तरुण के स्वप्न (नेताजी सुभाष चन्द्र बोस - युवा भारत के नाम क्रान्तिकारी वैचारिक घोषणा-पत्र)
Tarun Ke Swapna by Netaji Subhash Chandra Bose
नेताजी सुभाष चन्द्र बोस द्वारा
तरुणके स्वप्न
लिये उन्हें धन्यवाद है। मेरे साथ अभीतक जो व्यवहार
किया जाता था, उससे यह व्यवहार बिलकुल पृथक है।
२७ अप्रैलको भैयाने मुझे सरकारका उत्तर दिख-
लाया। इस उत्तरसे मूल विषय दोनों पक्षोंके सामने और
भी स्पष्टतासे आगया। ११ अप्रैलको सरकारी शर्तोंका
मैंने जो उत्तर दिया था, अब मैं फिर सोचकर उसे ही
ठीक समझता हूं।
मेरा जो सिद्धान्त है, वह सहज विचारका फल है।
अच्छी तरह सोच-विचार करनेसे यह सिद्धांत और भी
दृढ़ होता है। जीवनको सहज भावसे विचार कर मैं
इस सिद्धान्तपर पहुंचा हूं। अच्छीतरह सोचनेपर यह
सिद्धान्त और अधिक दृढ़ हुआ है। जेलमें मेरे जितने ही
अधिक दिन बीतते हैं, मेरे मनमें यह धारणा दृढ़ होती
है कि, जीवन-संग्रामके मूलमे मतवादका संघर्ष, सत्य या
मिथ्याका संघर्ष रहता है। कोई-कोई इसे सत्यके विभिन्न
पहलुओंका संघर्ष भी कहते हैं। मनुष्यकी धारणा ही
मनुष्यको चलाती है, ये सब धारणाएं निष्क्रिय नहीं हैं,
क्रियाशील और संघर्षात्मक हैं। हेगलका Absolute
Idea, हेपमेन और शोपेनहार Blind Will और हेनरी
“Iean Vital” के मतसे समस्त धारणाएँ ही क्रियाशील
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जीवन-लक्ष
हैं। ये सब धारणाएं खुद ही अपना पथ बना लेती हैं।
हम तो मिट्टीके पुतले हैं, भगवानकी तेजराशिके कुछ अणु
ही हममें हैं। यही समझकर हमें आत्मोत्सर्ग करना
होगा।
सांसारिक और शारीरिक सुख दुखको अग्राह्य कर
जो इस भावसे आत्मनिवेदन कर सके उसके जीवनमें
सफलता अवश्यम्भावी है। एक दिन मेरे आदर्शकी
विजय होगी, इसका मुझे दृढ़ विश्वास है। इसलिये अपने
स्वास्थ्य और भविष्यके सम्बन्धमें मैं कुछ चिन्ता नहीं
करता।
सरकारी शर्तके जवाबमें मैंने जो कुछ लिखा है उसमें
मैंने अपना मत व्यक्त कर दिया है। किसी किसी सम-
लोचकका कहना है कि अच्छी शर्तें पानेकेलिये मैंने चाल
चली है। समालोचकोंकी इस प्रकारकी निर्दय समा-
लोचनासे मैं दुःखी हूं। मैंने दूकानदारी या दर मुलाई
नहीं की, कूटनीतिसे मुझे घृणा है। मैं एक आदर्श लेकर
खड़ा हूं। बस, यहीं सब शेष है! मैं जीवनको इतना
प्रिय नहीं समझता कि उसकी रक्षाकेलिये चालाकीका
आश्रय लूं। मूल्यके सम्बन्धमें मेरी धारणा बाजारकी
धारणासे पृथक है। शारीरिक या वैषयिक सुखकी
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तरुणके स्वप्न
कसौटीपर जीवनकी सफलता या व्यर्थताका निर्णय
किया जा सकता है, इसे मैं नहीं मानता। हमारा संग्राम
शारीरिक बलका नहीं है। वैषयिक लाभ प्राप्तिकेलिये भी
हमारी लड़ाई नहीं है। सेण्टपालने कहा है,—
“हम रक्त मांसके विरुद्ध संग्राम नहीं करते, हमारा
संग्राम उनके विरुद्ध है; जो पृथ्वीके अन्धकारके नायक
हैं, हमारा संग्राम उच्च-पद-प्राप्त अन्यायके विरुद्ध है।”
स्वाधीनता और सत्य ही हमारा आदर्श है, रातके बाद
