनक्षत्रवारोद्भवा दोषास्तु हूणबङ्ग-

L30:
खशेष्वेव त्याज्याः, अन्यत्र नेत्यर्थः ॥१२॥
Wait, is there a comma after त्याज्याः?
Yes, त्याज्याः, अन्यत्र नेत्यर्थः ॥१२॥

Let's double-check all lines carefully.
Everything matches the scan with high fidelity.प्रकरणम् ५ ] वसन्तलक्ष्मीसहितम् । ६३
गोल में अन्तर ही नहीं हो सकता है, यह गोल की स्थिति से प्रत्यक्ष है, अतः
इस प्रकार से वारप्रवृत्ति सब देश के लिये मानना असङ्गत है । केवल रेखा
से पश्चिम किसी एक स्थान में हो सकता है, प्रायः ग्रन्थकार ने उसी अभिप्राय
से कहा है ॥१०॥
अथ वारप्रवेशादिष्टकालवशेन होरेशानयनमाह—
द्विघ्नेष्टनाडीशरलब्धतुल्या वारप्रवेशादपि कालहोराः ।
संख्योक्तवत्तास्थ यद्युभाभ्यां क्रूराः कुवर्गश्च

६४ विवाहवृन्दावनम्- [ षड्वर्ग-
भा०--गण्डान्त, वैधृति, और संक्रान्ति से पूर्व, पश्चात् १६, १६, घड़ी
अर्धयाम, व्यतीपात, भद्रा, कुलीक इन दोषों से लग्न भंग कहा गया है । इन दोषों
में कुलिक का मान कहते हैं--१४ में २, २, घटाने से ( अर्थात् १४, १२,
१०, ८, ६, ४, २ ये मुहूर्त ) क्रम से सूर्यादिवारों में कुलिक होते हैं । और
दिन के मुहूर्त संख्या में १ घटाने से रात्रि की मुहूर्त संख्या होती है । तथा तिथि,
नक्षत्र, वार सम्बन्धी जो अन्य दोष हैं वे नेपाल, बङ्गाल और हूण ( काश्मीर से
उत्तरपश्चिम ) देश से भिन्न देशों में त्याज्य नहीं हैं ॥ १२ ॥
अथ होरादिषड्वर्गं कथयति-
राश्यंशाः शशिभूगुणेक्षणहतास्तिथ्यभ्रभूदिक्शरै-
र्भक्ता भार्धदृकाणनन्ददिनकृद्भागा गृहं यस्य यत् ।
त्रिंशांशाः सितसौम्यजीवरविजक्ष्माजन्मनां व्युत्क्रमा-
दोजर्क्षेषु शराश्वसर्पमरुतः पञ्चेति षड्वर्गिका ॥१३॥
सं०-राश्यंशाः ( लग्नस्य, ग्रहस्य वा राशिमुक्तांशाः) शशि-भूगुणे-
क्षणहताः पृथक् क्रमेण तिथ्यभ्रभूदिक्शरैः भक्ताः क्रमशः भार्ध-दृकाण-
नन्द-दिनकृद्भागाः ( होरा-दृकाण-नवांश-द्वादशांशाः ) भवन्ति । तथा यस्य
यद् गृहं तत् तस्य गृहम् । समराशिषु सितसौम्यजीवरविजक्ष्माजन्मनां
क्रमेण शराश्वसर्पमरुतः पञ्च इति त्रिंशांशाः स्युः, ओजर्क्षेषु व्युत्क्रमात्
त्रिंशाशा ज्ञेयाः, इति ( इयं ) षड्वर्गिका स्यात् ॥ १३ ॥
भा०-ग्रह वा भाव जिसका षड्वर्ग विचार करना हो उसके राशि को छोड़
कर केवल अंश को १, १, ३, २ से गुणाकर पृथक् पृथक् १५, १०, १०, ५ से
भाग देने से क्रम से होरा, दृकाण, नवांश और द्वादशांश होते हैं । तथा जिसकी
जो राशि है वही उसका गृह कहाता है । और समराशियों में--शुक्र, बुध,
बृहस्पति, शनि और मंगल के क्रम से ५, ७, ८, ५ और ५ अंश तथा विषम
राशियों में उत्क्रम से ( अर्थात् मंगल, शनि, बृहस्पति, बुध और शुक्र के ५, ५,
८, ७ और ५ अंश त्रिंशांश होते हैं । यह षड्वर्गी ( षड्वर्ग ) है ॥ १३ ॥
अथ राश्यधिपान् कथयति-
कुजकवीन्दुजचन्द्ररवीन्दुजाः सितकुजेज्ययमार्कजसूरयः ।
भवनपा लवपाश्च तदादयस्त्वजमृगाननतौलिकुलीरकाः ॥१४॥

प्रकरणम् ८ ] वसन्तलक्ष्मीसहितम् । ६५
सं०—कुज-कवीन्दुज-चन्द्ररवीन्दुजाः सित-कुजेज्ययमार्कजसूरयः
'क्रमेण' भवनपाः ( मेषादिराश्यधिपाः ) लवपाः ( नवांशस्वामिनश्च )
स्युः । तथा—अज-मृगानन-तौलि-कुलीरकाः 'क्रमात्' तदादयः ( तेषां
नवांशानां ) आदयः ( आदिराशयः स्युः ) ॥१४॥
भा०—मंगल, शुक्र, बुध, चन्द्र, रवि बुध, शुक्र, मंगल, गुरु, शनि, शनि
और वृहस्पति ये क्रम से मेष आदि १२ राशियों के और नवांश राशियों के स्वामी
हैं । तथा मेषादि राशियों में क्रम से मेष, मकर, तुला कर्क ये नवांश के आदि
( आरम्भ राशि हैं ) ॥१४॥
अथ होरादृक्काण-द्वादशांशान् कथयति—
होरे समेऽब्जखगयोर्विषमे रवीन्दो-
र्दृक्काणकाः प्रथमपञ्चनवेश्वराणाम् ।
स्यु

