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तरुण के स्वप्न (नेताजी सुभाष चन्द्र बोस - युवा भारत के नाम क्रान्तिकारी वैचारिक घोषणा-पत्र)

Tarun Ke Swapna by Netaji Subhash Chandra Bose

नेताजी सुभाष चन्द्र बोस द्वारा

DevanagariHindipublished174 पृष्ठ

तरुणके स्वप्न

साथ साथ नवीन भारत गढ़ना होगा। साहित्य, विज्ञान,
संगीत, शिल्प-कला, शौर्य-वीर्य, क्रीड़ा-कुशलता, दया-
दाक्षिण्य इन सबकी सहायतासे नवीन भारत बनाना
होगा। राष्ट्रीय जीवनकी सर्वतोमुखी उन्नति करनेकी
शक्ति और राष्ट्रीय शिक्षाका समन्वय करनेकी प्रवृत्ति
सिर्फ बंगालीमें ही है।
मेरा विश्वास है कि बंगालीका अपना एक वैशिष्ट्य
है। शिक्षा, दीक्षा, स्वभाव, चरित्र सबमें इस वैचित्र्यकी
झलक रहती है। बंगालके प्राकृतिक दृश्यमें भी वैशिष्ट्य
लक्षित होता है। यहांकी मिट्टी, जल, आकाश, शस्यश्या-
मला धरती, ताल वृक्ष आवेष्टित पुष्करिणीमें क्या अपना
वैशिष्ट्य नहीं है ? और प्रकृतिकी यह विशेषता क्या बंगाली-
के चरित्रको वैशिष्ट्य नहीं देती ? ऐसी नरम मिट्टीमें
जन्म लेनेके कारण ही बंगालीके प्राण इतने सरस हैं।
प्राकृतिक सौंदर्यके बीच लालित पालित होनेके कारण ही
वह सुन्दरका उपासक है। सुजला, सुफला, शस्यश्यामला,
जन्मभूमिका अन्न जल सेवन करके ही बंगाली काव्य और
साहित्यमें ऐसा अपूर्व सर्जन कौशल दिखला सका है।
पिछले दो तीन वर्षोंमें जागरणकी जो बाढ़ आयी थी
उसमें इस समय उतार दिखलाई पड़ता है, किन्तु चढ़ावमे

१०

देशकी पुकार

अब अधिक विलम्ब नहीं है। बंगालके राष्ट्रीय स्रोतमें
फिर भीषण चढ़ाव आनेवाला है। उस बाढ़के स्पर्शसे
बंगालके प्राण फिर जग पड़ेंगे। बंगाली सर्वस्वको टेकपर
रखकर फिर स्वाधीनताकेलिये पागल हो उठेंगे। देश
फिर स्वाधीनताके लिये बद्धपरिकर होगा।
इस नव जागरणका स्वरूप क्या होगा यह कौन कह
सकता है ? इस नव यज्ञका पुरोहित कौन होगा, यह भी
कौन बतला सकता है ? जो भाग्यवान पुरुष इस यज्ञका
पौरोहित्य ग्रहण करेंगे वे इस समय कहां रमे हुए हैं, यह
भी कौन कह सकता है। इस आन्दोलनका नेतृत्व महात्मा-
जी ग्रहण करेंगे या अन्य कोई मनीषी उनके आसन पर
बैठेंगे भी यह हम नहीं जानते।
किन्तु इन सब प्रश्नोंके उत्तरके लिये बैठे रहनेसे नहीं
होगा। उस नवजागरणके लिये अभीसे हम सबको प्रस्तुत
होना होगा। ध्यान, धारणा, चिन्ता, कर्म, त्याग, योग
इन सबमें रत रहते हुए हमें साधनाके लिये प्रस्तुत होना
होगा।
बंग-जननी फिर तरुण संन्यासियोंका दल चाहती है।
भाइयो ! कौन कौन आत्म-बलिकेलिये प्रस्तुत है।
आओ ! मासे अभी तुम्हें सिर्फ दुःख, कष्ट, अनाहार,
११

