तरुण के स्वप्न (नेताजी सुभाष चन्द्र बोस - युवा भारत के नाम क्रान्तिकारी वैचारिक घोषणा-पत्र)
Tarun Ke Swapna by Netaji Subhash Chandra Bose
नेताजी सुभाष चन्द्र बोस द्वारा
मेरा देश
—**—
(माण्डलेकी जेलसे दक्षिण कलकत्ता सेवक समितिके
सहकारी सम्पादक श्री० अनाथ बंधु दत्तको लिखा हुआ
पत्र )
माण्डला जेल
दिसम्बर १६२६
सविनय निवेदन,
आपका ६ नवम्बरका पत्र यथा समय मिला । उत्तर
देनेमें बिलम्ब हुआ, कुछ खयाल न कीजियेगा । अपनी
इच्छाके अनुसार ही चलता तो पत्र नहीं लिखता, क्योंकि
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तरुणके स्वप्न
राजबन्दीके साथ सम्बन्ध रखना वांछनीय नहीं समझा
जाता। किन्तु आप पत्रोत्तरकी प्रतीक्षा करते होंगे और
उत्तर पाकर सन्तुष्ट होंगे, यही समझ कर उत्तर देने
बैठा हूं।
आपने सामूहिक रूपसे मुझे याद किया, मेरे स्वास्थ्य-
के लिये शुभ कामना की, मेरी रिहाईकी कामनाकी तथा
मेरे प्रति अपने हृदयका प्रेम प्रदर्शित किया, इसके लिये
मेरी आन्तरिक कृतज्ञता स्वीकार कीजिये। स्वदेश सेवक
इससे बढ़कर और क्या पारितोषिक चाह सकता है?
आपका पत्र पाकर और अखबारमें आपकी सभाका
विवरण पढ़कर मैं आनन्दित हुआ, यह कहना न होगा।
तब भी मैं समझता हूं इस तरहका आनन्द उपभोग करना,
मनकी सर्वोच्चता प्रकट नहीं करता। क्या करूं? स्वदेश
सेवी होनेकी स्पर्द्धा रखनेपर भी मैं मनुष्य हूं। अपनत्व
और ममताका निदर्शन पाकर कौन सुखी नहीं होता ?
प्रेम और ममता पानेकी आकांक्षा पर विजय पा लेना या
उससे आगे बढ़ जाना बहुत अच्छा है, तथा उच्च स्वदेश
सेवीके लिये हर तरहके प्रतिफलकी आकांक्षा पर विजय
प्राप्त कर लेना उचित है किन्तु यह अवस्था अभीतक मेरे
लिये आदर्शही है। हृदयपर हाथ रखकर बोलते समय मुझे
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मेरा देश
भी Alexander Selkirk की भाषामें कहना होगा, बीच
बीचमें मेरे भी मनमें होता है;—
“My friends do they now and then
Send a wish or a thought after me.”
आज पूरे चौदह महीने मुझे जेलमें हुए। इनमें ग्यारह
महिने बर्मामें काटे। समय समयपर मनमें होता है लम्बे
चौदह महिने देखते-देखते चले गये, किन्तु कभी मनमें
आता है कि न जाने कितने युगसे यहां हूं। जेल ही मानो
घर द्वार है, यहांसे बाहरकी बात मानो स्वप्नकी बात है,
मानो यहांका एकमात्र सत्य—वास्तविकता, लोहेकी
गारद और प्रस्तर प्राचीर है। सचमुच यह एक विचित्र
दुनिया है। रह रहकर मनमें सोचता हूं, जिसने जेलखाना
नहीं देखा उसने दुनियाका कुछ भी नहीं देखा। उसके
सामने दुनियाकी बहुत-सी सचाई नहीं आयी।
मैं अपने मनका विश्लेषण कर समझ पाता हूं कि ऐसे
विचार ईर्ष्याके कारण नहीं उठते। वस्तुतः जेलमें आकर
बहुत कुछ सीखा हू। बहुत कुछ सत्य जो एक समय छाया
के समान था, यहां वहो स्पष्ट हो गया है। तथा अनेक
नवीन गम्भीर अनुभूतियोंने मेरे जीवनको सबल और
गम्भीर बनाया है। यदि भगवान किसी दिन सुयोग और
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तरुणके स्वप्न
वाणी देंगे तो वे सब बातें देशवासियोंको सुनाऊंगा।
जेलमें हूं, इससे दुखी नहीं हूं। देशमाताके लिये कष्ट
