सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)
Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara
सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा
३२२ सिद्धान्त दर्पण
स्वस्व कक्षाः स्वभगणैरभ्यस्ताः कुदिनो (१५,७७,९१,७८,२८,०००) हृताः
फलं स्वगति मानं स्यात् खेचराणां दिनेदिने । २३ ।
ग्रह के कक्षा योजन को ग्रह के कल्प भगण से गुणा कर कल्प सावन दिन
से भाग देने पर ग्रह की दैनिक योजन गति होती है ।
स्वस्व पूर्ण गतिः स्वस्व कक्षायां योजनात्मिका
कथ्यतेऽथैक दिवसे रविमध्यम सावने । २४ ।
सूर्य के एक मध्यम सावन दिन में ग्रहों की अपनी अपनी कक्षा में योजनात्मक
सावन गति कही जाती है ।
भूगोलं परितोऽर्कस्य गजांगाष्टाभ्रविश्व के । १३०८६८)
खनखेशा (११,२००) विधोर्मानां प्राक् पश्चात् कृत गोनखाः (२०९४) । २५ ।
पृथ्वी के चारों और सूर्य की मध्यम सावन दिनों में गति (१३०,८६८) है ।
चन्द्र का (११,२००) तथा भचक्र (अयन) की पूर्व या पश्चिम दिशा में गति (२०९४)
योजन है ।
ज्ञशुक्रयोस्तु मध्यार्क क्रमात्र्य ष्ट्राष्ट्र गोनखाः (२०, ९८०३) बुध ।
गोऽक्षितृग् वेद तिथयः (१,५४,२२९) परितोऽथ महीभुवः । २६ ।
मध्यम रवि के चारों तरफ घूमते हुए बुध और शुक्र की अपनी अपनी कक्षा
में एक सावन दिन में गति क्रमशः (२०,९८०३) तथा (१, ५४,२२९) योजन है ।
मंगल की गति-
वसुसिद्धार्थ शून्येन्दु (१०५२४८) गुरोर्देवाद्रि षट् शराः (५६,७३२)
शनैश्चरस्य नागाभ्रपूर्णचन्द्राब्धयः (४१,००८) । २७ ।
(१,०५,२४८) योजन, गुरु (५६,७३३) योजन तथा शनि (४१,००८) योजन है ।
गतिश्चक्र कलाघ्नी स्वकक्षाप्ता कलात्मिका
भवति प्रायशस्तेषा मथोक्ता योजनात्मिका । २८ ।
किसी ग्रह की योजनात्मक गति को चक्रकला (२१, ६००) से गुणा कर उस
ग्रह की कलात्मक कक्षा से भाग देने पर प्रायः योजनात्मक भचक्र (आयन) गति
होती है ।
भवति (२०९४) ग्रह कक्षाघ्नी भकक्षाप्ता फलोनयुक्
पश्चात् प्राक् चक्र चलने भवेत् खेट गतिः स्फुटा । २९ ।
योजनात्मक आयनगति को ग्रह के कक्षा योजन से गुणा कर भकक्षा योजन
से भाग देने पर जो फल होगा उसे भचक्र पश्चिम की तरफ चलने पर ग्रह गति
से कम तथा भचक्र पूर्व की तरफ चलने से ग्रह गति में जोड़ेंगे । इससे सायन
मेष आदि से ग्रह की योजन में स्फुट गति होगी ।
भूगोल खगोल वर्णनम् ३२३
स्वतुंगा कर्षण वशात् कक्षा केन्द्रान्नभः सदाम्
कर्णस्योनाधिकत्वेऽपि समैव प्राग् गतिर्भवेत् । ३० ।
अपने उच्च आकर्षण के कारण ग्रह अपनी कक्षा से ऊपर नीचे होने पर भी
उसकी पूर्व दिशा में योजन गति समान ही रहती है । कर्ण कम या अधिक होने
पर भी पूर्व दिशा में योजनात्मक गति या कलात्मक गति (अपनी कक्षा के अनुपात
में ) समान होती है ।
विक्षिप्तानां स्वकैः पातैः सौम्य याम्य गतिः पुनः
न्यूनाधिकाद् भवेत्येषां मन्दकर्णानुसारतः । ३१ ।
अपने अपने पात द्वारा क्रान्ति वृत्त से उत्तर या दक्षिण दिशा में (शर) गति
ग्रहों के अपने मन्द कर्ण के अनुपात के अनुसार होती है ।
'भूरिन्दु सौम्य शुक्रार्क कुजेज्यार्कि भवृत्तकैः
क्रमायतै वृतेत्युक्तिः प्राच्यां दृष्टि विरोधिनी । ३२ ।
पृथ्वी के चारों ओर क्रमशः बड़ी कक्षाओं में चन्द्र, बुध, शुक्र, रवि, मंगल,
वृहस्पति, तथा शनि हैं,- ऐसा प्राचीन आचार्यों ने कहा है, पर यह दृक् सिद्ध
नहीं है ।
यत्तदुक्ता नभः कक्षा स्वकल्पभगणो दृता
लब्धाभिर्ग्रहकक्षाभिः सिद्धाभिर नुपाततः । ३३ ।
ऊपर जो ग्रहों की कक्षा का योजनात्मक मान कहा गया उसमें ग्रह के कल्प
भगण (अपूर्ण भगण अंश) से भाग देने पर अपनी कक्षा में कितना योजन ग्रहने
पार किया है और अनुपात द्वारा प्राप्त होगा ।
वेष्टिते लिखिते विन्दौ भूमि नाम्नि विपश्चिता
स्व स्व कक्षा सु तुल्याया नान्यायां प्राग्गतौ पुनः । ३४ ।
इस प्रकार ग्रह के कक्षा वृत्त खींचकर उनके केन्द्र बिन्दु को 'भू' नाम देकर
अपनी अपनी कक्षा में ग्रह की स्थिति और उसकी पूर्व गति लिखेंगे ।
शीघ्रोच्चा कर्षणोद् भूत दोः फलाग्रस्थितद् ग्रहः
भूतारास्य च सूत्रस्थश्चक्रार्द्ध नैति वक्रताम् । ३५ ।
इस स्थिति में शीघ्रोच्च आकर्षण के कारण जो भुजफल (शीघ्रफल ) होगा
उसके आगे (उतनी दूरी पर) ग्रह को रखेंगे । पृथ्वी, एक तारा (ग्रह की उस
स्थित के पास नक्षत्र) तथा ग्रह इन तीनों को एक सूत्र में देखेंगे । इसमें देखेंगे
कि चक्रार्द्ध में (उच्च से १८०° या नीच पर) ग्रह वक्र दीखता है या नहीं ।
तदस्मदुक्त मार्गस्थाः क्रमाल्पगतयोऽर्कतः
सूर्यर्क्षसूत्रगाः क्ष्मर्क्ष सूत्रात् स्युर्वक्रिणाः खगाः । ३६ ।
ामपि? Wait, look at the letter: First letter: looks like घृorधृorवृorदृorबृorशृ? Wait, look at the second letter: Is it ष? Wait, what if it's बुधानां? No, it has दाandमandपि. Wait, look at घृषदामपि: Could it be ग्रहाणामपि? Wait, does it look like ग्रहाणामपि? Let's look at दा: could it be णा? In many fonts, णhas two vertical lines or a loop with a vertical line:णा. Wait, does that letter look like दाorणा? It is a single vertical line with a round belly and tail: that is definitely दा! Wait, what about ष? It has a square with a diagonal: definitely ष! Wait, what about घृ? Could the word be वृषदामपि? घृषदामपि`?
