सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)
Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara
सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा
३९० सिद्धान्त दर्पण
' भेद से अलग अलग ऋतुयें होती हैं ।
तिरश्चिनाः करायत्र पतन्त्यर्कस्य भूतले
नाप्नोति तत्तथा तापं तत्र शीतं बलोत्तरम् । २११ ।
पृथ्वी के ऊपर सूर्य किरण तिरछे पड़ने से उष्णता अधिक नहीं होने के कारण
शीत बढ़ता जाता है ।
पतन्त्यृजुतया यत्र तत्र तापातिरेकतः
तत्रत्यानां तपर्तुः स्याद्रवि सम्मुख वृत्ति जात् । २१२ ।
जहां पर सूर्य किरण सरल (लम्ब रूप) पड़े वहां ताप अधिक होने के कारण
ग्रीष्म ऋतु होती है ।
तीक्ष्णैः सूर्याशुभि सिन्धो र्लघुतोयं समुत्थितम्
पतत्याकर्षणाद् भूमौ तत्तपान्ते घनागमः । २१३ ।
ग्रीष्म में सूर्य की सीधी किरण समुद्र में पड़ने से उसका पानी गर्म होने से
बाष्प बनकर ऊपर उठता है । पुनः भूमि के आकर्षण से ऊपर ठण्डा होकर
आकाश से पृथ्वी पर पड़ता है । अतः ग्रीष्म समाप्त होने पर वर्षा का आरम्भ
होता है ।
निरक्ष देशतोंऽशाना मक्षाणां यावदष्टकम्
हेमन्त शिशिरौ नस्तो ग्रीष्म वर्षातिरेकतः । २१४ ।
निरक्षदेश से आठ अंश तक (भारत में कुमारी अन्तरीप का निकटवर्ती स्थान
अत्यन्त गर्म होने के कारण वहां हेमन्त और शिशिर नहीं होता तथा ग्रीष्म और
वर्षा अधिक होती है ।
प्रावृडन्ते शरत्कालस्त पादो स्यात् वसन्तकः
एतयोरन्तरे किंचित् शीतं देशे जलाधिके । २१५ ।
वर्षा समाप्त होने पर शरत् काल होता है । ग्रीष्म के आरम्भ में वसन्त होता
है । शरत् और वसन्त के बीच में अधिक जल (वर्षा) वाले स्थान में सामान्य
शीत होता है ।
पौष माघ द्वयं शीतं द्वितीयेऽक्ष लवाष्टके
दशस्वेन्येषु मासेषु वसन्तादि चतुष्टयम् । २१६ ।
अक्षांश ८ से १६ तक पौष और माघ दो मास शीत होता है तथा बाकी दस
मास में वसन्त आदि चार ऋतुयें ही होती है ।
तृतीयेऽंशाष्टके शीतं स्यान्मार्गादि चतुष्टयम्
चैत्राद्येषु वसन्ताद्या श्चात्तारोऽत्रैवषट् समाः । २१७ ।
अक्षांश १६ से २४ के बीच में स्थित भारत में मार्गशीर्ष से आरम्भकर चार
वासना शेष रहस्य वर्णन ३९१
मास तक शीत होता है तथा चैत्र आदि आठ मासों में वसन्त आदि चार ऋतुयें
होती हैं ।
चतुर्विं शति रंशानांमियं स्यादुष्णमण्डलम्
इतः षोड़ शकं प्रोक्तं सममण्डल नामकम् । २१८ ।
२४ अंश अक्षांश तक उष्ण मण्डल होता है । २४ अंश के स्थान में सभी ६
ऋतुएं २-२ मास की होती हैं । २४ से ४० अक्षांश तक का स्थान सममण्डल
कहा जाता है ।
चतुर्थेऽष्टाष्ट के व्यक्षाद् भार्द्ध मुर्जादि शीतलम्
माधवा द्युष्णमत्रैव वसन्तादि चतुष्टयम् । २१९ ।
२४ से ३२ अक्षांश तक कार्तिक आदि ६ मास तक शीत होता है । वहां
वैशाख आदि ६ मास उष्ण होता है तथा उसीमे वसन्त आदि ऋतुयें होती हैं ।
उषाद्यं शीतलं प्रोक्तम् पञ्चमेऽष्टाष्टकेऽष्टकम्
वसन्तादि चतुष्टं स्यात्तत्र ज्येष्ठ चतुष्टये । २२० ।
अक्षांश ३२ से ४० के बीच के स्थानों में आश्विन आदि ८ मास शीत होता
है। ज्येष्ठ आदि ४ मासों में वसन्त आदि ४ ऋतुएं होती हैं ।
इतः केन्द्रातमक्षांशाः पञ्चाशच्छीतमण्डलम्
निरक्षादष्ट के षष्ठे भागानां भाद्रतो दश । २२१ ।
अक्षांश ४० से ५० तक शीतमण्डल होता है । अक्षांश ४० से ४८ तक भाद्र
से दस -
मासाः शीताः शुचिद्वन्द्वे वसन्ताद्भूतवोऽल्पकाः ।
इत्युक्तः षड् ऋतु स्थान मष्टा म्भो धि (४८) लवावधि । २२२ ।
मास तक शीत होता है तथा आषाढ़ और श्रावण मासों में बहुत कम समय
के लिए वसन्त आदि ऋतु होती हैं । इस प्रकार निरक्ष से ८-८ अंश उत्तर अक्षांश
के ६ ऋतुस्थानों का वर्णन हुआ ।
आसु मेरु ततो द्वयब्धि (४२) भागस्थं केवलं हिमम्
एवं देवे सुरांशे तु तुल्याद्याः स्युरजादिवत् । २२३ ।
अक्षांश ४८ से मेरु तक ४२° अक्षांश क्षेत्र बर्फ से ढंका रहता है । इस प्रकार
उत्तरार्द्ध की ऋतुयें हुईं । दक्षिण गोलार्द्ध में तुला आदि ६ राशियों में उत्तर
गोलार्द्ध के मेष आदि ६ राशियों के सूर्य के समान ऋतु होती हैं ।
अत्र राधादयोमासा संस्कृतस्यायनांशकैः ।
भानेर्मेष प्रवेशादेः स्वीकार्य ऋतु भुक्तये । २२४ ।
सायन रवि के मेष प्रवेश से वैशाख आदि १२ मास ऋतु भाग के लिये ग्रहण
..."?
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There is:
दहत्यथदावम्
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Is that aथ?
Wait, is itदहत्यदोषम्? No.
Wait, let's look at:
Could it beदहत्यथ दावम्?
Let's look at:द(da)ह(ha)त्य(tya)थ(tha)दा(dā)व(va)म्(m).
Wait, look at:द ह त्य- wait, where wouldहbe?