सहना गौरवकी बात है। Suffering में आनन्द है
इसे विश्वास करिये। अगर ऐसा न होता तो आदमी
पागल हो जाता, ऐसा न होता तो यातनाओंके बीचमें
मनुष्यका हृदय आनन्दसे भरकर हंसता कैसे ? जो
वस्तु बाहरसे suffering मालूम पड़ती है, भीतरसे देख-
नेसे वही आनन्दमय मालूम होती है। निश्चय ही वर्षके
३६५ दिन और दिनके २४ घण्टोंमें हमेशा ही यह भाव मेरे
हृदयमें नहीं रहता, क्योंकि अभी भी हाथोंपर बेड़ियोंके
दाग हैं। किन्तु यह सच है कि उपरोक्त अनुभूति कम या
ज्यादा जिसके हृदयमें नहीं है, वह suffering से जीवन-
को बल-युक्त नहीं कर सकता और suffering के बीचमें
प्रकृतिस्थ नहीं रह सकता।
मुझे दुख इस बातका है कि इन चौदह महीनोंका
बहुत-सा समय योंही बिता दिया। अगर बङ्गालकी जेल-
में होता तो साधनाके पथमें बहुत कुछ आगे बढ़ पाता।
किन्तु यह तो होनेको न था। अब इस समय मेरी प्रार्थना
यही है कि जिसके हाथमें पताका दो उसके हाथमें उसे
धारण करनेकी शक्ति दो। जिस समय यहांसे छुटकारेकी
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कल्पना करता हूं उस समय जितना आनन्द होता है उस-
से ज्यादा भय होता है कि तैयारी पूरी होते न होते कर्तव्य-
का आह्वान न आ जाय। तब यही चाहता हूं कि जब तक
तैयार न हो जाऊं तबतक छुटकारेकी बात नहीं उठे।
आज मैं बाहर भीतरसे तैयार नहीं हूं इसलिये कर्तव्यका
आह्वान भी नहीं आया। जिस दिन तैयार हो जाऊंगा,
उस दिन एक मुहूर्तके लिये भी यह मुझे अटकाकर न रख
सकेगा।
यही भावोंका सिलसिला है, इसमें Objective
truth है यो नहीं, नहीं जानता। जेलमे रहते रहते sub-
jective truth और objective truth एक हो गया हैं।
भाव और स्मृतिके सहारे रहते रहते, भाव और स्मृति
ही वास्तविकमें परिणत हो जाती हैं। मेरी अवस्था
बहुत कुछ ऐसी ही हो गयी है। भाव ही मेरे लिये
वास्तव सत्य है, क्योंकि एकत्व बोधमें ही शान्ति है।
आपने लिखा है, “देश और कालके व्यवधानने बंगालके
लिये आपको और भी अधिक प्रिय कर दिया हैं।” और
देश कालके व्यवधानने बंगालको मेरे सामने कितना
सुन्दर, कितना वास्तविक बना दिया है, यह मैं कह नहीं
सकता। देशबन्धुने कहा है, “बंगालके जल और मिट्टीमें
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तरुणके स्वप्न
एक चिरंतन सत्य है” इस उक्तिकी सत्यता यदि यहां एक
साल नहीं रहता तो इस प्रकार थोड़े ही समझ पाता ।
बङ्गालके शस्य श्यामल मनोहर क्षेत्र, मधुगन्ध-वह मुक-
लित आम्र कानन, आरति धूप धूमाच्छादित मन्दिर,
फलकवत् गाम्य कुटीर, मेरी आँखोंके सामने नाचता
रहता है। ओह ! ये सब दृश्य कल्पनामें भी कितने
सुन्दर हैं।
सवेरे या दोपहरको जब मेघोंके टुकड़े, आंखोंके
सामने आ आ कर चले जाते हैं, तब मनमें होता है कि
विरहीयक्षकी तरह मैं भी अपने अन्तरतम प्रदेशका सन्देश
वंग माताओंके चरणोंमें निवेदन करूं,-भेज दूं । आखिर
वैष्णवोंकी भाषामें लिख भेजता हूं।
“तोमारेई लागिया कोलंकेर बोझा,
बोहिते आमार सुख।”
सायंकालके बढ़ते हुए अन्धकारके आक्रमणसे जब
मार्त्तण्ड माण्डलेके दुर्गकी प्राचीरोंके पीछे छिप जाता है,
अस्तोन्मुख सूर्यकी सुनहली किरणोंसे जब पश्चिम