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भूगोल खगोल वर्णनम् ३२५
तारा ग्रहों की कक्षा बड़ी है ।
व्यर्क सूक्ष्मेन्दु बाहुज्या चन्द्र कर्णेन ताड़िता
सौराद्युक्तार्क कर्णाप्ता फल लिप्ता युतोनितः । ४४ ।
चन्द्र से रवि (की राशि) घटाकर उसकी भुजज्या निकालें) उसको चन्द्र कर्ण
से गुणा कर सूर्य सिद्धान्त या भास्कर के अनुसार रवि कर्ण मान से भाग देने पर
जो फल आता है उसे चन्द्र में जोड़ने या घटाने से
पक्षयोः शुभ्रभानुश्चेच्छुक्लाष्टम्यादि पादके
कृष्णाष्टम्यन्त पादे च पूर्णार्द्धः स्यान्नदृक् समः । ४५ ।
शुक्ल पक्ष के चन्द्र में जोड़ने या कृष्ण पक्ष के चन्द्र में घटाने से शुक्ल अष्टमी
के प्रथम पाद में (रवि चन्द्र का अन्तर ८४°-८७° के बीच रहने पर ) और कृष्ण
अष्टमी के अन्तिम पाद में (रवि चन्द्र का अन्तर २७३°-२७६° के बीच) पूर्ण चन्द्र
का आधा शुक्ल नहीं होता जो गणना से होना चाहिये ।
यदि द्वितीय पर्वान्त तृतीयाङ्घ्रि प्रवेशयोः
चन्द्रार्द्ध लक्ष्यते साक्षात् सूर्यकर्णोऽधिकस्ततः । ४६ ।
किन्तु शुक्ल अष्टमी के द्वितीय पाद के अन्त में (रवि चन्द्र अन्तर ९०°) तथा
कृष्ण अष्टमी के द्वितीय पाद के अन्त में (रवि चन्द्र अन्तर २७०°) चन्द्र का आधा
बिम्ब शुक्ल दीखता है । अतः मैने सूर्य कर्ण उन ग्रन्थों की तुलना में अधिक लिया
है ।
महत्ता भवतत्कक्षा बिम्बयोर्युक्ति भिः रवेः
इयता कथमानीता प्रश्नश्चेदिति कथ्यते । ४७ ।
सूर्य से आरम्भ कर सभी ग्रहों की कक्षा और बिम्ब का बड़ा मान सूर्य से
आरम्भ कर सभी ग्रहों की कक्षा और बिम्ब का बड़ा मान (सूर्य सिद्धान्त की
तुलना में) तर्क द्वारा सिद्ध होना चाहिये । अतः इन सभी का मान किस प्रकार
इतना हुआ इसका वर्णन कर रहा हूँ ।
नहि, शब्दाखिल त्यागा दनुमानं प्रशंस्य ते
विस्तारोऽकृतो भानो स्तनमया श्रुति सम्मतः । ४८ ।
वेद को न मानकर सिर्फ अनुमान की प्रशंसा नहीं होती है । अतः मैने सूर्य
का वेदोक्त व्यास स्वीकार किया है ।
ब्रह्मविद्योपनिषदि प्रणवार्थ निरूपणे ।
द्विसप्तति सहस्राणि योजनानीति भास्वतः । ४९ ।
ब्रह्मविद्या उपनिषद् में प्रणव (ॐ) के अर्थ की व्याख्या के समय सूर्य का
व्यास ७२,००० योजन कहा है ।
३२६ सिद्धान्त दर्पण
श्रीमत्पुरुषेणोक्ता विस्तृति र्यान्तिम् श्रुतौ
दृक् सिद्धा सार्क सिद्धान्त भूव्यासश्च तथा मतः । ५० ।
महापुरुष भगवान् ने अथर्व वेद में भी इतना ही विस्तार (सूर्य व्यास का)
कहा है । सूर्य सिद्धान्त में पृथ्वी का जो व्यास दिया गया है वह भी दृक् सिद्ध
है ।
मध्य बिम्बकला भानो यंत्र वेधेन लक्षिताः
भास्करेणोदिता दन्ताः (३२) सदन्त विकला (३२) यतः ५१ ।
यन्त्रवेध द्वारा भी सूर्य की मध्य बिम्ब कला (३२।३२) है जितना भास्करा
चार्य ने कहा है ।
तावद् दृष्टा नुपातेन कर्णमार्गो मयोदितः
ततः कक्षाः परेषान्तु सशीघ्र फल दर्शनात् । ५२ ।
मैने इस दृश्य बिम्बकला (तथा वास्तविक बिम्ब व्यास योजन) के अनुपात
से रवि कर्ण (सूर्य की दूरी) का मान कहा है । उसके अनुसार कक्षा का मान
कहा है । ग्रहों का अपना शीघ्र फल देखने से
शैघ्राः परिधयः सिद्धास्तद् गुणाद् भांश भाजितात् (३६०)
कक्षा वृत्ताद्रवेः सिद्धे स्व स्व कक्षेज्ञ शुक्रयोः । ५३ ।
अन्य ग्रहों की शीघ्र परिधि भी (अनुपात द्वारा) निकलती हैं । रवि के कक्षा
वृत्त को (बुध और शुक्र की) शीघ्र परिधि के अंश से गुणा कर ३६० से भाग देने
पर क्रमशः बुध और शुक्र की अपनी अपनी कक्षा का मान आता है ।
भू कक्षाया विभक्तायाः शैघ्रैः परिधि भागकैः
कुजेज्य मन्दकक्षाः स्युरिति सर्वं 'समञ्जसम् । ५४ ।
अपनी अपनी शीघ्र परिधि के अंश से भू कक्षा में भाग देने पर मंगल, गुरु
और शनि को कक्षा होगी । इस प्रकार इन मानों का सामञ्जस्य (तर्क संगति)
हुआ ।
नति लम्बन भूयस्थ बिम्ब मानो नतेक्षणात्
भूच्छाया लोकतिश्चन्द्र कक्षा बिम्बाल्यता कृता । ५५ ।
नति और लम्बन की अधिकता बिम्बमानो में अन्तर होने के कारण भूछाया
और चन्द्र बिम्ब का मान कम किया गया है ।
सूर्यान्नक्षत्र सूत्रस्थ ग्रहाणामन्तदोः फलम्
शैघ्रं भूमेरुङ्गत तात् सूत्राद् यद् बुध शुक्रयोः । ५६ ।
सूर्य से नक्षत्र सूत्र में स्थित (नक्षत्र दिशा में) ग्रहों का परम शीघ्रफल, यदि
पृथ्वी से नक्षत्र सूत्र में स्थित बुध और शुक्र से शीघ्र फल से-
भूगोल खगोल वर्णनम् ३२७
अधिकं दृश्यते यावद् भौमेज्य रविजन्मनाम्
यावन्न्यूनञ्च तद् बाहु फलान्तर कलायतः । ५७ ।
अधिक होता है तथा मंगल, गुरु शनि का शीघ्र फल कम दीखता है । तो
उन दोनों भुज (रवि नक्षत्र दिशा तथा भूनक्षत्रदिशा) के अन्तर कला