Wait,
वासना शेष रहस्य वर्णन ३९३
सूर्योष्मणाति लघवः परमाणवोऽपा
मूर्ध्वं व्रजन्ति गुरवोलवणस्यतेन
तेनाभिवृष्टि सलिलं मधुरं महाब्धेः सिद्धं
पुनः कुतुकतो गणितं ब्रुतेऽल्पम् । २३१ ।
महासागर में लवण जल है । सूर्य ताप से जल के अत्यन्त छोटे अणु ऊपर
ऊठ जाते हैं पर लवण के अणु नहीं उठते । अतः वर्षा का पानी मीठा होता है ।
अब मनोरञ्जन के लिए कुछ पाटीगणित कहता हूँ ।
घनः समांक त्रिनयस्य घातस्तदीय मूलानयनाय सूत्रम् ।
पश्चांकं पंक्ते श्चर ये निधाय विन्दुं ततो वाम गते चतुर्थे । २३२ ।
तीन समान अंकों के गुणनफल को घन कहा जाता है । इस घनांक का मूल
निकालने के लिए यह सूत्र कहा जा रहा है । घन संख्या के दाहिने अन्तिम अंक
पर विन्दु देकर उससे बायीं तरफ चतुर्थ अंक पर-
तत्तचतुर्थे क्रमतश्चदत्वा सविन्दु शिष्टं कितएव यस्य
यातुं घनो युज्यत एतमकं लब्धं न्यसेत्तद् घन वर्जितायः । २३३ ।
बिन्दु देकर बायीं तरफ प्रति चतुर्थ अंक पर उसी प्रकार विन्दु देते जायं ।
बायीं छोर से दाहिनी तरफ बिन्दु वाले अंक तक जो संख्या होगी, उससे जितनी
अधिक संख्या का घन घट सकता है, घटाते हैं । जिस संख्या का घन घटा उसे
लब्धि के रूप में रखते हैं ।
पंक्ते स्थिरात्मत्रिविधांक हानि जाताद्वितीयादिक लब्ध सिद्धयै ।
तस्यास्तलेन्यस्य पृथक् स्थिताया लब्धांक वर्गं त्रिशतघ्नमेकम् । २३४ ।
दूसरी लब्धि संख्या निकालने के लिये पहले लब्धांक को वर्गकर ३०० से
गुणा करके अलग स्थान में रखते हैं ।
वामाद् द्वितीयादिसविन्दुकांक स्याधोऽन्य शून्यस्य यथा स्थितः स्यात्
तेनैव तस्या हरणे प्रवृत्ते नवाधिकं चेत्पततीह लब्धम् । २३५ ।
उससे भाज्य में बायें से दूसरे बिंदु के नीचे के अंक तक जो शेष बचा उसमें
भाग देते हैं । फल दूसरी लब्धि के रूप में रखते है ।
नवैव कृत्वा तदनेन हारं हत्वा पृथक् पंक्ति तले निधाय
कृतिं द्वितीयादि फलस्य पूर्वं लब्धैर्हतां ख्राग्नि (३०) गुणांततोऽधः । २२६ ।
यदि लब्धि ९ से अधिक होती है । तो उसे ९ ही लेते हैं ( लब्धि के रूप
में) (१) द्वितीय लब्धि से भाजक को गुणा कर उसके नीचे (२) द्वितीय लब्धि
का वर्ग से पूर्व लब्धांक को गुणा कर ३० से गुणा कर प्राप्त संख्या को रखें ।
घन द्वितीयादि फलस्य चैवं त्रिधांक योगं विजहातु पंक्तेः
साल्पायदि त्र्यंकं युतेः द्वितीय चेकैक हीनं क्रमशॊऽ त्रलब्धम् । २३७ ।
३९४ सिद्धान्त दर्पण
उसके नीचे (३) दूसरी लब्धि का घन-इन तीन संख्याओं के योग को भाज्य
से घटाने पर यदि बहुत कम शेष आता है । तो दूसरी लब्धि को एक कम कर
पुनः इसी प्रकार एक के नीचे एक तीन संख्यायें लिखते हैं ।
कृत्वा विधाय त्रिविधांक योगं स्थिरं विशुद्ध्यान्त मथांक पंक्तेः
तेनोज्झिताया पुनरन्य लब्धाः न्येवं फलां का घनमूल संज्ञा । २३८ ।
इस प्रकार तीन संख्यायें स्थिर होने पर उनका योग भाज्य से घटाते हैं और
शेष में अगले बिन्दु तक के अंक मिलाते हैं । अबतक के दो लब्धि अंको को
पहली लब्धि मानकर अगला लब्धि अंक पहले की तरह प्राप्त करते हैं और तीन
संख्याओं का योग घटाकर तब तक क्रिया करते हैं । जबकि अन्तिम बिन्दु तक
भाज्य के अंक समाप्त न हों । यही लब्धि घनमूल होता है ।
पतन्ति पंक्त्युर्ध्व रविन्दु तुल्या स्तेषां घनः पूर्ववदंक पंक्तिः ।
सा चेत्सहस्राल्पतयास्थिता स्यात् सकृद् भवेत्तद् घनमूलमेकम् । २३९ ।
घन अंक संख्या के ऊपर जितने बिन्दु होते हैं । घनमूल में उतने ही अंक
होते हैं । घन १००० से कम होने से उसका एक ही अंक का घनमूल होता है
तथा एक ही बार में निकलता है, बिना अन्य क्रियाओं के ।
भास्करपोष्यां घनकरण सूत्र वृत्तम्--
समत्रिघातश्च घनः प्रदिष्टः स्थाप्योधनोऽन्तस्य ततोऽन्त्यवर्गः
आदि त्रिनिघ्नस्तत आदि वर्गस्त्वन्त्या हताश्वादि घनश्च सर्वे । २४० ।
तीन समान अंक (संख्या) के गुणनफल को उस संख्या का घन कहा जाता
है । संख्या को रखकर उसके अन्तिम अंक के घन को रखेंगे । शेष अंक के वर्ग
को आदि अंक और तीन द्वारा गुणा कर और तब आदि संख्या के वर्ग को अन्त्यं
अंक और तब आदि अंक के घन को
स्थानान्तरत्वेन युतः घनः स्यात्प्रकल्प्यतत् खण्डयुगं ततोऽन्त्यम् ।
एवं मुहुर्वर्ग घन प्रसिद्धा वाद्यंकतो वा विधिरेष कार्यः । २४१ ।
एक-एक स्थान हटाकार रखेंगे । अन्त में सबको जोड़ देने पर पूरी संख्या
का घन आ जायेगा ।
संख्या को दो खण्डों में बांट कर भी अन्तिम खण्ड से इस प्रकार कार्य कर
बाकी खण्ड से भी कार्य करेंगे । इससे पूरी संख्या का घन आ जायेगा ।
खण्डाभ्यतां हतो राशिस्त्रिघ्नः खण्डघनै क्य युक्
वर्गमूल घनः स्वघ्नी वर्ग राशि घनोभवेत् । २४२ ।
संख्या के दो खण्डों को आपस में गुणा कर ३ से गुणा कर उससे संख्या
को गुणा करेंगे । उसके दाहिने अन्तिम संख्या का घन तथा बायें आदि संख्या
का घन जोड़ने से पूरी संख्या का घन आ जायेगा । किसी वर्ग संख्या का घन
वासना शेष रहस्य वर्णन ३९५
निकालने के लिए वर्गमूल का घन निकालेंगे। और घन का वर्ग निकालेंगे।
घनमूले करण सूत्रं वृत्तद्वयम् --