प्रदेश रञ्जित हो जाता है और उसी समय जब असंख्य
रिक्तमेघ सूर्यकी लाल किरणोंसे रूप बदलकर लाल-लाल
दखलायी पड़ते हैं,उस समय बङ्गालके सुहावने सूर्यास्तकी
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मेरा देश
याद आती है। इस काल्पनिक दृश्यमें भी इतना
सौन्दर्य यह पहले नहीं जानता था।
प्रातःकालकी विचित्र वर्णच्छटा जब पूर्वाकाशको रंजित
करती है, तब निद्रालस नयनोंकी पलकोंपर आघात करके
कोई कहता है, "अन्धे जागो।" उस समय और भी एक
सूर्योदयका स्मरण होता है, जिस सूर्योदयमें कवि और
साधकोंने मांका दर्शन पाया है।
जाने दो—शायद मैं pedantic हुआ जा रहा हूं।
किन्तु यह pedantry नहीं, वाचालता है। भावोंका
आदानप्रदान बन्द होनेपर, फिर एकाएक सुयोग मिलने-
पर जो होता है,उसीका एक दृष्टान्त है। Engine समय-
समयपर जैसे अपनी स्टीम बाहर छोड़कर आत्मरक्षा
करता है, बस, ऐसी ही मेरी अवस्था है।
सेवक समितिका काम सुचारु रूपसे चल रहा है,
सुनकर सुखी हुआ। Lansdowne ब्रांचके साथ किसी
तरहका मनोमालिन्य न होना चाहिये। आशा है, वे लोग
कामकाज ठीक चला रहे होंगे। दक्षिण कलकत्ता सेवाश्रम
के Orphanage के लिये कुछ करें तो बड़ा अच्छा होगा।
इसकी विशेष उन्नति नहीं हो रही है, किन्तु यह काम
बहुत जरूरी है।
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तरुणके स्वप्न
आपलोगोंको पहचाननेमें कष्ट या असुविधा नहीं
है, आशा है आप सब सकुशल होंगे। मेरा प्रीतिसंभाषण
और आलिंगन ग्रहण करें। इति
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समाज-सेवा और गृह-शिल्प
[ श्री० अनिल बन्धुको लिखे गये पत्रका अंश ]
माण्डला जेल ।
सविनय निवेदन,
आपका पत्र पाकर और सब समाचार जानकर आन-
न्दित हुआ। कार्यसमितिके अधिकांश सदस्य सेवाश्रमके
कामोंमें दिलचस्पी नहीं लेते इससे आप निराश या चिंतित
न हों। अधिकांश कार्यकारिणी समितियोंकी यही
हालत है। अपनी सेवा और लगनसे ही दूसरोंमें सेवा
और लगनकी भावना जगाना होगा। गांवमें दूसरेके
दुःखके प्रति संवेदना और आग्रहका भाव जाग्रत हुए
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प्रथम खण्ड: जीवन-लक्ष्य, आत्म-विकास एवं साधना-पथ
तरुणके स्वप्न
बिना सेवाकार्य संभव नहीं होता। इसके बिना यदि
सम्भव भी हो तो सार्थक नहीं होता। आपकी आन्तरिक
सेवा और लोकप्रियताके कारण दूसरोंके हृदयोंमें भी
वैसे ही भाव जागरित होंगे, यही मेरा विश्वास और
आकांक्षा है।
सेवाश्रम-भवनके साथ फुलवारी लगाने लायक जमीन
है क्या ? महीनेमें १४० तकका चन्दा आ जाता है सुन-
कर सुखी हुआ। मकानका किराया क्या है ? मकान
कितने तल्लोंका है तथा कुल कितने कमरे हैं? कारपो-
रेशन प्राइमरी स्कूलमें कितने छात्र हैं और किस जातिके
छात्र पढ़ने आते हैं। सेवाश्रमके छात्रोंको किस तरहकी
शिक्षा दी जाती है, इसका विवरण भेजियेगा। सेवाश्रम-
में नौकर हैं क्या ? यदि हैं तो कितने हैं ? भोजन कौन
बनाता है ? बालकोंमें कितने तांत और Sewing machine
का काम सीखते हैं। बुननेका काम और सीनेका (साधा-
रण कोट, कुर्ता आदि ) कितने दिनमें सिखलाया जा
सकता है।
बालकोंका average intelligence कैसा है?