जैसे दिन आता है, हमारी कोशिश भी वैसे ही सफल
होगी, होगी ! हमारा शरीर नष्ट हो सकता है किन्तु
अटल विश्वास और दुर्जय संकल्पके बलसे हमारी जय
अवश्य होगी। हमारे आदर्शकी सफलता देखनेका सौ-
भाग्य किसे प्राप्त होगा, यह तो भगवान ही जानते हैं।
किन्तु अपने सम्बन्धमे मैं कह सकता हूं, मैं अपना काम
किये जाऊंगा, फिर चाहे जो भी हो।
और एक बात कहकर वक्तव्य समाप्त करता हूं। मैं
स्विटजरलैण्ड जाऊंगा या नहीं यह मैं अभी स्थिर नहीं
कर सकता। शरीरकी वर्त्तमान समयमें जो अवस्था है
उसे देखते हुए स्विटजरलैण्ड जानेका परिश्रम मैं कर
नहीं सकूंगा। फिलहाल भारतके किसी स्वास्थ्यप्रद
१२०
जीवन-लक्ष
〰〰〰〰〰
स्थानमें रहकर मुझे स्वास्थ्यलाभ करना होगा। कितने
दिन बाद स्विटजरलैण्ड जाने लायक शक्ति प्राप्त कर
सकूँगा कुछ ठीक नहीं। जो भी हो डॉक्टरोंका मत है कि
जबतक मैं जरा अच्छा नहीं हो जाता, तबतक स्विटजरलैंड
जानेका सवाल ही नहीं उठ सकता। और भारतके किसी
स्वास्थ्यप्रद स्थानमें रहकर ही यदि मैं स्वास्थ्यलाभ कर
सकूँ या इच्छापूर्वक निर्वासन स्वीकार न करूँ तो
स्विटजरलैण्ड जानेकी जरूरत ही क्या है?
साथ ही साथ स्विटजरलैण्ड जानेका निश्चय करने-
के पहले मुझे अपनी आर्थिक स्थितिके सम्बन्धमें सोचना
होगा। परिवारवालोंके साथ, विशेषकर माता पिताके
साथ इस सम्बन्धमें बातचीत करना होगा। कुछ ही
महिनोंमें बंगालकी राजनैतिक अवस्थामें परिवर्तन हो
सकता है तथा बंगाल सरकारकी धारणा भी परिवर्तित
हो सकती है। किसी तरहका निश्चय करनेके पहले इन
सब बातोंपर विचार कर लेना होगा। जो भी हो, मैं
किसी तरहकी बन्दिश नहीं चाहता, यदि सरकार किसी
तरहकी रोक थाम करना चाहे तो आप लोग बातचीत
बन्द कर दें। ईश्वर महान् है—कमसे कम अपनी सृष्टिसे
महान् अवश्य है। हम जब उसमें विश्वास करते हैं, तब
हमें दुःखी नहीं होना चाहिये।
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तरुणके स्वप्न
मेरे प्रति जो अनुरक्त हैं और सहानुभूति पूर्ण हैं, मैं
उनकेलिये पीड़ाका कारण हूं, इसके लिये मुझे बड़ा दुःख
है। किन्तु यही सोचकर मुझे सांत्वना मिली है कि जो
समान रूपसे मातृभूमिके प्रति आस्था सम्पन्न हैं, वे समान
रूपसे दुःख सुख भोगनेके अधिकारी हैं। आशा है आप
लोग सानन्द होंगे। इति
१२२
निवेदन
फैलसल लाज
शिलांग
१०-८-२७
श्रद्धापूर्वक निवेदन,
जब मैं उत्तर कलकत्ताके निर्वाचन क्षेत्रसे बंगीय
व्यवस्थापिका सभाकेलिये उम्मीदवार खड़ा हुआ
था, तब मुझे मान्डला जेलसे २४ सितम्बरको आपके पास
आवेदन भेजना चाहिये था मगर वह आपके पास नहीं
पहुंचा। अधिकारियोंने चाहे जिस कारणसे हो वह पत्र
आपके पासतक नहीं पहुंचने दिया। उन्होंने साधारण
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तरुणके स्वप्न
आवेदन पत्रको क्यों रोक लिया, यह पूछने पर भी उसका
कुछ उत्तर नहीं मिला। इसके बाद अपने निर्वाचनके विषयमें
व्यक्ति विशेषको मैंने जो पत्र दिये थे, उनमेंसे भी अधिक
अपने लक्ष स्थान तक नहीं पहुंचे। जब मैं जेलमें था तब