आद्यं घनस्थान मथाघने द्वेपुन स्थान्त्याद् घनतो विशोध्य
घनं पृथक् स्थं पदमस्य कृत्या त्रिघ्ना दातव्यं विजभेत् फलंतु । २४३ ।
घन संख्या को लिखकर दाहिने तरफ के अन्तिम अंक पर घन चिह्न दें।
उससे बायीं तरफ के दो अंकों पर अघन चिह्न दें। इसके बाद फिर एक अंक पर
घन और उससे बायें दो अंको पर अघन चिह्न दें। पूरी संख्या में घन अघन चिह्न
देने पर अन्तिम (बायें तरफ) घन संख्या से जिस अंक का घन घट सकता है
उस अंक को अलग लिखेंगे। और घन को घटायेंगे। इसके अंक के वर्ग को ३
से गुणा कर फल से प्रथम भाज्यशेष और उसके बाद के प्रथम अघन अंक से
भाग देंगे।
पंक्त्या न्यसेतत् कृतिमन्त्य निघ्नीं त्रिघ्नों त्यजेत्तत्प्रथमात् फलस्य
घनं तदाद्यात् घनमूलमेवं पंक्तिर्भवेदेव मतः पुनश्च । २४४ ।
फल को प्रथम घनमूल अंक के बाद रखेंगे। फल के वर्ग को पंक्ति में स्थित
बाकीअंक से गुणा कर और उसको तीन से गुणा कर भाज्य राशि से घटायेंगे।
पुनः जो शेष बचा उससे इस फल के घन को घटायेंगे। इस प्रकार बारबार करने
पर उक्त घन संख्या का घन मूल निकलेगा।
मूलावशेषात् कथयामसिद्धि षष्ट्यंशकानां पदशेष भाजाम्
पदं घनीकृत्य पदोत्तरांक घनाद्विजह्याद्य इहावशेषः । २४५ ।
सावयव संख्या का घनमूल निकालने के लिए प्रथम अवयव का जितना
मूल होता है, उतने का घन घटाने के बाद शेष को घनकर उसके बाद के अंक
के घन से घटायेंगे। फल शेष हार होगा।
स चान्त्यहारो यदि मूल संख्या त्रिंशद् बहुत्वत्र पदावशेषः
षष्ट्याहतोऽन्वेन हरेण भक्तः फलं कलास्तत्पद मल्पकं चेत् । २४६ ।
मूलसंख्या ३० से अधिक होने पर मूल शेष को ६० से गुणा कर अन्त्यहार
से भाग देने पर कला (१/६० वें भाग) में फल आयेगा। मूल संख्या ३० से कम
होने पर
व्योमोऽनलेभ्य (३०) स्तदिहान्त्यहारोन्मूलावशेषं विरहस्य शेषः
गुण्योऽन्त्य हारान्तु सरूपमूल भक्तात् फैलं स्याद् गुणकाभिधानम् । २४७ ।
अन्त्यहार से मूल अवशेष को घटा कर उसको गुण्य नाम देंगे। अन्त्यहार
को मूल में एक जोड़ कर भाग देने से जो लब्धि होगी उसको गुणक कहेंगे।
तत् क्षुण गुणे ध्योऽन्यहरेण भक्तः फलोञ्झितो ऽन्यस्फुट हार उक्तः ।
मूलावशेषो वियदंग (६०) निघ्नो लिप्तामयः स्यात् स्फुटहार भक्तः । २४८ ।
३९६ सिद्धान्त दर्पण
गुण्य और गुणक को गुणा उसको अन्त्य हार से भाग देंगे । फल को पुनः
अन्त्यहार से घटाने से वह अन्त्य स्फुट हार होगा । मूल अवशेष को ६० से गुणा
कर इस स्फुट हार से हरने पर यह लिप्ता होगा ।
पुरोदितं वर्गपदं मयात्र बहूपयोगोद्धन मूल मुक्तम्
दिग् दर्शिता साधन वासनाया गोलज्ञ गम्यानुदिता खिलायत । २४९ ।
वर्गमूल निकालने की विधि में पहले कह चुका हूँ। गणित में अति आवश्यक
होने के कारण घनमूल के बारे में भी मैने कहा । गणित साधन विधि सामान्य
प्रकार से कही गयी है । बाकी विधियां गोलज्ञ गणक स्वयं जान सकते हैं
सिद्धान्तशिरोमणौ-इषदोषदिह मध्य गमादौ ग्रन्थ गौरवभयेन मयोक्ता
वासनामति मतासक्त लोह्या गोल बोध इदमेद फलंहि । इति । २५० ।
सिद्धान्त शिरोमणि में लिखा है- ग्रन्थ बढ़ने के भय से मैं पहले थोड़ा थोड़ा
तर्क देकर आगे बढ़ जाता हूँ । बुद्धिमान् उसी से बाकीयुक्ति भी समझ लेंगे ।
गोल ज्ञान होने से ही यह फल होता है ।
हृत्प्राणेन्द्रिय रोध शोधित समक्रोध स्मरादिद्विषः
पञ्चक्लेश मुचोन यत्क्षणमपि द्रष्टुंक्षमा योगिनः
तद्यः स्वं परमं पदं स्वचरण प्रेमाध्व पान्थैर्जनैः
सु प्रापं विद धाति नः स भगवानव्याद् भव व्यापदः । २५१ ।
मन, प्राण और इन्द्रियों पर नियन्त्रण के लिये योगी गण मोह, क्रोध तथा
काम आदि शत्रुओं को जीतते हैं । इससे वे पांच क्लेशों विद्या, अस्मिता, अनुराग,
द्वेष और अभि निवेश से मुक्त हो जाते है । इसके बाद भी योगी गण उस परमपद
को एक क्षण के लिये भी नहीं देख पाते । (अधिक समय के लिए देखना दूर की
बात है ) उसी परम पद को जो अपने पाद सेवकों को सहज दिला देते हैं । वे
महाप्रभु श्री जगन्नाथ हमें विपद् से मुक्त करें ।
इत्युत्कलो ज्ज्वल नृपाल कुल प्रसूत
श्री चन्द्रशेखर कृतौ, गणितेऽक्षिसिद्धे
सिद्धान्त दर्पण उपाहित बालबोधे
सद् वासनोऽतिनख (२१) संख्यः इतः प्रकाशः । २५२ ।
इस प्रकार उड़ीसा के प्रसिद्ध राज परिवार में उत्पन्न श्री चन्द्र शेखर द्वारा
गणना और दृष्टि में समानता तथा बालकों की शिक्षा के लिये लिखे सिद्धान्त
दर्पण में सद् वासना (तर्क युक्त व्याख्या) सहित २१ वां प्रकाश समाप्त हुआ ।
द्वाविंश प्रकाशः
कालाधिकार
संवत्सरादि वर्णनम्
कलान्मानमकाल दण्ड निलयं कालाम्बु जन्म द्युतिं
कालो केलि कला जरार्च्चित पदं काला चलालं कृतिम्
क्रुध्यत् कालिय कालिकुब्जनकृतं काकोदरी काकुभिः
कृष्णं कृप्त कृपं करोभ्यभिवदन् कालाधिकार क्रमम् । १ ।
भगवान् कृष्ण काल के स्वरूप हैं और यम का काल दण्ड उनमें लीन (लुप्त )
हो जाता है । उनकी नील कमल जैसी शोभा है । उनके पदों की अर्चना पार्वती
की क्रीड़ा के चन्द्र रूप शिव के द्वारा की गयी है । वह नीलाचल पर जगन्नाथ
के रूप में स्थित है । वह नीलाचल पर जगन्नाथ के रूप में स्थित है । उन्होंने