सौ बातकी एक बात
मनुष्य जीवनमें बचपन, यौवन, प्रौढ़त्व और वार्द्धक्य
है, उसी प्रकार राष्ट्रीय जीवनमें भी यही सिलसिला
दिखलाई पड़ता है। मनुष्य मरता है और मृत्युसे निकल
कर नवजीवन लाभ करता है। किन्तु व्यक्ति और राष्ट्रमें
फर्क सिर्फ इतना है कि सब राष्ट्र मृत्युके बाद फिर जी
नहीं उठते। जिस राष्ट्रके अस्तित्वकी कोई सार्थकता नहीं
रह जाती, जिस राष्ट्रके प्राणोंमें कोई तत्व नहीं रह
जाता, वह जाति दुनियासे लोप हो जाती है। अथवा
कीड़ों पतंगोंकी तरह किसी प्रकार जीती रहती है किन्तु
१४

सौ बातकी एक बात

इतिहासमें नामोल्लेखके सिवा उसका निदर्शन कहीं नहीं
रहता।
भारतकी कई बार मृत्यु हुई और उसने फिर फिर
नवजीवन लाभ किया, इसका कारण यही है कि भारतके
अस्तित्वकी सार्थकता थी और आज भी है। भारतका
एक सन्देश है जो उसे विश्व परिषदको सुनाना है,
भारतकी शिक्षा ( culture ) में ऐसा कुछ है जो विश्व-
मानवके लिये अत्यन्त प्रयोजनीय है, जिसका ग्रहण किये
बिना विश्व-परिषदका उत्कर्ष नहीं हो सकता। सिर्फ
यही नहीं ; विज्ञान, कला, साहित्य, व्यवसाय, वाणिज्य,
सभी क्षेत्रोंमें हमारा राष्ट्र दुनियाको कुछ देगा, कुछ
सिखायगा। इसीलिये भारतीय मनीषियोंने अन्धकारपूर्ण
युगोंमें भी स्थिर भावसे भारतका ज्ञान दीप जलाये
रखा था। हम उन्हींकी सन्तान हैं,हम क्या अपना राष्ट्रीय
कर्त्तव्य पूरा किये बिना ही मर जायगे ?
मनुष्य देह पञ्च भूतोंमें मिल जानेपर भी आत्मा कभी
नहीं मरती, इसी प्रकार राष्ट्रकी मृत्यु होनेपर भी उसकी
शिक्षा-दीक्षा-सभ्यता रूपी आत्मा अमर है। राष्ट्रकी
सर्जन शक्ति जब लुप्त हो जाय तब समझना होगा कि राष्ट्र
मौतके घाट आ लगा है। आहार, निद्रा, सन्तानोत्पादन

१५

तरुणके स्वप्न
ही उस समय उसका दैनिक कर्तव्य हो जाता है और
पुराने जमानेसे चलती आयी परिपाटीकी लकीरको
पीटना ही उसकी नीति हो जाती है। इस अवस्थामें पड़-
कर भी कोई-कोई राष्ट्र फिर जी उठता है—यदि उसके
अस्तित्वकी सार्थकता रहती है। जिस समय अन्धकार-
मय युग आकर राष्ट्रको घेर लेता है, उस समय भी वह
किसी न किसी तरह अपनी शिक्षा दीक्षा और सभ्यताको
बचाये रखता है और अन्य राष्ट्रमें मिलकर अस्तित्व हीन
नहीं हो जाता। इसके बाद भाग्य या भगवानके इंगित
पर फिर नव जागरण होता है, अन्धकार धीरे-धीरे नष्ट
हो जाता है, सुप्त जाति फिर आंखें मलकर उठकर खड़ी
होती है, फिर उसकी सर्जन शक्ति जाग्रत हो जाती है।
सहस्त्र दलकमलकी तरह राष्ट्रके प्राण फिर खिल जाते हैं
तथा वह नवीन रूपसे, नवीन भावोंसे, नवीन नवीन दिशा-
ओंमें आत्मप्रकाश लाभ करता है। इस प्रकारके अनेक जन्म
और मृत्युके बीचमेसे भारतीय जाति होती चली आयी
है। क्योंकि भारतीय जातिका एक mission है, भार-
तीय सभ्यताका एक उद्देश्य है, जो आज भी सफल नहीं
हुआ है।
भारतके इस mission में जिसका विश्वास है,
१६

