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तरुण के स्वप्न (नेताजी सुभाष चन्द्र बोस - युवा भारत के नाम क्रान्तिकारी वैचारिक घोषणा-पत्र)

Tarun Ke Swapna by Netaji Subhash Chandra Bose

नेताजी सुभाष चन्द्र बोस द्वारा

DevanagariHindipublished174 पृष्ठ

तरुणके स्वप्न

शरीर अभी उतना अच्छा नहीं है, मगर उसके लिये
चिन्ता भी नहीं है। अमृत प्रभृति कैसे हैं? आप लोगोंका
कुशल समाचार पढ़कर अत्यन्त सुख होगा। पर कामका
समय बरबाद कर पत्र लिखनेकी जरूरत नहीं है। मेरा
प्रीति पूर्ण नमस्कार स्वीकार कीजियेगा। इति
६८

हिन्दू-मुस्लिम पैक्ट
माण्डला जेल
मैने आपका इस्तहार और श्रीयुक्त सेन गुप्त लिखित
उसका प्रतिवाद पढ़ा है। अब तक श्रीयुक्त सेन गुप्तके
प्रतिवादका कोई उत्तर नहीं देखा। पैक्टके फिर ग्रहण
करनेकी बात उठ ही नहीं सकती। सिराजगंजमें जब पैक्ट
स्वीकृत हुआ था, तब इसके खिलाफ एक दल था जो
मूक था। देशबन्धु यह जानते थे और उन्होंने एक बार
नहीं, बार बार साफ कह दिया था कि उनका उद्देश्य
देशके दो भिन्न सम्प्रदायोंके मिलनेकी एक स्पष्ट भित्ति
स्थापित करना है।
६६

तरुणके स्वप्न
इसलिये यदि इस पैक्टका कुछ अंश या कुछ धाराएं
उद्देश्य साधनके विपरीत या ग्रहणके अयोग्य समझी
जायं तो उनके परिवर्तनमें भी देशबन्धुको आपत्ति नहीं
थी। जहां तक मुझे याद है शायद कोकनाडा कांग्रेसमें
उन्होंने यह भी कहा था कि बंगाल पैक्ट इसी समय
कांग्रेस ग्रहण कर ले, यह वे नहीं चाहते। उनकी इच्छा
थी कि यह पैक्ट अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी द्वारा
आलोचित हो।
किन्तु उस समय कांग्रेस उसकी घोर विरोधी थी,
तथा कांग्रेसके सभ्य उस पैक्टकी आलोचना करनेके लिये
तैयार नहीं थे। कोकनाडा कांग्रेसके बाद सिराजगंजमें
यह पैक्ट गृहित हुआ था। मैं वहां ही उपस्थित नहीं था
किन्तु पैक्ट ग्रहण करनेके पहले भी देशबन्धुने सबको
आश्वासन दिया था कि वे किसी तरहके तर्क या सम-
झौतेकी बात नहीं सुनेंगे सो बात नहीं, बल्कि वे पैक्टके
किसी अंश या धाराके परिवर्तनकी जरूरत होनेपर वैसा
करनेकेलिये तैयार थे।
इसलिये मेरा खयाल है कि देशबन्धुका अनुरक्त भक्त
रहते हुए भी पैक्टके किसी किसी अंशके परिवर्तनकी
मांगकी जा सकती है। साथ ही साथ मैं यह भी समझ
१००

हिन्दू-मुस्लिम पैक्ट
रहा हूं कि सिर्फ देशबन्धुका ही या उनके न रहने-
पर बङ्गालकी समस्याका समाधान करनेके लिये अखिल
भारतीय कांग्रेस कमेटीका ही मुंह ताकनेसे काम नहीं
चलेगा। हिन्दू मुस्लिम समस्या अखिल भारतीय रूपसे
हल होनेपर भी, बङ्गालकी हिन्दू मुस्लिम समस्यांका
समाधान बङ्गालीको ही करना होगा।
समाचार पत्रोंके पढ़नेसे जहांतक सम्भव हो सकता
है, घटनाओंके सिलसिलेको समझ कर मैंने कुछ दृढ़
धारणाएं की हैं। उनमेंसे एक यह है कि वर्तमान विपद्-
संकुल समयमें हमें जिस चीजका सबसे अधिक अभाव
है, वह है सब विषयोंमें स्पष्ट दूरदर्शिता। इति—
१०१