सेवाश्रमके सम्बन्धमें यथासंभव विस्तृत विवरण भेजि-
येगा। उसे पढ़कर कुछ परामर्श देनेकी चेष्टा करूंगा।
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समाज-सेवा और गृह-शिल्प
बालकोंके भोजनकी क्या व्यवस्था है ? बीमारीमें चिकि-
त्साका क्या इन्तजाम है ? चिकित्सा और दवाके लिये
दाम देने पड़ते हैं कि नहीं ? इति—
२
मान्डला जेल
✽ ✽ ✽ ✽
सम्भव है आपने अबतक सुन लिया होगा कि हमारा
अनशन व्रत बिलकुल निरर्थक या निष्फल नहीं हुआ ।
सरकार हमारे धार्मिक अधिकार माननेको बाध्य हुई ।
अबसे बंगालके बन्दी पूजा ( दुर्गापूजा ) के खर्चके लिये
३०) रुपये एलाउन्स allowance पायेंगे, तीस रुपये बहुत
कम हैं और इससे हमारा खर्चा पूरा न होगा, किन्तु जिस
principle को सरकार अब तक मानना नहीं चाहती
थी, उसे अब स्वीकार कर लिया है, यही हमारे लिये
सबसे बड़ा लाभ है । रुपयेकी बात तो सब जगह, सब
समय, बिलकुल मामूली बात है ? पूजा करने देनेकी मांग-
के सिवा सरकारने हमारी अन्य मांग स्वीकृत की है ।
वैष्णव भाषामें कहने जानेपर इसे इस तरह कहना होगा
कि “एहि बाह्य” । यानी अनसनव्रतका सबसे बड़ा
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तरुणके स्वप्न
लाभ अन्तरका विकाश और आनन्दलाभ है, मांग स्वी-
कार करा लेनेकी बात तो बाहिरी लौकिक बात है।
Suffering के सिवा मनुष्य कभी भी अपने आन्तरिक
आदर्शके साथ अभिन्नता महसूस नहीं कर सकता और
कसौटीपर चढ़े बिना मनुष्य कभी स्थिर निश्चित भावसे
नहीं कह सकता कि उसके भीतर कितनी अपार शक्ति
है। इसी अभिज्ञताके आधारपर मैं अब अपनेको और भी
अच्छी तरह पहचान सका हूं तथा अपने पर मेरा विश्वास
सौ गुना बढ़ गया है।
❉ ❉ ❉ ❉
Social Service के द्वारा हमें गृहशिल्प-प्रतिष्ठा-
की चेष्टा करना होगा। Commercial Museum,
Bengal Home Industries Association आदि
प्रतिष्ठान या दूकान देखनेसे हमारे मनमें नवीन
भाव आ सकते हैं। बंगाल गवर्नमेंट द्वारा प्रकाशित
शिल्प-विभागकी वात्सरिक रिपोर्ट (Administration
Report of the Department of Home Industries)
देखनेसे भी हमारा लाभ हो सकता है। सबसे आवश्यक
बात यह है कि जहां गृहशिल्प हों वहां जाकर अपनी
आंखोंसे देखने और जाननेसे ही लाभ हो सकता है।
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समाज-सेवा और गृह-शिल्प
कुटीर-शिल्पके लिये बहुत बड़ी रकम चाहिये, ऐसा मेरा
विश्वास नहीं है। सबसे पहले जरूरी यह है कि सभाका
एक सदस्य ऐसा होना चाहिये जो सिर्फ इसी विषयमें
दिलचस्पी रखे, इस विषयकी सब बातें जाने और पुस्त-
कादि पढ़े तथा जहां कुटीर-शिल्प चलनेकी जरा भी
सम्भावना हो वहां जाकर अपनी आंखोंसे सब कुछ
देखे सुने। जब काम चलानेका निश्चय हो जाय तब
जिसके जिम्मे काम चलानेका भार हो उसे पहलेसे उस
कामकी शिक्षाके लिये उपयुक्त स्थानपर भेजकर शिक्षा