क्रूर कालिय का दमन किया तथा नाग स्त्रियों का रोना सुनकर उन पर दया की ।
उन्हीं प्रभु को प्रणाम कर मै कालाधिकार लिखता हूँ ।
कालास्तु द्विविधो नित्यो जन्यश्चेति प्रकीर्तितः
नित्यः श्री परमेशोऽत्र काल कालापराह्वयः । २ ।
काल के दो प्रकार हैं-नित्य तथा जन्य । स्वयं परमेश्वर नित्य काल का रूप
हैं । वह काल की गणना करते हैं । अतः उनका अन्य नाम काल है ।
विशेषं कलनात् कालो जन्यः स तु तथेश्वरः
तत् स्मृति सर्वकार्येषु कर्तव्या मंगलार्थिभिः । ३ ।
जगत् का हिसाब करने के कारण वही पर परमेश्वर जन्य काल भी है ।
अतः कल्याण चाहने वाले लोग सभी कामों में परमेश्वर का स्मरण करते हैं ।
कौम्र्मे - अनादि के भगवान् कालोऽनन्तोऽक्षरः परः ।
सर्वाङ्गत्वात् स्वतन्त्रत्वात् सर्वात्मत्वात् महेश्वरः । ४ ।
कूर्म पुराण में कहा है- भगवान अनादि और अनन्त काल रूप हैं । उनका
क्षय नहीं होता । वह सभी के रोम रोम में तथा उसके बाहर भी हैं वह महेश्वर,
सर्वगत, स्वतन्त्र तथा सभी की आत्मा है ।
पर ब्रह्म च भूतानि वासुदेवोऽपि शंकरः
कालेनैव च सृज्यन्ते स एव ग्रसते पुनः । इति । ५ ।
काल ही स्वयं परम ब्रह्म, वासुदेव और शंकर है । काल द्वारा ही संसार
उत्पन्न तथा पीछे नष्ट हो जाता है । (उद्धरण समाप्त)
स्मृतिश्च-सर्वेषु कालेषु समस्त देशेषु तथेश्वरे श्वरश्च ।
सर्वैः स्वरूपै भगवान नादि र्ममास्तु मांग्ल्य वृद्धये हरिः । ६ ।
३९८ सिद्धान्त दर्पण
स्मृति में है- हर समय-सभी देशों में और सभी कामों में भगवान ही स्वामी
रूप में है । वह सभी के रूपों में और अनादि है । वे हरि मेरे कल्याण वृद्धि
करें ।
यस्य स्मृत्या च नामोक्त्या तपोयज्ञ क्रियादिषु
न्यूनं सम्पूर्णतां याति स द्यो वन्दे तमच्युतम् । ७ । इति ।
तपस्या, यज्ञ आदि सभी कार्यों की कमी यात्रुटि जिसके नाम स्मरण या गान
से उसी समय पूर्ण हो जाती है । उसी अच्युत की में वन्दना करता हूँ । (उद्धरण
समाप्त)
निर्गुणत्वात् परेशस्य तत्स्मृति र्घटते कथम् ।
इति चे दुच्यते तस्य वाशिष्ठोक्त्या शरीरिता । ८ ।
यदि परमेश निर्गुण हैं तो उनका स्मरण किस प्रकार हो सकता है । इस प्रश्न
के उत्तर में योग वाशिष्ट रामायण में भगवान के शरीर धारण करने के विषय में
जो कहा है वह उद्धृत किया जा रहा है ।
तथा हि वाशिष्ठ रामायणे-
नित्योजन्यश्च कालौ द्वौ तयोराद्य परेश्वरः
सोऽवाङ्मनस गम्योऽपिदेही भक्तानुकम्पया । ९ ।
वाशिष्ठ रामायण में इस प्रकार है-नित्य और जन्य- दो प्रकार का काल है ।
इनमें परमेश्वर ही प्रथम और नित्यकाल है । वाणी और मन द्वारा उनकी कल्पना
नहीं की जसकती, पर भक्तों पर कृपा करने के लिए वे शरीर धारण करते हैं ।
खड्ग पाशधरः श्रीमान् कुण्डली कवचान्वितः
ऋतु षटक् मयोदार वक्तर् षट्क समन्वितः । १० ।
भगवान् खड्ग और पाश धरने वाले, कवच तथा कुण्डल से सजित हैं ।
वह ६ ऋतुओं के रूप में ६ मुख धारण किये हुए हैं ।
मासो द्वादश कोद्दाम भुज द्वादश कोद् भटः
स्वाकार समया वहा वृतः किंकर सेनया । इति । ११ ।
उनकी १२ भुजाओं का पराक्रम १२ मास है । वह अपने ही आकार और रूप
वाले सेवकों से सदा सेवित है । (उद्धरणं समाप्त)
यद्यप्येतत्काल रूपं तथाप्यस्य रमापतेः
धृतनानातनोर्भक्त्यै कार्यास्वेष्टा कृति स्मृतिः । १२ ।
लक्ष्मीपति इस प्रकार काल रूप होने पर भी भक्तों के लिये अनेक प्रकार का
रूप धारण करते हैं । अतः भक्त अपनी इच्छा के अनुसार किसी भी रूप में उनका
स्मरण करते हैं ।
संवत्सरादि वर्णनम् ३९९
नित्यात् जन्यस्य कालस्य समुत्पत्ति र्भूदिति
श्रुति प्रमाण्य मासाद्य प्राह स्वायम्भुवो मनुः । १३ ।
इसी नित्य कालरूप परमेश्वर से जन्य काल भी उत्पन्न हुआ है- यह वेद
में कहा है तथा स्वायम्भुव मनु ने भी कहा है ।
तथाहि-कालः काल विभक्तिश्च नक्षत्राणि ग्रहस्तथा
सृष्टिं ससर्ज चैवेमां स्रष्टुमिच्छांन्निमाः प्रजा । इति । १४ ।
ईश्वर रूपी काल ने प्रजा की सृष्टि के लिए काल के विभाग (दिन, मास
आदि), नक्षत्र ग्रह तथा इस विश्व की रचना की ।
कालात्मा दिनकृत् प्रोक्ता होरास्कन्धे यतस्ततः
सिद्धान्त गदिता सृष्टिर्न विरोध मिहार्हति । १५ ।
˙ होरा स्कन्ध (बृहज्जातक मे)सूर्य को कालात्मा कहा गया है । इस उक्ति का
सिद्धान्त की उक्ति विरोध करती है, ऐसा मानना ठीक नहीं है।
त्रुट् यदि प्रलंयान्तेषु जन्यकालेषु वत्सरः
प्रधान भूतोऽवयवो खाङ्गैर्युक्तोऽयनादिभिः । १६ ।
सूर्य को कालात्मा मानने से वह स्वयं सृष्टि का कारण है । त्रुटि से लेकर
प्रलय तक के जन्य काल में वर्ष प्रधान अवयव है । इसके अवयव हैं-अयन,
सम्यग् वसन्ति यत्रर्तु मास पक्षादिनादयः
प्राज्ञैःकाल विशेषोऽसौ संवत्सर इतीरितः । १७ ।
मास पक्ष और दिन आदि । वर्ष रुपी अवयव इन्हीं से बना है, इसका एक
नाम संवत्सर भी है ।
अयने येन पूषर्तु त्रयेणोदग् दिशं तथा ।
दक्षिणां शा तदेवोक्त मयनं सौर मानजम् । १८ ।
सूर्य जिन तीन ऋतुओं (६ मास) में उत्तर दिशा और अन्य तीन ऋतुओं में