जेल-मुक्तिके प्रस्तावका उत्तर
इनसिन सेन्ट्रल जेल
४ अप्रैल १६२७
बड़े भइया !
मिस्टर मोवार्लीके प्रस्तावके सम्बन्धमें मेरी क्या राय
है, यह जाननेकेलिये निश्चय ही आप लोग उत्कण्ठित
हो रहे होंगे और मेरा खयाल है इस सम्बन्धमें अपना मता-
मत प्रकट करनेका समय आ गया है। मेरी रायसे आप
लोगोंकी राय मिलेगी या नहीं, नहीं जानता। तब भी
मेरे मतकी चाहे जो भी कीमत क्यों न हो; नीचेकी
पंक्तियोंमें उसे प्रकट कर रहा हूं।
१०२

An exact line-by-line transcription of the Hindi text:

जेल-मुक्तिके प्रस्तावका उत्तर
मैंने अत्यन्त संयत होकर मिस्टर मोवार्लीके प्रस्ताव-
को पढ़ा। उनके प्रत्येक शब्द और प्रत्येक बातपर बार-
बार विचार किया और उससे मैं इस नतीजापर पहुंचा हूं
कि यह तो मानना ही पड़ेगा कि उन्होंने अत्यन्त साव-
धानीके साथ अपने वक्तव्यके शब्द चुने हैं और खूब सोच
समझकर उन्हें प्रकट किया है। उनके प्रस्तावके सब पह-
लुओंको अच्छी तरह सोचनेके बाद आज मैं अपना मत
प्रकट कर रहा हूं। इस समय मैं आपको जो कुछ भी
लिख रहा हूं उसे अनेक बार सोचकर निश्चय किया है।
तब भी मुझसे यदि कोई भूल हो गयी हो तो जाननेपर
उसपर फिर विचार करनेकेलिये प्रस्तुत हूं।
पहले ही कह देता हूं कि मिस्टर मोवार्लीकी स्पष्ट-
वादिताकी मैं प्रशंसा करता हूं और सोचता हूं उनकी ही
तरह यदि मैं भी सब बातोंको स्पष्ट रूपसे व्यक्त न करूंगा
तो बड़ा अन्याय होगा, तथा मेरा कर्तव्य भी अधूरा रह
जायगा। स्पष्टवादितामें मेरा हमेशा ही विश्वास रहा है
और मैं समझता हूं साफ-साफ कहनेसे दोनों पक्षोंको
अन्तमें लाभ ही होता है।
मिस्टर मोवार्लीकी कई बातोंके लिये मैं उन्हें धन्यवाद
दिये बिना नहीं रह सकता,खासकर जहांपर उन्होंने कहा है
१०३

कि वे मेरे अतीत कार्य-कलाप और भविष्यकी गतिविधि-
के लिये किसी तरहकी स्वीकारोक्ति नहीं चाहते। उन्होंने
कहा है कि मैं यदि प्रतिज्ञा करके कहूं तो वे मुझे छोड़
देंगे। अन्तमें उन्होंने कहा है कि पहले उन्होंने यह प्रस्ताव
मेरे सामने इसलिये नहीं रखा, कि ऐसा होनेसे मनमें यह
बात मेरे मनमें आ सकती थी कि प्रस्ताव स्वीकृत
करनेकेलिये मुझे बाध्य किया जा रहा है। इन अंशोको
पढ़कर समझा हूं कि वे मुझे आत्म-सम्मान विशिष्ट
सज्जन पुरुष समझते हैं और निम्नलिखित कारणोंके
कारण उनके प्रस्तावमें मेरे प्रति जो सम्मानजनक अंश
है उसकी उपलब्धि मैंने की है। अन्तमें बङ्गीय कानून
सभाके सदस्यकी हैसियतसे माननीय सभ्यके इस
तरहके व्यवहारकी प्रशंसा किये बिना भी मुझसे
नहीं रहा जाता। क्योंकि मेरा ख्याल है कि कौंसिल
के सभ्योंके प्रति आस्था स्थापनेकर किसी प्रस्तावका
सर्वप्रथम उनके सामने उपस्थित करनेका निदर्शन यह सर्व-
प्रथम ही है।
मेरा ख्याल है कि मिस्टर मोवार्लोको प्रस्तावके
सम्बन्धमें अपनी तरफसे कुछ नहीं कहना है।
सबसे पहले एक