एक उच्च कर्मचारीसे सुना था कि अधिकारियोंकी इच्छा
है कि मैं जेलमें रहकर निर्वाचनका काम न चला सकूं।
किन्तु मुझे विश्वास है कि मेरा लिखित निवेदन
आपके पास न पहुंचनेपर भी मेरे आकुल हृदयका मूक
निवेदन आपके पास पहुंच गया होगा। इसीलिये मेरा
निवेदन न सुननेपर भी और अति प्रबल योग्य प्रतिद्वन्दी
होनेपर भी मेरे जैसे अयोग्य आदमीको वोट देकर आपने
निर्वाचित किया है। माण्डला जेलमें रातको दस बजे जब मैंने
कई राजबन्दियोंके साथ निर्वाचनकी सफलताका समा-
चार सुना, उस समय प्रकट रूपसे आपके प्रति कृतज्ञता
नहीं जना सका। किन्तु मेरा विश्वास है कि नदी, नद,
जंगल पारकर मेरे हृदयकी वाणी आपके पासतक पहुंच
गयी होगी।
आपके प्रति विशेष कृतज्ञता प्रकट करनेका कारण यह
है कि जिस अवस्थामें पड़कर मित्रको उसके मित्र भी
पहचान नहीं पाते, ऐसे समयमें, जब कि मैं अधिकारियों
१२४
निवेदन
द्वारा लांछित था, उस समय भी आपने अधिकारियोंकी
पर्वा न कर मुझे सम्मानके उच्च आसनपर बैठाया । मेरे
प्रति ऐसा स्नेह और विश्वास प्रकट कर आपने सिर्फ
मुझे ही धन्य नहीं किया बल्कि सभी राजबन्दियोंको
गौरवमण्डित किया है ।
जेलमें रहते हुए आपके प्रति अपनी आन्तरिक कृत-
ज्ञता प्रकट करनेका अवसर नहीं मिला तथा वर्तमान सम-
स्याके सम्बन्धमें आपका मतामत जाननेका सुयोग भी
नहीं मिला । सोचा था, जब मुक्ति मिलेगी तभी ये दो
कार्य सम्पादन कर सकूंगा । पहले छूटनेकी बिलकुल
आशा नहीं थी, किन्तु जिस दिन अप्रत्याशित भावसे छूटा
उस दिन मैं बीमार और शैयाग्रस्त था । आपके प्रतिनिधि-
की हैसियतसे मेरा जो कर्तव्य है उसे जेलसे छूटनेपर
भी मैं आजतक नहीं कर सका । इच्छा न रहनेपर भी
आपके साथ मुलाकात न करके मुझे यहां आना पड़ा ।
कर्मक्षेत्रमें आनेमें अभी विलम्ब है, पर पहलेसे अब जरा ठीक
हूं, इसलिये निश्चय किया कि कमसेकम पत्र द्वारा अपना
निवेदन प्रकट कर दूं ।
मेरे छुटकारेके बाद आपने मुझे जिस प्रकार अभि-
नन्दित किया है एवं मेरी आरोग्य-कामनाकेलिये जो
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तरुणके स्वप्न
कुछ किया है, उसे मैं भूल नहीं सकता। आपने मुझे सेवा
करनेका अधिकार देकर धन्य किया है, मेरी एकान्त
कामना है कि मैं अपने इस अधिकारका समुचित उपयोग
कर सकूं। आपने मेरे प्रति स्नेह और विश्वास प्रकट कर
मुझे सम्मानित किया है।
पूर्ण रूपसे स्वस्थ होनेमें विलम्ब होनेपर भी आपके
आशीर्वाद और शुभ इच्छाके प्रभावसे मैं आरोग्य लाभ
कर रहा हूं। किन्तु शारीरिक आरोग्य प्राप्त करनेपर भी
मानसिक शान्ति पाना असंभव है। बङ्गालकी इतनी सुयोग्य
सन्तानें जबतक बिना अपराध बन्दी हैं, बिना विचारे
जेलोंमें पीसी जा रही हैं, बङ्गालके असंख्य नर-नारी जबतक
अपने प्रिय जनोंके दुःख कष्ट और लांछनाका ख्याल कर
असह्य हार्दिक वेदनासे दिन रात छटपटा रहे हैं, बङ्गालके
असंख्य घर पिता, पुत्र, पति, भाईके बिना श्मसान तुल्य
हो रहें हैं, तबतक कौन बङ्गाली खा-पीकर सुखसे
सो सकता हैं ? बंगालके गवर्नरने मुझे सूचित किया है
कि इस बार कौंसिलमें उपस्थित न होनेपर भी मेरा नाम