फलं खाङ्गाग्न्यंश (३६०) तुल्या भकक्षा तादृशोततः
दस्राद्येत्यतर भानान्तु न सीमा निश्चिता स्थिते । ५८ ।
३६० कला होने के कारण भ (नक्षत्र) कक्षा को रवि कक्षा से ३६० गुणा माना
गया है । अश्विनी आदि नक्षत्रों के अतिरिक्त अन्य नक्षत्रों की स्थिति सीमा अभी
तक ज्ञात नहीं है ।
बिम्ब ज्ञानात् पुष्पवतोः स्वकर्णः परिचीयते
स्वकर्ण वर्गत भर्नां ज्ञायन्ते मण्डलान्यपि । ५९ ।
सूर्य और चन्द्र की बिम्ब ज्ञान होने से कर्ण ज्ञान होता है । नक्षत्रों का कर्ण
ज्ञात होने से उनका बिम्ब ज्ञान होता है ।
बिम्बात्म चक्षुषोर्मध्यस्थिताच्छादन पट्टका
बिम्बव्यास समायत्र दृश्यान्यस्यात्र निश्चला । ६० ।
नक्षत्र बिम्ब और अपने आंख के बीच आवरण पट्टिका जितनी दूरी पर रखने
से वह जिम्ब व्यास के समान दीखे वह दूरी स्थिर करनी होगी ।
पट्टिकाक्ष्यन्तरं बिम्बव्यास निघ्नं तयोद्धृतम्
रवीन्दु कर्णमानं स्यात् कर्णाद् बिम्बोऽपि सिद्धयते । ६१ ।
पट्टी और आंख के बीच के दूरी को बिम्ब व्यास से गुणा कर पट्टी व्यास
से भाग देने पर रवि और चन्द्र कर्ण मान आयेगा । इसके उल्टे अनुपात द्वारा
कर्ण से बिम्ब निकाला जा सकता है ।
किं वोदयास्त मययोः प्राक् पश्चात् कुड्ययो गृहे ।
तद् वातायन माच्छाद्य तालपर्णेन तत्र च । ६२ ।
अथवा सूर्य उदय या अस्त के समय पूर्व या पश्चिम खिड़की को ताल पत्र
से ढंक कर-
विधाय वर्तुलं सूक्ष्मं छिद्रं तेनाध्वना गतः
अतपोऽपरभित्थ्यो यो बिम्बाकार ईक्ष्यते । ६३ ।
उस में सूक्ष्म छिद्र करने पर दूसरे तरफ की दीवाल में उस छेद से प्रकाश
जाने के कारण बिम्ब आकार का आकाश दीखता है ।
तद् व्यास छिद्रमानोनो हार कुड्य विलान्तरम्
बिम्ब मानाहतं हारं भक्तं कर्णः स्फुटो भवेत् । ६४ ।
३२८
सिद्धान्त दर्पण
उस प्रकाश व्यास से छिद्र का व्यास घटाने पर हार होता है । उस दीवाल
और छिद्र के बीच की दूरी को बिम्ब प्रमाण से गुणा कर हार से भाग देने पर
(सूर्य का) स्फुट कर्ण आता है ।
यस्य यस्य ग्रहस्यापि चन्द्रेणास्त मयोदयौ ।
विलोक्यते समंतस्य मण्डलं ज्ञातु मिष्यते । ६५ ।
जिस तारा और ग्रह का चन्द्र के साथ अस्त होता है । उनके मण्डल का
मान जानने के लिए -
षट् त्रिंशद् हस्ततो दूरे चन्द्र बिम्बाभिधायकम्
अताराच्छादकं न्यस्य कुत्रचित्ताल वृन्तकम् । ६६ ।
अपने दृष्टि स्थान से ३६ हाथ की दूरी पर एक ताल पत्र इस आकार का
रखेंगे, जिससे उतनी दूरी पर चन्द्र बिम्ब ढंक सके । उसको ऐसे स्थान पर रखेंगे,
जिससे तारा बिम्ब नहीं ढंके ।
चन्द्र बिम्बैक देशोऽत्र यथा तत्तारका समः
दृश्यते शुषिरं तद् वत् कार्यं तत्पादसं गुणात् । ६७ ।
उसमें इतना बड़ा छेद करेंगे जिससे तारा (तारा ग्रह ) का बिम्ब पूरादीख
भूगोल खगोल वर्णनम् ३२९
उच्चस्थान में स्थित दीप से किसी दिशा में समधरातल पर सम शंकु रख
कर उसकी छाया नाप लेंगे ।
शंकुमन्यं कियद्दूरे निवेश्यान्तर मेतयोः
द्वितीय शंकु भायुक्तं प्रथम प्रभयोज्झितम् । ७२ ।
उसी दिशा में उतना ही ऊंचा एक और शंकु रखर उसकी छाया भी नाप
कर दोनों शंकु के बीच की दूरी भी नापते हैं । उसमें दूसरे शंकु छाया जोड़कर
पहली छाया घटाते हैं ।
पुनस्तयाघ्नं विभजे छाययोरन्तरांगुलैः
लब्धं प्राक् शंकुभा हीनं भवेद्दीप तलस्थलात् । ७३ ।
फल को प्रथम शंकु छाया से गुणा कर उसको घटाने पर दीप मूल से प्रथम
शंकु की दूरी होगी ।
आपूर्व शंकु भूमान मथ लब्धं पुरोदितम्
शंकुघ्न प्रथमच्छाया भक्तं दीपोन्नति र्भवेत् । ७४ ।
भूमान निकालने से पहले जो लब्धि आयी थी उसे शंकु की ऊंचाई से गुणा
कर प्रथम शंकु की छाया से भाग देने पर दीप की उन्नता होगी ।
शंकु दीपान्तरं शंकु गुणितं छाययोद्धृतम्
शकुमानयुतम् दीपोन्नतिः स्यादेक शंकुतः । ७५ ।
शंकु और दीप के बीच की दूरी को शंकु से गुणा कर छाया से भाग देने पर
तथा उसमें शंकु की उन्नता जोड़ने पर दीप की उन्नता होगी ।
आक्रोश पर्वताद् यत्र शृंगतस्य विलोक्यते
तत्र तत्सम सूत्रस्थौ शतदण्डाधिकान्तरौ । ७६ ।
जहां पर एक कोस तक के क्षेत्र से पर्वत का शृंग (चोटी) दीखती है । वहां
शृंग से एक सरल रेखा (सम सूत्र) में परस्पर १०० दण्ड से अधिक दूरी पर
पञ्चहस्तोच्छितौ शंकु निवेशा वक्रितौ दृढम् ।
नवशंक्वग्रयोः साम्यं दृष्ट्वा दर्शे भुवस्थिते । ७७ ।
५ हाथ ऊंचा दृढ़ और सीधा शंकु स्थापित करेंगे । तब पृथ्वी की सतह पर
उसी रेखा में (सम सूत्र) एक दर्पण इस प्रकार रखेंगे जिससे उस दर्पण में पर्वत
(शृंग) और शंकु का अग्रभाग एक विन्दु पर दीखे ।
तद् भागे यत्र निश्चित्य द्विन्मान्मागौच्छ्यौ तथा
दवीयसी गिरौ मार्गैऽनुमिते त्येक शंकुना । ७८ ।