जेल-मुक्तिके प्रस्तावका उत्तर
'धारणा है उसे दूर करना चाहता हूँ । भय्या ( डा० सुनी-
लचन्द्र वसु) की रिपोर्टके साथ मेरे मतामतका कुछ सम्पर्क
नहीं है। क्योंकि रिपोर्ट लिखनेके पहले या बाद, वे क्या
लिखेंगे या मेरे लिये क्या सिफारिश करेंगे इस सम्बन्धमें
उन्होंने मेरे साथ कोई बात या परामर्श नहीं किया । मुझे
यदि वे पहले बतलाते तो मैं अवश्य ही स्विटजरलैण्ड भेज-
नेके प्रस्तावके अनुमोदनका विरोध करता ।
इस तरहका प्रस्ताव भेजनेके बाद जब उन्होंने मुझसे
इस प्रस्तावके बारेमें कहा था, तभी मैंने सन्देह किया था
कि इसका फल अच्छा न होगा, आखिर मेरा सन्देह सत्य
सिद्ध हुआ। भय्या डाक्टर की हैसियतसे मेरे
स्वास्थ्यकी परीक्षा करने आये थे और डाक्टरकी हैसि-
यतसे ही उन्होंने अपना मत प्रकट किया था, मेरा ख्याल
है कि ऐसा कर उन्होंने समदर्शी चिकित्सक और अभिज्ञ
वैज्ञानिकके व्यवहारकाही परिचय दिया, किन्तु उनके इस
मतकी राजनैतिक व्याख्या कैसी हो सकती है तथा सर-
कार ही इसे राजनैतिक चाल चलनेकेलिये किस तरह
व्यवहार करेगी, इसका विचार करनेकी उन्हे कोई जरू-
रत नही थी। इसलिये मैं भी उनके इस कार्यकी निन्दा
नहीं कर सकता। उनके कई रोगी स्विस आरोग्य आश्र-
१०५

तरुणके स्वप्न

ममें जाकर रोग मुक्त हुए हैं, यह देखकर उन्होंने मेरे लिये
भी वही सिफारिश की जो अन्यान्य यक्ष्मा रोगियोंके
लिये की थी। जो धनवान रोगी स्विटजर लैण्डके रहनेका
और दवा-पानीका खर्च सहन कर सकते हैं उनके लिये
यह सुझाव सर्व श्रेष्ठ है। किन्तु यह स्पष्ट है कि इस
तरहके किसी प्रस्तावसे मैं अपनेको किसी तरहसे बाध्य
नहीं समझ सकता।
सरकारने भाई साहबके रोग विवरणको स्वीकार
नहीं किया किन्तु स्वास्थ्य प्राप्तिके लिये उनके
प्रस्तावको स्वीकार कर लिया, क्योंकि मिस्टर मोबार्ली-
ने कहा है कि; “सुभाषचन्द्र बोस अधिक पीड़ित नहीं
हुए और काम करनेसे बिलकुल ही लाचार नहीं हुए यह
सभी जानते हैं।” मैं यह जानना चाहता हूं कि सरकार
मुझे कब “अत्यधिक पीड़ित” और “काम करनेसे बिल-
कुल लाचार” समझेगी ? जिस दिन सब चिकित्सक
कहेंगे कि मैं रोगसे छुटकारा नहीं पा सकता और कुछ
महिनोंमें ही मेरी मृत्यु हो जा सकती है, तब क्या ?
इसके सिवा वे यदि भैयाका दिया हुआ रोग विव-
रण स्वीकार नहीं करते तो फिर जिससे उसका बाहरी
अनुमोदन होता है उसे ग्रहण करनेको इतने व्यस्त क्यों