६६ विवाहवृन्दावनम्- [षड्वर्ग-


योगनाड्यो भवन्तीत्यर्थः । इमाः ( एवं प्रकारेण साधिताः अन्तरनाड्यः )
इन्दोः पुण्याः, रवेस्तु पुण्यतमाः स्युः—एतदुक्तं भवति—त्रयस्त्रिंशतं
षष्ट्या संगुण्य चन्द्रगत्या भजेत् लब्धफलं चन्द्रसंक्रान्तिकाले सन्धिनाड्यः,
सूर्यगत्या भजेत् फलं सूर्यसंक्रान्तिकाले सन्धिनाड्यो भवन्ति, ताश्चन्द्रस्य
सामान्यपुण्यप्रदाः, रवेस्तु पुण्यतमा भवन्तीत्यर्थः ॥ १६ ॥

भा०— ३३ को ३ स्थान में रखकर ६० से गुना करके पृथक् पृथक् चन्द्रमा
और सूर्य के गत्यन्तर, चन्द्रमा की गति और चन्द्र सूर्य की गति के योग से भाग
देने से क्रम से तिथिसन्धि, नक्षत्रसन्धि, और योगसन्धि घटी होती है । इसी
प्रकार ३३ को ६० से गुनाकर चन्द्रगति से भाग देकर लब्धि चन्द्र संक्रान्ति घटी
और सूर्य गति से भाग देकर लब्धि सूर्य संक्रान्ति घटी होती है, इनमें चन्द्रमा
की सन्धिघटी सामान्य पुण्य प्रद

प्रकरणम् ८ ] वसन्तलक्ष्मीसहितम् । -६७
सहितस्य ) रवेर्यदंशवृन्दं भवेत् , अत्र च यद् राशिद्वयभागतष्टलब्धं 'ते'
वसन्ताद् वसन्तमारभ्य ऋतवो भवन्ति ॥१८॥
भा०-सायन सूर्य में १ राशि जोड़कर उसके अंशों में २ राशियों के अंश
( ६० ) से भाग देकर लब्धि वसन्तादि ऋतु होता है ॥१८॥
उदा०-सूर्य ३ । ५ । १५ । २०, अयनांश २१ । ३० । ३२ सायन सूर्य
के अंश ११६ । ४५ । ५२ इसमें ६० के भाग देने से लब्धि गतऋतु २, वर्तमान
वसन्त से तृतीय वर्षाऋतु हुआ ॥१८॥
अथ ऋतुसन्धिकालं कथयति-
तत्सन्धयोऽङ्गाङ्गघटीसमाः स्युर्द्विसंगुणाश्चेद्विषुवायनीयाः ।
स सन्धिसन्धिः खलु यत्र शेषः शून्यं भवेदेष विशेषपुण्यः ॥१९॥
सं०-तत्सन्धयः ( तेषां ऋतूनां सन्धयः ) अङ्गाङ्गघटीसमाः
( षट्षष्टिनाडितुल्याः ) स्युः । विषुवायनीयाश्चेत् तदा द्विसंगुणाः (द्वि-
गुणितषट्षष्टिघट्यः ) भवन्ति । यत्र ( राशिद्वयभागतक्षणकाले यदा )
शेषः शून्यं भवेत् स 'कालः' सन्धिसन्धिः स्यात् । एष 'सन्धिसन्धिः'
विशेषपुण्यो भवेत् ॥१९॥
भा०-उन ऋतुओं की सन्धि ६६ घटी होती है । यदि विषुव (मेष तुला)
और अयन (कर्क, मकर ) सम्बन्धी हो तो १३२ घटी अर्थात् ६६ पूर्व और ६६
पश्चात् सन्धि काल समझना । और जब एक राशियुक्त शायन सूर्य के अंश में
६० के भाग देने से शेष शून्य हो जाय तो वह काल सन्धि की सन्धि समझना
वह विशेष पुण्यप्रद है ॥१९॥
अथोक्तसन्धिसमये विवाहफलं कथयति-
सन्धौ पुरन्ध्री शुचमेति वन्ध्या मृतप्रजा वा यदि सन्धिसन्धिः ।
वदन्ति वात्स्या ऋतुना विमूढां निशीथमध्यन्दिनसन्धिषूढाम् ॥
सं०-सन्धौ ( तिथि-नक्षत्र-योगानां सन्धिकाले ) 'विवाहे सति'
पुरन्ध्री शुचं ( शोकं ) ऐति प्राप्नोति, यदि सन्धिसन्धिस्तदा मृतप्रजा
भवेत् । तथा निशीथमध्यन्दिनसन्धिषु ऊढां ( विवाहितां ) 'कन्यां'
ऋतुना विमूढां आर्तव-विहीनां वात्स्या वदन्ति ॥२०॥
भा०-तिथि, नक्षत्र, योग की सन्धि में विवाह होने से स्त्री शोक में प्राप्त
होती है । विवाह समय में सन्धिसन्धि हो तो स्त्री मृतवत्सा होती है । यदि मध्य