दक्षिण दिशा में जाता है उसे ही अयन कहते हैं । यह सूर्य की क्रान्ति के अनुसार
होता है । (अय् धातु का अर्थ गति है)
इयर्त्य शोक पुष्यादि लिङ्ग साधारणैतरम्
यः सकाल विशेषोऽत्रवसन्तादि ऋतुरुच्यते । १९ ।
जिस समय (दो मास) अशोक वृक्ष पुष्प आदि असाधारण चिह्न धारण करता
है । उस को आदि ऋतु वसन्त कहा जाता है ।
मास्यते परिमीयते येन चन्द्रार्द्ध संख्ययौ
सूर्य राशि गतिर्यत्र मास्यतेऽह्नोञ्च यत्रहिं । २० ।
जिस समय को मापा जाय या हिसाब किया जाय उसे मास कहते हैं । चन्द्र
४०० सिद्धान्त दर्पण
की वृद्धि और क्षय का माप करने वाला चान्द्र मास है । सूर्य की राशि गति का
समय मापने वाला सौर मास तथा दिन रात
त्रिंशतानि व्यतीतानि भचक्र भ्रमणानिच
मासः स उच्यते चान्द्रः सौरः सावन ऋक्षकः । २१ ।
३० तथा ३० नक्षत्र भ्रमण का माप करने वाला समय क्रमशः सावन और
नाक्षत्र मास कहलाता है ।
पक्षेते परि गृह्येते देवता पितृकार्ययोः
यौ तौ पक्षौ शुक्ल कृष्णौ चन्द्र वृद्धिक्षयाद् भवौ । २२ ।
चन्द्र की वृद्धि और क्षय के अनुसार शुक्ल और कृष्ण पक्ष होता है । उन दो
पक्षों का उपयोग देव और पितृकार्य में होता है ।
तनोति यो वर्द्धमानां क्षीयमाणां कलां विधोः
एकां काल विशेषोऽयं तिथि रित्युच्यते बुधैः । २३ ।
बढ़ने वाले या घटने वाले चन्द्र की एक एक कला का जिस समय द्वारा
हिसाब होता है उसे तिथि कहते हैं ।
इत्थं याम मुहूर्त्तादि कालांगाना मदेशकः
व्युत्पत्तिर्न मया प्रोक्ता ग्रन्थ विस्तार साध्वसात् । २४ ।
इसी प्रकार याम, मुहूर्त आदि समय के अनेक अंग है । ग्रन्थ का विस्तार
बढ़ने के भय से इन सबकी व्युत्पत्ति नहीं कही है ।
नवधा कालमानानि चान्द्र मार्क्ष्य च सावनम्
बार्हस्पत्यं ततः सौरं मानवं पैत्र मेव च । २५ ।
समय का विभाग ९ प्रकार का है- चान्द्र, नाक्षत्र, सावन, बार्हस्पत्य, सौर,
मानव, पैत्र, दैव और ब्राह्म ।
दैवं ब्राह्मय मिति प्रोक्तान्यत्र पञ्चभिरादिमैः
व्यवहारो मनुष्याणां मन्वादीनां स्वनामतः । २६ ।
इनमें प्रथम पांच समय मान ही मनुष्य के व्यवहार में आते हैं, बाकी मानव
आदि का व्यवहार अपने नाम के अनुसार होता है ।
भू गर्भ निः सृतात् सूत्रात् सूर्य मण्डल मध्यगात्
प्राचीं यद्याति शीतांशूश्चान्द्र मानं तदुच्यते । २७ ।
भू केन्द्र से सूर्य केन्द्र तक के सूत्र से पूर्व की तरफ, १२ अंश जितने समय
में चन्द्र जाता है, उसको चान्द्र मान (१ तिथि) कहते हैं ।
व्यर्केन्दु भगणो मास स्तदर्द्धं पक्ष ईष्यते ।
तिथि स्तत् शर रूपांश (१५) स्तदर्द्धं करणं मंतम् । २८ ।
संवत्सरादि वर्णनम् ४०१
चन्द्र से सूर्य का अन्तर एक भगण होने से एक चान्द्र मास होता है । इसके
आधे को पक्ष कहते हैं । पक्ष के १/१५ भाग को तिथि तथा तिथि के आधे भाग
को करण कहते हैं ।
व्रतोपवास पर्वादि कृत्याकृत्य पितृक्रियाः ।
चान्द्र मानेन गृह्यन्ते मास वृद्धिक्षयादयः । २९ ।
मास की वृद्धि क्षय, व्रत, उपवास, पर्व आदि, कृत्यकाल और अकृत्य काल,
तथा पितृक्रिया-सभी चान्द्र मान (तिथि) के अनुसार ही किये जाते हैं ।
पर्वान्ते कृत्ति का दीनां योगद्ये कार्तिकादयः
मासाः प्राग् भिर्मता स्त द्यदृक्षस्थ बृहस्पते । ३० ।
पूर्णिमान्त में कृत्ति का आदि नक्षत्र के साथ चन्द्र के संयोग के कारण जिस
प्रकार कार्तिक आदि मासों का नाम दिया गया है । उसी प्रकार जिस नक्षत्र में
रहकर वृहस्पति अमान्त में -
उदयस्तद् भ नामा ब्दाः सूर्य सिद्धान्त सम्मत-
तल्लक्षणान्यति व्यासे नर्त्र प्रोक्तानि विस्तरात् । ३१ ।
उदय होता है, उसी नक्षत्र के अनुसार बार्हस्पत्य वर्ष का नाम होता है ऐसा
सूर्य सिद्धान्त का मत है । पर ग्रन्थ विस्तार के भय से इन सभी लक्षणों का वर्णन
नहीं किया जा रहा है ।
कृत्ति का शब्द वाच्यं यत् कृत्तिका रोहिणी द्वयम्
तत् पर्वान्ताद्वयन्मासो निरुक्त कार्तिको यदि । ३२ ।
कार्तिक और रोहिणी दोनों को कृत्तिका मानकर इसमें किसी के साथ पूर्णान्त
में चन्द्र का योग होने पर यदि उस मास को कार्तिक कहा जाता है,
तदूर्ज्ज मार्ग पर्वान्त भरणी रोहिणी यतौ
अब्दे त्विषोर्जतपत्ति र्भवेत् कार्तिक मार्गयोः । ३२ ।
तो कार्तिक और मार्गशिर पूर्णान्त में क्रमशः भरणी और रोहिणी के साथ
योग होने पर उस वर्ष इन मासों को क्रमशः आश्विन और कार्तिक क्यों नहीं कहा
जाता है ।
तथापि पूर्व चलित व्यवहार व शादिमे
कृत्तिका मार्ग-शीर्षादि नामभिः प्रायिका मताः । ३४ ।
यह असुविधा होने पर प्राचीन काल से प्रचलित व्यवहार के अनुसार कार्तिक
और मार्गशीर्ष आदि मासों की गणना होती है । यह नक्षत्र योग भी प्रायः घटता
है ।
४०२ सिद्धान्त दर्पण
एकः पश्चाद् भ्रमो भानां नाक्षत्रं दिन मुच्यते :
घटिकादिक मायुश्च तन्मानेनैव सिद्ध्यति । ३५ ।
नक्षत्रों के पश्चिम दिशा में एक चक्र पूरा करने में जितना समय लगता है,
उसे १ नक्षत्र दिन कहते हैं । घटी, पल आदि इसी मान के अनुसार होते हैं ।
ब्रह्मा की आयु भी इसी मान से होती है ।
नाक्षत्र मान संसिद्धं मायुः कल्पार्क वासरैः