१०६

जेल-मुक्तिके प्रस्तावका उत्तर

हैं ? उन्होंने तो यह नहीं कहा कि मुझे घर नहीं जाने
दिया जाय या विदेश जाते समय मैं अपने आत्मीय
स्वजनोंको न देख सकूं। उन्होंने यह भी नहीं कहा
कि मैं जिस जहाजसे जाऊं'गा, वह किसी भारतीय बन्दर
पर लङ्गर न डाल सकेगा। उन्होंने यह भी नहीं कहा कि
स्वास्थ्य ठीक हो जानेपर भी जितने दिन तक आर्डिनेंस
रहेगा मैं घर नहीं लौटूंगा। इन सब बातोंको देखनेसे मैं
यही समझता हूं कि सरकारका उद्देश्य मेरे बिगड़े हुए
स्वास्थ्यको सुधारनेको व्यवस्था करना नहीं है।
मिस्टर मोबार्लीने वस्तुतः दो बातें कही हैं, (१) या
तो मैं जेलमें बन्दी रहूं (२) या किसी विदेशमें जाकर स्वा-
स्थ्य सुधारूं और अनिश्चित समय तक वहीं रहूं।
किन्तु क्या सचमुच इन दोके बीचका कोई रास्ता
बाकी नहीं बचा है ? मेरे मनमें होता है, नहीं है। सरकार-
की इच्छा है कि आर्डिनेंसकी अवधि तक यानी १६३०
तक, बन्दी रहूं। किन्तु १६३० में जब इसकी अवधि
समाप्त होगी, तब इसपर फिरसे विचार नहीं किया जाय-
गा, यह कौन कह सकता है ? पिछले अक्टुबरमें सी०
आई० डी० 'पुलिसके सर्वेसर्वा मिस्टर लोमेनके साथ मेरी
जो बातचीत हुई थी, वह बिलकुल आशाजनक नहीं है।

१०२

तरुणके स्वप्न


और १६२६ में इस आर्डिनेंसको बाकायदा कानून बनाने-
का आन्दोलन हुआ तो मुझे आश्चर्य न होगा। ऐसा
होनेपर मुझे स्थायी रूपसे विदेशमें रहना पड़ेगा। और
इस तरहके निर्वासनकेलिये मुझे अपने आपको ही उत्तर-
दायी मानना होगा। यदि इस सम्बन्धमें सचमुच सर-
कारको कोई इच्छा होती कि मैं कब विदेशसे लौटकर
आ सकूँगा तो उसका उल्लेख अवश्य होता।
फिर विदेशमें मैं किस हद तक स्वाधीन रहूँगा, इसका
भी स्पष्ट उल्लेख नहीं है, स्विटजरलैंडके कोने-कोनेमें जो
सी० आई० डी० घूमते हैं भारत सरकार क्या उनसे मेरी
रक्षा कर सकेगी ? यह अस्वीकार नहीं किया जा सकता
कि राजनैतिक सन्देहमें अभियुक्त होने पर म जबतक अपना
मत बदलकर सरकारी गोयन्दा नहीं हो जाता, तब तक
सरकार मुझे सन्देहकी दृष्टिसे ही देखेगी। और यह
निश्चय है कि ये सी० आई० डी० पद पदपर मेरा पीछा
करके, मेरे जीवनको दुःसह कर देंगे।
स्विट्जरलैण्डमें सिर्फ ब्रिटिश गोयन्दा ही नहीं,
बल्कि ब्रिटिश सरकार द्वारा नियुक्त स्विस, इटालियन,
फ्रेंच, जर्मन और भारतीय सी० आई० डी० भी हैं, तथा
कोई उत्साही सी० आई० डी० मुझे सरकारकी

१०८

जेल-मुक्तिके प्रस्तावका उत्तर
नजरोंमें दोषोंकी खान सिद्ध करनेकेलिये, किसी मिथ्या
घटनाका वर्णन नहीं भेजेगा, इसका ही क्या प्रमाण है ?
मैंने पिछले साल मिस्टर लोमेनसे कहा था, कि सी० आई०
डी० वाले चाहें तो चाहे जिसके विरुद्ध प्रमाण बनाकर
उसे चाहे जिस आर्डिनेंसके अनुसार बन्दी बना सकते
हैं। युरोपमें ऐसा करना और भी सहज है। युरोपमें
जिन्हें सन्देहकी नजरसे देखा जाता है उन्हें स्वदेश लौटनेके-
लिये कितनी असुविधाएं उठानी पड़ती है, यह सब जानते
हैं। विलायती पार्लामेन्ट और मन्त्री सभाके कुछ सदस्य
प्रयत्न न करते तो लाला लाजपतराय जैसे नेता भी भारत
वापिस नहीं आ सकते। सरकारकी सन्देह दृष्टि जब
एक बार मेरे ऊपर पड़ गयी है, तो मेरे भविष्यका क्या
होगा, इसका सहज ही अनुमान किया जा सकता है।
मैं जानता हूं, कि पुलिसके गोयन्दा इस विषयमें विशेष
तत्पर रहते हैं मैं युरोपमें चाहे जितने शान्त भाव और
सावधानीके साथ क्यों न रहूं, वे मेरे खिलाफ़ भारत
सरकारके पास झूठी रिपोर्ट भेजेंगे ही। मेरे चुप रहनेपर
और कुछ न करनेपर भी वे मुझे भयंकर षड्यन्त्रका
कर्ता धर्ता बतलावेंगे, तथा वे क्या रिपोर्ट दे रहे हैं, यह
मुझे मालूम भी न होगा। फल-स्वरूप उस रिपोर्टके-
१०६