६८ विवाहवृन्दावनम्- [_षड्वर्ग-
रात्रि और मध्य दिन की सन्धि समय में विवाह हो तो वह स्त्री मासधर्म से
रहित होती है ॥२०॥
वि०-निशीथ और मध्यदिनसन्धि-
“मूर्तः कालो निवसति महानिशायां च दिनदले यस्मात् ।
दश पूर्वे दश परतस्तस्माद् वर्ज्यानि च पलानि ॥” इति ॥२०॥
अथ शूलादिदुष्टयोगसन्धीनां विशेषं कथयति-
शूलवैधृतवरीयसां च यत्पञ्चमेषु च तिथिष्ववान्तरम् ।
रेवतीन्द्रफणिभोद्भवन्तदप्यागताद्द्विगुणमुत्सृजेत्सुधीः ॥२१॥
सं०-शूलवैधृतवरीयसां योगानां यत् (पूर्वसाधितं) अवान्तरं,
पञ्चमेषु तिथिषु (पञ्चमीदशमीपञ्चदशीषु) च यद्वान्तरं, रेवतीन्द्र-
फणिभोद्भवं च यद्वान्तरं तदपि आगतात् (पूर्वसाधितात्) द्विगुणं सुधीः
उत्सृजेत् (त्यजेत्) ॥ २१ ॥
भा०-शूल, वैधृत, वारीयान् योगों की, तथा ५, १०, १५ तिथियों की
रेवती, ज्येष्ठा, श्लेषा नक्षत्रों की जो सन्धि घटी हो उसका द्विगुणित काल पण्डितों
को त्याग करना चाहिये ॥ २१ ॥
अथ मध्यगत्या नक्षत्रादिसन्धिघटिका आनीय कथयति-
नक्षत्रयोगतिथिसन्धिषु नाडिकैका
तिथ्यष्टविंशतिपलैः सहितोभयत्र ।
कर्कालिमीनतनुसन्धिषु दिक्पलानि
त्याज्यानि शेषविवरेष्वपि पञ्च पञ्च ॥ २२ ॥
सं०-नक्षत्र-योगतिथिसन्धिषु क्रमेण तिथ्यष्टविंशतिपलैः सहिता
एका नाडिका उभयत्र (नक्षत्रयोगतिथ्यन्तात् पूर्वं पाश्चाच्च) त्याज्या ।
कर्कालिमीनतनुसन्धिषु 'उभयत्र' दिक्पलानि त्याज्यानि । शेषविषरेषु
(शेषाणां वृषादिलग्नानां विवरेषु सन्धिषु) अपि पञ्च, पञ्च पलानि
त्याज्यानि ॥ २२ ॥
भा०-नक्षत्र सन्धि में १ घटी १५ पल, योगसन्धि में १ घटी ८ पल,
तिथिसन्धि में १ घटी २० पल पूर्व और पश्चात् त्याज्य है । कर्क, वृश्चिक और मीन
लग्न की सन्धि में पूर्व, पश्चात् १० पल और शेष लग्नों में ५, ५ पल त्याज्य हैं ॥

प्रकरणम् ५ ] वसन्तलक्ष्मीसहितम् । ६४

अथ चान्द्रमाससन्धिमाह—
अमातिथिः पार्श्वतिथिद्वयेन समं न माङ्गल्यमुपादधाति ।
लोकंपृणस्तत्र तिथेः प्रणेता यस्मान्न पीयूषवपुर्वपुष्मान् ॥२३॥
सं०—अमा(अमावास्या)तिथिः पार्श्वतिथिद्वयेन(चतुर्दश्या प्रतिपदा
च)समं सह माङ्गल्यं नोपदधाति । यस्मात् कारणात् तत्र लोकंपृणस्तिथि-
प्रणेता पीयूषवपुश्चन्द्रः वपुष्मान् (प्रशस्तबिम्बः) न भवति ॥ २३ ॥
भा०—अमावास्या अपने आगे और पीछे की दोनों तिथि (चतुर्दशी और
प्रतिपदा) सहित विवाह में मङ्गलप्रद नहीं होती है। क्योंकि इन तीनों तिथियोंमें
लोगोंका प्रिय तिथियोंका प्रणेता चन्द्रमा प्रशस्त बिम्बयुक्त नहीं रहता है ॥२३॥
कैश्चित् चन्द्रबाल्याद् द्वितीयापि निषिद्धा तन्मतं दूषयति —
उदेति चायं प्रतिपत्समाप्तौ कृशोपि वर्धिष्णुतया प्रशस्तः ।
द्वीपान्तरस्थो विफलोपि तावद्यावन्न पृथ्वीनयनाध्वनीनः ॥२४॥
सं०—अयं (चन्द्रः) प्रतिपत्समाप्तौ उदेति, अतः कृशोऽपि स
वर्धिष्णुतया प्रशस्तः स्यात् । द्वीपान्तरस्थः (अन्यत् द्वीपं द्वीपान्तरं तत्रस्थः
देशान्तरदृष्टः) अपि चन्द्रः तावद् विफलः, यावत् पृथ्वीनयनाध्वनीनो
न भवति (अर्थात् यावत् स्वदेशभूमिस्थितैर्जनैर्दृष्टो न भवति तावत्
विफल एवेति) ॥२४॥
भा०—यह चन्द्रमा प्रतिपदाके अन्तमें उदित होता है इसलिये द्वितीयामें
वर्धनशील होनेके कारण प्रशस्त माना जाता है। और दूसरे देशमें उदित चन्द्रमा
भी तब तक विफल है जब तक स्वदेशभूमिस्थ लोगोंका दृष्टिगोचर न हो। अर्थात्
जब तक अपने देशमें चन्द्रमा दृश्य हो तब तक ही उसका फल भी होता है ॥
अथ जन्ममासादिषु विवाहादिकं निषेधयति—
नो जन्ममासतिथिभेषु न चाधिकोने
मासे तिथौ च पृथुमङ्गलमामनन्ति ।
यज्ज्येष्ठगर्भजमपत्यमुपैतमेतज्
ज्येष्ठे महोत्सवमवश्यमियान्न वृद्धिम् ॥२५॥
सं०—जन्ममासतिथिभेषु पृथुमङ्गलं (चूड़ाकरणोपनयन-विवाहा-
दिकं) नो आमनन्ति, अधिकोने मासे च न, तथा अधिकोने तिथौ (तिथि-