गुणितं कल्प भदिन माप्तं सौराब्दादि स्फुटं । ३६ ।
नाक्षत्र मान की आयु को कल्प सौर दिन (१५,५२,००,००,०००,००) से गुणा
कर कल्प नक्षत्र दिन (१५,८२,२,३७,८,२,८,२८,००००) से भाग देने पर फल स्फुट
सौर वर्ष आदि होता है ।
यद्यपि स्याद् भग्रहाणां स्वस्वोदय युगान्तरम्
तत्तत् सावन घस्रारूय मुक्त पूर्वं तथापि हि । ३७ ।
पहले कहा जा चुका है, कि किसी ग्रह या नक्षत्र के एक उदय
संवत्सरादि वर्णनम् ४०३
इस प्रकार के ३० सौर दिनों का एक सौर मास होता है । इस प्रकार १२ सौर
मासों का एक सौर वर्ष होता है ।
सौर मानेन गृह्यन्ते संक्रमत्वर्यनादयः
देवासुर द्युरजनी युगमन्वन्तरक्षयाः । ४२ ।
सौर मान से संक्रान्ति, अयन और ऋतु आदि का पालन होता है । देवता
और असुरों का दिन और रात, युग, मन्वन्तर आदि की समाप्ति भी इसी सौर मान
से होती है ।
विवाह व्रत चूड़ादि वेश्मारम्भादयः क्रिया
मासाब्द नियमाः पर्वाण्यपि देशविशेषतः । ४३ ।
विवाह, व्रत, चूड़ा कर्म, गृहारम्भ आदि काम, मास, वर्ष, व्रतादि का पालन,
पर्व आदि का पालन किसी किसी देश में सौर मान से भी होता है । (सामान्यतः
चान्द्र मान से होता है ऐसा लिखा गया है)
सौर-तुलादिषडशी (८६) त्यंशैः षडशीति मुखं दिनम्
तञ्चतुष्टय मेवस्यात् द्विस्व भावेषु राशिषु । इति । ४४ ।
सूर्य सिद्धान्त में-तुला आरम्भ से ८६ अंश तक सूर्य रहने पर (अर्थात् ८६
सौर दिनों तक) षडशीति मुख नामक मास होता है । यह वर्ष में ४ बार होता है
और रवि द्विस्वभाव (द्वात्मक राशि ३,६,९,१२) में रहने पर ही होता है । (उद्धरण
समाप्त होता है ) ।
धनुषः सप्त विंशोऽश स्त्रयो विंशोऽण्डजस्य च
द्वन्दू से कोन विंशश्च स्त्रियाः पञ्चदशः स्मृतः । ४५ ।
धनु राशि का २७ अंश, मीन का २३ अंश, मिथुन का १९ अंश तथा कन्या
का १५ अंश में
तत्तन्मासेषु सूर्यस्य षडशीति मुखान्वयात् ।
षडशीत्याख्यया प्रोक्ता द्वात्मक क्षेत्र संक्रमाः । ४६ ।
उन मासों का सूर्य जाने से और ये स्थान ८६-८६ अंशों के बाद पड़ने से
इन (संक्रान्तियों) को षडशीति मुख कहते हैं । ये सभी द्वात्मक राशियों में ही
होती हैं ।
ओज पादादि चरयोः संक्रमौ विषवाभिधौ
युग्मादि चरये याम्य सौम्या यन तयोदितौ । ४७ ।
विषम पद में स्थित दो चर राशियों (मेष और तुला) में रवि की संक्रान्ति
को विषुव संक्रान्ति कहते हैं । सम पद में स्थित दो चर राशियों (कर्क और मकर)
संक्रान्ति को क्रमशः दक्षिण और उत्तर अयन संक्रान्ति कहा जाता है ।
४०४ सिद्धान्त दर्पण
चर द्वात्मकयो र्मध्ये स्थिर राशि चतुष्टयम् ।
भानो र्विष्णुपदी संज्ञा स्तद् प्रवेशाः प्रकीर्त्तिताः । ४८ ।
चर और द्वात्मक राशियों के बीच में जो चार राशियां (वृश्चिक, कुम्भ, वृष
और सिंह) हैं उनमें रवि के प्रवेश से विष्णुपदी संक्रान्ति होती है ।
पूर्वोक्त क्रम संसिद्धा रवि संक्रान्ति सम्भवः
पुण्य नाड्यस्त्रय स्त्रिंशत् स्वमध्य स्थार्क संक्रमः । ४९ ।
एक राशि का अन्तिम बिन्दु ही दूसरी राशि का आदि बिन्दु है । उस बिन्दु
को रवि बिम्ब की परिधि स्पर्श करने से संक्रमण या संक्रान्ति का आरम्भ होता
है । रवि बिम्ब का दूसरी तरफ का अन्तिम बिन्दु उस बिन्दु से लगने पर पूरा
रवि संक्रमण बिन्दु पार कर जाता है । इसमें ३३ दण्ड (रवि बिम्ब व्यास ३३
कला पार करने का समय) लगता है । अतः यह ३३ दण्ड ही संक्रान्ति का पुण्य
काल है ।
ग्राह्या दशसु संक्रान्तिष्वयने दक्षिणेतु ताः
अन्तःस्थ संक्रमाः सौम्यायनेत्वादिस्य संक्रमाः । ५० ।
दस संक्रान्ति में संक्रान्ति के आरम्भ से ३३ दण्ड ही पुण्य काल हैं । दक्षिणायन
संक्रमण में अन्तिम १६/३० दण्ड तथा उत्तरायण संक्रमण में प्रथम आधा (१६/३०)
अति पुण्यतमाः प्रोक्ताः संक्रमासन्न नाड़िकाः
चलना सन्नता यत्र दिवास्नानादिकं तदा । ५१ ।
अत्यन्त पुण्य काल होता है । यह एक राशि से दूसरी राशि में संचार का
समय है । संक्रान्ति समय दिन में पड़ने से स्नान दान आदि किया जाता है ।
तन्निशार्धादधश्चोर्द्धं सञ्चारे प्राक् परं ततः
आसन्न द्यु दलं पुण्यं निशीथे चेत्तदा तिथैः । ५२ ।
रात्रि के पूर्वार्द्ध में संक्रान्ति होने से उसके पूर्व दिन के दूसरे अर्द्ध तथा रात्रि
के दूसरे अर्ध में संक्रान्ति होने पर अगले दिन के प्रथम अर्द्ध में पुण्यकाल होता
है ।
संक्रान्ति काल निष्ठाया यदिने महती स्थितिः
तत्र कार्याः क्रियाएष विचारोह्या यनादृते । ५३ ।
ठीक आधी रात को संक्रान्ति पड़ने से इसका अधिक भाग जिस दिन होता
है उसी दिन उतने समय पुण्य काल होता है । अतः उसी समय पुण्य क्रिया
करनी चाहिये । अयन संक्रान्ति में इस प्रकार का विचार नहीं होता है ।
नक्रौ याम्यायने पूर्वदिनस्यान्त्य दलं मतम् ।
सौम्या यने 'पर दिन स्यादिमं पुण्यदं दलम् । ५४ ।
संवत्सरादि वर्णनम् ४०५
याम्य अयन या कर्क संक्रान्ति रात में होने से पूर्व दिन का द्वितीयार्द्ध तथा
उत्तरायण (मकर) संक्रान्ति रात में होने से अगले दिन का पूर्वार्द्ध पुण्यकाल होता
है।
अहः संक्रमणे पुण्य महः कृत् संप्रकीर्तितम्