दर्पण स्थिति से दोनों शंकु का छायाग्र भाग स्थिर कर जिस प्रकार दीप की
उन्नता तथा दूरी ज्ञात हुई थी उसी प्रकार पर्वत शृंग की उन्नता तथा दूरी भी ज्ञात
३३० सिद्धान्त दर्पण
होगी। पर्वत यदि बहुत दूर पर हो तो एक शंकु द्वारा उसकी उन्नतता निकाली जा
सकती है।
मातुमध्य धरोन्नत्या सह दृश्यां शमस्यहि
तिर्यग् विस्तीर्णता तिर्यक् शंकु नैवाव गच्छतु । ७९ ।
पर्वत का दृश्य भाग तथा भू पृष्ठ से ढंका अदृश्य भाग नापने के लिए तिर्यक
शंकु का व्यवहार होता है।
द्रुमाता शत हस्तत्तु दशहस्ताधिकान्तरौ
तावन्तौ वार्द्धमानौ वास्थाप्यौ तन्मितये नरौ । ८० ।
१०० हाथ तक ऊंचे किसी पेड़ की ऊंचाई नापने के लिए दस हाथ से अधिक
दूरी पर दो शंकु स्थापित करेंगे। उसके आधा अर्थात् ५ हाथ अन्तर पर भी यह
शंकु रखा जा सकता है। इन शंकुओं की उन्नतता भी १० हाथ या ५ हाथ होगी।
प्रमायार्केन्दु का शंकुप्रमेयच्छाययोर्गतिम्
तुल्यकाल भवां शंकु मेरुभागति ताड़ितः । ८१ ।
उस समय सूर्य या चन्द्र के कारण शंकु की छाया तथा मेरु (वृक्ष की चोटी)
की छाया की गति (लम्बाई) ज्ञात करेगी। शंकु को मेरु वृक्ष की चोटी छाया
की गति से गुणा कर
स्वभागत्याम उच्छ्रायोज्ञेयः शंकु भया तुसः
क्षुण्णः शंकु हतच्छाया मानं तत्तलतौ भवेत् । ८२ ।
अपनी छाया गति से भाग देने पर वृक्ष की उन्नति होगी। वृक्ष की उन्नति
को शंकु छाया से गुणा कर शंकु से भाग देने पर वृक्ष मूल से छायाग्र तक की
भूमि का मान होगा।
अव्यग्रस्याद् प्रखण्डस्यदृश्यार्कान्तर लिप्तिकाः
प्रमाय तत्क्षणं तद् भास्वस्थानान्तर हस्तकान् । ८३ ।
मेघ प्रायः स्थिर रहने पर उसमें और सूर्य के बीच की कोणीय दूरी को कला
में नापेंगे। उस समय अपने स्थान से पृथ्वी पर मेघ छाया की दूरी भी हाथों में
नापेंगे।
त्रिज्या हतान् भजेत्ताभिरुछायातोऽभ्रश्रुतिः फलम्
सा तत्काल नृभाध्याप्तात्तत् श्रुत्या दिनकृद्दिशि । ८४ ।
अपने स्थान से मेघ छाया की दूरी को त्रिज्या (३४३८) से गुणा कर सूर्य
और मेघ के बीच कलात्मक दूरी से भाग देंगे। फल मेघ छाया से मेघ तक कर्ण
(दूरी) का मान होगा। उस कर्ण को उसी काल के शंकुछाया से गुणा कर छाया
कर्ण से भाग देने पर सूर्य की दिशा में (मेघ कर्ण से मेघ तल तक की दूरी होगी।)
भूगोल खगोल वर्णनम् ३३१
आमेघ तल भूमानं स्यात्तन्नृघ्नं प्रभाहृतम्
घनोन्नत्यमिति ज्ञेय मन्यन्त्रैराशिक क्रमात् । ८५ ।
मेघ कर्ण से मेघ तल तक भूमि पर दूरी होगी । इस दूरी को शंकु से गुणा
कर शंकुछाया से भाग देने पर भूमि से मेघ की ऊंचाई होगी । इसी प्रकार त्रैराशिक
गणित द्वारा अन्य (प्रसाद आदि की) भी ऊंचाई निकाली जा सकती है ।
अष्टादश प्रकाशोक्त दृष्टि सीमादि विस्तरात्
विशेषः कथ्यते कश्चिद् गोलता ज्ञापकः क्षिते । ८६ ।
अठारहवें अध्याय में दृष्टि सीमा की दूरी का वर्णन किया गया था । यहां
कुछ और कहा जा रहा है, जिससे पृथिवी का गोलाकार और स्पष्ट हो जायेगा ।
शंकु दर्शन सीमायां परितो मण्डलाकृतिः
भूपृष्ठे साधिता सैव निजक्षितिज मण्डलम् । ८७ ।
भू पृष्ठ के चारों ओर वृत्ताकार में जो शंकु के दर्शन सीमा से निकाली गयी
है । उसी को शंकु का दृश्य क्षितिज मण्डल कहा जाता है ।
तिष्ठताभूविदूरत्वाद यः पुंसा नैव दृश्यते
उच्चस्थानाधिरूढेन स पुनर्द्दश्यते नगः । ८८ ।
जो पर्वत बहुत दूरी के कारण पृथिवी की सतह से नहीं दीखता है वही पर्वत
ऊंचे स्थान पर चढ़ने से दिखाई देता है ।
अन्योन्य विप्रकृष्टाग द्वय क्षितिज वृत्तयोः
यावत् स्यान्मेलनं तावद् दृश्यते भुवि तद् द्वयम् । ८९ ।
दूर पर स्थित दो पर्वतों की दृष्टि सीमा के व्यासार्द्ध से दो क्षितिज वृत्त बनाया
जायेगा । दोनों वृत्तों के मिलन स्थल में स्थित व्यक्ति को दोनों पर्वत दीखेगा ।
यत् शंकोः क्षितिजस्थेन यावान्यंशोऽन्यशंकुतः
पुरतो दृश्यते तावान् स्तदग्रे तिष्ठता यतः । ९० ।
एक पर्वत (शंकु) के क्षितिज (वृत्त के सीमा विन्दु पर) रहने से दूसरे शंकु
का कुछ अंश (चोटी से कुछ नीचे तक) दीखेगा ।
क्षितिजेदृश्य लिप्ताद्याः क्षितिजान्य नरान्तरा
गुणिताः शंकु युग्मान्त मार्गाप्ताः स्युर्नरि स्फुटाः । ९१ ।
क्षितिज से स्थित व्यक्ति को दूसरे शंकु का जितना भाग (कला में ) दीखता
है उसे दोनों शंकु के अन्तर (ऊंचाई के अन्तर) से गुणा कर उनके बीच की दूरी
से भाग देने पर शंकु अग्र की स्फुट दृश्यलिप्ता आदि होगी ।
तयोरति दवीयस्त्वान्न लगेत् क्षितिजद्वयम्
तयोरेकाग्र निष्ठेन नान्यः सन्दृश्यते क्वचित् । ९२ ।
३३२ सिद्धान्त दर्पण
यदि दो पर्वतों का दृष्टि क्षितिज नहीं मिलता है, तो एक क्षितिज की सीमा
से भी दूसरा पर्वत नहीं दिखायी देगा।