दिलवाना चाहिये। पहलेसे ही Polytechnic Institute
में भेजनेका प्रयोजन नहीं है। Electroplating का काम
सिखानेकी जरूरत नहीं है। क्योंकि सिलाईका काम अपने
यहां सिखाया ही जाता है और Electroplating सिखाने
से कोई फायदा नहीं होगा। मुझे जहांतक याद है, मैं एक
बार वहां गया हूं। Polytechnic के सब कामोंमें वेतका
सामान बनाने और मिट्टीके खिलौने आदि बनानेका काम
गृह-शिल्पके ढङ्गपर चलाया जा सकता है। इसमें भी वेतके
कामके बारेमें मुझे सन्देह है कि स्त्रियोंसे यह काम कर-
वाया जा सकेगा या नहीं ? अब यदि मिट्टीके खिलौने आ-
दिका काम चलानेका विचार हो तो कोई भी एक आदमी
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तरुणके स्वप्न
वहां जाकर कुछ ही दिनोंमें सीखकर आ सकता है।
इसमें खर्च भी कुछ न बढ़ेगा और जब यह काम शुरू
किया जायगा, तब सिर्फ रंगोंमें कुछ खर्च करना पड़ेगा,
इसके सिवा और खर्च बहुत कम होगा। सौ बातकी
एक बात यह है कि एक आदमीको इसीके पीछे हाथ
धोकर पड़ जाना होगा, He must become mad
over it.
और एक बात बार बार मेरे मनमें आती है, सम्भव
है पहले भी इस विषयमें लिख चुका हूं, बटन तैयार करने
के सम्बन्धमें। ढाका जिलेमें अनेक गांवोंमें यह काम
होता है। गरीब गृहस्थ अपने फुरसतके समय यही काम
करते रहते हैं। एक आदमीको बहुत शीघ्र ही यह काम
सिखाया जा सकता है। अथवा एक ऐसे आदमीको
नियुक्त किया जा सकता है जो यह काम जानता हो और
सिखा सकता हो।
अखबारमें विज्ञापन देनेसे ऐसा आदमी मिल सकता
है। मेरा ख्याल है कि पत्थरपर घिसकर बटन तैयार किये
जा सकते हैं। छेद करने और गोल काटनेके लिये यंत्रकी
जरूरत पड़ेगी। कुछ यंत्र और एक बोरा सीप और घोंघा
से ही काम शुरू किया जा सकता है। जिनको सहायता-
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समाज-सेवा और गृह-शिल्प
की जरूरत है उन्हीसे यह काम शुरू करवाना चाहिये,
किन्तु काम चल निकलनेपर गरीब गृहस्थ अपनी आय
बढ़ानेके लिये यह काम खुद ही करने लगेंगे। समिति
सस्ते भावमे raw materials दे और तैयार माल बेचने-
का प्रबन्ध करे। यह काम शुरू करनेपर पहले इसमें काफी
समय लगाना होगा। इति—
३
माण्डला जेल
आपने पहले जो कागजात भेजे थे, वे सब मिल गये
थे। कल पुस्तकालयका सूचीपत्र आदि मिला। समिति-
का कार्य दिनों दिन बढ़ रहा है, उससे मैं कितना आन-
न्दित हूं, यह लिख नही सकता।
* * *
आप लोगोंने खर्चा बाद देकर इतने रुपये जमा कर
लिये यह जानकर सुखी हुआ। चरखा, सूता आदिके
विषयमे आपने जो कुछ लिखा है, उससे मैं सहमत हूं।
तब भी अभीसे कोशिश बन्द नही करना चाहिये। आपने
पहले एक पत्रमें लिखा था कि रूईकी खेतीकेलिये एक
महाशय अस्सी बीघा जमीन देनेको तैयार हैं, वे महाशय
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तरुणके स्वप्न
अभी भी तैयार हों तो रूईकी खेतीमें पहले पहले अधिक