सौ बातकी एक बात
वही भारतीय जीवित है। भारतके पैंतिस करोड़ प्राणी
जीवितकी तरह जीवित हैं यह सच नहीं है। जो युवक
यह समझते हैं, अनुभव करते हैं वे ही जीवित हैं।
जन्मभूमिसे दूर जेलकी कोठरीमें महिने पर महिने काट
रहा था,उस समय बार-बार मेरे मनमें यह प्रश्न उठता था;—
“किसके लिये, किस उद्दीपनासे उद्दीप्त हो कारावासके
बोझसे न दबकर हम और भी शक्तिमान हो रहे हैं?”
इस प्रश्नका आत्मा जो उत्तर देती, वह यह था;—“भारत-
का एक mission है, एक गौरवमय भविष्य है, उस
भावी भारतके उत्तराधिकारी हमी हैं। नवीन भारतके
इतिहासकी रचना हमीने की है और करेंगे। इसी
विश्वासके बलपर हम सब दुःख, यातना सहते हैं, वास्त-
विकताको आदर्शके आघातसे चूर-चूर कर डालते हैं।
इसी अटल अचल विश्वासके कारण ही भारतीय युवकों-
की शक्ति मृत्युञ्जयी है।”
यही “श्रद्धा,” ऐसा आत्म विश्वास जिसमें है, वही
व्यक्ति सर्जक है, वही व्यक्ति देश-सेवाका प्रकृत अधि-
कारी है संसारमें जितने भी महान कार्य हैं वे सब मनु-
ष्य हृदयके आत्मविश्वास और सर्जन शक्तिपर अवल-
म्बित हैं।
२ १७

तरुणके स्वप्न
जिसका अपने राष्ट्रमें विश्वास नहीं है, अपनी आत्मा
में विश्वास नहीं है, वह किस वस्तुकी सृष्टि कर सकता
है ? भारतीयमें अनेक दोष हैं, किन्तु एक गुण है जिससे
उसके सब दोष दब जाते हैं, जिसके कारण वह दुनियामें
आदमी गिना जाता है। उसमें आत्म विश्वास है, भाव
प्रवणता है, कल्पनाशक्ति है, इसीलिये वह वर्तमान जीवनकी
सभी वास्तविक त्रुटियों, अक्षमताओं, असफलताओंको अग्राह्य
कर महान् आदर्शकी कल्पना कर सकता है। उसी आदर्श
के ध्यानमे मगन हो सकता है, जो असाध्य है उसके
'साधनकी चेष्टा कर सकता है। इसी कल्पना शक्ति और
आत्मविश्वासके कारण भारतने कितनेही साधकोंको जन्म
दिया है और देगा। इसी कारण दुख, कष्ट और
अत्याचारसे उसका मेरुदण्ड कभी नहीं टूटेगा। जो
जाति आदर्शवादी है वह अपने आदर्शके लिये यंत्रणा और
क्लेशको सानन्द सह सकती है।
बहुतसे समझते हैं suffering में सिर्फ कष्ट ही है,
पर यह सच नहीं है। Suffering मे जिस प्रकार कष्ट है
उसी प्रकार अपार आनन्द भी है। किन्तु जो इस आनन्द-
को महसूस नहीं कर सकता, उसके लिये कष्ट ही कष्ट
है। वह दुःख और कष्टसे अभिभूत हो जाता है। किन्तु
१८