महाद्रिक्षितिजस्यान्तः क्षुद्रादि क्षितिजं यदि।
लीयते तन्महागस्थः क्षुद्रं कौलीन मीक्षते । ९३ ।
बड़े पर्वत के क्षितिज के भीतर ही यदि छोटे पर्वत का क्षितिज वृत्त हो तो
बड़े वृत्त की सीमा से देखने पर सिर्फ बड़ा पर्वत दिखाई देगा। छोटा पर्वत बीच
में रहने पर भी नहीं दीखेगा। वह पृथ्वी में लीन हुआ दीखेगा।
उभयक्षितिजस्पर्शाद् यदि स्यान्मत्स्य रेखिका ।
तदाप्ययतनुं पश्येद् व्योमगं क्षितिजो परि । ९४ ।
बड़े और छोटे पर्वत की क्षितिज वृत्त रेखा स्पर्श करती हो तो स्पर्श रेखा पर
रहकर देखने से बड़ा पर्वत आकाश में ऊंचा दीखता है।
भू पृष्ठं यदि तुल्यं स्याद्दर्पणे च दरत्तदा
उच्चेऽनुच्चोऽपि दूरस्थो दृश्य क्षित्यन्तरेव सः । ९५ ।
भूमि पृष्ठ यदि दर्पण के समान समतल होता तो थोड़ी ऊंचाई पर स्थित होकर
भी कोई दूर के छोटे छोटे पर्वत पृथ्वी की सतह से लगा हुआ देखता ।
यद् गोलता स्फुटा साक्षाद् गिरेः क्षितिज मण्डले ।
यथा तथैव शिखरे ज्योतिश्चक्रस्य दर्शनात् । ९६ ।
पर्वत के क्षितिजवृत्त पर पृथ्वी का गोलाकार स्पष्ट दीखता है। पर्वत शिखर
पर रहकर ऊपर की तरफ देखने से ज्योति चक्र (राशि वृत्तं) की गोलाई स्पष्ट
दीखती है।
प्राक् पश्चाद् दृष्टि सीमोत्थ देशान्तर पलै रविः
उदेति पुरतः पश्चादस्तमेति नगोपरि । ९७ ।
पर्वत के ऊपर स्थित व्यक्ति पर्वत के नीचे भाग पर स्थित व्यक्ति से देशान्तर
लिप्तादि पहले सूर्योदय देखता है। तथा बाद में सूर्यास्त देखता है।
तिष्ठतः समभूस्थल्यां सांघ्रि हस्तत्रयोन्नतेः
पश्यतो नव साहस्र हस्तैः क्षितिज निश्चयात् । ९८ ।
साढ़े तीन हाथ ऊंचा व्यक्ति समतल पर जो क्षितिज देखता उसकी दूरी अपने
स्थान से ९००० हाथ है।
तद्देशान्तर कालस्तु पलोनत्वात् न गण्यते
नव्य वहिय तेचाद्रौ दृक् सिद्धेऽपि क्षणाधिकः । ९९ ।
पर्वत के ऊपर और नीचे के क्षितिज में समय का अन्तर यदि एक पल से
कम हो तो उसकी गणना नहीं होती है। यह दृक् सिद्ध होने पर भी ग्रहण में
भूगोल खगोल वर्णनम् ३३३
इसका उपयोग नहीं है ।
हस्तै रन्ध्ररसांग सिद्ध जलधि व्यो्राष्टभिः (८,०४,२८,९६०) संम्मितो
यन्मध्ये परिधिर्बभाविह महीपृष्ठे स्थितानांकमात् ।
शंकूनां किलतत्तदर्द्ध व पुषां क्रोशांघ्रि संख्या ब्रुवे
दृक् सीमां प्रथमोऽत्र षण्णवनभः पाथोधि हस्तोन्नचः । १०० ।
भूगोल के परिधि (८०४२४९६०) हाथ है । इस पर ११ शंकुओं की दृष्टि सीमा
का मान क्रोश के चतुर्थांश (१/४ कोस) में कहता हूँ । प्रथमशंकु का मान ४०९६
हाथ ऊंचा है । २ से ११ वें शंकु पहले से आधे हैं ।
दृग् भूपाः (१६२) शर शंकराः (११५) कुवसवः (८१)
सप्तेषवः (५७) खाब्धयो (४०) गोनेत्राणि (२९) नखा (२०)
श्रुतुर्र्दश (१४) दिशो (१०) गोत्राःशराः (५) प्रायशः इच्छानृघ्न
परा (४०९६) मद्दृङ् नृपकृतेः (२६२४४) सीमापदं गोः
स्वनूः सीमावर्गहतः पराकृति (२६२४४) हतो
नाद्यः (४०९६) स्वनांसीमतः । १०१ ।
शंकुओं की उच्चता और उनकी दृक् सीमा १/४ कोस में इस प्रकार -
शंकु संख्या शंकुउच्चता (हाथ में ) दृक् सीमा (१/४ कोस में )
१ ४०९६ १६२
२ २०४८ ११५
३ १०२४ ८१
४ ५१२ ५७
५ २५६ ४०
६ १२८ २९
७ ६४ २०
८ ३२ १४
९ १६ १०
१० ८ ७
११ ४ ५
इच्छा शंकु की दृक् सीमा निकालने के लिए शंकु की उच्चता में (४०९६)
हाथ से भाग देकर ४०९६ हाथ शंकु की दृक् सीमा (१६२ कोस पाद) के वर्ग
(२६,२४४) से गुणा करने उसका वर्गमूल लेते हैं ।
लक्ष्माष्ट दिनेश (१२८,००,०००) हस्तमवनि
व्यासाद्धमेतत् कृतिं (१६,३८,४०,००,००,००,०००)
सैकव्यास दलस्य (१२८,००,००१) वर्गंत (१६,३८,४०,०२५,५६,००, ००१)
ऋषी कृत्यावशेषात् (२५६,००,००१) पदम् (५०५९/३९) ।
३३४ सिद्धान्त दर्पण
दृक् सीमैक करस्यानुर्भवेति तत् वर्गो (२५६००००१) द्धतादिष्टनू
हस्तैर्मूलमभीष्टनू दृग्वधिश्चाहस्त लक्षाष्टकात् । १०२ ।
पृथ्वी का व्यासार्द्ध (१,२८,००,०००) हाथ है । इसके वर्ग को पृथ्वी के व्यासार्द्ध
वर्ग में १ जोड़कर उससे घटाने पर अन्तर फल का वर्गमूल निकालेंगे । यह एक
हाथ के शंकु की दृक् सीमा (५०५९/३९) हाथ होगी ।
इष्ट शंकु की दृक् सीमा निकालने के लिए एक हस्त शंकु की दृक् सीमा के
वर्ग को इष्ट शंकु की ऊंचाई से गुणा कर फल का वर्गमूल लेना होगा । इस
विधि से ८ लाख तक की दृक् सीमा आयेगी ।
दिनाब्द होरा मासे शज्ञानायान्यग्रहस्थितिः
दृष्टा तत्राल्प गतिकः स्थाप्य ऊर्ध्वे प्यधः पुनः । १०३ ।
दिन, वर्ष, होरा और मासों के अधिपति जानने के लिए अन्य प्रकार की
(प्राचीन) ग्रह स्थिति मानी जायेगी । सबसे कम गति वाले ग्रह को सबसे ऊपर
रखकर उससे नीचे
भूगोल खगोल वर्णनम् ३३५
सौरादिवर्ष का अधिपति, मास का अधिपति (सौर) और चान्द्रदिन का