तरुणके स्वप्न
सम्बन्धमें सच बात बतलाने या मेरे कुछ बोलनेकी जगह
नहीं रहेगी। इस प्रकार सम्भवतः १६२६ के पहलेही वे
मुझे बड़ा भारी बोलसेविक नेता प्रकट कर देंगे, जिसके
कारण भारत लौटनेका मेरा रास्ता हमेशाकेलिये
लिये बन्द हो जायगा, क्योंकि युरोपवाले सिर्फ बोल-
सेविकसे ही डरते हैं। इसलिये मैं अपनी इच्छासे अपनी
जन्मभूमिसे निर्वासित होना नहीं चाहता। सरकार भी
यदि मेरे दृष्टि कोणसे इसपर विचार करे तो मेरी अवस्था
समझ सकती है।
यदि बोलसेविक एजेन्ट होनेकी मेरी इच्छा होती तो
सरकारके कहते ही, सबसे पहले मिलनेवाले जहाजसे मैं
युरोपकेलिये रवाना हो जाता। तथा स्वास्थ्य ठीक
होनेपर बोलसेविक दलमें मिलकर समस्त संसारमें एक
विराट् विद्रोहकी सृष्टिकेलिये पेरिससे लेनिन ग्राड तक
दौड़ धूप करता। किन्तु मेरी ऐसी इच्छा या आकांक्षा
नहीं है। जब मैंने सुना कि मुझे भारत, सिंहल और वर्मा
लौटकर नहीं आने दिया जायगा, तब मैने सोचा कि क्या
सचमुच मैं भारतमें ब्रिटिश शासनकी रक्षाकेलिये इतना
विपज्जनक हूं। बंगालसे निर्वासित करके भी सरकार
सन्तुष्ट नहीं हुई, अथवा सब कुछ धोखेबाजी है ? यदि
११०

जेल-मुक्तिके प्रस्तावका उत्तर
'पहली बात सच है तो ब्यूरोक्रेसीके मुकाबलेमें मैं भयका
कारण बनूं यह मेरे लिये श्लाघाकी बात है। किन्तु इसके
बाद ही जब मैं अपने जीवन और कार्य-कलापके बारेमें
सोचता हूं तो अनुभव करता हूं एक हिंसा परायन दल मुझे
जैसा समझता है, वैसा मैं नहीं हूं। मैंने बंगालके बाहर कोई
राजनैतिक कार्य नहीं किया और भविष्यमें करूंगा ऐसा
भी मनमें नहीं सोचता, क्योंकि मैं बंगालको ही अपना
कार्य-क्षेत्र और अपने आदर्शकेलिये काफी विस्तृत सम-
झता हूं। बंगाल सरकारके सिवा अन्य किसी सरकारके
पास मेरे विरुद्ध कोई अभियोग है, ऐसा मैं नहीं समझता।
तब क्यों मेरे लिये समस्त भारत, सिंहल, और बर्मामें
प्रवेश करना निषेध बताया गया ? सिंहल तो बिलकुल
ब्रिटिश उपनिवेश है, कानूनन भारत सरकारकी आज्ञा
वहां चल सकती है, यह सन्देह जनक है।
बंगाल सरकार इस समय मेरी गति विधि नियन्त्रित
करना चाहती है। किन्तु जब मैं स्वाधीन था, तभी
मेरी गति विधि क्या थी ? अक्टूबर सन् १६२३ से
अक्टूबर १६२४ तक सिर्फ दो बार मैं कलकत्ते से बाहर
गया हूं। एक बार खुलना जिला कांफ्रेंसमें, दूसरी बार
नदिया जिलेके कौंसिल निर्वाचनमें खड़े हुए एक उम्मी-
१११