सदस्योंकी सूचीसे न काटा जायगा। मेरे मनमें हो रहा
है कि कौंसिलकी आगामी बैठकमैं जब राजबन्दियोंका
प्रश्न उठे तब वहां उपस्थित होकर अपना कर्तव्य पालन
१२६
निवेदन
करूं। चिकित्सकोंकी अनुमति मिलेगी या नहीं, नहीं
जानता, यदि अनुमति मिल गयी तो कलकत्ता आकर
अपना कर्तव्य पालन करूंगा। कौंसिलकी बैठकमे उपस्थित
हो सकूंगा इस आशासे प्रस्ताव और कुछ प्रश्न तैयार कर
लिये हैं। किन्तु यदि अनुमति न मिली तो जितना जल्द
हो सके आरोग्यलाभ कर जन सेवाकेलिये कर्मक्षेत्रमें आ
जाऊं, इसकी पूर्ण चेष्टा करूंगा। इस समय चारों तरफ
नव जागरणके लक्षण दिखलाई पड़ रहे हैं। राष्ट्रीय जीवन
क्षेत्रमे जो बाढ़ आनेवाली उसका आभास मेरे मनको मिल
गया है, अब यही चाहता हूं कि ठीक समयपर उसके लिये
शरीर और मनसे प्रस्तुत रहूं।
किमधिकम्। मेरी श्रद्धाञ्जलि ग्रहण कीजियेगा।
इति—
जेलसे निवेदन
[ निम्नोक्त निवेदन पत्र मान्डलेसे भेजा गया था,
जिसे अधिकारियोंने अटका रखा था ]
यथा योग्य सम्मान पूर्वक निवेदन कि;—
बंगीय व्यवस्थापिका सभाकी सदस्यताके लिये मैं
उत्तर कलकत्ता निर्वाचन क्षेत्रसे कांग्रेस द्वारा मनोनीत
होकर खड़ा हुआ हूं। जनमत मेरे अनुकूल है यह जानकर,
स्वदेश सेवी और शुभकांक्षियोंके उपदेशसे मैं देशकी सेवा-
का अधिकतर सुयोग पानेकी आशासे सदस्यताकेलिये
खड़ा हुआ हूं। किन्तु इसके पहले मुझे, जिस प्रकार आपके
सामने उपस्थित होना चाहिये था, उस तरह नहीं हो
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जेलसे निवेदन
सकता। किन्तु आशा करता हूं कि मेरी वर्तमान अवस्था
जानकर आप क्षमा कर देंगे।
जेलमें रहते हुए निर्वाचनकेलिये खड़ा होना चाहिये
या नहीं और निर्वाचनकेलिये खड़े होनेमें कुछ सार्थकता
है या नहीं, इसपर मैने अच्छी तरह विचार किया है।
राष्ट्रीय महासभाने भी इस विषयपर विचार किया है।
देशबन्धु चित्तरंजनदास होते तो वे भी मुझे खड़े होनेके
लिये कहते, ऐसा मेरा विश्वास है। श्री अनिलचरण रॉय
और सत्येन्द्रचन्द्र मित्र महोदयने पुनर्निर्वाचनके समय
जो कुछ कहा था, उससे मेरे कथनका अनुमोदन होता है।
सब बातोंपर अच्छी तरह विचार कर और समझकर कि
निर्वाचनकेलिये उम्मीदवार होनेमें सार्थकता है, मैने
आपके सामने पत्र द्वारा उपस्थित होनेका साहस किया
है। इस निश्चयपर पहुंचनेमे जनमतका अनुकूल होना एक
बहुत बड़ा कारण है, यह कहना ही होगा। अगर सुयोग
होता और सम्भव होता तो मैं स्वयं आपकी सेवामें उप-
स्थित होकर अपने राजनैतिक मतामत व्यक्त करता, तथा
आपका उपदेश और परामर्श जानना चाहता। किन्तु
सरकार द्वारा मैं इस अधिकारसे वञ्चित कर दिया गया
हूं। लगभग दो वर्ष हुए मैं बिना विचार और बिना न्याय
६ १२६
तृतीय खण्ड: तरुण भारत का भविष्य एवं अमर वैचारिक उपसंहार
तरुणके स्वप्न
जेलमें बन्द हूं। इन दो वर्षोंमें बहुत अनुरोध करनेपर भी
सरकारने मुझे किसी भी अदालतके सामने उपस्थित नहीं
किया। यहांतक कि अधिकारियोंके पास मेरे विरुद्ध क्या
अभियोग हैं और क्या गवाहियां हैं यह भी मुझे किसी