७० विवाहवृन्दावनम्— . [ गोधूलि-
वृद्धौ तिथिक्षये ) च न आमनन्ति ( न कथयन्ति ) । यत् ज्येष्ठगर्भजम-
पत्यं तत् ज्येष्ठे ( ज्येष्ठमासे ) महोत्सवं ( चौलादिकं ) उपेतं सत् अवश्यं
( निश्चयं ) वृद्धिं न इयात् ( न प्राप्नुयात् ) ॥२५॥
भा०—जन्ममास, जन्मतिथि और जन्मनक्षत्र में बृहत् मङ्गल ( चूड़ाकरण,
उपनयन, विवाह आदि ) शुभ नहीं कहा गया है । अधिक और क्षयमास तथा
तिथिवृद्धि सौर तिथिक्षय में भी शुभ नहीं होता है । तथा ज्येष्ठ गर्भ का सन्तान
जो हो उसका ज्येष्ठमास में चूड़ाकरण उपनयन विवाहादि महोत्सव हो तो
अवश्य ही वृद्धिकारक नहीं होता है ॥२५॥
अथ गुणदोषविवेककर्तृ णां प्रशंसामाह—
इत्यतीन्द्रियदृशो निरूचिरे यद्गुणागुणमयं मुनीश्वराः ।
दैवविद्विदितजन्ममन्मतः कीर्तिभाग्भवति लग्नलग्नधीः ॥२६॥
सं०—इत्येवमुपरोक्तं गुणागुणमयं अतीन्द्रियदृशो दिव्यदृष्टयो मुनी-
श्वरा यन् निरूचिरे, विदितजन्ममन्मतः ( जन्म च तेषां मुनीनां मतं चेति
जन्ममन्मते, विदिते जन्ममन्मते येन स तथोक्तः ) लग्नलग्नधीः ( लग्ने
लग्ना धीर्बुद्धिर्यस्य सः ) दैवविद् कीर्तिभाग् भवति ॥ २६ ॥
भा०—इस प्रकार उपरोक्त गुण और दोष दिव्यदृष्टि मुनीश्वरों ने जो कहा है,
उन मुनियों के मत और जन्म समय को जाननेवाला तथा लग्न में निष्ठ बुद्धिवाला
ज्योतिषी संसार में कीर्तिभागी होता है ॥ २६ ॥
अथ गोधूलिकाध्यायः ।
तत्र गोधूलिकालं दर्शयन् स्वकवित्वकौशलं दर्शयति—
प्राचीं कुंकुमचर्चितामिव दिशं मुक्ताफलस्रग्विणीं
कौसुम्भांशुकभासिनीमिव दिशं प्राचेतसीं दर्शयन् ।
यावद्याति करग्रहं सह रविः सन्ध्याकुरङ्गीदृशा
तावन्मङ्गलमङ्गलमसुरभीरेणोः करं गृह्णतः ॥ १ ॥
सं०—यावत् रविः सूर्यः मुक्ताफलस्रग्विणीं प्राचीं दिशं कुङ्कुमचर्चि-
तामिव, प्राचेतसीं ( प्रतीचीं ) दिशं च कौसुम्भांशुकभासिनीमिव दर्शयन्

प्रकरणम् ९ ] वसन्तलक्ष्मीसहितम् । ७१
सन्ध्याकुरङ्गीदृशा ( सन्ध्यैव कुरङ्गीदृग् वधूस्तया ) करग्रहं याति तावत्
पर्यन्तं अङ्गलग्नसुरभीरेणोः ( अङ्गे लग्ना सुरभीणां धेनूनां रेणुर्धूलिर्यस्या-
स्तस्याः कुमार्याः ) करं पाणिं गृह्णतः ( वरस्य ) मङ्गलं शुभं भवति ॥१॥
भा०—जब तक भगवान् सूर्य मुक्ताफलमाला सदृश तारागणपंक्ति को धारण
की हुई पूर्व दिशा को कुङ्कुम से मण्डित के समान और पश्चिम दिशा को कुसुमरंग
से रंगे वस्त्र से सुशोभित के समान बनाते हुए सन्ध्यारूपिणी वधू के साथ करग्रह
को प्राप्त होते हैं तावत् काल पर्यन्त अङ्गो में लगी है गायों के चरण की धूली
जिसके ऐसे कुमारिका के करग्रहण करनेवाले पुरुष का मङ्गल होता है ॥ १ ॥
अथ गोधूलिलक्षणं तदधिकारिणश्चाह —
उत्कर्णतर्णकवलोकनवल्गु वल्गत्पीनस्तनोद्धूषितदुर्धरधेनुधूलिः ।
गोधूलिकं सृजति गोपपृथग्जनानां दोषैर्महद्भिरपि लग्नमनूनमन्यैः ॥
सं०—उत्कर्णतर्णकवलोकनवल्गुवल्गत्पीनस्तनोद्धूषित-दुर्धरधेनुधूलिः
( उत् ऊर्ध्वौ कर्णौ यासां ता उत्कर्णास्ताश्च तर्णकानां विलोकनेन वल्गवः
शोभमानाः वल्गन्त्यः पीनस्तनाः, उद्धूषिताः दुर्धराश्च ता धेनवश्च तासां
धूलिः ) गोधूलिकं लग्नं सृजति । इदं गोधूलिलंनं गोपपृथग्जनानां
( गोपाश्च पृथग्जना हीनवणांश्च तेषां ) अन्यैर्महद्भिर्दोषैः अनूनं ( सहितं )
अपि शुभं भवति ॥ २ ॥
भा०--कान को ऊपर उठाई हुई, बछड़ों को देखने के लिये मीठी शब्द
करती हुई पीनस्तनवाली अत्यन्त हृष्ट और बड़े कठिन से थाम्ह कर रखने योग्य
गायों के द्वारा उत्पन्न धूलि गोधूलिक लग्न बनाती है । यह गोधूलिक लग्न गोपों
और हीनवर्णों के लिये अन्य महादोषों से युक्त होने पर भी शुभ होता है ॥ २ ॥
केचित् गोधूलिकेऽपि षष्ठाष्टमचन्द्रं त्यजन्ति तन्निरस्यति —
गोधूलिकेपि विधुमष्टमषष्ठमूर्तिं यन्मोचयन्ति तदयं स्वरुचिप्रपञ्चः ।
पञ्चाङ्गशुद्धिमयमेव विवाहधिष्ण्यैर्यस्मादिदं सततमस्तगते पतङ्गे ॥
सं०—गोधूलिकेऽपि अष्टमषष्ठमूर्ति ( अष्टमषष्ठयोर्मूर्ति र्देहो यस्य तं )
विधुं चन्द्रं यन् मोचयन्ति ‘केचित्’ तदयं ‘तेषां’ स्वरुचिप्रपञ्चः (स्वरुच्यैव
प्रपञ्चो व्यामोहनं ) स्यात् । इदं गोधूलिकं विवाहधिष्ण्यैः ( विवाहविहित-
नक्षत्रैः ) पञ्चाङ्गशुद्धिमयमेव ग्राह्यम् । यस्मादिदं सततं ( सर्वदा ) अस्त-