सौ बातकी एक बात
जिसने दुःख और कष्टमें भो एक अनिर्वचनीय आनन्दका
आस्वाद पाया है, उसके लिये suffering गौरवकी चीज
है। वह कष्ट और यातनासे मुमूर्षु न होकर और भी
शक्तिमान् और महान हो उठता है। अब सवाल होता है,
'यह आनन्दका स्रोत कहां है ?' मैं समझतो हूं इस आनन्द
की उत्पत्ति आदर्शके प्रति अनुरागसे होती है। जो व्यक्ति
किसी महान् आदर्शको निस्वार्थ भावसे चाहनेके कारण
दुःख और यन्त्रणा पाता है, उसके लिये वह दुःख और
यन्त्रणा अर्थहीन—बेमतलब नही होती। उसके लिये तो
दुःख आनन्दके रूपमें रूपान्तरित होता है। वही आनन्द
अमृतकी तरह उसकी रग रगमें शक्तिका संचार करता
है। वही जीवनका वास्तविक अर्थ समझ सकता है,
आदर्शके चरणोंमें सर्वस्व समर्पण कर सकता है, वही
जीवन-रसका आस्वाद पा सकता है।
पिछले अप्रैलमें इनसिन जेलमें एक रसियन उपन्यास
पढ़ते पढ़ते ठीक इसी भावकी उपलब्धि हुई। उपन्यास
लेखकने रसियन जातिको लक्षकर अपने नायक द्वारा
कहा है;—There is still much suffering in store
for the people, much of their blood will yet
flow, squeezed out by the hands of greed
(

तरुणके स्वप्न
but for all that,all my suffering, all my blood
is a small price for that which is already sti-
rring in my breast, in my mind, in the marrow
of my bones ! I am already rich as a star is
rich in golden rays. And I well bear all, will
suffer all because there is within me a joy
which no one, which nothing can ever stifle !
In this joy there is a world of strength ! (यानी;
भाग्यमें अभी भी अनेक कष्ट हैं, लोभी और अत्याचा-
रियोंके निष्पेषणसे अभी हमारा रक्त और भी बहेगा।
तब भी जो सत्य मेरे चित्तमें, हृदयमें, अस्थि-मज्जामे स्प-
न्दित है, उसे पानेके लिये यदि मुझे दुःख कष्ट भोगना
पड़े, मुझे अपना रक्त देना पड़े तो मैं समझूँगा कि बहुत कम
दाममें महान् सम्पदा मिल गयी। सुनहरी किरणोंसे
मण्डित तारेके समान अलभ्य सम्पदा मुझे मिली। इसी-
लिये मैं सम्पूर्ण कष्ट यन्त्रणा सहन करूंगा, सम्पूर्ण दुःख
कष्टको अपने हृदयमें खींच लूंगा, क्योंकि मैंने अपने
भीतर जो आनन्द पाया है उसे कोई भी पार्थिव पदार्थ
दबाकर नहीं रख सकता, यही आनन्द अनन्त शक्तिका
समुद्र है।)
२०

„सौ बातकी एक बात
नीलकण्ठ शिवको आदर्श मान जो व्यक्ति कह सकता
है कि मेरे हृदयमें आनन्दका झरना खुला है, इसीलिये मैं
संसारके सब दुःख कष्टोंको अपने हृदयमें खींचकर रख
सकता हूं, जो व्यक्ति कह सकता है कि मैं सम्पूर्ण यात-
नाओंको भोगनेको तैयार हूं क्योंकि इनसे मुझे सत्यका
आभास होता है, वही व्यक्ति साधनामें सिद्ध हुआ है।
हमें इसी साधनामें सिद्ध होना होगा। जो नवीन
भारतकी सृष्टि करना चाहते हैं, उन्हें सिर्फ देते रहना
पड़ेगा—जीवन भर देते रहना पड़ेगा, अपना सर्वस्व
लुटाकर कंगाल हो जाना होगा, बिना किसी प्रतिदानकी
इच्छा किये। अन्तमें जीवनदान देकर जीवनकी प्रतिष्ठा
करना होगा। जो ऐसे साधक होंगे उनकी सम्पदा होगी
उनका अपना आत्मविश्वास, आदर्शानुराग और आनन्द
बोध।
कुछ दिन हुए छात्र-जीवनके एक बन्धुसे मुलाकात
हुई, उसने मुझसे अनेक निराशा व्यंजक और अविश्वास-
पूर्ण प्रश्न किये। उसके प्रश्नका मर्म यही था कि हमारे
देशका कुछ न होगा। कई प्रश्नका उत्तर पाकर फिर
उसने पूछा, कौंसिलोंमें जाकर, सरकारी कार्यमें अड़ंगा
लगाकर, मंत्रियोंको भगाकर क्या होगा ? मैंने उत्तर
२१