स्मार्त्तं स्तथापि संक्रान्ते रासत्ति र्बहुमन्यते । ५५ ।
दिन में संक्रान्ति होने से सारा दिन दिन पुण्य काल होता है । यह स्मार्त्त
मत होने पर भी संक्रमण का निकट वर्ती समय निश्चय बहुत फल दायक है ।
उक्तो विधेरयं कालो निषेधे त्वामिषादिनः
पूर्वास्त्रिंशत्परास्त्रिंशद् ग्राह्याः पर्वाक्ष नाड़िकाः । ५६ ।
संक्रान्ति पर्व दिन होने के कारण पूर्वोक्त स्नान, दान, आदि के अतिरिक्त
इसमें आमिष भोजन करना मना है । आमिष भोजन का निषेध संक्रान्ति से ३०
दण्ड पहले और उसके ३० दण्ड बाद तक, इस प्रकार कुल ६० दण्ड तक है ।
मासान्तरूय निरंशा रूयौ मासस्यान्त्यादिमौलवौ
यात्रोद् वाहादि कार्येषु त्याज्या कल्याण मिच्छभिः । ५७ ।
किसी राशि का.अन्तिम (३० वां) अंश मासान्त तथा प्रथम अंश निरंश कहा
जाता है । इन दो अंशों में रवि रहने से मासान्त तथा निरंश काल होता है ।
कल्याण चाहने वाले इन दो दिनों में यात्रा विवाह आदि शुभ कार्य नहीं करते
हैं।
बिम्बान्तर्वर्त्तिनः पुंसः संक्रान्ति समयोनृभिः
त्रुटेः सहस्र भागत्वादवगन्तुं न शक्यते । ५८ ।
सूर्य बिम्ब के केन्द्र बिन्दु (पुरुष) का संक्रमण काल एक त्रुटि का हजारवां
भाग होता है । इसको जानना मनुष्य के लिये सम्भव नहीं है ।
सौरे-भचक्र नाभौ विषुव द्वितयं समसूत्रगम्
आयन द्वितयं तैव गतस्र परमास्तताः । इति । ५९ ।
भचक्र की नाभि या केन्द्र स्थल में होने के कारण दो विषुव संक्रान्ति तथा
दो अयन संक्रानति ये चार अति श्रेष्ठ हैं । सायन मेषादि तथा तुलादि जिस प्रकार
मेरु से बराबर दूरी (९०° अंश) पर है उसी प्रकार सायन कर्क तथा मकर आदि
भी ध्रुव से बराबर दूरी पर हैं। अतः इनका माहात्म्य भी समान है । (सूर्य सिद्धान्त
के अनुसार)
सौम्यायनान्मास युगैः शिशिरादि ऋतवस्त्रयः
तथैव याम्यायनतः प्रावृडाद्यास्त्रयोमताः । ६० ।
उत्तर अयन से दो दो मास अर्थात् मकर संक्रान्ति (सायन) से दो-दो सौर
मास तक शीत आदि तीन ऋतुएं होंगी (६ मास तक) इसी प्रकार सायन कर्क
| ४०६ | सिद्धान्त दर्पण |
|---|
*आरम्भ में २-२ मास की वर्षा आदि ३ ऋतुएं होगी ।
अथ पञ्चविधाब्दानां रवि मध्यम सावनैः
दिनैर्मानानि कथ्यन्ते मध्य भुक्त्यनुसारतः । ६१ ।
रवि की मध्यम गति के अनुसार पांच प्रकार के वर्ष में मध्यम सावन दिनों
की संख्या कही जा रही है ।
द्व्यक्षिनाड् यधिकाब्ध्यर्थ रामा (३५४।२२) श्चान्द्राब्द वासराः
सैकनाड्यंक बाणाग्नि संख्या (३५९।१) नक्षत्र वर्ष जाः । ६२ ।
चान्द्र वर्ष में (३५४।२२) तथा नाक्षत्र वर्ष में (३५९।१) सावन दिन होते हैं ।
सावनाब्दस्य ते षष्ठि समन्वित शतत्रयम् । (३६०)
स पञ्च दण्ड रूपाङ्गवह्वयो (३६१।५) जैववर्ष जाः । ६३ ।
सावन वर्ष में (३६०।०) तथा बार्हस्पत्य वर्ष में (३६१।५) सावन दिन होते
हैं ।
सौराब्द वासराः पञ्चषष्ट्युत्तर शत त्रयम् । (३६५)
तिथिभिः (१५) क्ष्माग्निभि (३१) श्वैतैः (३१)
सिद्धै (२४) दण्डादिभिर्यतम् । ६४ ।
सौर वर्ष में ३६५।१५।३१।३१।२४ सावन दिन होते हैं ।
ऋक्षेण भगणं केचिदार्द्धं मासं प्रचक्षते ।
अष्ट दण्डोन नागाक्षि गुणासद् वर्ष वासराः । (३२७।५२) । ६५ ।
कुछ लोग चन्द्र भगण काल को नाक्षत्र मास कहते हैं । इस मत से नाक्षत्र
वर्ष (१२ नक्षत्र मासों में ) सावन दिन संख्या ३२७।५२ है ।
मनूनां राज्य कालोऽत्र मानवं मान मुच्यते ।
न पृथग् दिन मासादि नियमस्तत्र सम्मतः । ६६ ।
स्वायम्भुव आदि मनु प्रत्येक जितने दिन राज्य करते हैं, उस काल को मनु
कहा जाता है । इसमें अलग दिन, मास आदि की गणना नहीं है ।
चान्द्रो मासः पितृदिनं यतैः खांगगुणैः (३६०) समा
सावनैस्तद् प्रमाणं तद्द्वा पाग्नि रस दिग् दिनैः (१०,६३१) । ६७ ।
एक चान्द्र मास को ही पितरों का अहोरात्र कहा जाता है। इस प्रकार के ३६०
दिनों का पितृवर्ष होता है । एक पितृवर्ष में (१०,६३१) सावन दिन होते हैं ।
देवमानं यदेवैतदासुरं परिकीर्तितम्
सौराब्दस्तदहोरात्रो दिनरात्रिविपर्ययात् । ६८ ।
देवताओं और असुरों का मान बराबर है, पर उनका दिन और रात विपरीत
संवत्सरादि वर्णनम् ४०७
क्रम से होते हैं, जिस समय एक का दिन (६ सौर मास का ) उस समय दूसरे
की रात्रि होती है ।
स षष्ठि त्रिशताहोभि (३६०) स्तदब्दः सतु सावनैः
सम्मितः साङ्कदण्डाग्नि गोशक्राग्नि कुभि (१३१४९३१९) दिनैः । ६९ ।
इस प्रकार के ३६० दैव (या आसुर) दिनों का दिव्य वर्ष होता है। जिसमें
(१,३१,४९३१९) सावन दिन होते हैं ।
सौराब्दे रर्बुद गुणैः कृतदिक् चन्द्र वह्निभिः (३११०४०,००,००,००,०००)
सम्मितं ब्रह्मणो वर्षं पुरोक्तास्त दिनादयः । ७० ।
ब्रह्मा का वर्ष (३१,१०,४०,००,००,००,०००) सौर वर्ष होते हैं । ब्रह्मा के दिन
के बारे में कहा जा चुका है ।
मनूनां यत् पृथङ्मानं हरिवंशेऽस्तितद्रवेः ।
गत्याप्यशक्यमाने तुं लिखाभ्यार्षोक्ति गौरवात् । ७१ ।
हरिवंश में मनु का जो अलग मान दिया गया है वह सूर्य की गति से नहीं
निकाला जा सकता है । ऋषि वचन के प्रति सम्मान के कारण में उसे यहां लिख
रहा हूँ ।
यथा हरिवंशे-दिव्यमब्दं दश गुणमहोरात्रं मनोः स्मृतम्