भी तरहसे नहीं बतलाया गया। अपने अपराधके सम्बन्ध-
में यदि मुझे कुछ कहना पड़े तो मैं यही कह सकता हूं कि
पराधीन जातिकी चिर आचरित पद्धतिको छोड़कर
कांग्रेसके एक साधारण सेवककी हैसियतसे स्वदेश
सेवामें मन प्राण अर्पण करनेका मैंने प्रयास किया है। जिसके
फलस्वरूप मैं जेलमे ही बन्द नहीं किया, बल्कि देशसे दूर
भेज दिया गया। अपनी मातृभूमिकी मिट्टी और जलसे
मुझे वञ्चित कर दिया गया। तब भी मेरे लिये
सन्तोषकी यही बात मेरा जेल जाना व्यर्थ नहीं हुआ।
आज मेरी सम्पूर्ण व्यथा रञ्जित होकर, गुलाबकी तरह
खिल गयी है। यहां आनेके पहले मैं बंगालको, भारतको
प्रेम करता था। किन्तु देशसे दूर आनेपर प्यारे बंगालको,
प्रिय भारतको हजार गुना अधिक चाहने लगा हूं।
बंगालका आकाश, बंगालकी वायु, स्वप्नप्रस्तुत, स्मृति
आच्छादित बंगालका मोहन रूप आज मेरे सामने कितना
मनोहर, कितना पवित्र, कितना सत्य है, यह मैं कैसे
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जेलसे निवेदन
बतलाऊं ? जिस आन्तरिक आत्मोत्सर्गका आदर्श लेकर
मैं कर्म भूमिमें अवतीर्ण हुआ था, निर्वासनकी पारसमणि
मुझे प्रतिदिन उसके लिये योग्यतर बना रही है। जो चिरं-
तन सत्य बंगालकी भागीरथी और बंगालके शस्यश्यामल
क्षेत्रोंमें मूर्त हुआ है, बंगालके जिस धर्मको बंकिमसे
लेकर देशबन्धुतकने साधना द्वारा उपलब्ध किया था,
तथा जिसका साहित्य द्वारा प्रकटीकरण किया था,
बंगालका जो भुवनमोहन रूप कितने शिल्पियों, कला-
कारों, कवियों और साहित्यिकोंकी तूलिका और लेखनी
का विषय है, आज उसका आभास पाकर मैं कृतकृत्य हूं।
देशकी इसी अनुभूतिके पुण्य प्रतापसे जेल-जीवनके ये
दो वर्ष सार्थक हुए हैं। मैं समझ सका हूं कि माकेलिये
इस प्रकार दुख, कष्टका वरण करना कितने गौरव और
सौभाग्यकी बात है।
इस प्रकारके आवेदनमें अपना परिचय देनेकी विधि
बहुत दिनसे चली आ रही है किन्तु मेरे पास ऐसा कुछ
नहीं है जिसका परिचय देकर मैं आपकी सहायता पाने-
का दावा कर सकूं। पांच वर्ष पहले जब उत्ताल महो-
दधिकी तरंगोंकी तरह भारतके प्राण भारतमाताके चरणों
मे उत्सर्ग होनेके लिये उतावले हो रहे थे, उस समय विश्व-
विद्यालयसे निकलकर मैं कर्मक्षेत्रमें आया था।
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तरुणके स्वप्न
अपने जीवनको पूर्ण रूपसे विकसित कर माताके
चरणोंमें अंजलि चढ़ा दूंगा और इसी आन्तरिक उत्सर्ग
द्वारा जीवनकी पूर्णता प्राप्त करूंगा, इसी आदर्शसे मैं
अनुप्राणित हुआ था। समाज सेवा और राजनीतिका
काम मैंने सामयिक रूपसे ग्रहण नहीं किया था। इसी-
लिये पराधीन देशके जीवनमें जो विपत और परीक्षा, दुःख
और वेदना अवश्यम्भावी है; उसके लिये शरीर और
मनसे प्रस्तुत होनेकेलिये हमेशा चेष्टा करता था। इस को-
शिशमें मैं सफल हुआ या नहीं, अथवा किस हदतक सफल
हुआ उसका विचार मेरे देशवासी करेंगे। मेरे इस क्षुद्र
किन्तु घटनापूर्ण जीवनके ऊपरसे जो जो तूफान गुजरे हैं,
उन्हीं विघ्न और विपत्तियों द्वारा मैंने अपने आपको सम-
झने और पहचाननेकी चेष्टा की है। यौवनके प्रभातमें मैंने