तरुणके स्वप्न
दवारका समर्थन करनेकेलिये । १६२४ के फरवरी माससे
अक्टुबर तक मैं एक बार भी बाहर नहीं गया । सिराज-
गंज कांफ्रेंसके साथ मुझे नत्थी करनेकेलिये काफी
कोशिश की गयी, इस समय मैं कारपोरेशनके चीफ इक-
जीक्युटिव आफिसरकी हैसियतसे कारपोरेशनके काममें
विशेष व्यस्त था,ठीक कांफ्रेंसके समय कारपोरेशनके धां-
गड़ोकी हड़तालकी संभावनाके कारण एक मिनटकेलिये भी
बाहर जाना संभव नहीं था । सन् १६२४ के मेसे अक्टुबर
तक मैने जो कुछ किया उसे सब जानते हैं । उस समय
सरकारको मेरी गति विधिका सब हाल मालूम था । मेरी
गतिविधिको नियंत्रित करना ही यदि मेरे गिरफ्तार किये
जानेका कारण है तो मैं कह सकता हूं कि मुझे गिरफ्तार
करनेकी कोई जरूरत नहीं थी ।
मिस्टर मोवार्लीने एक विषयमें हृदय हीनताका परि-
चय दिया है। सरकार जानती है प्राय २।। वर्षसे मैं निर्वा-
सित हूं, इस समयमें मैं अपने किसी आत्मीय, यहां तक
कि पिता मातासे भी नहीं मिल सका । सरकारने प्रस्ताव
किया है कि मुझे २।।-३ वर्ष विदेशमें रहना पड़ेगा, इस
समय भी उनके साथ मिलनेकी कोई सुविधा नहीं
मिलेगी । यह मेरे लिये कष्ट दायक है इसमें सन्देह नहीं,.
११२

जेल-मुक्तिके प्रस्तावका उत्तर
किन्तु जो मुझे चाहते हैं उनकेलिये तो यह और भी अधिक
कष्टदायक है। पूर्वीय लोग अपने आत्मीयोंके साथ
किस प्रकार अटूट स्नेह सूत्रमें बन्धे रहते हैं, इसका पश्चि-
मीय अनुमान भी नहीं कर सकते। मेरा ख्याल है कि
इस अज्ञानके कारण ही सरकारने ऐसी हृदय हीनताका
परिचय दिया है। वे सोचते हैं जब कि मेरा विवाह
नहीं हुआ, तब मेरा परिवार कहांसे हो सकता है और
किसीके प्रति मेरा प्रेम भी नहीं हो सकता।
पिछले २॥ वर्षोंसे मुझे कैसे कष्ट भोगने पड़ रहे हैं,
सरकार शायद यह भूल गयी। बिना कारण मुझे इतने
दिन तक अटका रखा गया है। तब भी मुझसे कहा
गया है, अस्त्र-शस्त्र तथा विस्फोटक पदार्थ मंगाने, सर-
कारी कर्म्मचारियोंकी हत्या करनेके षड्यन्त्रके अभियोग-
का मैं अपराधी हूं। इस सम्बन्धमें मुझसे कुछ कहनेकेलिये
कहा गय , मेरा कहना है कि मैं निर्दोष हूं। मेरा
विश्वास है कि परलोकगत सर एडवर्ड मार्शल और
सरजान साइमन इससे अधिक और कुछ नहीं कह सकते
थे। दूसरी वार ये अभियोग मेरे सामने रखे गये तब मैंने
पूछा था, इतने आदमियोंके रहते हुए पुलिसने मुझे पकड़ा
क्यों ? मेरा ख्याल है यही उत्तर सन्तोष जनक है।
८ ११३

तरुणके स्वप्न

मेरी गिरफ्तारीके बाद बंगाल सरकारने मेरे आश्रितोंके
लिये तथा घरकी रक्षाकेलिये किसी तरहका भत्ता नहीं
दिया। इसकेलिये मैंने बड़े लाटके पास आवेदन भेजा
था पर बंगाल सरकारने उसे दबाकर रख छोड़ा। इसके
बाद अब फिर मुझे तीन साल विदेशमें रहनेकेलिये कहा
जा रहा है। युरोप रहनेके समय मुझे अपना खर्च स्वयं
चलाना होगा। यह प्रस्ताव कैसे युक्ति संगत है यह
समझमें नहीं आता। १६२४ में मेरा स्वास्थ्य जितना अच्छा
था, कमसे कम वैसाही स्वास्थ्यशाली बनाकर सरकारको
मुझे छोड़ना चाहिये। जेलमें रहनेके कारण मेरे स्वा-
स्थ्यकी हानि हुई तो क्या सरकार उसकी क्षति पूर्ति
नहीं करेगी ? युरोपमें जब तक मैं स्वस्थ न हो जाऊं
तब तक सरकारको मेरा सब खर्च देना चाहिये। सरकार
यदि युरोप जानेके पहले मुझे घर जाने देती, युरोपमें
मेरा सब खर्च देती और स्वस्थ होतेही मुझे भारत
लौटने देती तो मैं उसके व्यवहारको सहृदयता-पूर्ण
समझता।
मिस्टर मोवार्लीने कहा है सरकार और सुभाषचन्द्र
बोस; दोनो ही समझते हैं कि आर्डिनेन्सकी अवधि
समाप्त होने तक सरकार सुभाषचन्द्र बोसको अटकाकर रख
२१४