७२ विवाहवृन्दावनम्- [गोधूलि-
गते सप्तमस्थे पतंगे सूर्ये सत्येव भवति । गोधूलिलग्ने विवाहविहितनक्षत्रे
सति पञ्चाङ्गशुद्धिरेव विलोक्या न पुनर्लग्नशुद्धिरित्यर्थः ॥ ३ ॥
भा०- गोधूलिक लग्न में भी कितने आचार्य अष्टम षष्ठ चन्द्र को जो त्याज्य
कहे हैं वह उनका अपनी रुचि का ही प्रपञ्च है । क्योंकि सर्वदा सप्तम स्थित सूर्य
में ही गोधूलिक लग्न होता है, इसलिये इसमें विवाहविहित नक्षत्र और पञ्चाङ्ग
शुद्धि मात्र देखना चाहिये ॥ ३ ॥
नांशो न लग्नमिह दृष्टयुतं स्वभर्त्रा नार्कारसौरतमसामपि सङ्गभङ्गः ।
किं चन्द्रचारभयमेकमिहास्तु किंचिन्नात्र प्रमाणवचनं किमपिश्रुतं नः ॥
सं०- इह ( अस्मिन् गोधूलिके ) अंशः ( नवांशः) स्वभर्त्रा दृष्टयुतो
न, लग्नं च स्वभर्त्रा दृष्टयुतं न भवतु । तथा च अर्कारसौरतमसां ( रवि-
कुज-शनिराहूणां ) अपि सङ्गभङ्गः ( सङ्गेन योगेन भङ्गः ) न भवति ।
इहास्मिन् एकं चन्द्रचारभयं पुनः किमस्तु । अत्र किञ्चित प्रमाणवचन-
मपि नः ( अस्माकं ) न श्रुतम् ॥ ४ ॥
भा०-इस गोधूलि लग्नमें नवांश वा लग्न अपने अपने स्वामीसे युक्त दृष्ट
न हो । इसमें सूर्य, मङ्गल, शनि और राहुके योगसे भी भङ्ग नहीं होता है । फिर
केवल एक चन्द्रचार का क्या भय हो सकता है ? तथा इसमें ( उपरोक्त अष्टम
षष्ठस्थित चन्द्र त्याग में ) प्रमाण वचन भी हम लोगों ने कुछ नहीं सुना है ॥४॥
अत्र किं विलोक्यमित्याह-
सार्कं शनौ विरवि चित्रशिखण्डिसूनौ
तत्केवलं कुलिकयामदलोपलम्भात् ।
प्रायेण शङ्करभुवामशुभर्त्तपत्त-
क्रूरर्त्तषेषु शुभकृत्करपीडनं स्यात् ॥ ५ ॥
सं०-तत् (गोधूलिकं) शनौ शनिदिने सार्कं सूर्यसहितं ग्राह्यम् ।
चित्रशिखण्डिसूनौ (गुरुदिने) विरवि, 'अस्तंगतेऽर्कबिम्बे' ग्राह्यमित्यर्थः ।
तदपि केवलं कुलिकयामदलोपलम्भात् ( कुलिकस्य, यामदलस्योपलम्भः
प्राप्तिस्तस्मात् ) । अत्र प्रायेण विशेषेण शङ्करभुवां हीनवर्णानां अशुभर्त्त-
पत्त-क्रूरर्त्तषेषु अपि करपीडनं शुभकृत् स्यात् किं पुनः पञ्चाङ्गादिशुद्धौ
सत्यामित्यर्थः ॥ ५ ॥

प्रकरणम् १० ] वसन्तलदमीसहितम् । ७३
भा०—शनिवार में सूर्यबिम्ब दृश्य रहते हुए ही, और गुरुवार में सूर्यबिम्ब
के अस्त होने पर गोधूलिक लग्न ग्रहण करना चाहिये । यह भी केवळ शनिवार
में अस्त के बाद कुलिक की प्राप्ति और गुरुवार में अस्त से पूर्व अर्धयाम की प्राप्ति
होने के कारण समझना । इस गोधूलि में अशुभ नक्षत्र कृष्णपक्ष और दुर्मुहूर्त
होने पर भी हीनवर्णों का विवाह शुभकारक होता है ॥ ५ ॥
सार्क शनावित्यादि यदुक्तं तत्परिमाणं कथयति —
अत्रोभयत्र घटिकादलमिष्टमाहुर्ग्राह्यस्तदम्बरमणेरपि नार्धविम्बः ।
कालार्गलानियतये तपनार्धविम्बवेलाव्यवस्थितिरियं रचयां बभूवे ॥
सं०—अत्र ( गोधूलिके ) उभयत्र ( विम्बार्धास्तमयात् पूर्वं पश्चाच्च )
घटिकादलं ( घट्यर्धं ) इष्टमाहुः । तत् तस्मात् अम्बरमणेः सूर्यस्य अर्ध-
विम्बः ( अर्धबिम्बं यस्मिन् सः ) अपि 'कालो' न ग्राह

