सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)
Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara
सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा
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सागर और पर्वत अंकित करें ।
तन्मध्ये ध्रुव यष्टिर्वृत्ता विष्टायततोत्तरावाच्योः
सरला करषट्क मिता कृशा दृढा मेरु दण्डाख्या । ७ ।
उसके बीच में ध्रुव स्थान में पतला छेद कर ध्रुव यष्टि लगायेंगे । यह यष्टि
(डण्डा) गोलाकार, लम्बा और सीधा ६ हाथ लम्बा होगा । यह मजबूत लकड़ी
का बनता है । इसे मेरुदण्ड कहा जाता है ।
कार्यात्तद्धरणार्थं सपाद कर पञ्चकान्तरं सौम्ये
याम्ये च स्तूप युगं पञ्चकरोन्नं दृढं स्थाप्यम् । ८ ।
इस मेरु दण्ड को पकड़ने के लिए सवा पांच (५-१/४।) हाथ की दूरी पर
दक्षिण और उत्तर में दो ५-५ हाथ का खूंटा दृढ़ता से स्थिर करेंगे ।
दारुण्यथवा भूमौ हस्तत्रितयोन्नत स्थले रन्ध्रे
निर्णाय स्तम्भ युगे ध्रुव यष्ट्यं प्र प्रवेशाय । ९ ।
यह दोनों खूंटे जमीन में या लकड़ी चौखट पर स्थिर किया जायेगा (लकड़ी
या जमीन से ऊंचाई ५ हाथ होगी) दोनों में तीन हाथ की ऊंचाई पर ध्रुव यष्टि
घुसाने के लिए एक एक छेद करेंगे ।
भूयो भूगोल दलादक्षांश समोन्नता नत स्थलयोः
भू सम्मुखीन रन्ध्रे सौम्यान्यस्तम्भयोः कार्ये । १० ।
३ हाथ की समान ऊंचाई वाले स्थल से उत्तर खण्ड में उत्तर की तरफ तथा
दक्षिण खण्ड में नीचे की तरफ एक एक छेद करेंगे । जिसमें ध्रुव यष्टि रह सके ।
आंशीत्वक् सारज्या पट्टकयाधार कशिका युग्मम्
बद्धवांशांशां (३६०) गुल मित मेकं क्षिति जाभिधं वृत्तम् । ११ ।
बांस की पतली पट्टी का ३६० अंगुल लम्बा दो वृत्त तैयार करेंगे । इसमें एक
का नाम क्षितिज वृत्त है ।
धृत्वा तत्र कराप्य मूर्ध्वाधर सौम्य याम्यकक्षाख्यम्
वृत्तं नियोज्य मन्द्राद् योगस्थान द्वये शुषिरे । १२ ।
दूसरा वृत्त ऊर्ध्वाधर वृत्त कहलाता है । इसका क्षितिज वृत्त से उत्तर दक्षिण
दिशा में जोड़कर मिलन स्थान में दो छेद
कृत्वात्रध्रुवयष्टि प्रवेशितास्तम्भरन्ध्रयोः स्थाप्या
श्लथमथविषुवत्कक्षा गोले बद्धाथाधोर्ध्व गता । १३ ।
कर उसमें ध्रुव यष्टि प्रवेश करेंगे और स्तम्भ के छेदों में उसे स्थापित करेंगे ।
यह दोनों वृत्त ऊपर रहेंगे जिससे उनको घुमाया जा सके । दोनों के ठीक बीच
में पृथ्वी का गोल रहेगा ।