तरुणके स्वप्न


दिया, यह सब न किया जाय तो क्या होगा ? फिर उसके
अविश्वास और अश्रद्धाके भावको लक्ष कर मैंने कहा,
“देखो ! तुम्हारी उम्र मुझसे कम है, आदर्शकी प्रेरणासे
तुमलोग असहयोग आन्दोलनमें आये हो । मेरा आदर्श-
वाद बड़ोंके साथ बढ़ता चला जा रहा है पर तुम्हारा
आदर्श दिन दिन क्षीण हो रहा है।” तब उसने स्वीकार
किया कि पिछले वर्षों'से नाना प्रकारके आघातोंके कारण
उसमे यह भावान्तर हुआ है।
यह अस्वीकार नहीं किया जा सकता कि पिछले
दो वर्षों'से अविश्वास और अश्रद्धाका भाव फैला हुआ
है। इस कारण हमारी कार्यकारी शक्ति लंगड़ी हो गयी
है, किन्तु अब इस जंजालसे अलग होनेका समय आगया
है। अपने भीतरके शत्रुसे बड़ा और शत्रु कौन होगा ?
इसलिये सबसे पहले इस गृहशत्रुको ही भगाना होगा।
तभी हम बाहरके शत्रुपर विजय प्राप्त कर सकेंगे। हमे
दुर्जय आत्मविश्वास प्राप्त करना होगा। हमे आदर्शमे
विश्वास, अपनी शक्तिमे विश्वास, भारतके गौरवमय
भविष्यमें विश्वास करना होगा। इसी विश्वासकी
प्रेरणासे उद्बुद्ध होकर हमें विश्वविजयी बनना होगा।
बंगालकी वर्तमान अवस्था देखनेसे दो बाते आशा-
२२

सौ बातकी एक बात
प्रद मालूम होती हैं। (१) व्यायाम चर्चा और भूपर्यटन-
की स्पृहा (२) युवकोंकी जागृति। एक समय बंगाली-
कापुरुष समझा जाता था, वह अपवाद अब नहीं रहा।
जो बंगालीके परम शत्रु हैं वे भी अब उसे बदनाम नहीं
कर सकते। यह बदनामी किसने की थी और कैसे
मिटी यह सब जानते हैं। किन्तु शारीरिक दुर्बलता अभी
भी हैं। इस कमीको दूर करना होगा। हर्ष है कि बंगाली
इस कमीको दूर करनेके लिये बद्धपरिकर हुए हैं और
प्रान्तभरमें समितियां खुल रही हैं। कमजोरीका यह
लांछन यदि हमेशाके लिये मिटाना है तो बंगालीको
राष्ट्रीय दृष्टिसे सबल और वीर्यवान् होना होगा। कुछ
विश्वविजयी पहलवान पैदा करनेसे ही कुछ न होगा।
क्योकि इस तरहके पहलवानोंकी शक्ति और शौर्यसे
राष्ट्रीय गौरवकी वृद्धि होनेपर भी साधारण बंगालीकी
शक्ति नहीं बढ़ेगी। जाति बलवान है या नहीं यह देखने-
के समय उसके दो चार पहलवानोको देखनेसे काम नहीं
चलता, यह भो देखना होता है कि सर्वसाधारणका क्या
हाल है।
बंगालीमे आजकल भ्रमणका शौक बढ़ रहा है यह
सबसे अधिक आनन्दकी बात है। बंगाली तैराकीमे,
२३

