विवाह वृन्दावनम् (पं. सीताराम झा ज्योतिष टीका - विवाह संस्कार, अष्टकूट गुण-मिलान एवं मुहूर्त विज्ञान सटीक)
Vivaha Vrindavanam: Vivaha Sanskara, Ashtakuta Guna Milana evam Muhurta Vigyan
केशवार्कमहोदय (टीकाकार: पं. सीताराम झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६२ विवाहवृन्दावनम्- •[ षड्वर्ग-
पापारिष्टं निष्फलं शक्तिभाजां स्यात्षड्वर्गे लग्नगे सद्ग्रहाणाम् ॥
सं०—सौम्यवर्गाधिके लग्ने क्रूरा होराः ( पापग्रहसम्बन्धिहोराः )
मोघाः ( निष्फलाः ) स्युः । एवं सौम्यवारे ( शुभग्रहाणां दिने ) रात्र्यां
च क्रूरा होरा निष्फला भवन्ति । तथा—शक्तिभाजां सद्ग्रहाणां षड्वर्गे
लग्नगे सति पापारिष्टं निष्फलं स्यात् ॥ ९ ॥
भा०—लग्न में अधिक शुभग्रह के वर्ग हो तो पापग्रह की होरा निष्फल
होती है । एवं शुभग्रह के दिन में भी पाप होरा विफल, तथा रात्रि में भी पाप
होरा निष्फल होती है । और बलवान् शुभग्रहों का षड्वर्ग लग्न में हो तो पापग्रह
जन्य अरिष्ट भी निष्फल होता है ॥ ९ ॥
अथ ग्रन्थकारः स्वदेशाभिप्रायिकवारप्रवृत्तिमाह—
चरार्धदेशान्तरयुग्वियोगौ क्रमेण याम्योत्तरगोलगेऽर्के ।
योगे पुरा रव्युदयाद्वियोगे पश्चात्प्रवृत्तिर्दिनवारकर्तुः ॥१०॥
सं०—याम्योत्तरगोलगेऽर्के सति क्रमेण चरार्धदेशान्तरयुग्-
वियोगौ कार्यों ( याम्यगोलगेऽर्के चरार्ध-देशान्तरपलानां योगः, उत्तर-
गोले वियोग इत्यर्थः ) योगे रव्युदयात् पुरा ( पूर्वमेव ), वियोगे रव्युद-
यात् पश्चात् तयोरन्तरपलैः दिनवारकर्तुः प्रवृत्तिः । अर्थात् दक्षिण-
गोले पूर्वं, उत्तरगोले पश्चाद् वारप्रवृत्तिर्भवति ॥१०॥
भा०—दक्षिण गोल में सूर्य हो तो चरपल और देशान्तर पल के योग, और
उत्तर गोल में अन्तर करके जो हो, दक्षिण गोल में सूर्योदय से योगपल तुल्य
पूर्व और उत्तर गोल में सूर्योदय से अन्तरपल तुल्य पश्चात् वारप्रवृत्ति होती है ॥
वि०—लङ्का में सूर्योदयकाल से ही सर्वत्र वारप्रवृत्ति मानी जाती है ।
कारण कि--लङ्का में सूर्योदय काल ही में सृष्टि का आरम्भ हुआ । कहा भी है--
“लङ्कानगर्यामुदयाच्च भानोस्तस्यैव वारे प्रथमं बभूव ।
मधोः सितादेर्दिन-मास-वर्ष-युगादिकानां युगपत् प्रवृत्तिः ॥”
लङ्का का याम्योत्तर वृत्त रेखा नाम से प्रसिद्ध है । रेखा और अपना स्थान
का पूर्वापर अन्तर देशान्तर; तथा उन्मण्डल और अपना क्षितिजका अन्तर
( अर्थात् लङ्का से दक्षिणोत्तर अन्तर ) चरार्ध कहलाता है । अतः लंका
क्षितिज और अपना क्षितिज का अन्तर चरार्ध और देशान्तर के संस्कार से हो
सकता । परञ्च सब स्थान में सर्वथा दक्षिण गोल में योग, और सर्वथा उत्तर