जिस कंटकमय पथका अवलम्बन किया, निश्चय ही उसी
पथपर अन्ततक चल सकूंगा, अज्ञात भविष्यको सामने
रखकर जिस व्रतको मैने ग्रहण किया था, उसका उद्यापन
किये बिना विरत नहीं होऊँगा। अपने प्राणों और ज्ञान-
को निचोड़कर मैंने यही सत्य प्राप्त किया है कि पराधीन
जातिका सब कुछ, शिक्षा-दीक्षा, कर्म, सब व्यर्थ है, यदि
वह स्वाधीनता प्राप्तिमे सहायक और उसके अनुकूल नहीं
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जेलसे निवेदन
होता। इसीलिये आज मेरे हृदयके अन्तरतम प्रदेशसे निक-
लकर यह वाणी हमेशा मेरे कानोंमें प्रतिध्वनित होती
रहती है, “स्वाधीनता हीनताय के बांचिते चाय रे, के
बांचिते चाय।” मैं हाथ जोड़कर आपसे यह प्रार्थना
करता हूं, आप लोग मुझे आशीर्वाद दें कि स्वराज्य
लाभकी पुण्य प्रचेष्टा ही मेरा जप, तप, स्वाध्याय, साधन
और मुक्तिका सोपान हो तथा जीवनके अन्तिम क्षणतक
मैं भारतीय मुक्ति संग्राममें लगा रहूं।
आत्मोत्सर्गके पवित्र और मूर्तिमान विग्रह प्रातः
स्मरणीय देशबन्धुके चरणोंमें मैंने देश सेवाकी दीक्षा, शिक्षा
ली है। उनके रहते हुए, सब विपत्तियोंको तुच्छ मानकर,
उनकी पताका लेकर चलता रहा हूं। उनकेन रहनेपर उनके
लोकोत्तर चरित्रसे शिक्षा लेकर उसे हृदयमें धारण कर
तथा उनके महिमामय जीवनके आदर्शको सामने रखकर
एकनिष्ट भावसे जीवन पथपर अग्रसर होऊंंगा, यहो
संकल्प मनमें कर रखा है। सर्व मंगलमय भगवान मेरी
रक्षा करें।
इस समय जो निर्वाचन समस्या है, उसका हल आपके
ही ऊपर है। क्योंकि इस निर्वाचन संग्राममें एक प्रवासी
राजवन्दी पहाड़, नदी, समुद्र पार रहकर, इतनी दूरसे
१३३
तरुणके स्वप्न
क्या कर सकता है ? देशका अकिंचन सेवक होनेपर भी
आपकेलिये तो मैं बिलकुल अपरिचित नहीं हूं। सबके
साथ प्रत्यक्ष परिचय न होनेपर भी क्या आपके ऊपर मेरा
कोई दावा नहीं है ? मैं प्रार्थना करता हूं, मेरी जयका
अर्थ है, राष्ट्रीय महासभाकी जय, जनमतकी जय, आप-
की जय है। इस व्ययसाध्य निर्वाचन संग्राममें आप ही
मेरी आशा, भरोसा, सहारा सब कुछ हैं। आपकी सेवा
कर कृतार्थ बनूं यही मेरी आकांक्षा है। मुझे विश्वास है
कि आप मुझे सेवाका सुयोग और अधिकार देकर धन्य
करेंगे और मैं क्या कहूं ? आप ही देशके मूर्तस्वरूप हैं।
वतनसे दूर, समुद्र पार निर्वासित बन्दीका श्रद्धापूर्वक
अभिवादन स्वीकार कीजिये। इति
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देशबन्धु
( श्री शरच्चन्द्र चट्टोपाध्यायको लिखा गया पत्र )
मान्डला जेल
१२-८-२५
श्रद्धास्पदेषु ।
मासिक वसुमतीमें आप द्वारा लिखित "स्मृति कथा"
तीन बार पढ़ी, बहुत अच्छी लगी । मनुष्य चरित्र देख-
नेकी अन्तर्दृष्टि आपको प्राप्त है, देशबन्धुके साथ घनि-
ष्ट सम्पर्क और आत्मीयता होनेके कारण छोटी छोटी
घटनाओंकी जानकारीमेंसे उनका विश्लेषण कर रस और
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तरुणके स्वप्न
सत्यका आविष्कार करनेकी क्षमता आपमें ही है। साध-
रण उपकरणके द्वारा भी आप इतनी सुन्दर चीज लिख
सके हैं !