तरुणके स्वप्न
साइकिलपर विश्वभ्रमण करनेमें उत्साह दिखलाने लगा
है। अपरिचित देश देखने, अपरिचितोंसे मिलनेकी जो
व्याकुलता है इसीसे जातिगठन और साम्राज्य सृष्टि
होती है। जो जाति अपनी परिमित सीमाके बाहर नहीं
जाना चाहती उसका पतन अवश्यम्भावी है। दूसरी तरफ
जो जाति बाधा विघ्न पारकर, प्राणोंकी माया त्यागकर,
देश विदेशोंका भ्रमण करती है उसकी दिन दिन शारी-
रिक, मानसिक उन्नति तो होती ही है साथ ही साथ
उसका साम्राज्य भी बढ़ता जाता है। कवि डी० एल०
रायने जिस समय गाया था—"आमार एई देशेते जोन्म,
जेन एई देशेते मोरि", उस समय उन्होंने हमारे सामने
भ्रान्त आदर्श उपस्थित किया था। अब यह कहनेका
समय आया है कि;—
“आमि जाबोना जाबोना, जाबोना घोरे
बाहिर कोरेछे पागल मोरे।”
घरका कोना छोड़कर अब हमें विश्वमें विचरण
करना होगा। अपने देशको भी प्रत्यक्ष रूपसे अच्छी तरह
देखना होगा फिर देशकी सीमा छोड़कर विदेशोंमें भ्रमण
करना होगा तथा अपरिचित देशका आविष्कार करना
होगा। जो जाति इस प्रकारके कार्य कर सकती है उस-
२४

सौ बातकी एक बात
का शारीरिक बल, साहस, चरित्र बल, ज्ञान और अभि-
ज्ञता बढ़ती है साथ ही साथ व्यवसाय तथा साम्राज्य
बढ़ता है। ब्रिटिश जाति जो इतनी उन्नत है और इतना
बड़ा विशाल साम्राज्य गठित कर सकी है, भ्रमणेच्छा
उसका एक प्रधान कारण है। साम्राज्य प्रतिष्ठाकी
इच्छा न रखते हुए भी विदेश भ्रमणसे हमारा हृदय
विशाल होगा, आत्म विश्वास बढ़ेगा, बुद्धिका विकाश
होगा इसमे किसे सन्देह है ? भू पर्यटनका यदि पूरा
फायदा उठाना हो तो अमेरिकन धनियोंकी तरह विश्व
भ्रमण न कर कुछ कष्ट सहकर पैदल, घोड़े या साइकिल-
पर विश्व भ्रमण करना चाहिये ।
एक अन्य आशाप्रद लक्षण यह है कि सब जिलोंके
युवकोमें चांचल्य पाया जाता है। यह चांचल्य ही जीवन
शक्तिका परिचायक है। तरुणोंमें जीवन आ गया है, वे
अब अपना कर्तव्य समझने लगे हैं, इसी कारण असंख्य
स्थानोंपर युवक समितियोंके अधिवेशन होते दिखलाई
पड़ते हैं। बीच-बीचमें सुना जाता है कि वे काम करनेके
लिये तैयार हैं किन्तु अभी उन्हें ठीक रास्तेका पता
नहीं चलता। नेता न पाने पर और पथ न पहचानने
पर भी युवक जाग पड़े हैं, अपना कर्तव्य और
३८

तरुणके स्वप्न
दायित्व समझनेकी चेष्टा कर रहे हैं, यह मामूली
बात नहीं है। मेरा यही कहना है कि यदि तलाश
करनेपर भी नेता न मिलेगा तो क्या तुम चुप बैठे
रह सकोगे ? तुम लोग ही नेता बनाकर काममे लग
जाओ। नेता आकाशसे नहीं गिरता, काम करते करते
ही नेता हो उठता है। अब “कःपंथा” कहकर बैठे रहनेसे
काम नहीं चलेगा। अपनी विवेक-बुद्धिके प्रकाशमें तुम
अपना रास्ता खुद ही खोज लो। तुम समस्याको जितना
जटिल समझते हो उतनी नहीं है। हम लोगोंका आदर्श
यही है कि हम एक सर्वाङ्ग सुन्दर जाति बनाना चाहते हैं
जो जाति ज्ञान और कर्ममें, शिक्षा और धर्ममें संसारकी
सर्वश्रेष्ठ स्वाधीन जातिके बराबर खड़ी हो सके। इसी-
लिये राष्ट्रीय जीवनके प्रत्येक क्षेत्रमें जागरण लाना
होगा। किसी भी तरफसे लापरवाही नहीं दिखलाई जा
सकती। जिसकी जैसी शक्ति हो, जिसकी जिस तरफ
अभिरुचि हो उसे अपने लिये वैसा ही कार्य-क्षेत्र चुन
लेना चाहिये। जिसकी जैसी जन्म-जात या भगवत् दत्त
क्षमता है, उसे उसीको विकसित करना चाहिये और
उसे ही देश माताके चरणोंपर अर्पण करना चाहिये।
पिछले बीस वर्षोंमें बंगालमें अनेक साधक, कवि,
२६