अधिपति वर्षारम्भ काल से होगा ।
प्रोक्तं चान्द्रार्क्षतः सूर्य तेजः शत गुणाधिकम्
दिग् (१०) गुणव्यासतः क्षेत्र फलं शत गुणं भवेत् । १०९ ।
शास्त्रों ने कहा है कि सूर्य का तेज चन्द्र और नक्षत्रों के तेज से १०० गुणा
अधिक है । व्यास १० गुणा होने पर वृत्त का क्षेत्रफल १०० गुणा होता है ।
स्यात्तेजः प्रसरः क्षेत्रफलानुक्रमतो यतः
तद् व्यास दशमांश स्य दृश्य स्याशा गुणे पथि । ११०
तेज का प्रसार क्षेत्रफल के अनुसार होता है । अतः किसी व्यास के दशमांश
द्वारा जितना प्रकाश किसी दूरी पर होगा, पूर्ण व्यास का उतना ही तेज १० गुणा
दूरी पर होगा ।
शतांशस्तेजसोल्लभ्य इतितन्निर्णये स्थिते
द्विसहस्र गुणेदूरे स्वव्यासात्तिग्म दृश्यते । १११ ।
१० गुणा दूरी पर तेज १/१० भाग हो जाता है । अतः सूर्यव्यास से (२,०००)
गुणा दूरी पर सूर्य किरण
उष्ण स्पर्श समाप्तिः स्यात् किरणानानभस्तले
अन्य ग्रहाणा मृक्षाणां शतद्वय गुणे पथि । ११२ ।
की गर्मी प्रायः समाप्त हो जाती है । अतः अन्य ग्रहनक्षत्रों का तेज भी अपने
व्यास से २०० गुणा दूरी पर समाप्त हो जाता है । (क्योंकि उनका तेज सूर्य तेज
का १/१०० है)
शीतोष्ण स्पर्श नाशः स्यात्तथा भौमस्य तेजस
स्पर्शान्ति स्थानतः खां शुव्याप्ति, पञ्चाशता गुणैः । ११३ ।
इसी प्रकार पृथ्वी के तेज की गर्मी भी व्यास से २०० गुणा दूरी पर समाप्त
हो जाती है । किरण की उज्ज्वलता अपने व्यास से ५०० गुणा दूरी तक होती है ।
अधिकाकिरण व्याप्ते मार्गे तत्व (२५) गुणाधिके
दृष्टि सीमेत्यनुमितं दीपार्केन्द्वनुभूतितः । ११४ ।
किरण व्याप्ति की सीमा और २५ गुणा दूरी तक होती है । दृष्टि सीमा का
अनुमान मैने दीप, रवि और चन्द्र के अनुभव से किया है ।
व्यासो हि सूर्य बिम्बस्य ख ख खाक्ष्याद्रि योजनः (७२,०००)
स्पर्श कर्ण तदुष्णाणां प्रयुतघ्नाब्धि वासवाः (१४,४०,००,०००) । ११५ ।
सूर्य बिम्ब का व्यास (७२,०००) योजन है । अतः उसकी गर्मी सीमा कर्ण
(दूरी) १४,४०,००,०००) योजन है ।
३३६ सिद्धांत दर्पण
किरण व्याप्ति कर्णोऽस्य कोटिघ्नख भूधराः (७,२०,००,००००)
ख खा भ्रधृतयः कोटि गुणिता (१,८०,००,००,००,०००) दर्शन श्रुतिः । ११६ ।
सूर्य की किरण का तेज (७,२०,००,०००) योजन तक तथा किरण की दीखने
की सीमा (१,८०,००,००,००,०००) योजन है ।
कालाध्वनोनृमानं यत्तदप्रांगाग्नि (३६०) ताड़ितम्
दिव्यमानं भवेत्तेन व्यासोऽस्य शतकोटिभिः । ११७ ।
मनुष्य के काल और मार्ग मान को ३६० से गुणा करने पर दिव्य काल और
दूरी का मान होता है । दिव्य मान से सौ कोटि योजन
योजनैः सम्मितोऽण्डस्य नृमाने नासुकः पुनः
ख ख खा भ्रा भ्र खा प्रषड् वह्नि भि (३,६०,००,००,००,०००) योजनंमतः । ११८ ।
ब्रह्माण्ड का व्यास है । अतः मनुष्य मान से ब्रह्माण्ड का व्यास
३,६०,००,००,००,००० योजन है ।
ब्रह्माण्डान्त ख कक्षार्क भगण किरण ध्वस्त विभक्त मिस्त्रा
लक्षाघ्ना प्राङ्ग भूम्ननवखगुणशिखै (११,३०,९७,६०,००,०००)
योजनैः सम्मितास्मात्
सेक्षाकक्षैव भानो रवि तनु विकला द्वादशांशोऽपि दृश्यो
ऽन्येषां लिप्ता द्विसप्तां (७२) शक इतर मतव्यञ्जकं वच्मिकिञ्चित् । ११९ ।
जहां पर सूर्य और तारों द्वारा प्रकाश का नाश नहीं हो पाता है । ब्रह्माण्ड
में उस आकाश की कक्षा परिणाम ११,३०,९७,६० ,००,००० योजन है । इसको
सूर्य की दर्शन कक्षा भी कहा जा सकता है । इतनी दूरी पर सूर्य बिम्ब १/१२
विलिप्ता अर्थात् ५ प्रति विकला होता है । अन्य ग्रहों का बिम्ब लिप्ता का १/७२
अंश दीखता है । यहां मैं इससे भिन्न मत भी कुछ कहूंगा ।
श्रीमान् भास्कर दुष्करांक घटना विष्कार वाचस्पते
त्वं चेत् पुष्कर मात्थ भास्कर, कराव स्कन्दितान्तस्तमः
कल्पाद् भूत न भोग भुक्त सरणी तुल्यात्म कक्षं तदा
किं ब्रूमो गुरु वर्ग दुर्घटनया निर्विघ्नचित्ता वयम् । १२० ।
श्री भास्कराचार्य ! आपने कहा है कि सूर्य किरण द्वारा अन्धकार दूर होने के
बाद जहां से काला आरम्भ होता है, वही आकाश कक्षा है । इतना ही योजन
आप के आविष्कार के अनुसार ग्रह एक कल्प में चलते हैं । आपके समान विज्ञ
व्यक्ति यदि ऐसा कहता है, तो हम लोग विषाद् ग्रस्त होकर और क्या कहेंगे ।
स्वकक्षायां खेट भ्रमण गण भुक्ता प्रसरणी
यदि स्याद् ब्रह्माण्डोदर परिमिता का हनितदा
भूगोल खगोल वर्णनम् ३३७
शताब्दा निष्ठायां पुरि परिवृतायां प्रतिदिनं
कयाचिद् व्यक्त्यास्यात् कुपरिधि समस्तद् गति पथः । १२१ ।
अपनी कक्षा में घूम घूम कर ब्रह्माण्ड के भीतर यदि ग्रह आकाश कक्षा के
बराबर योजन चलता है, तो लोग अपने ही घर में प्रतिदिन घूम घूम कर पृथ्वि
की परिधि के बराबर मार्ग क्यों नहीं चलते ?
