विवाह वृन्दावनम् (पं. सीताराम झा ज्योतिष टीका - विवाह संस्कार, अष्टकूट गुण-मिलान एवं मुहूर्त विज्ञान सटीक)
Vivaha Vrindavanam: Vivaha Sanskara, Ashtakuta Guna Milana evam Muhurta Vigyan
केशवार्कमहोदय (टीकाकार: पं. सीताराम झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६० विवाहवृन्दावनम्- [•षड्वर्ग-
त्याज्यः । तथा यो गुणः सम्यग् व्यापी (सर्वसम्मतः) सोऽनुगम्यः ( अनु-
सरणीयः-ग्राह्य इत्यर्थः ) तस्मात् कारणात् पञ्चमोऽपि ( लग्नकुण्डल्यां
पञ्चमस्थः शुभोपि ) अंशैः गेहभावाधिकः ( भावव्यक्तौ पञ्चमभावाधिकः
= षष्ठभावं गतः ) सन् भार्गवः शुक्रः भूत्यै ( शुभाय ) न स्यात् ॥ ५ ॥
भा० - क्योंकि-दोष पाक्षिक ( अल्प अंश से ) भी हो तो त्याज्य है ।
और जो गुण सर्वसम्मत हो उसका ग्रहण करना चाहिये । जैसे लग्नकुण्डली में
पञ्चम स्थानस्थ 'शुभ' शुक्र भी यदि भाव के अंश से अधिक होकर षष्ठ भाव में
प्राप्त हों तो वह शुभकारक नहीं होता है ॥ ५ ॥
वि०-इससे सिद्ध हुआ कि लग्नकुण्डली और भावकुण्डली दोनों प्रकार से
जो ग्रह शुभ हो वह शुभ है । तथा एक प्रकार से शुभ और एक प्रकार से अशुभ
हो तो वह अशुभ ही है ॥ ५ ॥
संक्रान्तिकालज्ञानादिष्टकाले स्पष्टसूर्यसाधनामाह -
संक्रान्त्यन्तर्वासरैर्यद्द्युवृन्दालब्धं भानुर्भादि मेषादिमिश्रम् ।
भक्ता रामैर्लग्नमुक्ता नवांशा दिग्भिर्निघ्नास्ते तदंशा भवेयुः ॥६॥
सं०-संक्रान्त्यन्तर्वासरैः ( गतैष्यसंक्रान्त्यन्तर्गतदिनैः ) द्युवृन्दात्
( गतसंक्रान्तिकालैष्टकालान्तर्गतदिनगणात् ) लब्धं भादि ( राश्यादिकं
फलं ) यत् 'तत्' मेषादिमिश्रं भानुः ( तात्कालिकः सूर्यः ) स्यात् !
अथेष्टलग्नांशसाधनमाह-लग्नभुक्ता नवांशा दिग्भिः ( दशभिः ) निघ्ना
रामैर्भक्ताः ते तदंशाः ( तस्य लग्नस्याभीष्टांशाः ) भवेयुः ॥ ६ ॥
भा०-विवाहकालिक इष्ट समय में--गत संक्रान्तिकाल से इष्टकाल पर्यन्त
जितने दिनादि हो उसमें गत और अग्रिम संक्रान्ति के अन्तर्गत दिनादि से भाग
देने से राश्यादिक लब्धि में मेषादि गत संक्रान्ति तक की राशि संख्या मिलाने
से स्पष्ट सूर्य होता है । तथा इष्ट लग्न में इष्ट नवांश से पूर्व की संख्या को १० से
गुना करके ३ का भाग देने से लब्धि इष्ट लग्न के अंशादि होते हैं । इस प्रकार
राश्यादि अभीष्ट लग्न का ज्ञान करना ॥ ६ ॥
अथ लग्न-सूर्याभ्यामिष्टकालज्ञानमाह-
रात्रौ भानुर्भार्धयुक्तसायनांशस्तन्वंर्काशाः स्वोदयघ्नाः पृथक्ते ।
त्रिंशद्भक्ता भुक्तभोग्याः पलादिस्तात्कालो मध्यगस्वोदयाढ्यः ॥
सं०-रात्रौ ( रात्रिगतेष्टघटी-साधने ) भानुः सूर्यः भार्धयुक्