खर्च नहीं पड़ेगा। दो एक मालियोंके वेतन और बीजोंके
दाम लायक रुपयोंका प्रबन्ध करनेसे साल भरमें ही हमें
उसका फल मिल जायगा। कृषि विभाग ( Agricul
tural Department ) से यह जान लेना होगा कि किस
जातिकी रूईके बीज बोने चाहिये। जिन गृहशिल्पोंका
श्रीगणेश कर चुके हैं,उनमें यदि नुकसान न हो,थोड़ा लाभ
भी हो तो चलाते रहियेगा। फिर अधिक लाभका काम
चल जानेपर यह काम बन्द किया जायगा। इस समय
जो शरणागत हैं उनसे कुछ न कुछ काम अवश्य कराना
चाहिये। भीख मांगना छोड़कर जब वे काम करने लगेंगे
तब उन्हें लाभ जनक व्यवसायमें लगा देनेसे बहुत उत्तम
फल मिलेगा। फिलहाल 'गृहशिल्पमें आर्थिक लाभ न भी
हो तो काम करनेकी तरफ रुचि और dignity of la-
bour की भावना जगाने और बढ़ानेसे समाजका बड़ा
लाभ होगा। कुटीर शिल्पके सम्बन्धमें यदि आप श्री
मदनमोहन बर्मनसे मिलें तो बड़ा अच्छा हो।
बड़ी, आचार, चटनी आदि तैयार हों तो ये चीजें
भी चल सकती हैं। स्त्रियां, विशेषकर विधवाएं यह काम
आसानीसे कर सकती हैं। किन्तु ये काम सिखानेवाला
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आदमी मिल सकेगा क्या ? बाजारमें बेचनेकेलिये इन
चीजोंका बहुत उत्तम होना जरूरी है । यदि अच्छी चीज
तैयार होनेकी संभावना हो तो इसका experiment
किया जा सकता है । Raw materials देकर आप
तैयारी माल ले सकते हैं, बिक्रीकी जिम्मेदारी आपकी
रहेगी । या वे खुद ही raw materials संग्रह कर माल
तैयार कर आपके पास आकर बेच जा सकती हैं। काम
शुरू करनेसे पहले दूकानदारसे बातचीत करना जरूरी है
कि वे हमारा माल लेंगे या नहीं। Raw materials अच्छा
होनेसे माल अच्छा बनेगा,पर इसमें चोरीकी भी सम्भावना
है। जो ये काम करेंगी वे गरीब होंगी,फिर वे आम, नींबू,
तेल, मिर्च आदि पानेपर उन्हें अपने उपयोगमें लानेके
लिये नहीं ललचायंगी, यह कौन कह सकता है ? फिर
यदि वे खुद raw materials लेंगी तो तेल वगैरह सस्ता
ले सकती हैं और फलस्वरूप चीज बढ़िया तैयार न
होगी। इस सम्बन्धमें आप दोनों तरफकी बातें सोच
समझ कर ही कुछ निर्णय करें। इसके सिवा यह जानना
भी जरूरी है कि बाजारमें इन सब चीजोंके खरीद्दार
कैसे हैं? मेरा ख्याल है कि conscientious recipients
नहीं मिलनेपर इस काममें सफलता नहीं मिल सकती ।
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तरुणके स्वप्न
गरीब भले गृहस्थों द्वारा यह काम चल सकता है। माल
तैयार होकर आते ही उसका दाम या मजदूरी चुका देना
पड़ेगा और मालको न बिकनेतक भण्डारमें रखना होगा।
समितिको एक और काममें हाथ लगाना चाहिये।
कलकत्ते में प्रेसीडेन्सी और अलीपुर दो जेल हैं। जेलके
अस्पतालमें यदि कोई हिन्दू मर जाय और उसके सम्बन्धी
कलकत्तेमे न हों तो उसकी दाह क्रिया उचित रूपसे नहीं
होती,—डोम या मेहतरको पैसे देकर यह काम कराया
जाता है। इस कामकेलिये मुसलमानोंका Burial