७४ विवाहवृन्दावनम्— [ गोचर-
परिणयविधौ विवाहविषये असौ इन्दुमासः ( चान्द्रमासः ) श्रेयान् अति
श्रेष्ठ उक्तोस्ति ॥ १ ॥
भा०-चैत्रमास प्रतिपदा रविवार में सूर्यादि समस्त ग्रहों के मेषादि में
स्थित होने पर भूर्लोक, भुवर्लोक, स्वर्लोक की प्रवृत्ति हुई । इस प्रकार पौष
मास मकरादिस्थित सूर्य में उक्त लोकों की प्रवृत्ति नहीं हुई, अतः विवाह विषय
में वह चन्द्रमास ही अत्यन्त श्रेष्ठ कहा गया है ॥ १ ॥
वि०-“लङ्कानगर्यामुदयाच्च भानोस्तस्यैव वारे प्रथमं बभूव ।
मधोःसितादेर्दिनमासवर्षयुगादिकानां युगपत्प्रवृत्तिः ॥”
लङ्का के क्षितिज में मेषादिस्थित सूर्य और चन्द्रमा के होने पर लोकत्रय की
प्रवृत्ति हुई । वहाँ सूर्य और चन्द्रमा को तुल्य राश्यादि होने के कारण चान्द्रमास
की प्रवृत्ति हुई है, और सूर्य ही की होरा होने के कारण रविवार भी हुआ ।
और मेषादि में सूर्य के होने से चैत्रमास भी हुआ । चान्द्रमास की गणना चैत्रादि
से ही होती है । और सौर मास की प्रवृत्ति मकरादिस्थ सूर्य से समस्त संहिता-
कारों ने कही है । इसलिये चान्द्रमास की ही प्रधानता हुई, सौरमास की नहीं ।
अथ सौरचान्द्रयोर्विरोधे सयुक्तिकं निर्णयं कथयति –
नेष्टः पौषो मृगयुजि रवावाहृतश्चेत्प्रवीणै-
श्चारुश्चैत्रोप्यजसहचरे भास्करे सुन्दरीणाम् ।
माण्डव्याद्यैः स्मृतशुभफलस्यास्य किं नोपयामे
मीनोपि स्यादविकृतफलः फाल्गुनस्य प्रसङ्गात् ॥ २ ॥
सं०-सुन्दरीणां नारीणां उपयामे विवाहे मृगयुजि मकरस्थे रवौ
पौषो नेष्टः स्यात् । चेत् ( यदि )प्रवीणैः ( कैश्चित् पण्डितं मन्यैः ) मृगेऽर्के
पौषः आहतः स्वीकृतः तदा अजसहचरे मेषगते भास्करे चैत्रोऽपि चारुः
शुभः स्यात् । किञ्च माण्डव्याद्यैः आचार्यैः स्मृतशुभफलस्यास्य फाल्गुनस्य
प्रसङ्गात् ( योगात् )मीनोऽपि ( मीनस्थितार्कोऽपि ) अविकृतफलः ( न
विकृतं फलं यस्य स तथा ) किं न स्यात् । अपि त्वविकृतफल एव स्यात् ॥
भा०-स्त्रियों के पाणिग्रहण में मकरस्थित सूर्य में भी पौष मास नेष्ट है,
अगर कोई प्रवीण उसे ( मकरस्थ सूर्य में पौष को ) स्वीकार करते हैं तो मेषस्थ
सूर्य में चैत्र भी शुभ हो सकता है । और माण्डव्यादि आचार्यों से कथित शुभ