जेल-मुक्तिके प्रस्तावका उत्तर


सकती है। इस विषयमें मैं मिस्टर मोवार्लीके साथ सह-
मत हूं। मैं जानता हूं सरकार जितने दिनतक चाहे मुझे
अटका कर रख सकती है। आर्डिनेन्सके खत्म होनेपर
तीसरे रेगुलेशन या किसी अन्य कानूनसे मुझे बन्दी
बना सकती है। व्यवस्थापिकाके सदस्य चाहे जितनी
उछल-कूद मचायें या शासन सभाके सदस्य सफर
खर्च क्यों न ना मंजूर कर दें, मै जानता हूं, सरकार
चाहे तो जीवनभर मुझे बन्दी रख सकती है। सरकार
मुझे चिरकालतक बन्दी रखना चाहती है या नहीं,
यही मैं जानना चाहता हूं। देशबन्धु मुझे युवक-वृद्ध
कहकर पुकारते थे, वे मुझे निराशावादी कहते थे।
हां, मैं निराशावादी हो सकता हूं, क्योंकि ज्यादातर
मैं प्रत्येक घटनाका अशुभ ही देखता हूं। वर्तमान
घटनाका सबसे खराब फल क्या हो सकता है, वह भी
मैंने सोचकर देखा है किन्तु तब भी मैंने निश्चय किया
है, जन्मभूमिसे हमेशाकेलिये दूर होनेकी अपेक्षा जेलमें
मृत्युको वरण करना ही अच्छा है। क्योंकि मैं कविकी
इस वाणीमें विश्वास करता हूं।
“गौरवका पथ सिर्फ मृत्युकी ओर ले जाता है।”
सरकारके प्रस्तावके पक्ष और विपक्षमें जो कुछ

११५

तरुणके स्वप्न
कहना है, मैंने वह सब कहा है। मेरे छुटकारेकी संभावना
दूर चली गयी इसके लिये कोई दुख न करे। पिता माता-
को सबसे अधिक कष्ट होगा, उनको सान्तवना दीजि-
येगा। स्वतंत्रताके पहले व्यक्तिगत और सामूहिक
भावसे हमें अनेक कष्ट सहने होंगे। भगवानको धन्य-
वाद है कि मैं निर्विकार हूं और हर तरहकी अग्निपरीक्षा-
के लिये प्रस्तुत हूं। अपनी जातिके समस्त पापोंका मैं
प्रायश्चित्त कर रहा हूं, इसीसे मैं तृप्त हूं। हमारा विचार
और आदर्श अमर रहेगा, हमारी स्मृति कभी भी नष्ट
न होगी, भविष्य सन्तान हमारी प्रिय कल्पनाकी उत्तरा-
धिकारिणी होगी, यही विश्वास कर हर तरहकी विपत्तियों
और कष्टोंको सहास्य सहकर जीवन बिता दूंगा। इति
११६

जीवन-लक्ष
( श्री शरच्चन्द्र वसुको लिखे गये पत्रका अनुवाद )
इनसिन जेल।
६ मई १९२७
बड़े भय्या !
लम्बा पत्र लिखनेकी ताकत नहीं है। जबतक पूरी
ताकत न आ जाये मुझे उसका इन्तजार करना होगा।
सरकारी प्रस्तावके सम्बन्धमे भय्याके साथ मेरी
बहुत बातचीत हुई है। मुझे इस तरहकी बातचीतका
अवसर मिला इसके लिये मैं अत्यन्त आनन्दित हूं। मान-
नीय स्वराष्ट्र सचिवने जो सौजन्य दिखलाया उसके
११७