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सर्वकोश
विवाह वृन्दावनम् (पं. सीताराम झा ज्योतिष टीका - विवाह संस्कार, अष्टकूट गुण-मिलान एवं मुहूर्त विज्ञान सटीक)

विवाह वृन्दावनम् (पं. सीताराम झा ज्योतिष टीका - विवाह संस्कार, अष्टकूट गुण-मिलान एवं मुहूर्त विज्ञान सटीक)

Vivaha Vrindavanam: Vivaha Sanskara, Ashtakuta Guna Milana evam Muhurta Vigyan

केशवार्कमहोदय (टीकाकार: पं. सीताराम झा) द्वारा

DevanagariHindipublished138 पृष्ठ

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पृष्ठ 74

प्रकरणम् ४ ] वसन्तलक्ष्मीसहितम्। ६१
( षड्राशियुक्तः ) कार्यः, दिने तु यथास्थित एव सूर्यः, स सायनांशः
अयनांशसहितः कार्यः, लग्नं च सायनाशं कार्यम्, अथ भुक्ता भोग्याः
तन्वकांशाः ( तनोः भुक्ताः, अर्कस्य भोग्या अंशाः ) ते पृथक् स्वोदयघ्नाः
त्रिंशद्भक्ता पलादिस्तात्कालः ( अर्थात् तनोर्भुक्तकालः, सूर्यस्य भोग्यकालः
सः ) मध्यगस्वोदयाढ्यः ( अर्क-तनुमध्यगतराशिखोदययुक्तः ) अभीष्ट-
कालो भवतीति शेषः ॥ ७ ॥
भा०—रात्रिगत इष्टकाल बनाना हो तो सूर्यमें ६ राशि जोड़ देना, और
दिनमें केवल सूर्यही में अयनांश जोड़कर उसके भोग्यांशको, इष्ट लग्नमें
अयनांश जोड़ कर उसके भुक्तांश को अपने देशीय उदय मान से गुनाकर ३०
का भाग देनेसे क्रम से लग्न का भुक्तपल और सूर्य के भोग्यपल होते हैं । उनके
योगमें सूर्य और लग्नकेमध्यगत राशियोंके स्वोदयमान जोड़ने से इष्टकाल होता है ।
अथ लग्नात्कालहोराज्ञानं कथयति—
तत्कालार्कन्यूनलग्नांशपिण्डो भक्तः पञ्चक्षोणिभिर्भुक्तहोराः ।
भास्वच्छुक्रेजेन्दुसौरार्यभौमाः संख्यायेरन्वारतस्ते तदीशाः ॥ ८ ॥
सं०—तत्कालार्कन्यूनलग्नांशपिण्डः ( तत्कालसूर्येोन-लग्नांशसमूहः )
पञ्चक्षोणिभिः ( पञ्चदशभिः ) भक्तः, भुक्तहोराः स्युः । तदीशाः
भास्वच्छुक्रेजेन्दुसौरार्यभौमाः इति क्रमेण वारतः ( इष्टवारात् ) संख्या-
येरन् गणयेरन् ॥ ८ ॥
भा०--तात्कालिक सूर्य को लग्न में घटाकर शेष के अंशादि बनाकर उसमें
१५ के भाग देने से गतकाल होरा होती है । सूर्यादिवारों में उनके स्वामी क्रम से
सूर्य, शुक्र, बुध, सोम, शनि, बृहस्पति और मङ्गल होते हैं। जिस दिन होराज्ञान
करना हो उसी दिन से आरम्भ कर उक्त क्रम से गिनकर समझना चाहिये ॥८॥
उदा०—जैसे गुरुवार में स्पष्ट सूर्य १ । १५ । १४ । २० और लग्न ५ ।
१६ । २० । २५ । लग्न में सूर्य को घटाकर ४ । १ । ६ । ५ इसके अंशपिण्ड
१२१ । ६ । ५ में १५ के भाग देने से लब्धि ८ गत होरा वर्तमान ९ वीं होरा
हुई, अभीष्टवार बृहस्पति है, अतः बृहस्पति से बृहस्पति, मङ्गल, सूर्य इत्यादिक
क्रम से ९ वाँ मंगल होरेश हुआ ॥ ८ ॥
पापहोराया निष्फलत्वं कथयति—
होराः क्रूराः सौम्यवर्गाधिके स्युर्लग्ने मोघाः सौम्यवारे च रात्र्याम् ।