अहोरात्रं दश गुणं मानवः पक्ष उच्यते । ७२ ।
हरिवंश पुराण के अनुसार -१० दिव्य वर्षों का मनु का एक अहोरात्र होता
है । १० मनु अहोरात्र का मनु का १ पक्ष होता है ।
पक्षो दस गुणो मासो मासै द्वादशभिर्गुणैः
ऋतुर्मनूनां संप्रोक्तः प्राज्ञैस्तत्वार्थ दर्शिभिः । ७३ ।
मनु के १० पक्षों का मनु मास, १२ मनु मास का मनु की एक ऋतु होती
है-ऐसा तत्त्व दर्शी ज्ञानियों ने कहा है ।
कालव्याप्ति र्बहुविधा श्रौत स्मार्त्तेषु कर्मसु
तत् शुद्धिश्च विवाहादौ . न्युक्ता स्मृत्युक्ति भावतः । ७४ ।
वैदिक और स्मार्त्त कर्मों में अनेक प्रकार का काल विभाग हैं । स्मृति में इस
प्रकार की काल व्यवस्था का वर्णन होने के कारण विवाह आदि में काल शुद्धि
की व्यवस्था यहां नहीं कही जा रही है ।
चन्द्रगत्यनुसारेण जलोल्लासान्महाम्बुधेः
गंगाद्यवृद्धि नियमः क्वाचित्कत्वादलेखिना । ७५ ।
चन्द्र गति के अनुसार महासागर का पानी ऊपर उठता है । अतः गंगा आदि
नदियों का पानी भी बढ़ता होगा । परन्तु यह विचार ठीक नहीं होने के कारण
४०८ सिद्धांत दर्पण
इस विषय में नहीं लिखा जा रहा है ।
भास्वत्सम्मुख भाग् दले द्युति भृतोऽन्यत्रात्मनश्छायया
व्याप्तस्येन्दव गोलकस्य सतत क्ष्मा सम्मुखै कार्द्धतः
सूर्या शांत्यजतोऽयतो धवलतां वृद्धिक्षया वीक्षते
लोकस्तत् पितरः क्व सम्मुख दले मासार्क पश्चाद् भ्रमम् । ७६ ।
चन्द्र का जो गोलार्द्ध सूर्य के समाने होता है वह सूर्य किरण से प्रकाशित
होता है तथा विपरीत दिशा का आधा भाग छाया में रहता है । छाया अर्द्ध के
सामने पृथ्वी के लोग देखते हैं, कि चन्द्र सूर्य से दूर जाते समय उसकी कला
बढ़ती जाती है । दूसरी दिशा में (चन्द्र सूर्य के निकट) आने पर चन्द्र की कला
घटती है । क्या चन्द्र मण्डल पर रहने वाले पितर भी रवि की एक मास तक
पश्चिम दिशा की गति देख पाते हैं ?
नव्याभ्र भ्रमर प्रभाकर सुता पाथः प्रफुल्लोत्पलः
प्रालेयांशुकलंक कजलमहानीलाश्म नीलोज्वलः
शम्पा चम्पक नीप कुंकुमतमी चामीकरा भाम्बरः
कृष्णः संसृति शर्करा ध्वजनितं मुष्णातु, तृष्णां मम । ७७ ।
नया काला मेष, भ्रमर, यमुना जल, प्रफुल्ल नील कमल, चन्द्र का काला
कंलक, कजल और नीलमणि के समान उज्ज्वल, बिजली, चम्पाफूल, कुकुम,
हल्दी और सोने के समान पीताम्बर धारण करने वाले कृष्ण जगन्नाथ संसार रूपी
लोभ द्वारा जन्मी मेरी तृष्णा को नष्ट करे ।
इत्युत्कलोज्वल नृपाल कुल प्रसूत
श्री चन्द्रशेखर कृतौ गणितेऽक्षिसिद्धे
सिद्धान्त दर्पण उपाहित बाल बोधे
द्वाविंशकः प्रथित काल इतः प्रकाशः । ७८ ।
इस प्रकार उड़ीसा के प्रसिद्ध राज परिवार में उत्पन्न श्रीचन्द्रशेखर द्वारा गणना
और दृष्टि में समानता तथा बालकों के ज्ञान के लिये लिखे सिद्धान्त दर्पण में
काल वर्णन सम्बन्धी २२ वां प्रकाश समाप्त हुआ ।
त्रयोविंश प्रकाश
पुरुषोत्तम स्तव वर्णन
या वाग् वाग् ब्रह्म शर्वेडित गुणविततेः श्रीपते वर्णनाढ्या
सास्याद् विश्वाशुभघ्नी सततमपियुता यद्यवद् गव्यपद्यैः
या तद्रक्ता सुपृक्ता पि च सुभग पदै स्त्यज्यते सद्भिरेशा
तस्मात् कृष्णा चले शामल गुण जलधो वर्णनीयोऽत्रविन्दुः । १ ।
सरस्वती, ब्रह्मा और शिव द्वारा पूजित गुणों के समुद्र लक्ष्मीपति की गद्य पद्य
पूर्ण वाक्यों में विस्तृत वर्णन है । वह सारे संसार का क्लेश दूर कर सकते हैं,
इसमें सन्देह नहीं है ।
दूसरे अर्थ से जो वाक्य अत्यन्त सुन्दर पद विन्यास और लय से युक्त हैं ।
पर उसमें भगवान् का गुण कीर्तन नहीं है उसको सज्जन ग्रहण नहीं करते हैं ।
अतः विशुद्ध गुण के सागर नीलाचल नाथ श्री जगन्नाथ का बहुत थोड़ा
वर्णन यहां किया गया है । गुण के सागर होने के कारण सभी गुणों का वर्णन
नहीं हो सकता ।
उत्कल
यत्रक्षेत्रं पवित्रं विलसत सितरुङ् मित्रनेत्रस्य गात्रं
गोत्रा यत्रातिमात्रा स्तदवयव सृती दीपवत्यो विचित्राः
स्वस्थानस्थाः पदस्थापित निजजनता देवताः सन्ति नित्याः
मर्त्याःस्मार्ताः स्मरार्ता हरिचरण रता श्रोत्कलः स्तात्कलिघ्नः । २ ।
जिस देश में कमल नेत्र श्रीकृष्ण का शरीर तथा पवित्र क्षेत्र है, जिसके
अंशरूप में अनेक पर्वत हैं जहां देवताओं के मन्दिरों में सदा दीपक जलते हैं,
जहां देवी देवता अपने अपने मन्दिरों में स्थित होकर भी भक्तों को उच्च पद पर
स्थापित करते हैं, जहां के लोग स्मार्त काम कर नाम स्मरण और प्रभु चरण सेवा
में तत्पर हैं । वह उत्कल देश कलि के दोषों का नाश करे ।
स्तव्याभव्या अभव्या अपि वचन चयैर्नव्य नवैश्च दिव्यै
र्वास्तव्ययत् पृथिव्या मवनत वदनै व्योम्नि निर्वर्ण्यमाना
बाहू व्यूहाग्र विभ्राजित वन जगदा कम्बुचक्रा इवेङ्गे
रौडूः प्रौढः प्रभावो जयति परिवढः सर्वदेशस्य सोऽयम् । २ ।
जहां के निवासी अयोग्य होने पर भी हाथों में चक्र गदा और पद्म धारण
करने वाले विष्णु की तरह दीखते हैं । देवगण आकाश में झुक कर उनकी विचित्र
और बड़े शब्दों में प्रशंसा करते उनको योग्य कहते हैं, वह औड्र देश बहुत प्राचीन
काल से विख्यात है और अन्य देशों से उच्च स्थान पर है ।