कोटिघ्नैर्नखनन्द षट्क नख भू
भू भृद् भुजंगेन्दुभि (१८,७१,२०,६९,२०,००,००,००,०००)
स्वत् प्रोक्तस्य च योजनैः ख परिधिस्तत्रापि लक्षांशके
नस्याद्वि द्विशरर्तु (६५२२) योजन रवि व्यासस्य यद्दर्शनं
द्योता व्याप्तिः तमः क्षितिः क्व घटते खान्तेऽपिते तन्मते । १२२ ।
आप आकाश की परिधि का मान (१८,७१,२०,६९,२०,००,००,००,०००) योजन
कहते हैं, इसके एक लाख भाग में भी एक भाग करने पर सूर्य व्यास ६५२२ योजन
नहीं होता है । (उससे बहुत अधिक है) तब आकाश गोल का अन्धकार गोल
परिधि तक सूर्य कैसे नाश करता है ?
सर्वाश्चर्य गहाम्बुधेर्भगवतः स्थूलेविभौधामनि
क्रीडाण्डाणुगणाः स्फुरन्ति कतिधा नो वेत्तिवेधा अपि
तस्माद् वेद पुराण वर्णित जगन्मानादिकं नो मृषा
किन्त्वस्मद् वसते र्भुवोऽन्तिक जुषामेषा स्थिति ज्योतिषाम् । १२३ ।
भगवान् सबसे बड़े आश्चर्य और आश्चर्य के महासमुद्र हैं । उनके विराट् स्थूल
रूप के भीतर कितने प्रकार के विश्व हैं । यह ब्रह्मा भी नहीं जान सकते हैं ।
अतः वेद और पुराणों में जगत का जो परिणाम दिया गया है, वह सब मिथ्या
नहीं होगा। किन्तु सिर्फ हमारी पृथ्वि के आसपास जो ग्रह दीखते हैं, उन्हीं की
स्थिति के विषय में मैं अनेक बातें कहूंगा ।
शंखासुर सुहतिनन्दित देववृन्दः
शंखारि सुन्दर तराग्र कराविन्दः
शंखाकृति क्षितिपतिः प्रतनोतु नित्यं
शंखादि भूतमयकाय निकाय भाजाम् । १२४ ।
जिनके द्वारा शंखासुर का वध होने पर देवगण प्रसन्न हुए थे, जिनका कर
रूपी कमल शंख चिह्न द्वारा और सुन्दर दीखता है, तथा जो शंख क्षेत्र के अधिपति
है । वह (महाप्रभुजगन्नाथ) आकाश आदि पांच भूतों के बने शरीर धारियों का
मंगल करे ।
३३८ सिद्धान्त दर्पण
इत्युत्कलो ज्वल नृपाल कुल प्रसूतः
श्री चन्द्र शेखर कृतौ गणितेऽक्षि सिद्धे
सिद्धान्त दर्पण उपाहित बाल बोधे ।
यातः प्रकाश इह भा भगृदूनविंशः । १२५ ।
इस प्रकार उड़ीसा के उज्ज्वल राजकुल में उत्पन्न श्री चन्द्र शेखर द्वारा गणना
और दृष्टि में समानता के लिए तथा बलकों की शिक्षा के लिए लिखे सिद्धान्त
दर्पण में नक्षत्र और आकाश के विषय में २९ वां प्रकाश समाप्त हुआ ।
विंशः प्रकाशः
गोलाधिकारे गोलादि यन्त्र वर्णनम्
यन्त्रं विनाग्रह ग्रहणादिकानां
स्याद् वासना न सुगमा समय क्रमश्च
तद् यन्त्र निर्मित मुपक्रमतेऽभिधातुं
श्रीचन्द्रशेखर कृतोप्रतिभानुसारत् । १ ।
बिना यन्त्रों के ग्रहों की गति तथा ग्रहण आदि आसानी से नहीं जाने जा
सकते हैं। कालगति भी बिना यन्त्र के नहीं जानी जा सकती। अतः श्रीचन्द्रशेखर
अपनी प्रतिभा के अनुसार यन्त्र निर्माण का वर्णन आरम्भ करते हैं।
यन्त्रं द्विधा भवति गोलक काल भेदात्
सन्त्येतयोः पुनरवान्तर भूरि भेदाः
तेभ्यः कियन्ति सुकराणि समाकलस्य
प्राधान्यतः शिशुमुदे विशदी करोमि । २ ।
गोल और काल भेद से यन्त्र कई प्रकार के हैं, उनके भीतर भी कई उपभेद ।
उनमें जो आसानी से बनाये जा सकते। उनमें कुछ के विषय में मैं यन्त्र के विषय
में नहीं जानने वालों के लिये वर्णन कर रहा हूँ।
गोलारूयमेककक्षं बहुकक्ष मितिद्विधेच्यते यन्त्रम्
तत्राद्यमुक्तमादिभिरपरं मत्कल्पनासिद्धम् । ३ ।
यहां दो प्रकार के गोल यन्त्रों के बारे में कहा जायेगा। एक एक कक्ष वाला
तथा दूसरा बहु कक्ष वाला। पहले के बारे में प्राचीन आचार्यों में कहा है। दूसरे
के बारे में स्वयं अपनी बुद्धि से कह रहा हूँ।
गुप्तस्थले सुविमले सुस्नातोऽलंकृती गणकः
सम्पूज्य भास्कर मुखान् ग्रहान् भचक्रं चतुर्व्यूहम् । ४ ।
गुप्त और स्वच्छ स्थान में स्नान कर और अलंकृत होकर गणक जाये और
वहां विभिन्न देवताओं की पूजा करे-सूर्यादि ग्रह, नक्षत्र मण्डल, चारों तरफ के
इन्द्रादि लोक पालान् गुह्यकवर्गं गुरुन विघ्नाय
बोधार्थं शिष्याणां गोलक यन्त्र निविधीयात् । ५ ।
इन्द्र आदि लोक पाल, (गुह्यक) तथा अपने गुरु-जिससे विघ्न दूर हों। इसके
बाद शिष्यों के यन्त्र ज्ञान के लिये गोलयन्त्र बान्धना आरम्भ करें।
निर्माय क्षितिगोलं षडं गुलाभितस्ववेष्टनं समिधा
द्वीपाद्रि सागराद्यैरंकितमन्तर्गत स्वप्रम् । ६ ।
काठ का एक पृथ्वी गोल बनायें जिसकी परिधि ६ अंगुल हो। उसमें द्वीप,
३४० सिद्धान्त दर्पण
सागर और पर्वत अंकित करें ।
तन्मध्ये ध्रुव यष्टिर्वृत्ता विष्टायततोत्तरावाच्योः
