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सर्वकोश
विवाह वृन्दावनम् (पं. सीताराम झा ज्योतिष टीका - विवाह संस्कार, अष्टकूट गुण-मिलान एवं मुहूर्त विज्ञान सटीक)

विवाह वृन्दावनम् (पं. सीताराम झा ज्योतिष टीका - विवाह संस्कार, अष्टकूट गुण-मिलान एवं मुहूर्त विज्ञान सटीक)

Vivaha Vrindavanam: Vivaha Sanskara, Ashtakuta Guna Milana evam Muhurta Vigyan

केशवार्कमहोदय (टीकाकार: पं. सीताराम झा) द्वारा

DevanagariHindipublished138 पृष्ठ

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पृष्ठ 72

प्रकरणम् ८ ] वसन्तलक्ष्मीसहितम् । ५४
प्रथम और द्वितीय भाव के योग का आधा करने से सन्धि होती है, वह प्रथम
की विराम और द्वितीय की आरम्भ सन्धि होती है । इसी प्रकार जिन दो भावों
के योग कर आधा किया जाता वह उन दोनो भावों की सन्धि होती है ॥ २ ॥
ग्रहाणां भावसम्बन्धिफलं कथयति—
सन्धौ खेटो निःफलो भावभागैस्तुल्यः सम्यग्भावपक्तिं व्यनक्ति ।
सन्धेरूनाधिक्यमाप्तो गतैष्यभावाधीनं संदधाति स्वपाकम् ॥ ३ ॥
सं०— सन्धौ ‘स्थितः’ खेटो ग्रहो निष्फलो भवति, भावभागैस्तुल्यो-
ग्रहो भावपक्ति भावफलं सम्यग् व्यनक्ति ददातीत्यर्थः । सन्धेरूनाधिक्यं
आप्तः गतः खेटः क्रमेण गतैष्यभावाधीनं स्वपाकं सन्दधाति – सन्धेरूनो
ग्रहः पूर्वभावफलं, सन्धेरधिको ग्रहोऽग्रिमभावफलं ददातीत्यर्थः ॥ ३ ॥
भा०—सन्धि में ( अर्थात् सन्धितुल्य ) ग्रह निष्फल होता है ( अर्थात्
शुभ वा अशुभ कुछ भी फल नहीं देता है ) । तथा भाव के अंश के तुल्य ग्रह
पूर्णफल देता है । और सन्धि से अल्प हो तो उस सन्धि से पूर्वभाव का फल,
और सन्धि से अधिक हो तो उस सन्धि से अग्रिमभाव का फल देता है ॥ ३ ॥
अथ राशिभावयोर्भेदे सति निर्णयमाह—
नाङ्गीकारो भावजानां गुणानां तद्दोषाणां तत्त्वतस्त्याग एव ।
भावव्यक्तावष्टमत्वं गतोऽपि त्याज्यो लग्नात्सप्तमः सप्तसप्तिः ॥ ४ ॥
सं०—भावजानां ( भवसम्बन्धिनां ) गुणानां अङ्गीकारो न कार्यः,
तद्दोषाणां भावदोषाणां तत्त्वतः त्याग एव कार्यः । यथा—लग्नात् सप्तमः
सप्तसप्तिः ( सूर्यः ) भावव्यक्तौ सत्यां अष्टमत्वं गतोऽपि ( अष्टमे शुभत्वं
प्राप्तोऽपि ) त्याज्य एव ॥ ४ ॥
भा०—भावस्पष्ट बनाने से भावकल्पनावश जो गुणप्राप्त हो उसका स्वीकार
नहीं करना चाहिये । और भाव कल्पनावश जो दोष हो वह सर्वथा त्याज्य है ।
जैसे—लग्नकुण्डली में सप्तम रवि ‘जो अशुभ कहा गया है’ वह यदि भावकुण्डली
के अनुसार अष्टम ( अष्टम होने से शुभ ) भी हो तथापि वह त्याज्य ही है ॥४॥
प्रत्याख्येयः पाक्षिकोपीह दोषः सम्यग्व्यापी यो गुणः सोनुगम्यः ।
यस्मादंशैर्गेहभावाधिकः सन्न स्याद् भूत्यै भार्गवः पञ्चमोऽपि ॥५॥
सं०—हि यतः दोषः पाक्षिकोऽपि (न्यूनपक्षसम्भवोऽपि) प्रत्याख्येयः