प्रकरणम् १० ] वसन्तलक्ष्मीसहितम् । ७५
फाल्गुन मास के योग से क्या मीन भी अविकृत फल (यथोक्त फलप्रद) नहीं हो
सकता है ? अर्थात् अवश्य अपने अशुभ फल को ही दे सकता है ॥ २ ॥
अतोऽत्र सिद्धान्तमाह-
झषो न निन्द्यो यदि फाल्गुने स्यादजस्तु वैशाखगतो न निन्द्यः ।
मध्वाश्रितौ द्वावपि वर्जनीयावित्यादिवाचामियमेव युक्तिः ॥ ३ ॥
सं०-यदि फाल्गुने मासे झषः (मीनस्थोऽर्कः) तदा न निन्द्यः स्यात् ।
अजः मेषार्कस्तु वैशाखगतो न निन्द्यः स्यात् । मध्वाश्रितौ चैत्रमासगतौ
द्वौ (मीनमेषार्कौ) अपि वर्जनीयौ चान्द्रमासस्य प्राधान्यात् । इत्यादि-
वाचां इत्याद्युक्तवतां युक्तिः इयमेव कथितैवेत्यर्थः ॥ ३ ॥
भा०-यदि फाल्गुन मास में मीन गत रवि हो तो निन्द्य नहीं है । और
वैशाख में मेषगत सूर्य हो तो निन्द्य नहीं है । तथा चैत्र मास में दोनों
(मीनार्क मेषार्क) त्याज्य है इत्यादि कहनेवालों की युक्ति यही है । अर्थात्
चन्द्रमास में ही प्राधान्य माना गया है ॥ ३ ॥
यदि चान्द्रमासस्य प्राधान्यं तदा पृथक् सौरमासं किमुक्तमित्याह-
प्रायः सौरं मानमिष्टं विवाहे तत्किं चान्द्रं मासमाहुः फलेन ।
यस्मात्सम्यक्तत्फलाप्तिस्तदैक्ये सौरो मासः केवलः किञ्चिदूनः ॥
सं०-प्रायः (विशेषेण) विवाहे सौरं मानमिष्टं, तत् (तदा)
फलेन चान्द्रं मासं किं आहुः ? यस्मात् कारणात् तदैक्यै (तयोः सौर-
चान्द्रयोः) ऐक्ये तत् फलाप्तिः (विवाहफललब्धिः) सम्यक् संपूर्णा
भवति । केवलः सौरो मासः किञ्चिदूनः स्यात् ॥ ४ ॥
भा०-विवाह में बहुधा सौरमान ही इष्ट है, तो शुभाशुभ फल से पृथक्
चान्द्रमास शौनकादिकों ने क्यों कहा ? इसलिये कि-सौर और चान्द्र दोनों के
ऐक्य होने से परिपूर्ण फल होता है । केवल सौरमास कुछ न्यून है ॥४॥
अथ गोचराष्टकवर्गयोर्बलाबलं कथयति-
योषितां गुरुपतङ्गगोचरे शोभने शुभकरः करग्रहः ।
अष्टवर्गविधिना तदत्यये सूर्यशुद्धिमपरे नृणां जगुः ॥ ५ ॥
सं०-योषितां नारीणां गुरुपतङ्गगोचरे शोभने (गोचरयुक्त्या गुरु-
बले, सूर्यबले च) सति करग्रहो विवाहः शुभकरः स्यात् । तदत्यये

( गोचरविधिना स्त्रीणां गुरुसूर्यबलालाभे ) सति अपरेऽन्ये अष्टवर्ग-
विधिना नृणां वराणां सूर्यशुद्धिं जगुः ॥ ५ ॥
भा०—गोचर विधि से स्त्रियों के गुरुबल और सूर्यबल प्राप्त होने पर विवाह
शुभ है । यदि गोचर विधि से गुरुबल और सूर्यबल प्राप्त नहीं हो तो अष्टवर्ग
विधि से पुरुष का ही रविबल ग्रहण करना अन्य आचार्यों ने कहा है ॥ ५ ॥
अत्र गोचरस्यैव कथं मुख्यतेति कथयति—
अष्टवर्गफलमेव जातके नास्य किं परिणयेपि मुख्यता ।
सत्यमुद्वहनजन्मशास्त्रयोरन्यथा मुनिभिरेव संस्मरे ॥ ६ ॥
सं०—जातके होराशास्त्रे अष्टवर्गफलमेवास्ति, अतः परिणये वि-
वाहेऽपि अस्य अष्टवर्गफलस्य मुख्यता किं न स्यात् ? इति सत्यम्, उद्वहन-
जन्मशास्त्रयोः विवाहजातकशास्त्रयोः अन्यता ( भिन्नता ) मुनिभिरेव
संस्मरे स्मृतेत्यर्थः ॥ ६ ॥
भा०—जातकशास्त्र में अष्टवर्ग से ही फल कहा गया है, इसलिये विवाह में
भी इस ( अष्टवर्ग फल ) की मुख्यता क्यों न हुई ? यह सत्य है; परञ्च मुनियों
ही ने जातकशास्त्र और विवाह में भिन्नता कही है ॥ ६ ॥
अत्रोदाहरणं कथयति—
क्रूरमष्टममरिष्टमिष्टदं सप्तमं शुभमुशन्ति जन्मनि ।
नेयमुद्वहनरीतिरित्यसावत्र गोचरपथो रथोद्धतः ॥ ७ ॥
सं०—जन्मनि जन्मकाले ( जातके ) अष्टमं क्रूरं पापग्रहं अरिष्टदं
( अशुभप्रदं ) सप्तमं सप्तमस्थानस्थं शुभं शुभग्रहं इष्टदं ( शुभप्रदं ) उशन्ति
कथयन्ति । इयं उद्वहनरीतिः ( विवाहविधिः ) न भवति । इत्यस्मात्
कारणात् अत्र ( विवाहे ) असौ गोचरपथः रथोद्धतः ( रथैरुद्धत उद्घृष्टः
परम्परागतः स्फुट एवेत्यर्थः ) ॥ ७ ॥
भा०—जातकशास्त्र में अष्टम पापग्रह शुभप्रद, और सप्तम शुभग्रह शुभप्रद
है । परञ्च यह विवाह की रीति नहीं है, अर्थात् विवाह में अष्टम पाप और सप्तम
शुभग्रह भी अशुभ ही है । इसलिये विवाहमें यह गोचरविधि परंपरागत स्पष्ट है ॥

