विवाह वृन्दावनम् (पं. सीताराम झा ज्योतिष टीका - विवाह संस्कार, अष्टकूट गुण-मिलान एवं मुहूर्त विज्ञान सटीक)
Vivaha Vrindavanam: Vivaha Sanskara, Ashtakuta Guna Milana evam Muhurta Vigyan
केशवार्कमहोदय (टीकाकार: पं. सीताराम झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७४ विवाहवृन्दावनम्— [ गोचर-
परिणयविधौ विवाहविषये असौ इन्दुमासः ( चान्द्रमासः ) श्रेयान् अति
श्रेष्ठ उक्तोस्ति ॥ १ ॥
भा०-चैत्रमास प्रतिपदा रविवार में सूर्यादि समस्त ग्रहों के मेषादि में
स्थित होने पर भूर्लोक, भुवर्लोक, स्वर्लोक की प्रवृत्ति हुई । इस प्रकार पौष
मास मकरादिस्थित सूर्य में उक्त लोकों की प्रवृत्ति नहीं हुई, अतः विवाह विषय
में वह चन्द्रमास ही अत्यन्त श्रेष्ठ कहा गया है ॥ १ ॥
वि०-“लङ्कानगर्यामुदयाच्च भानोस्तस्यैव वारे प्रथमं बभूव ।
मधोःसितादेर्दिनमासवर्षयुगादिकानां युगपत्प्रवृत्तिः ॥”
लङ्का के क्षितिज में मेषादिस्थित सूर्य और चन्द्रमा के होने पर लोकत्रय की
प्रवृत्ति हुई । वहाँ सूर्य और चन्द्रमा को तुल्य राश्यादि होने के कारण चान्द्रमास
की प्रवृत्ति हुई है, और सूर्य ही की होरा होने के कारण रविवार भी हुआ ।
और मेषादि में सूर्य के होने से चैत्रमास भी हुआ । चान्द्रमास की गणना चैत्रादि
से ही होती है । और सौर मास की प्रवृत्ति मकरादिस्थ सूर्य से समस्त संहिता-
कारों ने कही है । इसलिये चान्द्रमास की ही प्रधानता हुई, सौरमास की नहीं ।
अथ सौरचान्द्रयोर्विरोधे सयुक्तिकं निर्णयं कथयति –
नेष्टः पौषो मृगयुजि रवावाहृतश्चेत्प्रवीणै-
श्चारुश्चैत्रोप्यजसहचरे भास्करे सुन्दरीणाम् ।
माण्डव्याद्यैः स्मृतशुभफलस्यास्य किं नोपयामे
मीनोपि स्यादविकृतफलः फाल्गुनस्य प्रसङ्गात् ॥ २ ॥
सं०-सुन्दरीणां नारीणां उपयामे विवाहे मृगयुजि मकरस्थे रवौ
पौषो नेष्टः स्यात् । चेत् ( यदि )प्रवीणैः ( कैश्चित् पण्डितं मन्यैः ) मृगेऽर्के
पौषः आहतः स्वीकृतः तदा अजसहचरे मेषगते भास्करे चैत्रोऽपि चारुः
शुभः स्यात् । किञ्च माण्डव्याद्यैः आचार्यैः स्मृतशुभफलस्यास्य फाल्गुनस्य
प्रसङ्गात् ( योगात् )मीनोऽपि ( मीनस्थितार्कोऽपि ) अविकृतफलः ( न
विकृतं फलं यस्य स तथा ) किं न स्यात् । अपि त्वविकृतफल एव स्यात् ॥
भा०-स्त्रियों के पाणिग्रहण में मकरस्थित सूर्य में भी पौष मास नेष्ट है,
अगर कोई प्रवीण उसे ( मकरस्थ सूर्य में पौष को ) स्वीकार करते हैं तो मेषस्थ
सूर्य में चैत्र भी शुभ हो सकता है । और माण्डव्यादि आचार्यों से कथित शुभ