सौ बातकी एक बात
साहित्यिक, वैज्ञानिक नेता हुए। उनमें अनेक अपना
कर्तव्य पूरा कर देशवासियोंको रुला स्वर्ग सिधार गये।
उनके रिक्त स्थान अभीतक खाली पड़े हैं, यह कुछ कम
लज्जाकी बात नहीं है। बंगालीको यदि बचे रहना है तो
उसे ऐसे मनुष्योंका सर्जन करना होगा जो इन रिक्त
स्थानोंका अधिकांश पूरा कर सकें। जो जाति वस्तुतः
जीवित है, उस जातिमे ऐसे महत्वपूर्ण स्थान इस प्रकार
शून्य नहीं पड़े रहते। महापुरुषोंके स्वर्गवासके बाद अन्य
मनीषि उन स्थानोंको भर देते हैं। जो जाति एकमन होकर
जीवनके विभिन्न क्षेत्रोकी साधनामे लगी रहती है उस
जातिमें किसी भी तरफ उपयुक्त मनुष्यका अभाव नहीं
होता। बंगालकी साधना अभी पूर्ण और सर्वांग सुन्दर
नहीं हुई, इसीलिये किसी महापुरुषके जानेके बाद उनके
रिक्त स्थानकी पूर्ति नहीं होती। सर्वांग सम्पन्न जातिका
आदर्श सामने रखकर जातीय साधनामें प्रवृत्त न होनेसे
वह साधना कभी भी विजय युक्त और साफल्य मण्डित
नहीं होती। राष्ट्रीय जीवनके अनेक क्षेत्र हैं, सभी क्षेत्रोंमें
जातिको पूर्ण करना होगा। जब जाग्रतिकी बाढ़ आयगी,
तब वह जीवनके सभी क्षेत्रोंपर अधिकार कर लेगी।
तरुण बङ्गालको स्वावलम्बी होना होगा, बाहिरी शक्ति-
३७

तरुणके स्वप्न
पर निर्भर न होकर अपना भरोसा करना होगा। नवीन
जातिकी सृष्टिका उत्तरदायित्व आज युवकोंपर है।
इतना बड़ा दायित्वपूर्ण कार्य सफल बनानेके लिये प्राणों-
की बाजी लगाकर साधनामें प्रवृत्त होना होगा। बड़ी
प्रसन्नताकी बात है कि चारों तरफ इस साधनाका विपुल
आयोजन चल रहा है। इस विराट् यज्ञमें हमी निश्चेष्ट
रहेगे, यह हो ही नहीं सकता। इसीलिये कहता हूं, हे
तरुण दल ! आओ, हम भी यह वाणी उच्चरित करें।
“मंत्रम् वा साधयेयम् शरीरम् वा पातयेयम् ।”
आश्विन १३३१ ( वंगला )
२८

पत्रावली

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मेरा देश
—**—
(माण्डलेकी जेलसे दक्षिण कलकत्ता सेवक समितिके
सहकारी सम्पादक श्री० अनाथ बंधु दत्तको लिखा हुआ
पत्र )
माण्डला जेल
दिसम्बर १६२६
सविनय निवेदन,
आपका ६ नवम्बरका पत्र यथा समय मिला । उत्तर
देनेमें बिलम्ब हुआ, कुछ खयाल न कीजियेगा । अपनी
इच्छाके अनुसार ही चलता तो पत्र नहीं लिखता, क्योंकि
६१