सरला करषट्क मिता कृशा दृढा मेरु दण्डाख्या । ७ ।
उसके बीच में ध्रुव स्थान में पतला छेद कर ध्रुव यष्टि लगायेंगे । यह यष्टि
(डण्डा) गोलाकार, लम्बा और सीधा ६ हाथ लम्बा होगा । यह मजबूत लकड़ी
का बनता है । इसे मेरुदण्ड कहा जाता है ।
कार्यात्तद्धरणार्थं सपाद कर पञ्चकान्तरं सौम्ये
याम्ये च स्तूप युगं पञ्चकरोन्नं दृढं स्थाप्यम् । ८ ।
इस मेरु दण्ड को पकड़ने के लिए सवा पांच (५-१/४।) हाथ की दूरी पर
दक्षिण और उत्तर में दो ५-५ हाथ का खूंटा दृढ़ता से स्थिर करेंगे ।
दारुण्यथवा भूमौ हस्तत्रितयोन्नत स्थले रन्ध्रे
निर्णाय स्तम्भ युगे ध्रुव यष्ट्यं प्र प्रवेशाय । ९ ।
यह दोनों खूंटे जमीन में या लकड़ी चौखट पर स्थिर किया जायेगा (लकड़ी
या जमीन से ऊंचाई ५ हाथ होगी) दोनों में तीन हाथ की ऊंचाई पर ध्रुव यष्टि
घुसाने के लिए एक एक छेद करेंगे ।
भूयो भूगोल दलादक्षांश समोन्नता नत स्थलयोः
भू सम्मुखीन रन्ध्रे सौम्यान्यस्तम्भयोः कार्ये । १० ।
३ हाथ की समान ऊंचाई वाले स्थल से उत्तर खण्ड में उत्तर की तरफ तथा
दक्षिण खण्ड में नीचे की तरफ एक एक छेद करेंगे । जिसमें ध्रुव यष्टि रह सके ।
आंशीत्वक् सारज्या पट्टकयाधार कशिका युग्मम्
बद्धवांशांशां (३६०) गुल मित मेकं क्षिति जाभिधं वृत्तम् । ११ ।
बांस की पतली पट्टी का ३६० अंगुल लम्बा दो वृत्त तैयार करेंगे । इसमें एक
का नाम क्षितिज वृत्त है ।
धृत्वा तत्र कराप्य मूर्ध्वाधर सौम्य याम्यकक्षाख्यम्
वृत्तं नियोज्य मन्द्राद् योगस्थान द्वये शुषिरे । १२ ।
दूसरा वृत्त ऊर्ध्वाधर वृत्त कहलाता है । इसका क्षितिज वृत्त से उत्तर दक्षिण
दिशा में जोड़कर मिलन स्थान में दो छेद
कृत्वात्रध्रुवयष्टि प्रवेशितास्तम्भरन्ध्रयोः स्थाप्या
श्लथमथविषुवत्कक्षा गोले बद्धाथाधोर्ध्व गता । १३ ।
कर उसमें ध्रुव यष्टि प्रवेश करेंगे और स्तम्भ के छेदों में उसे स्थापित करेंगे ।
यह दोनों वृत्त ऊपर रहेंगे जिससे उनको घुमाया जा सके । दोनों के ठीक बीच
में पृथ्वी का गोल रहेगा ।
गोलाधिकारे गोलादि वर्णनम् ३४१
भूमेर्निरक्ष रेखो परिखं रसोर्षबुधां (३६०) गुल प्रमिता
नाड़ी मण्डल मेषा नाड़ी फल चिह्निता कार्या । १४ ।
एक और ३६० अंगुल लम्बे बांस की पट्टी का वृत्त बनायेंगे और उसको पृथ्वी
की विषुवत रेखा के ठीक ऊपर अर्थात् क्षितिज और उर्ध्वाधर वृत्त के बीच में
रखेंगे । इसे नाड़ी मण्डल कहते हैं । इसमें नाड़ी पल भी चिह्नित करेंगें ।
तत्पार्श्वयो र्भुजैक द्वित्रि भुजापक्रम स्थलेषु पुनः
षड् वलयाः क्रमतोऽल्पाद्युरात्र वृत्तारूपया स्थाप्याः । १५ ।
विषुव वृत्त के दक्षिण उत्तर दोनों तरफ, १,२, और ३ राशि की क्रान्ति के
बराबर अंगुल की दूरी पर ३-३, कुल ६ अहोरात्र वृत्त (क्रमशः छोटे आकार का)
उस गोल में स्थापित करेंगे ।
ध्रुव यष्टि शिखा विद्ध स्वनाभि फलकद्वयं न्यसेदभितः
तन्नेमौ च शलाकाः खरस गुणा (३६०) सन्निवेश्यासााम् । १६ ।
ध्रुव यष्टि के दोनों तरफ दो वृत्ताकार पट्टा लगायेंगे । जिसके केन्द्र के छेद
में यष्टि को लगाया जायेगा । उसमें ३६० अंशों का चिह्नित कर प्रत्येक अंश पर
एक शलाका परिधि पर लगायेंगे ।
वलयार्द्धाकाराणामग्रपि वज्रलेपसदृढानि
कृत्वान्तरजतुलाधोर्न्यसेद् ध्रुवौ सौम्य याम्यौ च । १७ ।
शलाकाओं को वज्र लेप से दृढ़ कर देंगे जिससे वह गिरे नहीं । इस फलक
के मेष आरम्भ में (०° पर) उत्तर ध्रुव तथा तुला आरम्भ (१८०°) में दक्षिण ध्रुव
चिह्न देंगे ।
ध्रुव चिह्नात् फलकान्त वलये रेकांगु लान्तरै रंशाः
लेखास्तिर्यग् भांशा अथ गोले वेणुजैवैलयेः । १८ ।
ध्रुव चिह्न से फलक के अन्त में बांस के जो वलय हैं, उसमें एक एक अंगुल
पर अंश चिह्नित करेंगे (३६० अंगुल पर ३६० अंश) यह चिह्न फलक के चिन्हों
से तिरछे (दूसरे तल के वृत्त में) होंगे ।
आविषुवद् वलयान्तात् क्रमाधिकै र्गाढ़ सूत्र संनद्धैः ।
अक्षांशा रचनीया इत्यभितो भांश (३६०°) संस्थाने । १९ ।
काठ के पृथ्वी पर बांस पर गोले में ध्रुव से विषुव की तरफ बांस के पतले
पतले वृत्त चिपकायेंगे । ध्रुव से ये वृत्त क्रमशः मोटे होते जायेंगे । तथा विषुव
पर सबसे मोटा होगा ।
निश्चित्य राशि सन्थोन प्रवृत्तं तत्तदर्क संलग्नम्
अयनांशं संस्कृत तुला मेषाद्योः संस्पृशद् विषुवम् । २० ।