जो उनके अन्तरङ्ग थे, उनके हृदयमें एक गोपन कथा
रह गयी। उन गोपन कथाओंमें कुछका उल्लेखकर
आपने सिर्फ सत्यकी ही प्रतिष्ठा नहीं की है, बल्कि आपने
हमारे मनका भार भी हलका कर दिया। सचमुच, “परा-
धीन देशकेलिये सबसे बड़ा अभिशाप यही है कि विदे-
शियोंकी अपेक्षा अपने देशवासियोंके साथ ही अधिक
लड़ाई करनी पड़ती है।” इस उक्तिमें जो निष्ठुर सत्य
है, उसे राष्ट्र सेवियोंने अच्छी तरह अनुभव किया है
और अब भी कर रहे हैं।
आपके लेखमें मुझे यह बात सबसे अच्छी लगी कि
“अत्यन्त प्रिय, बिलकुल अपने आत्मीयकेलिये हृदयमें
जैसी आग लग जाती है, यह वैसी ही आग है। आज
हम लोग जो उनके आस पास थे, उनकी ऐसी हालत
ही रही है कि हमारे पास अपना मार्मिक दुख प्रकट करने
लायक भाषा भी नहीं है और दूसरेके सामने यह दुखड़ा
रोना अच्छा भी नहीं लगता”। सचमुच हृदयकी गूढ़ बात
क्या दूसरेसे आसानीसे कही जा सकती है? हां, वे
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उपहास करें तो उसे सहा जा सकता है। किन्तु यदि
वे दुखका मर्म न समझें तो कितना भीषण कष्ट होता है,
तब मनमें यही होता है, “अरसिकेषु रस निवेदनम् शिर-
सि मा लिख।” हमारे हृदयकी बात अन्तरंग मित्रके सिवां
कौन समझ सकता है ?
आपने और एक बात लिखी है, जो मुझे बहुत अच्छी
लगी कि “हम देशबन्धुका काम करते थे।” मैं ऐसे आद-
मियोंकों जानता हूं जो देशबन्धुके मतमें विश्वास नहीं
करते थे किन्तु उनके हृदयमें जो मोहिनी शक्ति थी, उससे
मोहित होकर उनकेलिये काम किये बिना नहीं रहते थे।
और वे भी मतामतसे रहित होकर सबको प्रेम करते थे। वे
कभी-भी समाजके वर्तमान विधि निषेध या परिपाटीसे
मनुष्यके चरित्रको नहीं देखते थे। मनुष्यकी अच्छाई, बुराई
जानकर भी उसे प्यार करना चाहिये, यह उनका विश्वा-
स था।
अनेक सोचते होंगे कि हम लोग अन्धेकी तरह
उनका अनुसरण करते थे, किन्तु उनके प्रधान शिष्योंके
साथ उनका सबसे अधिक झगड़ा होता था। अपने सम्ब-
न्धमें मैं कह सकता हूं, असंख्य विषयोंमें मेरा उनके साथ
झगड़ा हुआ है। किन्तु मैं जानता था कि चाहे जितना
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