[ प्रकरणम् ११ ] वसन्तलक्ष्मीसहितम् । ७७

अथ ग्रहयोगाध्यायः ।
तत्रादौ चक्रयोगं तत्फलं चाह—
चक्रस्यार्धे प्राचि पश्चात्क्रमेण क्रूराक्रूरैश्चक्रमित्यामनन्ति ।
अत्रोढायाः सुभ्रुवः स्वैरिणीत्वे भ्राम्यत्युच्चैश्चक्रवच्चित्तवृत्तिः ॥ १ ॥
सं०—चक्रस्य ( राशिमण्डलस्य ) प्राचि पश्चार्द्धे क्रमेण क्रूराक्रूरैः
चक्रं ( चक्रनामयोगं ) इति आमनन्ति, 'आचार्या' इति शेषः । दशमभाव-
मारभ्य चतुर्थभावपर्यन्तं चक्रस्य पूर्वार्धम्, चतुर्थाच्च दशमपर्यन्तं पश्चि-
मार्धं तत्र क्रमेण पापशुभैः स्थितैश्चक्रनामयोगो भवतीत्यर्थः । अत्रास्मिन्
योगे ऊढाया विवाहितायाः सुभ्रुवः कन्यायाः चित्तवृत्तिः स्वैरिणीत्वे पुंश्च-
लीत्वविषये उच्चैश्चक्रवद् भ्राम्यति सा स्त्री पुंश्चली भवतीत्यर्थः ॥ १ ॥
भा०—राशिमण्डल के पूर्वार्ध (दशम भाव से आगे चतुर्थभावपर्यन्त) में
सब पापग्रह और पश्चिमार्ध (चतुर्थ भाव से आगे दशमभाव पर्यन्त) में सब
शुभग्रह हों तो चक्रनाम योग होता है । इस योग में विवाहिता स्त्री की मनोवृत्ति
पुंश्चलित्व विषय में विशेषकर भ्रमित होती है, अर्थात् वह पुंश्चली होती है ॥ १ ॥
तनुनिमीलनगैश्च शुभाशुभैर्ध्वज इतीह कृतोद्वहना वधूः ।
सगुणलाभवती भवतीङ्गितैः प्रियमनोयमनोन्मुखविभ्रमा ॥ २ ॥
सं०—शुभाशुभैः क्रमेण तनुनिमीलनगैः (लग्नाष्टमस्थितैः) ध्वज इति
योगो भवति । इहास्मिन् ध्वजयोगे कृतोद्वहना वधूः सगुणलाभवती भवति ।
तथा च इङ्गितैः स्वचेष्टितैः प्रियमनो-यमनोन्मुखविभ्रमा (प्रियस्य स्वामिनो
मनः प्रियमनस्तस्य यमनं आकर्षणं तत्रोन्मुखो विभ्रमो विलासो यस्याः
सा तथोक्ता) भवति ॥ २ ॥
भा०—लग्न में शुभग्रह और अष्टम में पापग्रह हो तो ध्वजनामक योग होता
है । इस योग में विवाहिता स्त्री गुणसहित लाभवती और अपनी चेष्टाओं से अपने
स्वामी के मन को आकर्षण करनेवाली होती है ॥ २ ॥
अखिलकेन्द्रसखैः खलखेचरैर्भवति वापिरिहार्पितपुंस्करा ।
युवतिरुज्झितकान्तगृहा गृहे जनयितुः कुरुते कुरतोत्सवान् ॥ ३ ॥
सं०—अखिलकेन्द्रसखैः खलखेचरैः (सर्वेषु केन्द्रेषु स्थितैः पाप-
ग्रहैः) वापिः वापिनामयोगो भवति । इहास्मिन् योगे अर्पितपुंस्करा

७८ विवाहवृन्दावनम्- [ ग्रहयोग-

( अर्पितः पुंसे करो यया सा तथोक्ता ) युवतिः उज्झितकान्तगृहा
( त्यक्तपतिभवना सती ) जनयितुः पितुः गृहे कुरतोत्सवान् कुरुते ॥ ३ ॥
भा० — चारों केन्द्र में पापग्रह हों तो वापिनायक योग होता है । इस योग
में विवाहिता स्त्री अपने पति के गृह को त्याग कर पिता के घर में कुरत ( परपुरुषों
के साथ प्रेम ) से आनन्द करती है ॥ ३ ॥
गगनतोयतपस्सु शुभैर्भृगुर्गदति शंखमशंस्खलयत्यसौ ।
धनयशनयशोभितनुश्रिया परिणयेन पयोरुहचक्षुषाम् ॥ ४ ॥
सं०—गगनतोयतपस्सु ( दशम-चतुर्थनवमेषु ) शुभैः शुभग्रहैः सद्भिः
भृगुर्मुनिः शंखं ( शङ्खनामयोगं ) गदति । असौ योगः धनयशनयशो-
भितनुश्रिया ( धन-यशो-नयैः शोभिनी तनुः यासां ता धनयशनयशोभित-
नुश्रियः, तासां तथोक्तानां ) पयोरुहचक्षुषां ( कमलनेत्राणां ) स्त्रियां अशं
( दुःखं ) स्खलयति निराकरोति ॥ ४ ॥
भा०—१०, ४, ९ भावों में शुभग्रह हों तो भृगुमुनि शंख योग कहते हैं ।
विवाह में यह योग—धन, यश, नीति से सुशोभित शरीरवाली कमलनयना स्त्री
के दुःख को नाश कर देता है, अर्थात् अत्यन्त सुखप्रद होता है ॥ ४ ॥
एकादशे कुजरवी रविजः सपत्ने
वित्ते विधुस्तपसि शेषनभश्चराश्चेत् ।
श्रीवत्स एष सुखयत्यपि रूपरिक्तां
सौभाग्यभोगभरभङ्गितरङ्गिताङ्गीम् ॥ ५ ॥
सं०-- एकादशे कुजरवी, सपत्ने ( षष्ठे ) रविजः, वित्ते ( द्वितीये )
विधुः, तपसि ( नवमे ) शेषनभश्चराश्चेद् तदा श्रीवत्सो नाम योगः स्यात् ।
एष योगः रूपरिक्तां ( रूपहीनां ) अपि सौभाग्यभोगभरभङ्गितरङ्गिताङ्गीं
( सौभाग्यभोगस्य भरो भारस्तस्य भङ्गी रचना तया तरङ्गितानि अङ्गानि
यस्यास्तां तथोक्तां ) स्त्रियं सुखयति ॥ ५ ॥
भा०—लग्न से ११ भाव में मङ्गल रवि, षष्ठ में शनि, द्वितीय में चन्द्रमा,