Association है, जो मुसलमान कैदीके मरनेकी खबर पाते
ही उचित व्यवस्था करता है। मृत हिन्दू कैदियोंकेलिये
एक ऐसा organization चाहिये। सेवक समिति क्या
इस कार्यका भार ले सकती है ? यदि आपकी राय हो तो
बसन्त बाबूकी मार्फत जेल सुपरिण्टेण्डेण्टको पत्र लिखा
जा सकता है कि सेवक समिति इस कार्यका भार लेनेके
लिये तैयार है। आप यदि इस सम्बन्धमे कोई व्यवस्था न
कर सके तो मैं जेलसे आनेपर इस सम्बन्धमें विशेष
प्रयत्न करूंगा। आदमी न होनेपर मैंने खुद कई बार यह
काम किया है। ऐसे काममें स्वयंसेवक बननेकेलिये मैं
हमेशा तैयार हूं।
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समाज-सेवा और गृह-शिल्प
गृह-शिल्प चलाना चाहते हों तो एक काम आवश्यक
है। किसी युवकको कासिमबाजार polytechnic या
इसी तरहकी दूसरी संस्थामे काम सीखनेकेलिये भेजना
होगा। कासिमबाजार स्कूलमें मिट्टीके खिलौने और देव-
देवियोंकी मूर्तियां बहुत अच्छी तैयार होती हैं। सहायता
चाहनेवालोंको ऐसे काममें लगाया जा सके तो उनके
द्वारा तैयार माल बङ्गाल भरमें बिक सकता है। यहांपर
एक शिल्प और भी प्रचलित है, रङ्गीन कागजोंसे फूल,
पेड़, पत्तियां, गुलदस्ते, चीनी लालटेन आदि बनाना। ये
चीजें इतनी सुन्दर होती हैं कि देखनेपर एकाएक मनमें
यह बात नहीं उठती कि ये चीजें असली नहीं, बल्कि
कागजकी हैं। भले घरोंके छोटे बच्चे यह काम कर सकते
हैं, यह बिलकुल आसान है।
ढाका जिलेमे कुटीर शिल्पके ढङ्गपर बटन तैयार होते
हैं, वहां घर घरमें यह काम होता है, किसी आदमीको
वहां यह सब देखनेकेलिये भेजा जा सकता है।
स्वास्थ्य विषयक व्याख्यान और मेजिक लालटेनके
प्रदर्शनकी व्यवस्था भवानीपुरकी तरफ करना अच्छा
होगा। जहां गरीब रहते है वहां व्याख्यानकी सख्त जरू-
रत है, यदि सम्भव हो तो मेजिक लालटेन आदि खरीदने
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तरुणके स्वप्न
की व्यवस्था कीजिये। प्रदर्शनके लिये तस्वीरें किसीसे
बनवा लेना शायद अच्छा होगा। इति—
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(दक्षिण कलकत्ता सेवक समितिके अन्यतम कर्मी
श्रीमान् हरिचरण बागचीको लिखे हुए पत्रका अंश)
माण्डला जेल
३-७-२५
तुम्हारे तीन पत्र यथासमय मिले। उत्तर देनेका अव-
सर नहीं मिला, इसके सिवा शरीर भी ठीक नहीं है।
किसी तरहके काममें (लिखने पढ़नेमें भी) मन नहीं
लगता। पहले हफ्तेमें दो पत्र लिख पाता था, अब सिर्फ
एक लिख पाता हूं। फलस्वरूप, उत्तर देनेका अवसर न
मिलनेके कारण दो तीन महिनेकी चिट्ठियां जमा हो
जाती हैं।
Social Service विभागका प्रधान उद्देश्य होना
चाहिये,—गरीबकी सहायता कर उसके द्वारा काम
कराना। सिर्फ दान करना Organised Charity का
उद्देश्य नहीं हो सकता। प्रतिदान न देकर दान ग्रहण
करना आत्म सम्मानकेलिये हानिकर है, यही भाव गरीब
सहायता चाहनेवालोंके मनमें जगाना चाहिये। तब भी
५०